Friday, 20 January 2017

डायनेमिक पर्सनालिटी आज लेगी शपथ

डायनेमिक पर्सनालिटी, डोनाल्ड जॉन ट्रंम्प आज दिनांक 20 जनवरी 2017 को 45वें अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।

कडे़ सुरक्षा इंताजामात के बीच चलने वाला यह समारोह 19 जनवरी 2017 से शुरू हो चुका है। कैपिटल हिल में होने वाले मुख्य समारोह से पहले लिंकन मेमोरियल पर हॉलीवुड के साथ-साथ बॉलीवुड के लोग भी अपनी छटा बिखेरेंगे। पूर्व मिस इण्डिया मनस्वी ममगई के नेतृत्व में 30 भारतीय कलाकारों ने प्रस्तुति दी है।
सात मिनट के इस कार्यक्रम की मुंबई के कोरियोग्राफर सुरेश मुकुन्द ने तैयार किया था। 20 जनवरी 2017 को सम्पन्न होने वाले इस शपथ ग्रहण समारोह का थीम ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन‘ है।


मुख्य न्यायाधीस जॉन रॉबर्ट्स शपथ दिलायेंगे। इस मौके पर राष्ट्रपति ट्रम्प दो बाइबिलों की शपथ लेंगे उनमें से एक वह होगी, जिसकी शपथ अब्राहम लिंकन ने ली थी, दूसरी वह होगी, जिसे ट्रम्प की माता श्री ने उन्हें बचपन में भेंट की थी।

भारत में भी ट्रम्प के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने पर आयोजन हो रहे हैं, और खुशियां मनाकर मिठाईयां बांटी जा रही हैं। स्तम्भकार, सतीश प्रधान द्वारा भी राष्ट्रपति ट्रम्प को बधाई पेषित की जा रही है, और विश्वास व्यक्त किया जा रहा है कि मा0 डोनाल्ड ट्रम्प के डायनेमिक निर्देशन में विश्व को एक नई राह मिलेगी। ट्रम्प जी को बहुत-बहुत बधाई।

अमेरिका का राष्ट्रपति हिन्दू भी हो सकता है



वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने आखिरी संवाददाता सम्मेलन में अपने अनुभव के आधार पर उम्मीद जताई कि भविष्य में किसी भी धर्म एवं मूल का कोई भी व्यक्ति (महिला/पुरूष) अमेरिका का राष्ट्रपति हो सकता है।
उनका कहना है कि यदि हम हर किसी के लिए अवसर बनाये रखते हैं, तो निश्चित रूप से हमारे पास एक महिला राष्ट्रपति भी होगी। ऐसा उन्होंने हिलेरी क्लिंटन के परिपेक्ष्य में ही कही है क्योंकि इस चुनाव में मिसेज क्लिंटन को सपोर्ट कर रहे थे। आगे उन्होंने कहा कि लैटिन मूल का राष्ट्रपति भी होगा, यहूदी राष्ट्रपति भी होगा और हिन्दू भी राष्ट्रपति होगा।

ओबामा वर्ष 2008 में अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गये थे, इससे पूर्व का इतिहास केवल श्वेत राष्ट्रपति होने का ही रहा है! उन्होंने कहा कि अमेंरिका में हर नस्ल की प्रतिभा विकसित हो रही है, और यही अमेरिका की ताकत भी है।
उनका कहना है कि जब हमारे पास हर किसी को अवसर देने की शक्ति है, और हर कोई अपने क्षेत्र में बना हुआ है तो इसका परिणाम भी हमें ही मिलेगा।


Tuesday, 10 January 2017

ओबामा सत्ता के सुगम हस्तांतरण के बजाय इसे टिकलिस बना रहे हैं?

   
    
        ट्रम्प अमेरिकी जनता द्वारा विधिवत चुने गये प्रेसीडेन्ट हैं, फिर क्यों बराक ओबामा सत्ता के सुगम हस्तांतरण के बजाय इसे टिकलिस बना रहे हैं?
जबकि दुनियाभर के लोगों को याद रखना चाहिए की, ट्रम्प लीक पर चलने वाले व्यक्ति नहीं हैं, और उन्हें सत्ता प्राप्त करने में मात्र दो सप्ताह का ही समय शेष हैं। आगामी 20 जनवरी को वे अमेरिका का प्रेसीडेन्ट पद प्राप्त कर लेंगे, फिर क्यों निवर्तमान होने जा रहे राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने अन्तिम समय में ऐसा कार्य करने जा रहे हैं, जिससे राष्ट्रपति ट्रम्प को परेशानी हो।

सभी जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प  एक क्रांतिकारी राष्ट्रपति हैं, वो जो करना चाहेंगे, उसे करने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता, ठीक उसी तरह, जैसे भारत के प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी को कोई भी शख्शियत उन्हें वो करने से नहीं रोक सकती, जो की वो करना चाहते हैं। उनका नोटबन्दी का फैसला, चाहकर भी न्यायालय रोक नहीं पाया, जबकि उसकी पूरी इच्छा नोटबन्दी के फैसले को पलटने की थी, लेकिन सभी की अपनी-अपनी मजबूरियां रहीं, जबकि नमो (नरेन्द्र मोदी) की कोई मजबूरी ना तो थी और ना ही है।
ओबामा को डोनाल्ड ट्रम्प की धूआंधार ट्वीट से ही समझ लेना चाहिए था कि वे किस व्यक्तित्व के इंसान हैं। उनसे टकराकर कोई, कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता? ट्रम्प की कार्यर्शली का भी विश्व को दीदार होना चाहिए। देखा जाना चाहिए कि उनके शासन से अमेरिका को और विश्व को क्या मिलने वाला है। सारी अर्थव्यवस्था, मात्र धुरन्धर कहे जाने वाले अर्थशास्त्रीयों के भरोसे ही निबटा ली जाती तो, किसी भी देश में अर्थशास्त्रीयों की कमी नहीं है। बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री सभी देश में हैं, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता केवल पूंजीपति पैदा करने के प्रति ही समर्पित है।

समझ में नहीं आता कि रूस की तरफ नरम रुख एवं दोस्ती को आतुर, अमेरिका के भावी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए राष्ट्रपति पद से मात्र दो सप्ताह में विदा होने वाले राष्ट्रपति बराक ओबामा, उलझने क्यों छोड़ कर जाना चाहते हैं और काली नस्ल पर धब्बा क्यों लगाना चाहते हैं।
उन्हें तो शांतिपूर्वक और बगैर किसी दुराग्रह के भावी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को सत्ता सौंप देनी चाहिए।
उन्होंने ऐसा माहौल क्यों बनाया कि भावी राष्ट्रपति ट्रम्प को सत्ता के सुगम हस्तांतरण में अडंगा डालने का ट्वीट करना पड़ा। ये बहुत ही गंभीर मामला है, और यदि नहीं होता तो, हवाई में परिवार संग सालाना छुट्टियां मना रहे निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा को डोनाल्ड ट्रम्प को फोन पर बात करने की आवश्यकता ना पड़ती। ओबामा को स्मरण रहना चाहिए था कि ट्रम्प छुपे हुए राजनीतिज्ञ हैं, वे सीधे-सपाट और बोल्ड व्यक्तित्व के धनी हैं और जो कुछ उन्हें महसूस होगा, उसे बोलने में तनिक भी हिचकिचाने वाले नहीं हैं।
ऐसा शायद विश्व के इतिहास में पहली बार होने जा रहा है कि शू्रड पॉलिटीशियन के स्थान पर अमेरिका जैसे देश का राष्ट्रपति एक धुंआधार व्यक्तित्व का धनी इंसान होने जा रहा है, जो अपने फैसलों से विश्व को आश्चर्यचकित जरूर करेगा।
राष्ट्रपति का पद छोड़ते-छोड़ते भी निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा रूस द्वारा साइबर हमले के जबाब में प्रतिबन्धों की ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं, जिसे ट्रम्प जैसा राष्ट्रपति बदल ना पाये, लेकिन इसे बराक ओबामा की नादानी ही कहा जायेगा।
विश्व के इतिहास में यह पहली बार देखने को मिला है कि यूनाइटेड नेशन पर भी किसी ने पहली बार गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि वैश्विक संस्था यू0एन0 समस्याओं को सुलझाने के स्थान पर उन्हें उलझाता नहीं, बल्कि पैदा करता है। उन्होंने फ्लोरिडा में कहा कि यू0एन0 के पास इतनी अधिक क्षमतायें हैं, लेकिन वह अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहा है। साथ ही उन्होंने सवाल भी दाग दिया कि आपने यू0एन0 को समस्याओं को सुलझाते कब देखा? वे ऐसा नहीं करते। वे समस्यायें पैदा करते हैं, इसके अलवा भी बहुत सी बातें हैं जो सार्वजनिक तौरपर नहीं कही जा सकतीं, लकिन वे इन बातों पर गम्भीरता से विचार करते हैं।
इसी के साथ सदस्य देशों की भूमिका से भी वे असंतुष्ट दिखाई दिये। वैसे तो अभी हाल ही में 12 दिसम्बर को यू0एन0 के महासचिव पद की शपथ एंटोनियो गुटेरेस ने लेने के साथ ही स्पष्ट किया है कि वे ‘सेतुनिर्माता‘ की भांति कार्य करेंगे। लेकिन लगता है, पहले तो उन्हें आगामी राष्ट्रपति ट्रम्प को ही संतुष्ट करना पड़ेगा।

ट्रम्प की यह अति गंभीर टिप्पणी है कि विश्व निकाय (यू0एन0) के 193 देश बातचीत और समय बिताने के अलावा कुछ नहीं करते। मेरा भी नजरिया डोनाल्ड ट्रम्प से ही मेल खाता है कि यू0एन0 मात्र एक सफेद हाथी है, जिस पर शान की सवारी की जा रही है।
वैसे तो निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जाते-जाते रूस पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है, लेकिन ये कितने दिनों और घन्टों की होगी, यह तो वक्त ही बतायेगा। राष्ट्रपति चुनावों के दौरान साइबर हमलों के जवाब में रूस के खिलाफ प्रतिबन्ध लगाने के तौर पर रूस के 35 अधिकारियों को देश छोड़ने का आदेश दिया गया है। दो रूसी परिसर बंन्द करने के अलावा नौ इकाईयों पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रूसी हैकिंग के जवाब में ये कदम उठाये हैं।
दरअसल अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा का मानना है कि अमेरिका में समपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत सुनिश्चित कराने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साइबर हमले कराये। उन्होंने डोनाल्ड की डेमोक्रेटिक प्रतिद्वन्दी हिलेरी क्लिंटन को बदनाम करने के लिए अभियान चलाने का आदेश दिया था।
ओबामा के जॉंच आदेश पर खुफिया विभाग द्वारा सौंपी गई 31 पन्नों की रिर्पोट का सार यह है।
1 पुतिन ने 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए व्यापक साइबर अभियान चलाने का आदेश दिया।
2 इसका मकसद लोकतन्त्र में जनता का भरोसा कमजोर करना, हिलेरी को बदनाम करना और उनकी जीत की संभावना को नुकसान पहुंचाना था।
3 रूसी खुफिया अधिकारियों ने डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी और वरिष्ठ डेमोक्रेट नेताओं के ई-मेल जारी करने के लिए विकिलीक्स, डिसीलीक्स और गुसिफर की मदद ली।
4 इन दावों के समर्थन और पुतिन की सीधी भूमिका को लेकर रिर्पोट में किसी तरह के सुबूत नहीं दिये गये हैं।
इस पर डोनाल्ड ट्रम्प की प्रतिक्रिया ये है।
अ रूस, चीन सहित कई देश और समूह अमेरिकी संस्थानों के बुनियादी साइबर ढ़ंाचे को लगातार तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, चुनाव के परिणाम पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
ब रिपब्लिकन नेशनत कमेटी को हैक करने का प्रयास किया गया था, लेकिन हैंिकंग से बचने की मजबूत सुरक्षा प्रणाली के कारण हैकर विफल रहे।
स पद संभालने के 90 दिनों के भीतर हैकिंग से निपटने की रणनीति तैयार करने के लिए कार्यदल का गठन करूंगा।
द उन तरीकों, उपकरणों और रणनीतियों पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा नहीं होनी चाहिए जिसका इस्तेमाल हैकिंग रोकने के लिए हम करते हैं।

Saturday, 29 October 2016

डीएवीपी का न्यू मीडिया में भी खेल

      सतीश प्रधान    

डीएवीपी के एक निदेशक है, अनिन्दय सेनगुप्ता, जिनके पास वेबसाइट्स को सूचीबद्ध किये जाने का अधिकार के0 गणेशन, महानिदेशक डीएवीपी ने दिया है। 01 जून 2016 को उन्होंने फाइल नं0 Dir(New Media) /EAC/Websites/2014/New Media  दिनांक 01 जून 2016 से वेबसाइट्स के सूचीबद्धीकरण और उनके रेट फिक्स करने के लिए पालिसी गाइडलाइन बनाई और डीएवीपी की साइट पर अपलोड की। यहाॅं भी एक अलग स्कैण्डल तैयार हो रहा है।
उक्त गाइडलाइन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आफिस मेमो नं/45/2011-MUC  दिनांक 25 मई 2016 के तहत जारी की गई है।इनके द्वारा जारी गाइडलाइन के प्रथम पेज को यहाॅं इसलिए स्पष्ट करना चाहता हूं कि ये अधिकारी जानबूझकर नोटिफिकेशन का गलत मतलब निकालकर मीडिया को धोखा दे रहे हैं। पालिसी के प्रथम पेज की फोटो पेस्ट की जा रही है।

इसमें सेनगुप्ता ने लिखा है कि The Policy Guidelines for Emplacement and Rate Fixation for Central Govt. Advertisements on Websites are being notified.
क्या सेनगुप्ता बतायेंगे कि इसके ड्राफट को कैबीनेट से कब पास कराया गया और इसे लोकसभा में कब प्रस्तुत किया गया? अथवा सरकार ने इसका नोटिफिकेशन कब जारी किया। 
इस नीति में इसका भी जिक्र है कि वेबसाइट को सूचीबद्ध कराने वालों के लिए अलग से प्रार्थना-पत्र आमंत्रित किये जायेंगे। वे समय-समय पर वेबसाइट को चेक करते रहें। इसमें सेनगुप्ता ने कम्पीटेन्ट अथारिटी का जिक्र किया है, लेकिन ये नहीं बताया है कि आखिरकार काम्पीटेन्ट अथारिटी है, कौन?
इस तथाकथित नीति में यूनिक यजर्स की बात की गई है। वेबसाइट सूचीबद्धता को तीन भागों में विभक्त किया गया है। ए, बी, एवं सी कैटेगरी। सी कैटेगरी के लिए न्यूनतम ढ़ाई लाख से बीस लाख यूनिक यूजर्स, बी केटेगरी के लिए बीस लाख एक से पचास लाख तक, एवं आ कैटेगरी के लिए पचास लाख प्लस यूनीक यूजर्स की शर्त रखी गई है अब इसे देखिए, ये शर्त व्यावहारिक है अथवा अव्यावहारिक।
डीएवीपी ने अपनी वेबसाइट वर्ष 2012 में बनाई है और आज दिनांक 29 अक्टूबर 2016 के दो बजकर दस मिनट तक उसकी ही वेबसाइट को क्लिक करने वालों की संख्या 1,77,75,232 (दो करोड़ सत्तर लाख पचहत्तर हजार दो सौ बत्तीस) है। जबकि हालात ये हैं कि अपने ही कम्प्यूटर पर एक के बाद, दूसरी, तीसरी,..........दसवीं विण्डो आप खोलें तो 30 सेकण्ड में ही विजिटर की संख्या 100 से भी ऊपर पहुंच जाती है। यानी ये यूनीक यूजर्स नहीं हैं।
यूजर्स तो आप अकेले ही हैं, लेकिन जितनी बार आप डीएवीपी की विण्डो  खोलेंगे उतने ही नम्बर इसके बढ़ जायेंगे। अब देखिये 2012 से इस गति  से चल रही इस वेबसाइट की हालत की इन लगभग 55 महीनों में उसकी साइट पर विजिटर्स की संख्या हुई 3,23,186 (तीन लाख तेईस हजार एक सौ छियासी) ये पेज व्यू हैं, यूनीक यूजर्स नहीं। इसके यूनिक यूज़र्स निकाले जायँ  तो ये बीस हज़ार से अधिक नहीं बैठेंगे। देखिए जब वेबसाइट सूचीबद्ध करने वाले डीएवीपी संस्थान की हालत ये है कि वो स्वंय सी  केटेगरी में नही आ रहा, तो अन्य का आना कैसे सम्भव है, जबकि डीएवीपी की वेबसाइट रोजाना खोलना तो लाखों लोगों की मजबूरी है।
Websites will get the advertisements like this.
इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि डीएवीपी के ये अधिकारी कितने नासमझ, अव्यवहारिक और वास्तविकता से दूर हैं। ये कौन सी वेबसाइट्स को सूचीबद्ध करना चाहते हैं, और डीएवीपी के फण्ड को किस तरीके से साइफन करना चाहते हैं, ये जाँच का विषय है.
सुनने में आया है कि वेबसाइट को सूचीबद्ध करने का रेट आठ लाख रूपये है। कितना विज्ञापन ये वेबसाइट पर देंगे, ये तो लेने वाले ही जानें। जैसे प्रिन्ट में लगे अधिकारी दैनिक समाचार-पत्रों की सूचीबद्धता में दो-दो लाख ले लेते हैं, उसके बाद उनका काम खत्म। अब विज्ञापन चाहिए तो उसके लिए पचास प्रतिशत अलग से लेकर विज्ञापन दिलाने वाले दलाल को पकड़िए, वही हाल इस न्यू मीडिया में सेनगुप्ता भी करने जा रहे हैं।
हालात ये हैं कि ये वेबसाइट का सूचीबद्धीकरण कर रहे हैं अथवा ठेकेदारों का। इन्होंने तो टेण्डर निकाल दिया है। जिसमें दो तरह की बिड पड़नी हैं, एक कामर्शियल और दूसरी फायनेन्सियल। डीएवीपी के ये अधिकारी लूट का धन्धा स्थापित कर रहे हैं, वो भी नरेन्द्र मोदी की सरकार में।
स्थापित की गई इस फर्जी नीति के बिन्दु-4 के द्वितीय पैरा में लिखा है कि सूचीबद्धता के लिए विण्डों को- The Window for applications for the next panel will be opened from 01 Dec. to 31 of the previous year for the panel that will come into the following year. For example, the Window for the panel that will come into effect from April 01, 2018 shall be opened from Dec 01 to 31, 2017. The first panel under these Guidelines shall be valid till March 31, 2017.

इसके बाद भी इस फर्जी नीति के तहत अभी से आवेदन-पत्र कैसे मांग लिए गये। इतनी जल्दी सेनगुप्ता को कयों हुई? किसका दबाव था, समय से पूर्व आवेदन पत्र आमंत्रित करने की? ये गणेशन के आदेश पर हुआ अथवा सूचना सचिव श्री अजय मित्तल का वर्तमान में खोली गई विंण्डो पर फायनेन्सियल बिड़ की अन्तिम तिथि बढ़ाये जाने के बाद 10 नवम्बर 2016 है। अब जिस वेबसाइट वाले को एक वर्ष 10 नवम्बर को पूरा हो रहा है, उसका तो सेनगुप्ता ने हक़ मार ही दिया, वो भी भ्रष्टाचार के इटरेस्ट में। 
वेबसाइट के टेण्डर में भाग लेने वाले सावधान रहें, और आठ लाख रुपया कतई ना दें, क्यों कि कुछ लोग न्यायालय में जा रहे हैं। और मामला स्टे हो गया तो कब खुलेगा, पता नहीं। तबतक डीएवीपी के इन अधिकारियों पर क्या गाज गिरती है, पता नहीं।
कुछ पत्रकारों का कहना है कि इसमें से कुछ अधिकारियों ने अपना कालाधन विदेश में रखा हुआ है। और कुछ ने अभी-अभी 40 प्रतिशत देकर सफेद किया है। इनका काला धन खोजने में सी0बी0आई को भी पसीने आ जायेंगे।
सेनगुप्ता जी  वेबसाइट के लिए आवेदन की तिथि को 31 दिसम्बर 2016 तक बढ़ा दें, अन्यथा आप भी जानबूझकर लोगों को गुमराह करने, सूचना मंत्रालय को धोखे में रखने तथा वेबसाइट वालों को गुमराह करने के दाषी पाये जायेंगे। गणेशन,  नाम रख लेने मात्र से गणेश जी नहीं बचायेंगे। ऐसा ही हाल डीएवीपी के प्रकाशन विंग का भी है, जिसकी  कहानी आपको आगे बताई जाएगी। साथ ही ये भी बताया जायेगा की डीएवीपी का उक्त प्रिंटिंग प्रेस से कैसा एग्रीमेंट है। क्या वैसा ही एग्रीमेंट है, जैसा प्रोफॉर्मा उसने हम प्रकाशकों को जारी किया है. क्या उसका एग्रीमेंट भी वैसा ही नहीं होना चाहिए जैसा उसने प्रकाशकों के लिए जारी किया है।.




Thursday, 27 October 2016

डीएवीपी को तोड़ दिया जाये, काम विदेशी ऐजेन्सी को दिया जाये

 
DAVP, a unit of I&B Ministry, havily destroying
 the public image of Prime Minister of India in the Media
        
        समाचार-पत्रों  के कार्पोरेट मीडिया घरानों के प्रकाशक, (ए0बी0सी0) आडिट ब्यूरो आॅफ सर्कुलेशन, रजिस्ट्रार न्यूजपेपर्स आॅफ इण्डिया (आर0एन0आई), प्रेस काउन्सिल, प्राइवेट न्यूज ऐजेन्सियां और डीएवीपी के कमीशन खोर अधिकारियों का खेल है, प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016, बगैर एक्ट, बगैर किसी रूल, बिना किसी नोटिफिकेशन के जारी की गई प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016, जिसमें मीडिया के बारे में तो एक शब्द भी नहीं है, सिवाय विज्ञापन व्यवस्था को किस तरह से ऐसा बनाया जाये कि प्रतिमाह मोटी कमाई डीएवीपी के अधिकारी हड़प लें, केवल इसी का तसकरा है। देश का मीडिया जाये ऐसी-की-तैैसी में। वो परेशान होता है तो करे भाजपा और उसके नरेन्द्र मोदी को बदनाम।
Act overruled, unlawfull Print Media Advt. Policy-2016,
 framed in the regime of  the above  Minister.
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  ये फर्जी तथाकथित नीति, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए कांग्रेसी  शासन में नियुक्त डीएवीपी के महानिदेशक के0 गणेशन एवं उनके चेले आर0सी0जोशी की देन है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है, जो न्यायालय में एक मिनट भी नहीं ठहर सकती और जिसे जज महोदय एक झटके में उठाकर फेंकने के साथ ही इन अधिकारियों के खिलाफ स्ट्रक्चर पास कर सकते हैं, क्योंकि इस ड्राफ्ट को तो कैबीनेट तक में नहीं रखा गया है, और मनमानापन कर रहे हैं।
  ये देश ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की मनमर्जी एवं मनमाने तरीके से नहीं चलाया जा सकता? डीएवीपी के तो अभी अपने ही कार्यालय पूरे देश में नहीं हैं। जिन कार्यालयों के दम पर डीएवीपी अपनी वर्किंग करने की कोशिश कर रहा है, वे पी0आई0बी0 के कार्यालय हैं, पी0आई0बी0 अलग महानिदेशालय है, और उसके अलग महानिदेशक हैं। पी0आई0बी0 के अधिकारी और कर्मचारी इतने खाली हैं कि उनके पास काम नहीं है, और वे डीएवीपी का काम करने के लिए खाली हैं तो उनके कार्यालय को खत्म करके पूरी तौर पर डीएवीपी को दे देना चाहिये।
  एकदम फर्जी एवं बकवास नीति-2016 के माध्यम से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की छवि को मीडिया विरोधी घोषित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, वो कतई ठीक नहीं है। इस नीति को हवा दी है, पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने, वह भी के0 गणेशन के निर्देशन में। एक विज्ञापन बांटने वाली ऐजेन्सी डीएवीपी को मीडिया अच्छा नहीं लग रहा, क्योंकि  उसके अधिकारियों का करेक्टर लायजनिंग वाला है। उसे तो अपनी ही तरह के दलाल चाहिए। इसीलिए उसका सारा जोर ऐजेन्सियों पर ही रहता है, फिर चाहे ये विज्ञापन की हों अथवा न्यूज की।
  इस बनाई गई क्या पैदा की गई फर्जी नीति में कहीं भी न्यूज कनटेन्ट की ना तो कोई बात है, और ना ही कोई प्वाइंट। पी0आई0बी0 की खबरों, लेख और फोटोज् को छापने के लिए कुछ भी नहीं कहा गया है। कोई अखबार कितने प्रतिशत विज्ञापन छापेगा और कितना परसेन्ट उसमें न्यूज कनटेन्ट होगा, इसका भी जिक्र नहीं है। क्योंकि अखबार किसे कहते हैं, इसका तो डीएवीपी के अधिकारियों का ज्ञान ही नहीं है। बस अपनी चौधराहट दिखाने के लिए डीएवीपी वसूली ऐजेन्ट की भूमिका में कार्य कर रहा है।
  प्रेस काउन्सिल की लेवी की वसूली उसने एक झटके में करा दी। सारा अधिकार प्रेस काउन्सिल के पास होने के बाद भी वह अपनी लेवी नहीं ले पा रहा था, लेकिन डीएवीपी के एक फर्जी और अन्यायिक आदेश/नीति ने करोड़ों की वसूली करा दी। डीएवीपी ठीक उसी रोल में कार्य कर रहा है, जैसे एक माफिया/ डाॅन करता है। जो अरबपति/व्यवसायी अपने यहाॅं कार्यरत स्टाफ को उनकी उचित सेलरी तक नहीं देता, माफिया/डान की एक फोन काॅल पर करोड़ों हग ही नहीं देता है बल्कि उसके दरवाजे पर पहुंचकर अपनी और अपने परिवार के प्राणों की भीख भी मांगता है। अपना मूंह बांधकर नगद/कैश अपनी गाड़ी में रखकर अकेला डाॅन के बताये स्थान पर पहुंचाता है, सुरक्षित लौट आये तो बहुत बड़ी बात।
  छोटे एवं मझोले अखबारों के लिए डीएवीपी ऐसा ही माफिया डाॅन बना हुआ है। एक बात और है कि उस डाॅन के पीछे वहां का सरकारी तंत्र उसके साथ होता है, तभी वह ऐसा कर पाता है, वरना तो उ0प्र0 में भी श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे माफिया डाॅन का सरकार के मुखिया ने ही एनकाउन्टर करा दिया। उसी का नहीं सारे माफियाओं /गुण्डों का यही हश्र होता है, बशर्तेे सरकार में बैठे किसी ईमानदार नेता अथवा अधिकारी को समझ में आ जाये कि इसने बहुत अत्याचार कर लिया अब बस। बस समझिये जिस दिन कायदे के ईमानदार और देशभक्त सचिव अथवा कैबीनेट सचिव को समझ में आ गया कि डीएवीपी की तो आवश्यकता ही नहीं, ये काम तो अंर्तराष्ट्रीय   स्तर की किसी संस्था से भी कराया जा सकता है, तो उसी पन्द्रह प्रतिशत के कमीशन में ही वह ऐजेन्सी डीएवीपी से अच्छा कार्य कर देगी, जिसे डीएवीपी समाचार-पत्रों को जारी किये गये विज्ञापन में से काट लेता है। वैसे डीएवीपी जैसे सफेद हांथी की इस गरीब देश में  कोई आवश्यकता नहीं है। ये संस्थान केवल भ्रष्टाचार करने के लिए बना हेै।
  ए0एम0ई0 और एम0ई0, उप-निदेशक, निदेशक, अति0 महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों पर बैठे अधिकारियों के पाप का घड़ा अब भर गया है, जिसका फूटना अत्यंत आवश्यक है। कितने अधिकारी सी0बी0आई0 की गिरफ्त में आयेंगे, कितने सोसाइड करेंगे, इनकी गिनती किया जाना ही शेष है। देश के छोटे एवं मझोले समाचार-पत्रों को समाप्त करने के उद्देश्य से बड़े कहे जाने वाले कार्पाेरेट मीडिया घरानों के नेक्सस ने ऐसी नीति को बनाने में अपनी महत्वपूंर्ण भूमिका निभाई है। अरबों के विज्ञापन बटोरने के बाद भी उसका पेट नहीं भर रहा।
  अपने यहाॅं कार्यरत पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए उसके पास पैसा नहीं है, लेकिन नर्तकी नचाने, इवेन्ट आयोजित करने, बालीवुड में प्रोग्राम आयोजित करने और फैशन शो आयोजित करने के लिए धन की कमी नहीं है। उसने अपने संस्थान से सम्पादकीय लोगों को किनारे कर दिया है। प्रबन्ध सम्पादक और सम्पादक पद पर मालिक बैठ गया है अथवा विज्ञापन का कार्य करने वाले को बिठाकर हर तरह से सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन लूटने में लगा है। जिसके लिए वह कमीशन और लड़कियों का भी इस्तेमाल करता है। 
  वरना तो हालात ये हैं कि अपने को अंर्तराष्ट्रीय  स्तर का घोषित करने वाला समाचार-पत्र जिलों-जिलों से निकलता है, डाक संस्करण बताकर, जबकि प्रेस एण्ड बुक्स रजिस्ट्रेशन एक्ट में ऐसे किसी संस्करण का कोई स्थान/औचित्य नहीं है। जिलों-जिलों से संस्करण निकाल कर यह केवल छोटे एवं मझोले समाचार-पत्रों का हक ही नहीं मार रहा है, बल्कि उनके हक पर डांका डाल रहा है। ये है इथिक्स इन तथाकथित बड़े कहे जाने वाले अखबारों की। ऐसे जिलों-जिलों से छपने वाले अखबार को कैसे अंर्तराष्ट्रीय स्तर का कहा जा सकता है, आप ही समझिये। जो व्यक्ति पार्षद हो और कहे कि मैं अंर्तराष्ट्रीय स्तर का हूं तो कौन कैसे समझेगा, ये आप ही समझिए।
  खैर! ऐसे अंर्तराष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र के सम्पादक, प्रबन्ध सम्पादक कम मालिकान की उसकी कोठी में घुसकर एक डीआईजी ने उसके घर की महिलाओं की जो बेइज्जती की कि क्या कहा जाये। यहाॅं तक कि महिलाओं की ......तक फाड़ डाली, लेकिन ऐसे अंर्तराष्ट्रीय अखबार का प्रबन्धतंत्र चूं तक नहीं कर पाया। एक काॅलम की खबर अपने अखबार में नहीं छाप पाया, बल्कि उस दिन तो सारे नियम कायदे तोड़ते हुए उसके अखबार में 80 प्रतिशन विज्ञापन छपा। इज्जत गई तेल लेने। इससे तो वे कमजोर और दीन-हीन महिलाएं बेहतर हैं जो अपने साथ घटी शर्मनाक घटनाओं पर एफ0आई0आर0 तो दर्ज कराती हैं।
  बहरहाल इनकी मजबूरी भी ही है, एक्शन ना लेने की, क्योंकि चोरी की प्रिन्टिंग मशीन इनके यहाॅं लगी है, एक फायनान्स कम्पनी की कई एकड़ जमीन फर्जी कागजातों पर इन्होंने कब्जाई हुई है। चीनी, वनस्पति का धंधा ये करते हैं। जाने दीजिए कुछ चीजें दबा भी देता हूॅं। वरना एक रामनाथ गोयनका जी भी थे और उनका था एक अखबार। जिसने इंदिरा गाॅंधी जैसी डिक्टेटर की हेकड़ी मिट्टी में मिला दी थी। उन्हीं की कलम के दम से खिन्न होकर इन्दिरा ने इमरजेन्सी लगाई और उसके बाद जेल भी गईं, लेकिन बहुत बड़ा व्यापार चलाने के बाद भी स्व0 श्री रामनाथ गोयनका का बाल भी टेढा नहीं कर पाई इन्दिरा गाॅंधी।
  दरअसल कलम की मार का डीएवीपी को अन्दाजा नहीं है, वो कमीशन की चकाचैंध में अन्धा होकर इतरा रहा है, उसे केवल इतना पता है कि जो ज्यादा बिकता है, प्रचार वहाॅं से मिलता है। प्रसार तो रेड लाइट एरिया का भी ज्यादा होता है। पोर्न स्टार के ग्राहक और लाइक करने वाले करोड़ों हैं, तो डीएवीपी को सरकार के प्रचार के लिए ऐसी ही जगहों पर जाना चाहिए। क्या जरूरत प्रिन्ट मीडिया में विज्ञापन देने की। उसे याद रखना चाहिए कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। यहाॅं सारी चीजें मात्र नफा-नुकसान के लिए ही नहीं रची जा सकतीं।
  विज्ञापन व्यवस्था को स्ट्रीम लाइन करने के नाम पर डीएवीपी ने नये धन्धे की ही शुरूआत कर दी। उसने समाचार-पत्रों के पेज को भी प्रीमियम पर विज्ञापन देने का नया धन्धा शुरू कर दिया है।
The only work of DAVP, to collect the money, either form
 Publication, Drama, Nautanki or from release  Advts.
डीएवीपी के अधिकारियों ने इतना भ्रष्टाचार कर लिया है कि या तो एक-एक अधिकारी की आय से अधिक सम्पत्ति की जांच कर ली जाये एवं इस विभाग को खत्म करते हुए इसका कार्य किसी अन्र्तराष्ट्रीय स्तर की संस्था को अधिकतम पन्द्रह प्रतिशत के कमीशन की दर पर दे दिया जाये। इससे भ्रष्टाचार भी खत्म हो जायेगा और सरकार को भी डीएवीपी केएस्टेब्लिशमेंट पर होने वाले करोड़ों रूपये की बचत होगी अलग से। वैसे भी हमें अमेरिका की नीति का पालन करते हुए अपने यहाॅं ज्यादातर चीजें प्राइवेट सेक्टर में देनी चाहिए। फिर इसकी शुरूआत डीएवीपी से ही क्यों नहीं  
सतीश  प्रधान, उपाध्यक्ष
उ0प्र0राज्यमुख्यालय मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति (रजि0 अण्डर दी सो0 रजि0 एक्ट)