Thursday, 24 August 2017

रवीन गांधी, अमरीका छोड़ो;

अन्तिम किश्त
           सीमा से परे जाकर लेख लिखने वाले रवीन गांधी के खिलाफ परोशी जा रही नस्ली टिप्पणी/नफरत भरे संदेश वास्तव में ये सिद्ध करते हैं कि उन अमेरिकन्स में देशभक्ति  है और वे अपने देश को अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं, मान देते हैं, सम्मान देते हैं, अमेरिकन्स के लिए देश पहले है, अपना घर, सुख-चैन, बाद में, जबकि भारतीयों के लिए अपना घर पहले है, देश बाद में। इसलिए भारतीयों के लिए ऐसी घड़ी आ गई है कि, वे अपना सबकुछ बेस्ट देने के बाद भी नस्ली टिप्पणी झेलने और जूते खाने को मजबूर हैं।
कुछ टिप्पणीयों को यहां उघृत किया जाना अपरिहार्य है। जैसे कि एक महिला ने अपने वॉयस मेल में रवीन गांधी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और कहा कि अपना कूड़ा समेटो और भारत चले जाओ और अपने साथ निक्की हेली को भी लेते जाओ।
           निक्की हेली संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की दूत हैं। उन्हें राजदूत किस उद्देश्य से बनाया गया, ये तो अमेरिका ही जाने, लेकिन इतना सत्य है कि उसने अपने फायदे के लिए ही बनाया होगा। अमेरिकन जानते हैं कि भारतीय, गुलामी मानसिकता के लोग हैं, उनके जीन्स में गुलामी कूट-कूट कर भरी है. वे किस बिना पर हमारे ही देश का खाकर-पीकर हमारे ही श्वेत राष्ट्रपति की नीतियों का विरोध कर रहे हैं।
अमेरिका में नस्ली भेदभाव की घटनाओं में इजाफा होना परिलक्षित है। यदि समय रहते भारतवंशियों ने स्वंय से अमेरिका नहीं छोड़ा तो कुछ ही दिनों में उन्हें अमेरिका को  वैसे ही छोडऩा पड़ेगा जैसे लोगो को सीरिया छोड़ना पड़ रहा  हैं। उनकी सारी पूंजी, चल/अचल सम्पत्ति वहीे रह जाएगी और भारत वापस लौटना भी उनके लिए सम्भव नहीं हो पायेगा।
           किसी भी देश का प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति वही नीति बनाता है और लागू करता है, जो उसके लिए मुफीद होती है, जो उसे सत्ता में ज्यादा दिनों तक टिकाये रहने में मददगार होती है। रवीन गांधी भी अपनी कम्पनी में उसी नीति को अपनाते होंगे, जो उनके लिए मुफीद हो। वे उन कर्मचारियों के भले की नीति तो बनाते नहीं होंगे। दूसरे उन्हीं के अधीन काम करने वाला, भले ही वह कम्पनी का प्रबन्ध निदेशक बना दिया गया हो, रवीन गांधी को ये तो कतई अच्छा नहीं लगेगा कि वो प्रबन्ध निदेशक, रवीन गांधी की नीति की कटु अलोचना करें। ऐसा करने का क्या मतलब होता है, ये रवीन गांधी को आज नहीं तो कल समझना ही होगा। 
           वैश्विक परिवेष में ऐसी टिप्पणीयों को निर्विकार भाव से समझना होगा, और उसी के अनुरूप टिप्पणी करनी होगी। जब भारत देश से प्यार करने वालों ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो का सफल आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों को भगा दिया तो अमेरिकन्स यदि 'अमेरिका छोड़ो का नारा बुलन्द कर रह हैं, तो कैसा और काहे का विरोध-हंगामा ।
          रवीन गांधी को वॉयसमेल पर प्राप्त मैसेज को यू-टयूब, ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट करने से कोई फायदा होने वाला नहीं। ये तीनों प्लेटफार्म अमेरिकन्स के ही हैं, उस पर की जा रही पोस्टिंग, भारतीयों-अमेरिका छोड़ो के आन्दोलन को ही बढ़ावा देगी। मेरी राय में निक्की हेली, रवीन गांधी और उन जैसे हजारों लाखों भारतीयों को अपने आप अमेरिका छोड़कर भारत वापस आ जाना चाहिए, उसके लिए वे सीधे भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी से विचार-विमर्श कर सकते हैं।
           अपने घर की सूखी रोटी से अच्छा, अमेरिका का जूता भरा पिज्जा, मुझे तो पसन्द नहीं, आप जैसे सौतेले अमेरिकन्स को पसन्द हो तो खाईये पिज्जा, लेकिन अपमान भरी जिन्दगी तो जीनी ही पड़ेगी, उससे कोई नहीं बचा पायेगा।
सतीश प्रधान

ओ ‘Indians” अमरीका छोड़ो;

प्रथम किश्त
          अंग्रेजों, भारत छोड़ो की तर्ज पर आजकल अमेरिका में भी भारतवंसियों  के लिए यही तराना गूँज रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि ये भारतवंशी ना तो वहां के शासक हैं, और ना ही अमेरिकियों पर कोई जुल्म कर रहे हैं, जिससे आहत होकर अमेरिकियों को एसा करना पड़ रहा हो। अपनी बुद्धि, अपने कौशल, अपनी लगातार मेहनत करने की प्रवृत्ति (जिसका प्रदर्शन वे हिन्दुस्तान में नहीं करते) के बल पर ही वे अमेरिका/विदेश में ल्यूक्रेटिव नौकरी पाते हैं। प्रतिस्पर्धा में अमेरिकियों को पछाड़ कर ही सीईओ जैसे पद को प्राप्त कर पाते हैं। और ऐसा उन्होंने स्वंय से नहीं किया है। 
           उन्हें अच्छे/सम्मान जनक पदों पर अमेरिकियों ने ही पद-स्थापित किया है, फिर आज ऐसी स्थिति क्यों पैदा की जा रही है कि नस्लभेदी टिप्पड़ियों ने इन भारतीयों को नवाजने के साथ 'अमेरिका छोड़ो का नारा ही नहीं दिया जा रहा है, बल्कि कई भारतीयों को तो बेवजह गोली मार दी गई। इन सब कृत्यों के मूल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेशी भगाओ नीति भी है, जिसके बल पर अमेरिकन, अमेरिका में बसे भारतीयों का उत्पीडऩ कर रहे हैं, मानवधिकारों का पोषक अमेरिका केवल अमेरिकियों पर होने वाले उत्पीडऩ को ही मानवधिकारों  के हनन को तवज्जो देता है, जब वह स्वंय में किसी भारतीय, अथवा अन्य विदेशी मूल के लोगों के साथ उत्पीडऩ करता है तो मानवाधिकारों का हनन कोई मुद्दा नहीं रह जाता है।
           ताजा मसला जी0एम0एम0 नॉन स्टिक कोटिंग्स कम्पनी के संस्थापक और सीईओ रवीन गांधी के सीएनबीसी में प्रकाशित एक आलेख के  बाद शुरू हुआ है, जिसके बाद ट्रम्प के समर्थकों ने भरपूर नस्ली टिप्पणीयां करना शुरू कर दिया। दरअसल रवीन गांधी ने अपने लेख में लिखा है कि वर्जीनिया में हुई नस्ली हिंसा के बाद ट्रम्प ने अपने बयान में श्वेत श्रेष्ठतावादियों का बचाव किया है, इसलिए वे ट्रम्प के आर्थिक एजेंडे का समर्थन नहीं करेंगे। भले ही बेरोजगारी एक प्रतिशत रह जाये अथवा जीडीपी सात प्रतिशत बढ़ जाये। लेकिन वे ऐसे राष्ट्रपति का समर्थन नहीं करेंगे जो नस्ली भेदभाव को बढ़ावा देता हो और वह उन अमेरिकियों से नफरत करे जो उन जैसे नहीं दिखते हैं।
           यहां पर मैं, रवीन गांधी के स्टेटमेंट /आलेख से सहमत नहीं हूं। रवीन गांधी को समझना होगा कि वे भारत में नहीं हैं, अमेरिका में हैं। भले ही अमेरिका  ने उन्हें अमेरिकी नागरिक मान लिया हो, लेकिन हैं वे अमेरिका की सौतेली औलाद? उन्होंने आपको अमेरिकी इसलिए तो नहीं बनाया कि आप वहीं रहें, वहीं खायें, वहीं मौज करें और उसी देश के अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों पर तल्ख़ टिप्पणी करें। ऐसा रवीन गांधी ने इसलिए किया कि वे भूल गये कि वे भारत में नहीं अमेरिका में हैं। भारत में तो एक टुच्चे लेवल का व्यक्ति भारत के सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री पर ऐसी बेहुदा ओद्दी और हद दर्जे की गन्दी टिप्पणी कर देता है कि-यदि वह व्यक्ति अमेरिका में हो तो सूट कर दिया जाये, लेकिन भारत में वह लीडर हो जाता हैं, उसके साथ हजारों फिरका परस्तों की भीड़ खड़ी हो जाती हैं।
           इसीलिए रवीन गांधी जी, भले ही आप अमेरिका के लिए फायदे की चीज़ हों, लेकिन ये अधिकार आपको कागजी रूप से मिले अधिकारों में शामिल नहीं हैं। आपको अथवा किसी भी गैर अमेरिकी लोगों को अमेरिका ने ये अधिकार ना तो दिया ना ही देंगे कि आप जैसे लोग, वहां के राष्ट्रपति की नीतियों की इस तरह से भर्तस्ना करें। आप अपनी तुलना उन अमेरिकियों से नहीं कर सकते, जो आप पर नस्ली टिप्पणीयां कर रहे हैं, क्योंकि उनमें देश भक्ति है, और ऐसे राष्ट्रीय करेक्टर की छवि, किसी भी उन भारतीयों में नहीं है, जो विदेश में जा बसे हैं, और अपनी और केवल अपनी मौज-मस्ती और अपने परिवार की जिन्दगी का ही भला सोचते है।
Satish Pradhan

Tuesday, 22 August 2017

आतंकी फण्डिंग का हाल्ट लखनऊ तो नहीं?

राष्ट्रीय जांच ऐजेन्सी (एन.आई.ए) को आतंकी फण्डिंग पर संभावनाओं की तलाश के लिए लखनऊ को भी निशाने पर रखना चाहिए। लखनऊ का एक शक्स काफी वर्षों से इसका इनपुट दे रहा है, लेकिन उसकी जानकारी पर अहम ऐजेन्सियां मौन साधे बैठी हैं, क्यों, ये तो वही जानें, लेकिन कश्मीर में की जा रही फंण्डिंग और उत्तर प्रदेश में हुए आतंकी धमाकों में कहीं कोई कनेक्शन तो नहीं, इस पर जांच-पड़ताल और कड़ी नज़र की जरूरत है।
फण्डिंग के नेटवर्क का पता तो तभी चलेगा, जब उस पर हल्के से इनपुट पर ही आप उसे अपने स्कैनर पर रखेंगे। एन०आई०ए० ने कश्मीर में मारे गये छापे में विदेश से फंण्डिंग आने और उन्हे लोकल स्तर पर वितरित करने की रसीदें जब्त की।
कश्मीर का नामी-गिरामी व्यापारी जद्दूर वटाली अपने देश-विदेश में फैले व्यापारिक संस्थानों के माध्यम से आतंकी फण्डिंग का व्यापार चला रहा था। आश्चर्य की बात यह है कि एन०आई०ए० ने जिन बारह स्थानों पर छापेमारी की वे सभी जद्दूर वटाली के हैं। यहां बताना आवश्यक है कि एन०आई०ए, आतंकी फण्डिंग के मामले में हुर्रियत के सात नेताओं को पूर्व में ही यहां से गिरफ्तार कर चुकी है।
एन०आई०ए० पिछले ढ़ाई महीने में 25 से भी अधिक बार जद्दूर वटाली से पूछ-ताछ कर चुकी है तथा वटाली के गुडग़ांव स्थित कार्यालय पर छापा भी मार चुकी है। बावजूद इसके जद्दूर वटाली ने एन०आई०ए को कुछ भी नहीं बताया, काफी ढ़ीठ किस्म का व्यापारी निकला।
आखिरकार एन०आई०ए० ने वटाली की आतंकी फण्डिंग में लिफ्त होने की ठोस सूचना एकत्र करने के बाद उसके रिश्तेदारों के यहॉ छापे मारने की कार्ययोजना बनाई, और उसी के तहत, बारह स्थानों पर छापेमारी की, जिसमें वटाली के करीबी रिश्तेदार और एक ड्राइवर शामिल है। छापे में बरामद दस्तावेज के बारे में एन०आई०ए ने कोई खुलासा नहीं किया है, और करना भी नहीं चाहिए। वैसे एन०आई०ए ने आतंकी फण्डिंग से जुड़े सुबूत बरामद किये जाने का दावा जरूर किया है।
उपरोक्त के सन्दर्भ में आपको बता दें कि यू०पी० ए०टी०एस० बांग्ला और अरबी जानने वालों के जरिए फैजान के यहां से मिले दस्तावेजों का अनुवाद करवा रही है।

Monday, 21 August 2017

Blue Whale से सौगुना ज्यादा खतरनाक लव जि़हाद


भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा एक मामला तब आया जब केरल हाईकार्ट ने एक पिता की रिट पर उसकी पुत्री के धर्म परिवर्तन करने के पश्चात मुस्लिम व्यक्ति शफी जहॉ से शादी कर ली। पिता की रिट पर केरल High Court ने विवाह को रद्द कर दीया, जिसके खिलाफ मुस्लिम युवक शाफी Supreme Court पहुंच गया।
पिता के बयान को Supreme Court ने गंभीरता से लिया और उसे लव जि़हाद के आईने में देखते हुए चीफ जस्टिस जे०एस० खेहर ने कहा कि-केरल में लव जि़हाद के मामले वाकई चिंता का विषय हैं। हम चाहते हैं कि उसकी गहनता से विवेचना हो, जिसके लिए एन०आई०ए० एक उपर्युक्त संस्था है। चीफ जस्टिस ने कहा कि जाँच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आर०वी०रवीन्द्रन करेंगे, जिससे किसी तरह की गफलत ना हो।
ब्लूव्हेल, इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का जानलेवा गेम है। इस प्राणघातक गेम के कारण देश के कुछ बच्चों ने आत्महत्या की है। भारत के कानून एवंं आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सभी तकनीकी मंचों को यह दिशा-निर्देश दिये जाते हैं कि वे तात्कालिक प्रभाव से इस लिंक को डीलिंक कर दें। ज्ञात हो यह गेम ५० दिनों की अवधि में खिलाडिय़ों को कुछ टास्क देता है, और इसका अंतिम टास्क आत्महत्या करना होता है। खिलाड़ी से हर टास्क के बाद उसको ऑनलाइन फोटो भी शेयर करने के निर्देश होते हैं। विदेश में ऐसी कई हत्याओं के बाद अब भारत के मुम्बई और पश्चिम मिदनापुर जिले में भी ऐसी आत्महत्याओं की पुस्टि हुई है। ऐसी हत्याओं के आंकड़े अभी हजार से नीचे ही हैं, फिर भी यह घनघोर चिंता का विषय है, जबकि लवजि़हाद के मामले में आत्महत्याओं का आंकड़ा दस हजार के भी पार हो गया है।

ब्लूव्हेल इंटरनेट पर खेला जा रहा है, लेकिन लवजि़हाद तो हमारी आम जिन्दगी के बीच खेला जा रहा है। हमारे सुप्रीम कोर्ट को भी आखिरकार यह मानने पर मजबूर होना पड़ा है कि लव जि़हाद भी व्लूव्हेल गेम की ही तरह है। दोनों में ही एक लक्ष्य तय करके काम किया जाता है।
लवजि़हाद में अबतक दस हजार से भी अधिक हिन्दू, ईसाई एवं सिख लड़कियों को उकसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया, और फिर मिशन पर लगा दिया गया। मिशन पूंर्ण होने से पूर्व ही केरल की एक हिन्दू लड़की के मुस्लिम युवक शाफी के साथ किये गये विवाह को लड़की के पिता की हाईकोर्ट में गुहार के बाद रद्द कर दिया गया।

इस विवाह रद्दीकरण के पश्चात मुस्लिम लड़का सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने एन० आई० ए० से जाचं के आदेश करते हुये, कहा कि जाचं की निगरानी सेवानिवृत्त जस्टिस के० एस० राधाकृष्णन करेगें, लेकिन मुस्लिम युवक शफी जहॉ के वकील कपिल सिब्बल ने आपत्ति जताई कि केरल मूल के किसी सेवानिवृत्त अधिकारी को मामले में जोडऩा ठीक नहीं होगा। इसके बाद चीफ जस्टिस ने रवीन्द्रन का नाम तय कर दिया।
सिब्बल का कहना था कि पीडि़त महिला से भी अदालत को बात करनी चाहिए। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि अभी ये ठीक नहीं होगा। पहले एनआईए अपनी जांच पूरी करले, तब उनकी पीठ सभी जांच रिर्पोटों पर गौर करेगी। उसके पश्चात ही महिला को सुनना बेहतर होगा।

Tuesday, 15 August 2017

मुफ्त मुफ्त का खाके महबूबा गईं पगलाय

         हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों के खून पसीने की कमाई खा-खा कर महबूबा मुफ्ती पागलों की तरह बर्ताव करने लगी हैं। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के देशद्रोही बोलअगर संविधान के अनुच्छेद 370 और 35- से छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। वो शायद भूल रही हैं कि तिरंगा वो झंडा है जो उनकी मृत्यु पर उनको भी नसीब नहीं होगा। उनको पता नहीं कि तिरंगा नसीब वाले लोगों को ही नसीब होता है,किसी ऐरे गैरे को नहीं।और महबूबा मुफ्ती इसी कैटेगरी मैं आती हैं।     
         जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का एक फलसफिया बयान है किआप किसी विचार को कैद नहीं कर सकते। आप किसी विचार को मार नहीं सकते।इसका अहसास उन्हें शायद तब हुआ जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए हुर्रियत के सात लोगों को गिरफ्तार कर दिल्ली ले आई और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में आतंकियों के  मारे जाने का सिलसिला तेज हो गया। एनआइए की कार्रवाई से ठीक एक दिन पहले 28 जुलाई को नई दिल्ली की एक संगोष्ठी में उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था, गौरतलब है कि इससे पहले 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 35- को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के लिए विशेष पीठ का गठन किया गया था। नए राष्ट्रपति के शपथ ग्र्रहण समारोह में शिरकत करने के तुरंत बाद महबूबा ने आतंकियों के कृत्यों को जस्टिफाय करने के लिए उक्त विचार रखे। आखिर ऐसा क्यों है कि जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती देशद्रोही बयान देने के बावजूद अपने पद पर काबिज हैं? सवाल यह भी है कि उनको  सत्ता में बनाये रखना  भाजपा की कौन सी मजबूरी है कि वह उन्हें ढोये चले जा रही है? भले ही महबूबा के करतब  नए हों, लेकिन ऐसे तुर्रे छेड़ने की उनकी आदत खासी पुरानी है। 
          इसी साल 17 मार्च को महबूबा ने कहा था कि राज्य के कुछ हिस्सों से अफस्पा कानून को हटा देना चाहिए। उन्होंने यह बयान तब दिया था जब सुरक्षा बलों की आतंकियों से मुठभेड़ आम हो चली थी। इन मुठभेड़ों के दौरान सुरक्षा बलों पर पत्थरबाज छोड़ दिए जाते थे। अब तो जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती विदेश नीति में भी खासी दिलचस्पी दिखा रही हैं। 18 मार्च को मुंबई में मोदी सरकार को एक बिन मांगी सलाह देते हुए उन्होंने कहा था कि भारत को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी से जुड़ जाना चाहिए, क्योंकि इससे कश्मीर का मध्य एशिया के साथ जुड़ाव काफी फायदेमंद साबित होगा। उन्होंने ऐसा कहने से पहले इस परियोजना के विरोध में भारत सरकार की उस घोषित नीति का भी लिहाज नहीं किया जिसके तहत उसे गुलाम कश्मीर में चीन के दखल को औपचारिक और स्थाई बताते हुए खारिज किया गया था। मुख्य विपक्षी-दल कांग्रेस तो छोड़िए, अमूमन चीन की ओर झुकाव रखने वाले वामपंथी भी ऐसा कहने का दुस्साहस नहीं करते, लेकिन भाजपा के समर्थन से सरकार चला रहीं महबूबा आए दिन उसे मुंह चिढ़ाते हुए लक्ष्मण रेखा लांघ रही हैं और भाजपाई मजबूरन धृतराष्ट्रवादी बनने को मजबूर हैं। 
          
          अगर भाजपा की विवशता को समझना है तो उस समझौते को देखना होगा जिसके आधार पर दोनों दलों का गठजोड़ टिका है। जिन शर्तों पर यह सरकार बनी है उससे यही लगता है कि भाजपा ने पीडीपी के समक्ष समर्पण कर रखा है। समझौते की एक शर्त यह है कि भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे सहित सभी कानूनों को यथावत रखा जाएगा। तीन साल तक सुप्रीम कोर्ट में जवाब टालते हुए केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 35- पर अपना पक्ष रखने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कियह अति संवेदनशील मामला है।दूसरी ओर महबूबा 35- को लेकर बेचैन क्या पागल सी दिख रही हैं।
          इस मामले में दौड़ते दौड़ते उन्होंने फारूख अब्दुल्ला से भी मुलाकात कर डाली। गठबंधन की शर्तों में यह भी शामिल है कि केंद्र सरकार कश्मीर में हालात की पुन: समीक्षा कर उसे अपीड़ित क्षेत्र घोषित कर अफस्पा की आवश्यकता पर पुनर्विचार करे।राजनीतिक पहलके तहत पाकिस्तान से बातचीत शुरू करना और रिश्ते सुधारने की भी बात है। लगता है कि यही वजह रही कि भारत ने पाकिस्तान के साथ अपनी ओर से जो वार्ता बंद की उसी को प्रधानमंत्री ने अपमान का घूंट पीकर 23 फरवरी, 2015 को स्वयं शुरू किया।
आज कोई और नहीं, बल्कि महबूबा ही पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के लिए लगातार दबाव बना रही हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने सरकार की इतनी फजीहत की हो, जितनी महबूबा करती रही हैं। 
          बहरहाल इसके लिए महबूबा और उनकी पार्टी पीडीपी की पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है। महबूबा के पिता और पार्टी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद खानदानी मुफ्ती यानीमजहबी कानूनके ज्ञाता थे। उन्होंने कांग्र्रेस के साथ अपने सियासी सफर का आगाज किया फिर नेशनल कांफ्रेंस की लोकप्रियता का मुकाबला करने के लिए उन्हें जमात--इस्लामी के नेतृत्व और संगठन की शरण में जाना पड़ा। वहीं अलगाववाद के झंडाबरदार और हुर्रियत के सरगना सैयद अली शाह गिलानी(आतंकियों का साथ देने वाला देश का गद्दार नेता) के साथ उनके रिश्तों की बुनियाद पड़ी। कांग्र्रेस की राजनीति करते हुए भी उनकी जहनियत पर इस्लाम का ही ज्यादा असर रहा।
          धयान रहे कि 1990 के विस्थापन से पहले घाटी के हिंदू समुदाय ने 1986 में अनंतनाग के दंगों की विभीषिका झेली थी। उसमें हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कतलेआम किया गया तथा जान-माल का नुकसान हुआ था। 40 से अधिक मंदिरों को लूटखसोट कर आग के हवाले कर दिया गया था। मुफ्ती के गृहनगर का यह तांडव मुफ्ती मोहम्मद सईद की शह पर ही हुआ था।
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          राज्य विधानसभा चुनाव के बाद महबूबा मुफ़्ती दिल्ली में थीं। एक मीडिया संस्थान के कार्यक्रम में उनसे जब पूछा गया कि चुनाव नतीजे 23 दिसंबर को ही गए तो नई सरकार के शपथ ग्र्रहण में एक मार्च तक की देरी क्यों हो गई? तब महबूबा के मुंह से अनायास ही निकल आया कि हुर्रियत को मनाने में हफ्तों निकल गए। इससे जाहिर होता है कि उनके पिता ने शपथ लेते ही सबसे पहले हुर्रियत और पाकिस्तान को धन्यवाद क्यों दिया और वह भी प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में। 
          यह भी समझ आता है कि गठबंधन की शर्तों में पाकिस्तान के साथ बातचीत की शर्तों पर इतना जोर क्यों है और इस पर भाजपा ने घुटने क्यों टेके? यह वही महबूबा हैं जिन्होंने 2008 में कांग्रेस के साथ अपनी ही गठबंधन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। तब उन्हें श्रीअमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई जमीन पर कड़ा एतराज था। जमीन 16 हजार फीट ऊंचाई पर यात्रियों के प्राथमिक उपचार और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए आवंटित की गई थी जिनके अभाव में कई वर्षों से तीर्थयात्रियों की मौत हो रही थी। 
          विरोध के पीछे उनकी दलील थी कि यह कश्मीर का जनसंख्या अनुपात बदलने की साजिश है, जबकि इतनी ऊंचाई पर आम इंसानी बसावट कोई आसान बात नहीं है। यह भूमि भी अस्थाई निर्माण के लिए थी। जब राज्यपाल ने असहमति जताई तो राज्यपाल को ही बदल दिया गया और आवंटन रद कराया गया। वर्ष 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी के एक कार्यक्रम में तत्कालीन रॉ प्रमुख एएस दुलत ने मंच पर महबूबा को जगह भी नहीं दी थी। इसके पीछे वजह यही बताई गई कि भारतीय गुप्तचर एजेंसियों ने महबूबा की हिजबुल कमांडरों से नजदीकियां ताड़ ली थीं। 
          अब उन्हीं महबूबा को यह मुगालता हो गया है कि कश्मीर में तिरंगा उनके हाथों का मोहताज बन गया है। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को पता नहीं कि तिरंगे की मोहताज़ मुफ़्ती हो सकती हैं तिरंगा नहीं  अच्छा होता कि भाजपा उनसे यह कहे कि कश्मीर में तिरंगा उनसे पहले भी फहरता रहा है और उनके बाद भी बदस्तूर लहराता रहेगा।
सतीश प्रधान