Monday, 15 January 2018

CJI रहित संविधान पीठ को न्याय की दरकार


भारत  की जनता के लिए  गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीषों को अपनी बात कहने के लिए देश की मीडिया के सामने आना पड़ा?

Justice J Chelameswar and three other senior Supreme Court judges had held a press conference.


देखा जाये तो न्यायिक इतिहास की यह अभूतपूर्व घटना साबित होगी। भारत में न्यायपालिका और विशेषकर उच्चतम न्यायालय एक ऐसा संस्थान है, जिसपर भारत का जनमानस बहुत अधिक विश्वास करता है। जब पीड़ित हर तरफ से न्याय की उम्मीद छोड़ चुका होता है तो यही संस्थान जिसे न्यायालय कहा जाता है, उसके उम्मीद की एक किरण होती है।
उम्मीद की यही किरण उसे अधीनस्थ न्यायालय से उच्चतम न्यायालय लाती है कि न्याय के अंतिम पायदान पर तो उसे न्याय नसीब होगा ही। जबकि बहुत से वरिष्ठ वकीलों से मैंने सुना है कि न्यायलय में न्याय नहीं जजमेन्ट मिलता है।


अदालत के सामने एक केस होता है, जिस पर न्यायालय दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाता है।  पेश किये गये तथ्यों, उस पर दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कानून में नीहित प्राविधानों के मद्देनजर, अदालत जजमेन्ट देती है। अब किसको न्याय मिला नहीं मिला ये सब गौण हैं।
चारों जजों ने अपने को मीडिया के समक्ष पेश किया और अपनी बात रखी, इसलिए यह कोई केस तो हुआ नहीं कि इस पर अदालत फैसला दे। यहॉं तो बात न्याय की है और वो भी इन जजों को मिलता है कि नहीं, ये तो आने वाला समय ही बतायेगा।
शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीषों द्वारा पता नहीं किस मजबूरी में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाना पड़ा और एक संयुक्त पत्र जारी कर देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायाधीष पर न्यायसम्मत तरीके से कार्य न करने की बात कहनी पड़ी।
उन्होंने मुख्य न्यायाधीष के प्रशासनिक अधिकार की ओर उंगली उठाते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीष अपने इस अधिकार का सही इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। उन चारों का कहना रहा कि अगर हम आज उच्चतम न्यायालय की मौजूदा स्थिति के खिलाफ न खड़े होते तो अब से 20 साल बाद समाज के कुछ बुद्धिमान व्यक्ति यह कहते कि हम चार जजों ने ‘अपनी आत्मा बेच’ दी थी।
इन चारों न्यायाधीषों ने यह भी बयान किया कि हम इस मामले में चीफ जस्टिस के पास गए थे, लेकिन वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा। ये भी बड़ा गंभीर विषय है कि उच्चतम न्यायालय के ही चार वरिष्ठ न्यायाधीषों की बात मुख्य न्यायाधीष ने नहीं सुनी।
इस प्रेस कांफ्रेंस को संपन्न हुए पांच मिनट भी नहीं हुए थे कि कई वरिष्ठ वकीलों ने पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क देने शुरू कर दिए। वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया में आकर मुख्य न्यायाधीष के कथित चहेते जजों का नाम और वे मामले जो उन्हें सौंपे गए, बताना शुरू कर दिया तो पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर0एस0 सोढ़ी ने इन चार जजों के कदम को उच्चतम न्यायालय की गरिमा गिराने वाला, हास्यास्पद और बचकाना करार दिया।
वकील के0टी0एस0 तुलसी और इंदिरा जयसिंह ने चार जजों का पक्ष लिया तो पूर्व अटार्नी जनरल एवं वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी ने चार जजों की ओर से प्रेस कांफ्रेंस करने पर घोर निराशा जताई। चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के औचित्य-अनौचित्य को लेकर तरह-तरह के तर्कों के बाद आम जनता के लिए यह समझना कठिन हो गया कि यह सब क्यों हुआ और इसके क्या परिणाम होंगे?
उसके मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिरकार उच्चतम न्यायालय में क्या चल रहा है? इन सवालों का चाहे जो जवाब हो, लेकिन पहली नजर में यही लगता है कि एक विश्वसनीय संस्थान व्यक्तिगत अहंकार या कहिए वर्चस्व की जंग का शिकार हो गया है।
जब प्रेस कांफ्रेंस में चार न्यायाधीषों से पूछा गया कि क्या वे मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग लाने के पक्षधर हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि यह समाज को तय करना है। इसका सीधा और साफ मतलब यही निकलता है कि उच्चतम न्यायालय के ये चारों जज मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग चलाये जाने के पक्ष में हैैं?
ज्ञात हो कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों को, मात्र महाभियोग लगाकर ही हटाया जा सकता है। और यह बहुत ही कठिन प्रक्रिया है।
भारत में उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीषों की पीठ को संविधान पीठ का दर्जा मिला हुआ है और उसके फैसलों में कानून की ताकत होती है। आपने अभी तक कभी-कभार ही केंद्रीय बार काउंसिल और राज्य बार एसोसिएशनों द्वारा जजों के खिलाफ व्यक्तिगत मामलों में आरोप लगते हुए देखा-सुना होगा?
लेकिन पिछले 70 सालों में एक बार भी ऐसा देखने को नहीं मिला होगा कि उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ जज अपने मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करें और वह भी केसों के आवंटन में कथित पक्षपात को लेकर। इन चार जजों का कहना है कि कौन केस किस बेंच के पास जाएगा, यह तो मुख्य न्यायाधीष के अधिकार क्षेत्र में है।

लेकिन यह प्रक्रिया भी कुछ संस्थापित परंपराओं के अनुरूप चलाई जाती है। सामान प्रकृति के मामले सामान बेंच को जाते हैं। और यह निर्धारण, मामलों की प्रकृति के आधार पर होता है, ना कि केस के आधार पर।

कुछ विद्वानों का मत है कि अगर यह तरीका कारगर नहीं हुआ जैसा कि जजों द्वारा संकेत किया गया है तो फिर ये जज मुख्य न्यायाधीष की केस आवंटन प्रक्रिया के खिलाफ स्वयं संज्ञान लेते हुए फैसला दे सकते थे। ऐसा कोई फैसला स्वत: सार्वजनिक होता और कम से कम उससे यह ध्वनि न निकलती कि सार्वजनिक तौर पर कुछ जज मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ सड़क पर आ गए हैैं।
कैसी-कैसी हास्यास्पद बातें की जा रही हैं। यदि ऐसा कुछ इन चार जजों में से किसी के भी द्वारा ऐसा किया जाता तो तब पूरा देश उन्हें कटघरे में खड़ा करता कि अगर उन्हें मुख्य न्यायाधीष की कार्यप्रणाली से कोई शिकायत थी तो वे कहीं उचित फोरम पर अपनी बात रखते? स्वंय मुख्य न्यायाधीष के एक्शन के खिलाफ स्यो-मोटो फैसला लेना कहॉं तक उचित था।

प्रेस के सामने आना कोई गुनाह नहीं होना चाहिए,और गुनाह होता भी नहीं है। इस देश में हर व्यक्ति न्याय पाने के लिए अपनी बात कहीं भी और विशेषतौर पर मीडिया के सामने रखने के लिए स्वतंत्र है। और विशेषतौर पर मीडिया के समक्ष रखना ही उसे ज्यादा आसान दिखाई देता है।  


इस देश के आम नागरिक से लेकर, विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री, छोटे से अधिकारी से लेकर बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स तक, एवं विपक्षी पार्टीयों से लेकर मुख्य न्यायाधीष तक प्रेस के सामने आये ही हैं।


फिर ऐसी सूरत में संविधान पीठ के चार जज यदि अपनी बात की सुनवाइ उसी संविधान पीठ के एक अन्य जज जो कि मुख्य न्यायाधीष हैं द्वारा उनकी ही बात ना सुने जाने पर प्रेस के सामने आ गये तो कौन सा अपराध हो गया?
अपनी ही न्यायपालिका के जज हैं अपने ही देश में अपनी ही प्रेस के सामने आ गये तो क्या हो गया?


उन्होंने जो कहा और उस पर जो नतीजा सामने आयेगा, उससे हमारी न्यायपालिका  और अधिक न्यायिक नज़र आयेगी। उन्होंने प्रेस के सामने यह तो नहीं कहा कि संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया है, इसलिए वे प्रेस के अलावा कहॉं जाते?
मुख्य न्यायाधीष ने भी अबतक निभाई जा रही मान्य परम्पराओं का निर्वहन करते हुए अपना अधिकार समझते हुए निर्णय लिए।


अब यदि उन प्रशासनिक निर्णयों से अपनी ही पीठ के चार अन्य जज सहमत नहीं हैं तो, सर्वमान्य प्रक्रिया का प्रतिपादन हो सकता है। इसे परिवार में हुए मन-मुटाव के अलावा अन्य किसी भी तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।
 मैं तो अपनी छोटी सी बुद्धि के बल पर यही कहूंगा कि ये कोई ऐसा मसला नहीं कि इसका हल ना निकले

इससे पहले रविवार को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष विकास सिंह ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मुलाकात की थी।

 विकास सिंह ने शीर्ष न्यायपालिका में संकट को लेकर एक प्रस्ताव सौंपा था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ की बैठक होने की संभावना है, जिसमें मौजूदा संकट पर चर्चा हो सकती है।


वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने सीजेआई दीपक मिश्रा से मुलाकात करने के बाद बताया  कि उन्होंने एससीबीए के प्रस्ताव की एक प्रति प्रधान न्यायाधीश को सौंपी, जिन्होंने उस पर गौर करने का आश्चासन दिया है। उनकी न्यायमूर्ति मिश्रा से करीब 15 मिनट बातचीत हुई।
 सिंह ने कहा,‘मैं प्रधान न्यायाधीश से मिला और प्रस्ताव की प्रति उन्हें सौंपी। उन्होंने कहा कि वह इस पर गौर करेंगे और सुप्रीम कोर्ट में जल्द-से-जल्द सौहार्द कायम करेंगे।’

सतीश प्रधान
(लेखक: वरिष्ठ पत्रकार,स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार है)

Thursday, 24 August 2017

रवीन गांधी, अमरीका छोड़ो;

अन्तिम किश्त
           

सीमा से परे जाकर लेख लिखने वाले रवीन गांधी के खिलाफ परोशी जा रही नस्ली टिप्पणी/नफरत भरे संदेश वास्तव में ये सिद्ध करते हैं कि उन अमेरिकन्स में देशभक्ति  है और वे अपने देश को अपने से भी ज्यादा प्यार करते हैं, मान देते हैं, सम्मान देते हैं, अमेरिकन्स के लिए देश पहले है, अपना घर, सुख-चैन, बाद में, जबकि भारतीयों के लिए अपना घर पहले है, देश बाद में। इसलिए भारतीयों के लिए ऐसी घड़ी आ गई है कि, वे अपना सबकुछ बेस्ट देने के बाद भी नस्ली टिप्पणी झेलने और जूते खाने को मजबूर हैं।
कुछ टिप्पणीयों को यहां उघृत किया जाना अपरिहार्य है। जैसे कि एक महिला ने अपने वॉयस मेल में रवीन गांधी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और कहा कि अपना कूड़ा समेटो और भारत चले जाओ और अपने साथ निक्की हेली को भी लेते जाओ।



          
निक्की हेली संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की दूत हैं। उन्हें राजदूत किस उद्देश्य से बनाया गया, ये तो अमेरिका ही जाने, लेकिन इतना सत्य है कि उसने अपने फायदे के लिए ही बनाया होगा। अमेरिकन जानते हैं कि भारतीय, गुलामी मानसिकता के लोग हैं, उनके जीन्स में गुलामी कूट-कूट कर भरी है. वे किस बिना पर हमारे ही देश का खाकर-पीकर हमारे ही श्वेत राष्ट्रपति की नीतियों का विरोध कर रहे हैं।
अमेरिका में नस्ली भेदभाव की घटनाओं में इजाफा होना परिलक्षित है। यदि समय रहते भारतवंशियों ने स्वंय से अमेरिका नहीं छोड़ा तो कुछ ही दिनों में उन्हें अमेरिका को  वैसे ही छोडऩा पड़ेगा जैसे लोगो को सीरिया छोड़ना पड़ रहा  हैं। उनकी सारी पूंजी, चल/अचल सम्पत्ति वहीे रह जाएगी और भारत वापस लौटना भी उनके लिए सम्भव नहीं हो पायेगा।

 

         
किसी भी देश का प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति वही नीति बनाता है और लागू करता है, जो उसके लिए मुफीद होती है, जो उसे सत्ता में ज्यादा दिनों तक टिकाये रहने में मददगार होती है। रवीन गांधी भी अपनी कम्पनी में उसी नीति को अपनाते होंगे, जो उनके लिए मुफीद हो। वे उन कर्मचारियों के भले की नीति तो बनाते नहीं होंगे।

दूसरे उन्हीं के अधीन काम करने वाला, भले ही वह कम्पनी का प्रबन्ध निदेशक बना दिया गया हो, रवीन गांधी को ये तो कतई अच्छा नहीं लगेगा कि वो प्रबन्ध निदेशक, रवीन गांधी की नीति की कटु अलोचना करें। ऐसा करने का क्या मतलब होता है, ये रवीन गांधी को आज नहीं तो कल समझना ही होगा।


           वैश्विक परिवेष में ऐसी टिप्पणीयों को निर्विकार भाव से समझना होगा, और उसी के अनुरूप टिप्पणी करनी होगी। जब भारत देश से प्यार करने वालों ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो का सफल आन्दोलन चलाया और अंग्रेजों को भगा दिया तो अमेरिकन्स यदि 'अमेरिका छोड़ो का नारा बुलन्द कर रह हैं, तो कैसा और काहे का विरोध-हंगामा ।

         रवीन गांधी को वॉयसमेल पर प्राप्त मैसेज को यू-टयूब, ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट करने से कोई फायदा होने वाला नहीं। ये तीनों प्लेटफार्म अमेरिकन्स के ही हैं, उस पर की जा रही पोस्टिंग, भारतीयों-अमेरिका छोड़ो के आन्दोलन को ही बढ़ावा देगी। मेरी राय में निक्की हेली, रवीन गांधी और उन जैसे हजारों लाखों भारतीयों को अपने आप अमेरिका छोड़कर भारत वापस आ जाना चाहिए, उसके लिए वे सीधे भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी से विचार-विमर्श कर सकते हैं।


           अपने घर की सूखी रोटी से अच्छा, अमेरिका का जूता भरा पिज्जा, मुझे तो पसन्द नहीं, आप जैसे सौतेले अमेरिकन्स को पसन्द हो तो खाईये पिज्जा, लेकिन अपमान भरी जिन्दगी तो जीनी ही पड़ेगी, उससे कोई नहीं बचा पायेगा।
सतीश प्रधान

ओ ‘Indians” अमरीका छोड़ो;

प्रथम किश्त
          अंग्रेजों, भारत छोड़ो की तर्ज पर आजकल अमेरिका में भी भारतवंसियों  के लिए यही तराना गूँज रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि ये भारतवंशी ना तो वहां के शासक हैं, और ना ही अमेरिकियों पर कोई जुल्म कर रहे हैं, जिससे आहत होकर अमेरिकियों को एसा करना पड़ रहा हो। अपनी बुद्धि, अपने कौशल, अपनी लगातार मेहनत करने की प्रवृत्ति (जिसका प्रदर्शन वे हिन्दुस्तान में नहीं करते) के बल पर ही वे अमेरिका/विदेश में ल्यूक्रेटिव नौकरी पाते हैं। प्रतिस्पर्धा में अमेरिकियों को पछाड़ कर ही सीईओ जैसे पद को प्राप्त कर पाते हैं। और ऐसा उन्होंने स्वंय से नहीं किया है। 
           उन्हें अच्छे/सम्मान जनक पदों पर अमेरिकियों ने ही पद-स्थापित किया है, फिर आज ऐसी स्थिति क्यों पैदा की जा रही है कि नस्लभेदी टिप्पड़ियों ने इन भारतीयों को नवाजने के साथ 'अमेरिका छोड़ो का नारा ही नहीं दिया जा रहा है, बल्कि कई भारतीयों को तो बेवजह गोली मार दी गई। इन सब कृत्यों के मूल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेशी भगाओ नीति भी है, जिसके बल पर अमेरिकन, अमेरिका में बसे भारतीयों का उत्पीडऩ कर रहे हैं, मानवधिकारों का पोषक अमेरिका केवल अमेरिकियों पर होने वाले उत्पीडऩ को ही मानवधिकारों  के हनन को तवज्जो देता है, जब वह स्वंय में किसी भारतीय, अथवा अन्य विदेशी मूल के लोगों के साथ उत्पीडऩ करता है तो मानवाधिकारों का हनन कोई मुद्दा नहीं रह जाता है।
           ताजा मसला जी0एम0एम0 नॉन स्टिक कोटिंग्स कम्पनी के संस्थापक और सीईओ रवीन गांधी के सीएनबीसी में प्रकाशित एक आलेख के  बाद शुरू हुआ है, जिसके बाद ट्रम्प के समर्थकों ने भरपूर नस्ली टिप्पणीयां करना शुरू कर दिया। दरअसल रवीन गांधी ने अपने लेख में लिखा है कि वर्जीनिया में हुई नस्ली हिंसा के बाद ट्रम्प ने अपने बयान में श्वेत श्रेष्ठतावादियों का बचाव किया है, इसलिए वे ट्रम्प के आर्थिक एजेंडे का समर्थन नहीं करेंगे। भले ही बेरोजगारी एक प्रतिशत रह जाये अथवा जीडीपी सात प्रतिशत बढ़ जाये। लेकिन वे ऐसे राष्ट्रपति का समर्थन नहीं करेंगे जो नस्ली भेदभाव को बढ़ावा देता हो और वह उन अमेरिकियों से नफरत करे जो उन जैसे नहीं दिखते हैं।
           यहां पर मैं, रवीन गांधी के स्टेटमेंट /आलेख से सहमत नहीं हूं। रवीन गांधी को समझना होगा कि वे भारत में नहीं हैं, अमेरिका में हैं। भले ही अमेरिका  ने उन्हें अमेरिकी नागरिक मान लिया हो, लेकिन हैं वे अमेरिका की सौतेली औलाद? उन्होंने आपको अमेरिकी इसलिए तो नहीं बनाया कि आप वहीं रहें, वहीं खायें, वहीं मौज करें और उसी देश के अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों पर तल्ख़ टिप्पणी करें। ऐसा रवीन गांधी ने इसलिए किया कि वे भूल गये कि वे भारत में नहीं अमेरिका में हैं। भारत में तो एक टुच्चे लेवल का व्यक्ति भारत के सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री पर ऐसी बेहुदा ओद्दी और हद दर्जे की गन्दी टिप्पणी कर देता है कि-यदि वह व्यक्ति अमेरिका में हो तो सूट कर दिया जाये, लेकिन भारत में वह लीडर हो जाता हैं, उसके साथ हजारों फिरका परस्तों की भीड़ खड़ी हो जाती हैं।
           इसीलिए रवीन गांधी जी, भले ही आप अमेरिका के लिए फायदे की चीज़ हों, लेकिन ये अधिकार आपको कागजी रूप से मिले अधिकारों में शामिल नहीं हैं। आपको अथवा किसी भी गैर अमेरिकी लोगों को अमेरिका ने ये अधिकार ना तो दिया ना ही देंगे कि आप जैसे लोग, वहां के राष्ट्रपति की नीतियों की इस तरह से भर्तस्ना करें। आप अपनी तुलना उन अमेरिकियों से नहीं कर सकते, जो आप पर नस्ली टिप्पणीयां कर रहे हैं, क्योंकि उनमें देश भक्ति है, और ऐसे राष्ट्रीय करेक्टर की छवि, किसी भी उन भारतीयों में नहीं है, जो विदेश में जा बसे हैं, और अपनी और केवल अपनी मौज-मस्ती और अपने परिवार की जिन्दगी का ही भला सोचते है।
Satish Pradhan

Tuesday, 22 August 2017

आतंकी फण्डिंग का हाल्ट लखनऊ तो नहीं?

राष्ट्रीय जांच ऐजेन्सी (एन.आई.ए) को आतंकी फण्डिंग पर संभावनाओं की तलाश के लिए लखनऊ को भी निशाने पर रखना चाहिए। लखनऊ का एक शक्स काफी वर्षों से इसका इनपुट दे रहा है, लेकिन उसकी जानकारी पर अहम ऐजेन्सियां मौन साधे बैठी हैं, क्यों, ये तो वही जानें, लेकिन कश्मीर में की जा रही फंण्डिंग और उत्तर प्रदेश में हुए आतंकी धमाकों में कहीं कोई कनेक्शन तो नहीं, इस पर जांच-पड़ताल और कड़ी नज़र की जरूरत है।
फण्डिंग के नेटवर्क का पता तो तभी चलेगा, जब उस पर हल्के से इनपुट पर ही आप उसे अपने स्कैनर पर रखेंगे। एन०आई०ए० ने कश्मीर में मारे गये छापे में विदेश से फंण्डिंग आने और उन्हे लोकल स्तर पर वितरित करने की रसीदें जब्त की।
कश्मीर का नामी-गिरामी व्यापारी जद्दूर वटाली अपने देश-विदेश में फैले व्यापारिक संस्थानों के माध्यम से आतंकी फण्डिंग का व्यापार चला रहा था। आश्चर्य की बात यह है कि एन०आई०ए० ने जिन बारह स्थानों पर छापेमारी की वे सभी जद्दूर वटाली के हैं। यहां बताना आवश्यक है कि एन०आई०ए, आतंकी फण्डिंग के मामले में हुर्रियत के सात नेताओं को पूर्व में ही यहां से गिरफ्तार कर चुकी है।
एन०आई०ए० पिछले ढ़ाई महीने में 25 से भी अधिक बार जद्दूर वटाली से पूछ-ताछ कर चुकी है तथा वटाली के गुडग़ांव स्थित कार्यालय पर छापा भी मार चुकी है। बावजूद इसके जद्दूर वटाली ने एन०आई०ए को कुछ भी नहीं बताया, काफी ढ़ीठ किस्म का व्यापारी निकला।
आखिरकार एन०आई०ए० ने वटाली की आतंकी फण्डिंग में लिफ्त होने की ठोस सूचना एकत्र करने के बाद उसके रिश्तेदारों के यहॉ छापे मारने की कार्ययोजना बनाई, और उसी के तहत, बारह स्थानों पर छापेमारी की, जिसमें वटाली के करीबी रिश्तेदार और एक ड्राइवर शामिल है। छापे में बरामद दस्तावेज के बारे में एन०आई०ए ने कोई खुलासा नहीं किया है, और करना भी नहीं चाहिए। वैसे एन०आई०ए ने आतंकी फण्डिंग से जुड़े सुबूत बरामद किये जाने का दावा जरूर किया है।
उपरोक्त के सन्दर्भ में आपको बता दें कि यू०पी० ए०टी०एस० बांग्ला और अरबी जानने वालों के जरिए फैजान के यहां से मिले दस्तावेजों का अनुवाद करवा रही है।

Monday, 21 August 2017

Blue Whale से सौगुना ज्यादा खतरनाक लव जि़हाद


भारत के सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा एक मामला तब आया जब केरल हाईकार्ट ने एक पिता की रिट पर उसकी पुत्री के धर्म परिवर्तन करने के पश्चात मुस्लिम व्यक्ति शफी जहॉ से शादी कर ली। पिता की रिट पर केरल High Court ने विवाह को रद्द कर दीया, जिसके खिलाफ मुस्लिम युवक शाफी Supreme Court पहुंच गया।
पिता के बयान को Supreme Court ने गंभीरता से लिया और उसे लव जि़हाद के आईने में देखते हुए चीफ जस्टिस जे०एस० खेहर ने कहा कि-केरल में लव जि़हाद के मामले वाकई चिंता का विषय हैं। हम चाहते हैं कि उसकी गहनता से विवेचना हो, जिसके लिए एन०आई०ए० एक उपर्युक्त संस्था है। चीफ जस्टिस ने कहा कि जाँच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आर०वी०रवीन्द्रन करेंगे, जिससे किसी तरह की गफलत ना हो।
ब्लूव्हेल, इंटरनेट आधारित सोशल मीडिया का जानलेवा गेम है। इस प्राणघातक गेम के कारण देश के कुछ बच्चों ने आत्महत्या की है। भारत के कानून एवंं आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सभी तकनीकी मंचों को यह दिशा-निर्देश दिये जाते हैं कि वे तात्कालिक प्रभाव से इस लिंक को डीलिंक कर दें। ज्ञात हो यह गेम ५० दिनों की अवधि में खिलाडिय़ों को कुछ टास्क देता है, और इसका अंतिम टास्क आत्महत्या करना होता है। खिलाड़ी से हर टास्क के बाद उसको ऑनलाइन फोटो भी शेयर करने के निर्देश होते हैं। विदेश में ऐसी कई हत्याओं के बाद अब भारत के मुम्बई और पश्चिम मिदनापुर जिले में भी ऐसी आत्महत्याओं की पुस्टि हुई है। ऐसी हत्याओं के आंकड़े अभी हजार से नीचे ही हैं, फिर भी यह घनघोर चिंता का विषय है, जबकि लवजि़हाद के मामले में आत्महत्याओं का आंकड़ा दस हजार के भी पार हो गया है।

ब्लूव्हेल इंटरनेट पर खेला जा रहा है, लेकिन लवजि़हाद तो हमारी आम जिन्दगी के बीच खेला जा रहा है। हमारे सुप्रीम कोर्ट को भी आखिरकार यह मानने पर मजबूर होना पड़ा है कि लव जि़हाद भी व्लूव्हेल गेम की ही तरह है। दोनों में ही एक लक्ष्य तय करके काम किया जाता है।
लवजि़हाद में अबतक दस हजार से भी अधिक हिन्दू, ईसाई एवं सिख लड़कियों को उकसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया, और फिर मिशन पर लगा दिया गया। मिशन पूंर्ण होने से पूर्व ही केरल की एक हिन्दू लड़की के मुस्लिम युवक शाफी के साथ किये गये विवाह को लड़की के पिता की हाईकोर्ट में गुहार के बाद रद्द कर दिया गया।

इस विवाह रद्दीकरण के पश्चात मुस्लिम लड़का सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने एन० आई० ए० से जाचं के आदेश करते हुये, कहा कि जाचं की निगरानी सेवानिवृत्त जस्टिस के० एस० राधाकृष्णन करेगें, लेकिन मुस्लिम युवक शफी जहॉ के वकील कपिल सिब्बल ने आपत्ति जताई कि केरल मूल के किसी सेवानिवृत्त अधिकारी को मामले में जोडऩा ठीक नहीं होगा। इसके बाद चीफ जस्टिस ने रवीन्द्रन का नाम तय कर दिया।
सिब्बल का कहना था कि पीडि़त महिला से भी अदालत को बात करनी चाहिए। तब चीफ जस्टिस ने कहा कि अभी ये ठीक नहीं होगा। पहले एनआईए अपनी जांच पूरी करले, तब उनकी पीठ सभी जांच रिर्पोटों पर गौर करेगी। उसके पश्चात ही महिला को सुनना बेहतर होगा।