Friday, 30 December 2011

तानाशाही एक राजवंश की


          भारत में जनता की पसन्द का बहाना लेकर सत्ता पर काबिज राजवंश अब जनता की परवाह न करने वाले तानाशाह के रूप में सामने आ गया है। प्रधानमंत्री और संसद की ओर से सरकार के वरिष्ठ मंत्री द्वारा संसद में दिया गया आश्वासन {जिसे सेन्स ऑफ हाऊस कहना ज्यादा उचित है} को दरकिनार कर जनता को खुलेआम धोखा  दिया  जा रहा है। पूरी की पूरी सरकार राजवंश के इशारे पर नाचती हुई उल-जुलूल वक्तव्यों से जनता की इच्छा को पैंरों तले रौंद रही है और किसी को भी पूरे भारत में इटली के कैसीनो का साम्राज्य गुण्डई के साथ धन्धा करते दिखाई नहीं दे रहा है।
          राहुल बाबा कहॉं तक शिक्षित हैं यह तो वही जानें,लेकिन इतना तो के0जी0 क्लास का बच्चा तक जानता है कि हांथी कभी घास नहीं खाता है और पंजा केवल झपट्टा मारने के ही काम आता है। घास तो गधा खाता है। क्या हांथी और गधे का अन्तर भी कैम्ब्रिज स्कूल में नहीं सिखाया जाता! जनता की खून-पसीने की कमाई को चूस-चूस कर टैक्स के रूप में एकत्र किये गये धन की ऐसी रेबड़ी बांटी जा रही है कि गोया उनके दादा का माल हो। जब मन किया सबसिडी चालू कर दी और जब मन आया सबसिडी बन्द कर दी। हजारों-हजार करोड़ रूपये का बजट ऐसी योजनाओं के लिए हफ्तों में जारी कर दिया जाता है जिसके ना तो क्रियान्वयन की सही रूपरेखा है और ना ही मॉनीटरिंग की। देखिए किस तरह एक जनलोकपाल के मुद्दे को पूरी सरकार और उसके कारकूनों ने उसे जातिगत राजनीति से जोड़ते हुए आरक्षण का मुद्दा ही नहीं बनाया अपितू सारी ऊर्जा इस पर लगाई कि एक गधा लोकपाल तैयार किया जाये।
          शायद कांग्रेस पार्टी के जहन में नहीं है कि ट्यूनेशिया से उठी क्रान्ति,जिसने 30 सालों से भी अधिक सत्ता में काबिज राष्ट्रपति जैनुल आबिज जैनुल बिन अली को अपनी पत्नी और सारी धन-समपत्ति के साथ रातों-रात ट्यूनेशिया छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया,क्योंकि ट्यूनेशिया के बेरोजगार युवकों ने सत्ता के विरूद्ध धावा बोल दिया था, और देखते ही देखते बेरोजगार छात्रों का यह धावा एक क्रान्ति में तब्दील हो गया। इस क्रान्ति को चमेली क्रान्ति का नाम दिया गया और ट्यूनेशिया के महल में लाठी-डण्डा लेकर चढ़े युवकों को पूरी दुनिया में क्रान्ति के नये हिरावल दस्ते के रूप में देखा गया।
          ट्यूनेशिया से चला चमेली क्रान्ति का यह रथ उत्तरी अफ्रीका से लेकर मध्य पूर्व से होते हुए गेटवे ऑफ इण्डिया के रास्ते भारत में प्रवेशकर महाराष्ट्र के ही रालेगण सिद्धी में अपने प्रदर्शन का इंतजार कर रहा है। चमेली क्रान्ति का अगला पड़ाव मिस्र रहा,जहां होस्नी मुबारक 40 साल से सत्ता में जमे थे और भरपूर गुण्डई कर रहे थे। मिस्र की राजधानी काहिरा का तहरीर चौक आजादी की शहनाई का बिसमिल्लाह खॉं साबित हुआ। एक युवती(दुर्भाग्य है मेरा कि मेरे पास उस महान युवती का नाम नहीं है,इस पोस्ट को पढ़ने के बाद यदि कोई उसका नाम मुझे ईमेल कर देगा तो मेहरबानी होगी) ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि-मैं तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक के खिलाफ आन्दोलन करने जा रही हूँ,बिल्कुल अकेली। अगर कोई मेरा साथ देना चाहे तो मेरे साथ आये। जब वह युवती घर से निकली तो अकेली थी,जब वह पांच किलोमीटर तक पहुंची तो उसके साथ दस लोग और जुड़ गये और इसके आगे जब वह कार्ड-बोर्ड का बैनर लिए तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक के विरूद्व आन्दोलन करने खड़ी हुई,तबतक उसके साथ आये लोगों की तादाद दो दर्जन से ज्यादा हो गई थी।
          अब इस बात के आंकड़े राहुल गांधी और डा0 मनमोहन सिंह के द्वारा मोंटेकसिंह आहलुवालिया से निकालवाये जायें कि किस दर से आंदोलनकारियों की संख्या बढ़ी कि 11वें दिन वह युवती तहरीर चौक पर 10 लाख लोगों के साथ मौजूद थी। ये लोग किसी भी कीमत पर अपने घर वापस जाने को तैयार नहीं थे,भले ही उन्हें वहीं दफन ही क्यों न कर दिया जाये। किसी भी आन्दोलन की नब्ज,खुफिया ऐजेन्सियों अथवा अपने चमचों से नहीं टटोली जा सकती! मंहगाई से कराहती जनता को आपने रिजर्व बैंक के हवाले कर दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक तो एक सफेद हांथी है,जो केन्द्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार में जबरदस्त सहयोग कर रहा है। उसके पास मंहगाई कम करने का कोई फॉर्मूला है ही नहीं सिवाय रेपो रेट को जब-तब घटाने अथवा बढ़ाने के। जिसकी खुद की रेपो नहीं बची वह देश में रेपो की रेट तय कर रहा है,कैसा भाग्य है इस देश का। जो स्वंय दो कदम चलने को मजबूर है वो देश चला रहा है, है ना आश्चर्य की बात!
          राहुल गांधी आंकलन नहीं कर पा रहे हैं कि इस देश में बाजाफ्ता ट्यूनेशिया,जो क्रान्ति का दौर शुरू हुआ है वह मिस्र होता हुआ भारत में पहुंच चुका है,वह भारत की मगरूर सत्ता का क्या हश्र करेगा! राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अपने पूरे मंत्रीमण्डल को 74 वर्षीय बुजुर्ग समाजसेवी अण्णा हजारे एवं उनकी टीम को बदनाम करने के लिए पीछे लगा दिया है, और पूरे देश में किये जा रहे भ्रष्टाचार जो विशेष रूप से उनकी ही पार्टी और मंत्रीमण्डल द्वारा किया जा रहा है, को छोड़कर केवल एक दलित महिला मुख्यमंत्री और उसकी पार्टी ही दिखाई दे रही है। कौन उनकी बात पर यकीन कर सकता है कि वे सच बोल रहे हैं,जबकि देश के सामने वे भट्टा-पारसौल मामले में लाशों के ढ़ेर को राख के ढ़ेर में तब्दील होने का फर्जी और गुमराह करने वाला झूंठा ढिंढ़ोरा पीट चुके हैं।
          ख्वाब उनका है प्रधानमंत्री बनने का और अपनी सरकार के तमाम लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार की बात न करके केवल उ0प्र0 में मनरेगा के भ्रष्टाचार की बात करते हैं,गोया मनरेगा केवल उ0प्र0 में ही चल रही है। महाराष्ट्र,राजस्थान अथवा अन्य प्रदेशों में न तो यह स्कीम चल रही है और ना ही करोड़ों का घोटाला हो रहा है। वह भूले जा रहे हैं कि राजस्थान में तो उनकी पार्टी के मंत्री पूरी की पूरी औरत को अय्यासीबाजी करने के बाद चूने की भट्टी में झोंके दे रहे हैं। इस पर उन्हें शर्म नहीं आती है कोई क्षोभ नहीं होता है।
          मिस्र में होस्नी मुबारक के विरूद्ध तहरीर चौक के आन्दोलन ने कितनी तेजी से पूरे मिस्र को अपनी गिरफ्त में लिया,इसको मापने का कोई पैमाना न तो होस्नी मुबारक के पास था,ना ही हमारे भारत में सरदार मनमोहन सिंह, सरदार आहलुवालिया,सोनिया गांधी अथवा राहुल गांधी के पास है,बल्कि ये तो स्वंय पैमाने पर सवार हैं। होस्नी मुबारक ने सार्वजनिक रूप से प्रगट होकर जल्द चुनाव कराने की घोषणा की,लोगों को शांत करने के लिए तात्कालिक रूप से अपने मंत्रीमण्डल में कुछ फेरबदल भी किये,लेकिन जनता अड़ी थी कि वह किसी भी कीमत पर होस्नी मुबारक को सत्ता से बाहर देखना चाहती है।
          मिस्र की सेना जो कि होस्नी मुबारक के इशारे पर नाचती थी,सैद्धान्तिक रूप से ही मुबारक के साथ थी,और आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने से उसने भी इन्कार कर दिया था। व्यतीत होते हर पल के साथ तहरीर चौक का आन्दोलन इतिहास रचता रहा और हालात इतनी तेजी से बिगड़े कि होस्नी मुबारक को न चाहते हुए भी शर्म अल शेख भागना पड़ा। वर्तमान में होस्नी मुबारक नजर कैद हैं,उन पर मुकदमा चल रहा है और कोई नहीं जानता कि उनके साथ क्या होगा?
          अब आइये लीबिया पर! लीबिया में लगभग एक दशक से चले आ रहे सत्ता के खिलाफ विरोध ने ट्यूनेशिया और मिस्र से इतनी ऊर्जा ग्रहण की कि उसके जबरदस्त विरोधी रूख के कारण कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को मजबूरन पहले राजधानी छोडनी पड़ी और फिर उसके बाद जान भी गवानी पड़ी। विद्रोहियों ने उन्हें उनके ग्रह नगर शर्त में उस समय गोलियों से छलनी कर दिया जब वह जान की भीख मांगने के बाद भाग खड़े होने की कोशिश कर रहे थे। लीबिया में इस समय अंतरिम सरकार है और वहां भी लोकतन्त्र की बहाली के लिए कोशिशें हो रही हैं।
           अब समय तानाशाही के अन्त का है,फिर चाहे यह सैन्य तानाशाही हो अथवा राजवंश की। सीरिया, लेबनान, यमन, सऊदी अरब कोई ऐसा देश नहीं है जहॉं सत्ता में काबिज शेखों, तानाशाहों और खलीफाओं के विरूद्व जनता में आक्रोश नहीं है। आतंक का पर्याय बने ओसामा बिन लादेन को,जिसकी खोज दस वर्षों से अमेरिकी सेना अफगानिस्तान की घाटियों में कर रही थी उसे पाकिस्तान के ऐबटाबाद में अमेरिकी सील ने एनकाउन्टर में मार गिराने का दावा कर इतिहास में दफन कर दिया। बावजूद इसके आतंक में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं आई है। आतंक में किसी भी प्रकार की कमी ना आना पूरी तरह से लादेन की मृत्यु पर सन्देह तो अवश्य प्रगट करता है। हॉं इतना जरूर है कि दुनिया जिस देश पाकिस्तान को आतंकवाद का एक्स्पोर्टर समझती है,उसी के देश में इस वर्ष दो दर्जन से अधिक आतंकवादी घटनाएं हुईं,जिसमें से अधिकतर फिदायीन दस्तों द्वारा अंजाम दी गयीं थीं।
          आतंक किसी का नहीं रहा तो कांग्रेस का कब तक रह सकता है? जनता द्वारा मांगे जा रहे एक जनलोकपाल बिल पर ऐसी हायतौबा! एक तरफ आप कहते हैं कि आप ईमानदार हैं और ईमानदारी से काम करते हैं,कांग्रेस ने अपना साथ दे रही ऐसी पार्टियों के नेताओं को समझाया कि अगर ये लोकपाल का बिल पास हो गया तो सबसे पहले तुम लोग ही पकड़े जाओगे,क्योंकि आय से अधिक सम्पत्ति का तुम्हारा ही मामला उच्चतम न्यायालय में चल रहा है। बस फिर क्या था नेता जी ने कर दिया रोना शुरू! उन्होंने भरी संसद कैसे रो-रोकर बताया कि तब तो हमें एक दरोगा जब चाहेगा जेल भेज देगा। डी.एम. और एस.पी. जब चाहेंगे हमें जेल भिजवा देंगे। हम ऐसे किसी लोकपाल बिल को पास नहीं होने देंगे।
          एक दरोगा से कैसे एक पार्टी का मुखिया इतना भयभीत दिखाई दिया कि बस रोना ही बाकी था। क्या जनता समझ नहीं रही है कि यदि ऐसा बिल पास हो जाये तो उसका भी भला हो जायेगा? जब आप ईमानदार हैं तो जनलोकपाल के एक दरोगा से डरने की क्या जरूरत? एक दरोगा से जब आप खुलेआम एसएसपी को गाली दिलवा सकते हैं,उसी दरोगा का इस्तेमाल गेस्ट हाऊस काण्ड कराने में कर सकते हैं तब आपको डर नहीं लगता,लेकिन उसी दरोगा के लोकपाल के अधीन हो जाने पर आपकी रूह कांप रही है!
          आखिरकार इन दरोगाओं की नियुक्ति क्या केवल जनता को परेशान करने,उन्हें बेवजह जेल में बन्द करने और इन नेताओं की गुलामी करने के लिए की गई है? इन दरोगाओं से आपको तब डर नहीं लगता है जब आप इनका इस्तेमाल शैडो की तरह करते हो! इनसे लूट करवाते हो अथवा मासूम जनता पर लाठी चार्ज कराते हो। क्या यह सच नहीं है कि आप नेताओं ने इन दरोगाओं को अपना निजी नौकर बना छोड़ा है। अब जब आपको दिखाई दिया कि अरे यह तो लोकपाल का दरोगा होगा जो हमारी हुक्म उदीली नहीं करेगा तो आपकी रूह कांपने लगी। कड़क ठंड में संसद की गर्मी के अन्दर आपके बदन से पसीना टपकने लगा। आपकी सदरी तर-बतर हो गई।
          70 प्रतिशत मतदाता को बलाये ताख रख केवल 30 प्रतिशत मतदाताओं के मत पर आप पूरे हिन्दुस्तान को गधे की तरह चरे जा रहे हो? भाई कभी तो जनता जागेगी और जब भी जाग गई समझ लीजिए इस हिन्दुस्तान में भी सुनामी आ जायेगी। आपको कर्नल गद्दाफी की तरह भागने का मौका भी नहीं मिलेगा। आपको पांच साल के लिए उत्तर प्रदेश की सत्ता चाहिए, लेकिन केन्द्र में मिली सत्ता से आपने इस देश की जनता को जो दिया है उसके बदले में आपको क्या मिलना चाहिए यहां लिखना ठीक नहीं है। लेकिन इतना ध्यान रखिए भगवान कहीं है तो वो सिर्फ हिन्दुस्तान में ही है,और आपका क्या हश्र होगा यह तय तो है, लेकिन खुलेगा भविष्य में ही।

अब हम आपको बताते हैं, कब और कहां से शुरू हुई क्रान्ति।

ट्यूनेशियाः 18 दिसम्बर 2010 को विरोध प्रदर्शन शुरू,14 जनवरी को ट्यूनेशिया के राष्ट्रपति बेन अली का इस्तीफा, सरकार ने सत्ता छोड़ी।
मिस्रः 25 जनवरी 2011 को आन्दोलन शुरू,11 फरवरी को होस्नी मुबारक ने सत्ता को कहा अलविदा।
यमनः 03 फरवरी 2011 को आन्दोलन शुरू,23 नवम्बर को सरकार सुधारों के लिए तैयार हो गई।
लीबियाः 17 फरवरी को गद्दाफी के खिलाफ शस्त्र विद्रोह,19 मार्च को लीबि‍या में नाटो की सैन्य कार्रवाई आरम्भ, 20 अगस्त को त्रिपोली में विद्रोही सेना का प्रवेश, 23 अगस्त को सत्ता से किया बेदखल, 20 अक्टूबर को विद्रोही सेना ने गददाफी व उनके पुत्र की हताया की,गददाफी शासन का अंत ।
सीरियाः 15 मार्च को बशर अल असद के खिलाफ हुआ आन्दोलन का आगाज,18 अगस्त को अमेरिका व यूरोपीय संघ ने सीरि‍या पर लगाए प्रतिबंध। (सतीश प्रधान)

Sunday, 25 December 2011

मेरी मेरी क्रिसमस-अगले राष्ट्रपति भी बराक ओबामा


         अमेरिका में कराये गये एक ताजा सर्वेक्षण से प्रकाश में आया है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आगामी राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी को लेकर लोकप्रियता के मामले में रिपब्लिकन पार्टी के दो संभावित प्रमुख उम्मीदवारों से बढ़त बनाई हुई है। सीएनएन-ओआरसी इंटरनेशनल सर्वेक्षण के परिणाम जारी करते हुए सीएनएन ने अपनी विज्ञप्ति में कहा है कि एक नये राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चला है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा के पुननिर्वाचन की संभावनाओं में दो महत्वपूर्णं संकेतकों में बढ़ोत्तरी हुई है। सर्वेक्षण से यह पता चलता है कि ओबामा ने खुद को चुनौती देने वाले रिपब्लिकन पार्टी के पांच संभावित उम्मीदवारों के खिलाफ बढ़त हासिल कर ली है और उनकी स्वीकार्यता रेटिंग में भी मध्य नवम्बर से पांच अंकों की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।


सर्वेक्षण, वर्ष 2012 में होने वाले चुनाव में ओबामा रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी में 52 प्रतिशत मतों के साथ मिट रोमनी जिन्हें 45 मत मिले थे,उनसे 5 अंकों से आगे चल रहे हैं।
          इसी के साथ बराक ओबामा ने रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी के अन्य शीर्ष उम्मीदवारों, नेवट गिंगरिच, रिक पेरी, रोन पॉल और माइकल बचमैन पर भी जबरदस्त बढ़त कायम की हुई है। सर्वेक्षण में पूरी बात सामने आती है या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तय है कि राष्ट्रपति बराक ओबामा को अमेरिकी आर्मी एवं उनके परिवारीजनों का जबरदस्त सहयोग इस चुनाव में हासिल होगा। 
           क्रिसमस के इस अपार खुशी के पर्व पर मेरी हार्दिक शुभकामना एवं भविष्यवाणी है कि वर्ष 2012 का चुनाव भी बराक ओबामा भारी मतों से जीतेंगे और पुनः अमेरिका के राष्ट्रपति बनेंगे। (सतीश प्रधान)   
                                
         
As Christmas carols fill the air with joy and merriment, as the chime of church bell echoes all around, and prayers reach out to God,
                                          
WE wish the people all around the World specially the Readers, Commentators and management team of jnn9's Blog a joyous Christmas and a Happy New Year.





Wednesday, 21 December 2011

साइबर मीडिया पर नियंत्रण की सनकी कवायद

          अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की पूर्व संध्या पर, दिल्ली स्थित यूनाइटेड नेशन इन्फारमेशन सेन्टर से महासचिव मून का बयान जारी किया गया । इस बयान में मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर देते हुए कहा गया कि अपने विचारों को बेधड़क रूप से व्यक्त करने के लिये बहुत से लोगों ने खुद को सशेल मीडिया से जोड़ा है। अब वे दिन बीत गये जब दमनकारी शासक सूचना के प्रवाह पर अंकुश लगा देते थे। उनका इशारा स्पष्ट रूप से मनमोहन सरकार और उनके हैसियत भूले मंत्री कपिल सिब्बल की ओर ही था। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर अंकुश लगा ही नहीं सकती सरकार- बान की मून, महासचिव, यूनाइटेड नेशन। 
          मून ने कहा ‘मानवाधिकारों पर सभी का अधिकार है। दुनिया भर में लोग न्याय, गरिमा, समानता और भागीदारी की मांग को लेकर एकजुट हुए हैं। उन्हें यह सब पाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि ‘यह सच है कि दुनिया में दमन बहुत है और कानून से बचने के रास्ते भी बहुत हैं। फेसबुक, गूगल, याहू, ट्विटर, यू-ट्यूब जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग और मीडिया वेबसाइट्स पर रोक लगाने के लिये चाटुकार कपिल सिब्बल ने नये दिशा- निर्देश बनाने की अंतिम इच्छा जताई है,जिससे कि वह मैडम सोनिया गांधी और सरदार मनमोहन सिंह को अपनी वफादारी का सुबूत पेश कर सकें। वैसे भी उनके पास, इसके अलावा दिखाने को कुछ शेष नहीं रहा है।
            सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,भारत सरकार के साइबर सलाहकार नीरज अरोड़ा का कहना है कि गलत, अश्लील या भद्दी सामग्री वेबसाइट पर डालने पर आईटी एक्ट की धारा-79 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसा ही केन्द्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल भी कह रहे हैं। इस पर गूगल का कहना है कि अगर कोई विवादास्पद सामग्री कानूनन जायज है तो हम उसे नहीं हटाते, ताकि विभिन्न लोगों के विचारों का सम्मान हो- 
गूगल इण्डिया 
इसी के साथ फेसबुक ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। उसका कहना है कि हम उस सामग्री को हटा देंगे,जो हमारी शर्तों का उल्लंघन करती हैं। हम नफरत,हिंसा और अश्लीलता फैलाने वाली किसी भी सामग्री के खिलाफ हैं।
राज्यसभा सांसद व उद्योगपति राजीव चन्द्रशेखर ने कहा कि सिब्बल भारत में इन्टरनेट पर नियंत्रण का चीनी मॉडल लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह इसमें सफल नहीं होंगे। बुनियादी तौर पर कहा जाये तो सरकार गलत दिशा और गलत लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा रही है। जहां तक चीन की बात है तो वह एक गैर-लोकतांत्रिक देश है, इसलिए हमें उसका अनुशरण नहीं करना चाहिए। उसका अनुशरण हम तब कर सकते हैं,जब चीन का 1,36,000 वर्ग किलोमीटर से दूना क्षेत्रफल कब्जा कर लें। कम से 12 देशों के साथ हमारे विवाद हों और कम से कम तीन देशों पर हम कब्जा कर लें,जैसे चीन ने पूर्वी तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया और तिब्बत को कब्जा रखा है। सिब्बल को शायद यह सब दिखाई नहीं देता है अथवा उनको इसकी जानकारी ही न हो, यह भी सम्भव है।
          जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि वह आनलाइन सामग्रियों पर प्रतिबन्ध के खिलाफ हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अक्सर दुरुपयोग किया जाता है।
लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के आरोपी कपिल सिब्बल ने फेसबुक,गूगल और ऑर्कुट जैसी कई सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर शिकंजा कसने के इरादे जाहिर कर दिये हैं। दरअसल कपिल सिब्बल, सरदार मनमोहन सिंह के सबसे प्यारे मंत्री हैं,क्योंकि एक तो वे पेशे से वकील है,दूसरे उनके पास दूरसंचार मंत्रालय है,तीसरे वे राहुल की लुटिया डुबा सकते हैं और चौथे उन पर सोनिया गांधी का हाथ है। हिन्दुस्तान में वे कैबीनेट से ऊपर हैं,संसद से ऊपर हैं, जनता उनके जूतों तले पड़ी है और ये सोशल नेटवर्किंग साइट्स उनके रहम पर ही भारत में कुछ कर सकती हैं, वरना उनकी भौंहें टेढ़ी हो गईं तो प्रतिबन्ध लगने में देर कैसी?
            दरअसल स्वामी अग्निवेश के मित्र सिब्बल महाराज ने इतना सब कुछ महज,सरदार मनमोहन सिंह और मैडम सोनिया गांधी के विरुद्ध सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दर्ज की गयी टिप्पणीयों को देखकर सोनिया गांधी के प्रति अपनी वफादारी सिद्ध करने के इरादे से किया है। इसी के साथ चूंकि वे जननायक अन्ना हजारे से भी मुंह की खा चुके हैं,इसलिए बहुत ही शातिराना अन्दाज में उन्होंने,अन्ना के आन्दोलन को ठंडा करने के लिये ये तरकीब सोची है। सबसे पहले उन्होंने 5 सितम्बर को फेसबुक,ट्विटर,ऑर्कुट और गूगल इण्डिया के अधिकारियों को तलब किया। आगे सिब्बल ने कहा कि दूरसंचार विभाग के सचिव चन्द्रशेखर ने भी 19 अक्टूबर 11 को इन कम्पनियों के अधिकारियों के साथ बैठक की थी,जिसमें यह निर्णय लिया गया था कि आपत्तिजनक सामग्रियों को लेकर उपचार संहिता बनाई जायेगी।
           कपिल सिब्बल को शायद उनके मुंशी ने बताया नहीं है कि सोशल मीडिया पर मानहानि से जुड़ी सामग्रियों के प्रकाशन व प्रसारण को रोकने व दण्डात्मक कार्रवाई हेतु संशोधित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानून-2008 पहले से मौजूद है। इस कानून की धारा 66-ए के मुताबिक ऐसी इलैक्ट्रानिक सामग्री जो किसी भी सम्भव स्वरूप में मानहानि से जुड़ी है,वह दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आती है। इसी तरह कानून की धारा-67 के तहत अश्लील सामग्री आदि का प्रकाशन व प्रसारण दंडनीय अपराध है,जिसके लिये अधिकतम तीन साल की सजा व पांच लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
          11 अप्रैल 2011 को संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी कानून में कहा गया है कि यदि सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध कोई सामग्री किसी की मानहानि करती है तो सरकार इसका सज्ञान ले सकती है तथा सम्बन्धित नेटवर्क के सेवा प्रदाता को शिकायत के बाद अधिकतम 36 घंटों के भीतर प्रकाशित सामग्री को हटाना होगा।
          दरअसल उत्तर प्रदेश में विधान सभा के आम चुनाव होने वाले हैं,जिसके प्रसारण की गूगल इण्डिया ने गम्भीर तैयारी की हुई है। ये साइट्स इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि मैडम सोनिया गांधी को लग रहा है कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो अन्ना इफेक्ट,उत्तर प्रदेश में तो उनकी लुटिया ही डुबा देगा, जिससे उनके युवराज का राजतिलक होना असम्भव हो जायेगा। वैसे भी अब तो उ0प्र0 में कांग्रेस का लोकदल के अजित सिंह से समझौता हो ही गया है, इसी के तहत उन्हें केन्द्र में नागरिक उडड्यन मंत्रालय सौंप कर उनको नवाजने की कोशिश की गई है कि उनका ही कुछ करतब कांग्रेस के काम आ जाये। ऐसी स्थिति में भी वह 50 के आस-पास पहुंच जाये तो बड़ी बात है। बगैर अजित सिंह के सहयोग के उसकी क्या स्थिति होगी,व्यक्त करना दिलासा देने लायक भी नहीं है।
          भारत की आम जनता की आवाज को दबाने का खेल सत्ता के दीवाने,कपिल सिब्बल क्यों और किसके इशारे पर खेलना चाह रहे हैं,इसे तो सरदार मनमोहन सिंह ही बता पाने में सक्षम हो सकते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मनमोहन के इशारे पर कपिल सिब्बल,मनीष तिवारी,दिग्विजय सिंह आदि नेता इस तरह की हरकत कर रहे हैं जिससे जनता की सारी नाराजगी राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर निकले और उनके खिलाफ जबरदस्त विरोध खड़ा हो जाये,जिससे प्रधानमंत्री पद पर सरदार जी का बना रहना अपिरिहार्य हो जाये। ऐसा नुस्खा मैडम सोनिया गांधी के साथ पूर्व श्रूड प्रधानमंत्री नरसिंम्हा राव भी बखूबी आजमा चुके हैं। सोनिया गांधी को अच्छी तरह से पता है कि नरसिंम्हाराव ने आतंकी खतरा बताकर उनकी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था करा दी थी। उन्हें जनता के मध्य नहीं आने दिया था। अब चूंकि वह जनता के बीच हैं तथा लला को प्रधानमंत्री पद पर देखने के लिए अधीर एवं व्याकुल भी, इसीलिए प्रधानमंत्री पद पाने से पूर्व राहुल गांधी को जनता की भावना का आदर करने के साथ ही उत्तर प्रदेश की जनता का सम्मान करना भी सीखना पड़ेगा। वैसे भी जब तक उ0प्र0 के लोग भीख मांगने की प्रवृत्ति से ऊपर नहीं आ जाते हैं,उनकी प्रधानमंत्री बनने की चाहत कोई मायने नहीं रखती है।
          पूरे उत्तर प्रदेश के लोगों को भीख मांगने से वे क्या रोक पायेंगे,जब वे स्वयं ही वोट की भीख मांगने के लिये पूरे प्रदेश में दर-दर घूमने को मजबूर हैं। वे पहले सुल्तानपुर और रायबरेली के लोगों को ही बेहतर स्थिति में ला दें यही बहुत है। रायबरेली और सुल्तानपुर में सर्वे कराकर वह आंकड़ा प्रस्तुत करें कि वहां के कितने लोग भीख मांगने के लिये अपने जनपद से बाहर नहीं निकलते हैं। देश स्वतंत्र होने से लेकर आज तक पूरी तौर से सत्ता में बने रहने के बावजूद वे केवल दो जनपदों से भिखारीपन दूर नहीं कर पाये तो आगे क्या करेंगे,सिवाय इसके कि एक गरीब दलित के घर खाना खाकर उसे एक सप्ताह के लिये भूख से मरने के लिये छोड़ दें। क्या वे ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं कि केवल इन दो जनपदों के लोगों को ही अपने घर पर एक माह में एक ही दिन सही,खाना खिलाने का लंगर खोल दें। सालभर के लिए बारह लंगर रायबरेली में और बारह लंगर सुल्तानपुर के लिए। कुल मिलाकर 24 लंगर प्रधानमंत्री का पद पाने के लिए कौन सी बड़ी चीज़ है?
          राहुल गांधी,गरीब दलित के घर खाना खाकर उसे और गरीब बना रहे हैं एवं जबरदस्त फर्जी पब्लिसिटी पा रहे हैं, अलग से। क्योंकि अभी तक यह सुनने में नहीं आया कि राहुल गांधी ने जिस गरीब दलित के घर खाना खाया उसे वहॉं से जाते वक्त पॉंच- दस हजार रूपये दे दिये हों! जबकि वे कोई कमजोर व्यक्ति नहीं हैं। इसके विपरीत यदि वे गरीब अगर राहुल गांधी के घर खाना खायेंगे तो न तो वह पब्लिसिटी गरीबों के काम आयेगी और न ही गरीबों की गरीबी दूर हो जायेगी, जबकि इसकी पब्लिसिटी भी बाबा राहुल गांधी को ही मिलेगी। टी-सीरीज वाले का मॉ वैष्णों के दरबार में रोजाना लगाया जाने वाला भंडारा, टी-सीरीज की ही पब्लिसिटी कर रहा है। वहां कितने करोड़ लोग खाकर चले गये कौन जानता है? हो सकता है राहुल बाबा ने भी वहां प्रसाद पाया हो। देश में चारों तरफ ऐसा देखकर भी उनके मन से यह हूक नहीं उठती कि सुल्तानपुर और रायबरेली में ही सही,कम से कम,एक-एक भंडारा तो खोल दिया जाये,जिससे वहां की गरीब और भिखमंगी जनता रोजाना भरपेट भोजन तो कर सके। राहुल गांधी कितना इस देश से कमायेंगे और किसके लिये,उनकी तो अभी शादी भी नहीं हुई है। 
         कपिल सिब्बल अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री की आड़ में घिनौना खेल खेलना चाह रहे हैं। ‘बिगबॉस’ कार्यक्रम क्या आपत्तिजनक नहीं है? कितनी ही पोर्न साइटें चल रही है, क्या वे आपत्तिजनक नहीं हैं? कितने ही ब्लू फिल्म दिखाने वाले अड्डे चल रहे हैं, वे आपत्तिजनक नहीं हैं? जहां तक धार्मिक भावनाएं भड़काने की बात है,उसमें भी दम नहीं है,क्योंकि जब धार्मिक भावनाएं भड़काकर भाजपा कुछ भी प्राप्त न कर सकी तो कोई और क्या पा सकेगा। हिन्दू-मुस्लिम सभी जानते हैं कि यह सत्ता का खेल है,फिर चाहे सत्ता पाकिस्तान की हो या गुजरात की। मनमोहन सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी पर फरसा लगाने की सोच पर उसे मुंह की ही खानी पड़ेगी। जिसकी एक घुड़की पर सरदार मनमोहन विचित्र मोहन की स्थिति में आ जाते हों,उसके कन्ट्रोल वाली साइबर मीडिया को कुटिल सिब्बल क्या खाकर नियंत्रण में कर पायेंगे,यही देखना शेष है। 
          इंटरनेट निहित हितों, मीडिया स्वामित्व से मुक्त है। सिब्बल इस पर लगाम क्यों लगाना चाहते हैं।
                  
 -वरूण गांधी,भाजपा सांसद।



       इंटरनेट की सेंसरशिप। इसकी जरूरत को एक मिनट के लिए भूल जाइए। क्या यह सम्भव है?
             
-जयन्त चौधरी, लोकदल सांसद एवं केन्द्रीय उड्डयन मंत्री, अजित सिंह के सुपुत्र।
 (सतीश प्रधान)



Friday, 16 December 2011

भारत रत्न मेजर ध्यान चन्द को दो

         
          क्रिकेट के भगवान अब तो मुँह खोलो! खेल में पहला भारत रत्न मेजर ध्यान चन्द को ही दिया जाये, जरा अपने मुख से तो बोलो।


          ऐसा किया जाना सचिन जी,आपकी महानता को ही दर्शायेगा और भगवान में महानता ही ना हो,तो फिर तो वह साधारण इन्सान ही कहा जायेगा! भगवान के लिए कुछ तो बोलो।

Thursday, 15 December 2011

दलाईलामा और अन्ना से घबराती सरकारें

          चीन सरकार दलाईलामा की और सोनिया सरकार अन्ना की मृत्यु की कामना कर रही हैं,जिससे एक ओर जहां चीन किसी कठपुतली को अगले दलाईलामा के रूप में पेश करके अपनी मनमर्जी कर सके,वहीं दूसरी ओर मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ रही आवाज का गला दबाकर चैन की बंशी बजा सके। और दोनों ही स्थिति में ले-देकर भारत की ही ऐसी की तैसी होनी है।
          यदि ऐसा नहीं है तो एक भिक्षु और तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा से पूरी चीन सरकार क्यों घबराई हुई है,और एक बुजुर्ग एवं दुर्बल समाजसेवी अन्ना हजारे से भारत सरकार क्यों गुण्डई कर रही है। जिस तरह तिब्बतीयों के लिये दलाईलामा महत्व रखते हैं,ठीक उसी तरह 120 करोड़ भारतीय जनता के लिये अन्ना हजारे का महत्व है। पिछले दो दशक से विश्व मंच पर लगातार बढ़ रहे चीनी दबदबे के आदी हो चुके लोग इस बात से हैरान-परेशान हैं कि चीन सरकार अपनी बौखलाहट और हताशा का प्रदर्शन क्यों करती है! इसी प्रकार मात्र छह माह पूर्व भ्रष्टाचार के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे को लेकर रालेगण सिद्धी(महाराष्ट्र)से लेकर दिल्ली की ओर कूच करने वाले अन्ना हजारे से सोनिया गांधी सरकार हलकान क्यों है?
          जिस प्रकार पूरी दुनिया यह नहीं समझ पा रही है कि लगभग हर मामले में दुनिया को ठेंगा दिखाने की हिम्मत रखने वाला चीन,सत्ताहीन पूर्व शासक और एक बौद्ध भिक्षु दलाईलामा से इस कदर घबराता क्यों है,ठीक इसी प्रकार भारतीय जनता यह नहीं समझ पा रही है कि आखिरकार भारत के सारे भ्रष्ट नेता अन्ना हजारे से भयभीत क्यों है? लेकिन इस भय के बाद भी वे अपनी गुण्डई छोड़ने को कतई तैयार नहीं है,जैसे की चीन।
          पिछले दिनो बीजिंग ने ऐसी ही हायतौबा,नई दिल्ली में होने वाले विश्व बौद्ध सम्मेलन को लेकर भारत सरकार के खिलाफ मचाई। पहले तो उसने ‘सीमावार्ता’ की आड़ लेकर इस सम्मेलन को स्थगित करने की मांग की,लेकिन जब भारतीय विदेश मंत्रालय ने इंकार कर दिया तो चीन ने मांग उठाई कि दलाईलामा को इसमें भाग लेने से रोक दिया जाये। इन दोनों ही बातों को न मानने के एवज में भारत सरकार ने,इस विश्व सम्मेलन में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की उपस्थिति को गैरहाजिर कराकर चीन को संतुष्ट किया,जैसा कि अन्ना हजारे के दिल्ली स्थित रामलीला मैदान पर 13 दिनो के अनशन के बाद संसद के दबाव में आश्वासन देकर किया था।
          उधर चीन सरकार,इतने से खुश नहीं हुई और उसने गुस्से में आकर‘बीजिंग’में होने वाली प्रस्तावित सीमावार्मा को ही स्थगित कर दिया। भारत में,संसद और राष्ट्रपति के आश्वासन के बावजूद मजबूत लोकपाल बिल(एनाकौण्डा) की जगह विष-दंतहीन लोकपाल(मटमैले सांप)का मसौदा,मजबूत अभिषेक मनु सिंघवी ने  दिसम्बर 2011 के दूसरे पक्ष में संसद के समक्ष रखने का मन बनाया है। जिस प्रकार तिब्बती चीन का कुछ नहीं कर सकते सिवाय इसके कि दिन-प्रतिदिन अपनी नफरत को दिन-दूनी रात चैगुनी करते जायें,ठीक उसी प्रकार भारतीय जनता इस हठी और कमीशनखोर सरकार का आम चुनाव से पूर्व कुछ नहीं कर सकती,सिवाय इसके कि इस सरकार के प्रति अपनी नफरत को दिन-दूनी रात चैगुनी बढ़ाती जाये। दिल्ली में आयोजित बौद्ध सम्मेलन के एक दिन बाद ही चीन सरकार के कोलकाता स्थित वाणिज्य दूत ने पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार को सीधे धमकी भरी एक चिट्ठी लिख मारी और कहा कि राज्य के राज्यपाल और मुख्यमंत्री उस सभा में भाग न लें,जो मदर टेरेसा की स्मृति में कोलकाता में होने वाली थी और जिसमें दलाईलामा मुख्य अतिथि के रूप में भाग ले रहे थे।
          एक विदेशी राजदूत की इस बेजा हरकत पर कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी, एसएम कृष्णा, प्रणव मुखर्जी,पी. चिदम्बरम,मनमोहन सिंह समेत सोनिया गांधी और राहुल गांधी को चिंता नहीं हो रही है? ये सरकार न तो देश को ठीक से चला पा रही है और न ही विदेशों में अपने सम्मान की रक्षा कर पा रही है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने सम्मेलन में भाग लेकर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने,अपनी गम्भीर रूप से बीमार माँ की तीमारदारी में लगी रहने के बावजूद अपने एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को सभा में भेजकर चीनी राजदूत को उसकी हैसियत तो दिखा ही दी।
          चीनी बौखलाहट के इस सार्वजनिक प्रदर्शन की वजह से उपरोक्त दोनों सभाओं को दुनिया भर के मीडिया एवं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इतना भरपूर समर्थन मिला कि इतना तो इसके आयोजक कई करोड़़ डालर विज्ञापन पर खर्च करके भी नहीं प्राप्त कर सकते थे। दुनिया को एक बार फिर सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि आखिरकार क्या कारण है कि चीन जैसा विशालकाय देश दलाईलामा से इतना घबराता है। लगभग यही हालात भारत में भी विद्यमान हैं। 11 दिसम्बर को दिल्ली में अन्ना हजारे का एक दिन का सांकेतिक अनशन हुआ जिसमें सभी राजनीतिक दलों ने भाग लिया जिससे घबराकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 13 दिसम्बर को कैबिनेट की बैठक बुलाई तथा 14 दिसम्बर को सर्वदलीय बैठक का आयोजन किया गया है।
          एक तरफ जहां दलाई लामा को लेकर चीनी नेताओं की इस बौखलाहट के कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण चीन द्वारा पिछले सात दशक में जबरन कब्जाये गये तीन देशों यथा पूर्वी तुर्किस्तान(शिजियांग),भीतरी मंगोलिया और तिब्बत में से अकेला तिब्बत ऐसा है,जिसके स्वतंत्रता आन्दोलन को दलाईलामा जैसा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव वाला भिक्षु नेता उपलब्ध है। 1949 में पूर्वी तुर्किस्तान के लगभग सभी नेता तब मार दिये गये थे,जब चेयरमैन माओ के निमंत्रण पर चीन की हवाई यात्रा के दौरान उनके विमान को हवा में ही विस्फोट करा दिया गया।
          भीतरी मंगोलिया में भी कडे़ चीनी नियंत्रण के कारण आज तक कोई प्रभावी नेता नहीं उभर पाया है, लेकिन 1959 में तिब्बत से भाग कर स्वतंत्र दुनिया में आने के बाद से दलाईलामा के प्रति चीन सरकार के मन में बसे खौफ का एक और बड़ा कारण यह है कि 1951 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद वाले 60 वर्ष में अपने सारे प्रयासों के बावजूद वह तिब्बती जनता का दिल जीतने में बुरी तरह नाकामयाब रहा है। इसकी भी सटीक वजह यह है कि दरअसल तिब्बती जनता को खौफजदा करने और असहाय समझने और तिब्बत पर नियंत्रण पक्का करने के इरादे से चीन सरकार ने वहां लाखों चीनी नागरिकों को बसा दिया,इसका परिणाम यह हुआ कि तिब्बती नागरिकों के मन में असुरक्षा की भावना पहले से कहीं अधिक बलवती हो गयी,जिसके कारण 1989 में राजधानी ‘ल्हासा’ और दूसरे कुछ बड़े शहरों में उठ खड़े हुए विशाल तिब्बती मुक्ति आन्दोलन ने चीनी नेताओं को हैरान कर दिया।
          दलाईलामा के समर्थन वाले लोकप्रिय नारों के बल पर तिब्बत की आजादी के लिये चले आन्दोलन को तत्कालीन तिब्बती गवर्नर हूं जिंताओ ने टैंकों और बख्तरबन्द गाड़ियों की मदद से कुचल तो दिया,लेकिन इस आन्दोलन ने तिब्बती जनता के मन की ज्वाला को और हवा दे दी। इसके एक साल बाद ही चीन सरकार ने यह निश्चय किया कि तिब्बती धर्म का दमन करने की नीति को छोड़कर तिब्बती जनता का दिल जीतने का प्रयत्न किया जाये। इसी उद्देश्य से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक ‘अवतार खोजी कमेटी’ ने धार्मिक नेता करमापा के नये अवतार को खोजा,जिसे दलाईलामा ने भी अपनी स्वीकृति दे दी।
          ठीक इसी प्रकार भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन करने वाले बाबा रामदेव को पुलिसिया तांडव से भयभीत कराकर उनके आन्दोलन को तो कुचल दिया,लेकिन भारतीय जनमानस के मन में यह छाप छोड़ दी कि यह सरकार गुण्डों की है। वहीं दूसरी ओर अन्ना हजारे को आन्दोलन करने से पूर्व ही उन्हें सुबह-सुबह गिरफ्तार किरके जेल में बन्द कर देने पर वह मुसीबत में आ गयी,आखिरकार 12 दिनो के उनके जबरदस्त आन्दोलन से हारी सरकार ने एक दांव खेला‘स्टैंडिंग कमेटी’ का जिसने खोजकर निकाला है,बाबा राहुल गांधी जैसा मजबूत लोकप्रिय लोकपाल।
          उधर 1995 में तिब्बत में दूसरे नम्बर के धार्मिक धर्मगुरू पंजेन लामा की खोज की गयी,लेकिन उसके लिये खोजे गये 6 वर्षीय बालक गेदुन नीमा को जब दलाई लामा ने अपनी स्वीकृति दे दी तो चीन भड़क गया और उसने उस 6 वर्षीय मासूम,उसके माता-पिता को हिरासत में लेकर अपनी पसन्द के एक लड़के ग्यालसेन नोरबू को असली ‘पंचेन लामा घोषित कर दिया। इस सारी कवायद का मकसद वर्तमान दलाईलामा के बाद अपनी सुविधा के अनुसार किसी बच्चे को ‘असली दलाईलामा’ के रूप में घोषित करने का है। लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा है कि यदि दलाई लामा ने घोषणा कर दी कि उनके न रहने के सातवें दिन जो बच्चा चीन में पैदा होगा,वह तिब्बत को स्वतंत्र कर देगा,तब चीन की सरकार कितने चीनी बच्चों का कत्ल करायेगी?

          तिब्बती आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा ने कहा है कि गुस्सा नुकसानदायक है और करूणा खुशहाली लाती है। पांचवें पेंग्विन व्याखान में लोगों के प्रश्नों का जवाब देते हुए दलाई लामा ने कहा कि वर्ष 2008 के संकट के दौरान मेरी इच्छा थी कि मैं चीनी अधिकारियों की नाराजगी और भय ले सकूं और उन्हें अपनी करूणा दे दूं। करूणा आपके मस्तिष्क को शांत रखने में मदद करता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में तिब्बत में दंगे भड़क गये थे, यहॉं तक कि भिक्षू भी विद्रोह करने में शामिल हुए और दंगे स्वायत्त क्षेत्र के बाहर बौद्ध मठों तक पहुंच गये थे।
          पिछले कुछ वर्षों से चीन,भारत की क्षेत्रीय अखण्डता की खिल्ली उड़ा रहा है,जबकि भारत अपने तिब्बत रुख में कोई बदलाव करने का इच्छुक ही नहीं दिखाई दे रहा। दरअसल सरदार मनमोहन सिंह के दब्बूपने से बीजिंग की दबंगई बढ़ गयी है। अगर ऐसे ही हालात रहे तो चीन,जिसने भारत का 1,35,000 वर्ग किलोमीटर भू-भाग दबा रखा है, तिब्बत पर किये गये कब्जे का विस्तार अरुणाचल को दक्षिण तिब्बत बताकर वहां तक करने की चेष्ठा करेगा। 2006 से बीजिंग अरुणाचल प्रदेश के तिब्बत से सम्बन्धों के आधार पर इस पर दावा करता आ रहा है। वह तमाम सेक्टरों में सैन्य भिड़न्त के लिये तत्पर दिखता है,जबकि नई दिल्ली सीमा वार्ताओं अथवा वार्ताओं से ही किसी को मूर्ख बनाने का भ्रम पाले हुए है।
          वार्ताओं के दौर से न तो ड्रैगन को बेवकूफ बनाया जा सकता है और न ही अन्ना हजारे और इस देश को। वार्ताओं के दौर जारी रखकर मनमोहन सिंह,पी.चिदम्बरम,कपिल सिब्बल,सलमान खुर्शीद,अभिषेक मनु सिंघवी,दिग्विजय सिंह,मनीष तिवारी,नारायण सामी आदि नेताओं के माध्यम से राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तो लुटिया डुबो सकते हैं लेकिन दलाईलामा का साथ देकर ‘तिब्बत’ में विकास के माध्यम से कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। वैसे भी एसएम कृष्णा के जाने का नम्बर आ गया है, विदेश मंत्रालय कपिल सिब्बल को दे दिया जाये,तो कुछ न कुछ तो हो ही जायेगा। वर्तमान माहौल में स्व.लाल बहादुर शास्त्री की याद आती है,क्योंकि सरदार जी में तो सरदार वाले एक भी गुण दिखाई नहीं देते और जो दिखाई दे रहे हैं,वे सरदार के तो नहीं हैं। (सतीश प्रधान)


Tuesday, 6 December 2011

खेल से कोसों दूर हैं खेल फेडरेशन

          सिडनी ओलम्पिक की कांस्य पदक विजेता और इंडियन वेटलिफ्टिंग फेडरेशन की वाइस प्रेसिडेन्ट पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी के  त्यागपत्र देने से पूरा खेल जगत और खेलप्रेमी स्तब्ध हैं। पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी ने इस्तीफा देने की वजह फेडरेशन में खेल की समझ न रखने वालों का बोलबाला और खेल की बजाय राजनीति का हावी होना बताया है।
          दरअसल फेडरेशन, खिलाड़ियों के लिए काम ही नहीं कर रही है। इण्डियन वेटलिफ्टिंग फेडरेशन के प्रेसीडेन्ट बी0पी0वैश्य को खेल की नाम मात्र की भी समझ नहीं है,इसके बावजूद फेडरेशन में उन्ही की तूती बोलती है। सीनियर व दिग्गज खिलाड़ी कह रहे हैं कि किसी भी खेल का नेशनल फेडरेशन अच्छे खिलाड़ियों को किसी पद पर देख ही नहीं सकता। एक न एक दिन ऐसी नौबत आनी ही थी। उधर,मल्लेश्वरी कह रहीं हैं कि फेडरेशन में उनका दम घुट रहा था। वहीं वेटलिफ्टिंग फेडरेशन के सचिव कह रहे हैं कि फेडरेशन ठीक से काम कर रहा है। उनका कहना है कि मल्लेश्वरी ने इस्तीफा दिया है, यह उनकी मर्जी है। किसी ने इस्तीफे के लिए उन पर दबाव नहीं बनाया है, इसका सीधा मतलब है कि उनकी फेडरेशन में दबाव भी बनाया जाता है।
          पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी का कहना है कि पहले यही फेडरेशन वाले गुजारिश कर रहे थे कि वह फेडरेशन में आएं, जिससे उनके अनुभव का फायदा फेडरेशन और देश के उभरते हुए वेटलिफ्टरों को मिल सके। वर्ष 2009 में वह उपाध्यक्ष के रूप में फेडरेशन से जुड़ भी गईं,लेकिन बाद में फेडरेशन ने उनकी एक न सुनी। उन्होंने जब भी फेडरेशन के पदाधिकारियों की कार्यशैली पर अंगुलि उठाई तो वे उनसे नाराज होने लगे। पिछले दो सालों में इन पदाधिकारियों ने ऐसा माहौल तैयार कर दिया कि उन्हें मजबूरन फेडरेशन से अपने को अलग करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यहॉं चाहकर भी खिलाड़ियों का भला नहीं किया जा सकता। उन्होंने कई बार खेल की बेहतरी के लिए सुझाव दिये, लेकिन उन्हें दरकिनार कर दिया गया। उनका कहना है कि फेडरेशन के अधिकारियों ने अन्य महिला वेट लिफ्टरों पर दबाव बनाया कि वे मल्लेश्वरी से नाता न रखें। नाता रखने वालों का कैरियर खराब किये जाने की धमकी भी दी जाती थी। ऐसी परिस्थितियों में कैसे कोई काम कर सकता है,इससे बेहतर था कि इस्तीफा दे दिया जाये और मैंने अपना इस्तीफा खेल मंत्री, और फेडरेशन को दे दिया है।
          वहीं फेडरेशन के सचिव सहदेव सिंह आरोप लगाते हैं कि कोई चाहे जितना बड़ा खिलाड़ी हो लेकिन जब वह किसी संगठन में रहेगा तो उसे उसके कायदे-कानून भी मानने पड़ेंगे। सहदेव सिंह का आरोप है कि मल्लेश्वरी न तो फेडरेशन की बैठकों में हिस्सा लेती थीं और न ही वेटलिफ्टिंग के सुधार के लिए कोई सुझाव देती थीं। शायद सहदेव सिंह को भी क्रिकेट एसोसियेशन के राजीव शुक्ला की तरह झूंठ बोलने की आदत पड़ गई है,इसीलिए वह कह रहे हैं कि कर्णम,फेडरेशन की बैठक में हिस्सा नहीं लेती थीं। यदि कर्णम बैठकों में हिस्सा न लेती होतीं तो उन्हें इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि तब तो फेडरेशन उन्हें बड़ी आसानी से बाहर का रास्ता दिखा सकता था। तब उसके पास कहने को भी होता कि बैठकों में भाग न लेने के कारण कर्णम को बर्खास्त कर दिया गया है।
          सहदेव सिंह का कहना है कि यही नहीं फेडरेशन ने पिछले कुछ माह में जो कदम उठाए हैं उनसे भी मल्लेश्वरी खुश नहीं थीं। आखिरकार खेल संघों में कौन से ऐसे कदम उठाये जा रहे हैं जिनसे खिलाड़ी ही खुश और संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं? यदि वास्तव में ऐसा है तो ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता ही क्या है? 400मी. हर्डल के पूर्व राष्ट्रीय रिकार्डधारी भुवन सिंह कहते हैं कि फेडरेशन में ऐसे-ऐसे लोग हैं जिनके साथ खिलाड़ियों का काम करना मुश्किल है। नब्बे के दशक के आखिरी सालों में ऑल इंग्लैण्ड चैम्पियन बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण उस समय के बैडमिंटन संघ की कार्यशैली से खिन्न थे। उन्होंने नया संघ बनाया लेकिन अंततः उन्हें उस समय के बैडमिंटन संघ के सामने हथियार डालने पड़े। इसी तरह हॉकी खिलाड़ी गुरबक्श सिंह व परगट सिंह या कई बड़े एथलीटों को राष्ट्रीय संघों ने जगह नहीं दी।
          पादुकोण की कहानी ठीक उ0प्र0 के आगरा क्रिकेट संघ से मिलती जुलती है,जिसके सर्वेसर्वा मि0 जी0डी0शर्मा बने हुए हैं,जो राजीव शुक्ला के चेले हैं एवं हुण्डई की डीलरशिप ब्रज हुण्डई के नाम से लिए हुए हैं और उसमें भी हुण्डई वाहनों की सर्विस के नाम पर स्पेयर पार्टस के उल्टे-सीधे बिल बनाकर कस्टमर को ठगते हैं। आगरा क्रिकेट संघ में कोई भी खिलाड़ी न होकर इनके भाई-बिरादर यू0डी0शर्मा और इनके वर्कशाप में काम करने वाले कर्मचारी ही हैं। इन्होंने न तो स्वयं आगरा की क्रिकेट के लिए कुछ किया और ना ही किसी दूसरे को कुछ करने दिया।
          इनके नकारेपन से खीझकर कुछ क्रिकेट खिलाड़ियों ने सात-आठ वर्ष पूर्व आगरा क्रिकेट समिति का गठन किया जिसके अध्यक्ष थे आगरा कालेज के कैप्टन रहे समीर चतुर्वेदी और सचिव थे मधुसूदन मिश्रा, जिन्होंने आगरा में कईएक टूर्नामेन्ट आयोजित कराये। आगरा में क्रिकेट को प्रोत्साहित करने के लिए इस समिति का सह्योग दिया रणजी प्लेयर सर्वेश भटनागर,जो कि रेलवे की टीम से खेलते थे, के साथ रेलवे की टीम के नेगी, धीरज शर्मा, रमन दीक्षित, जीत सिंह, और रेलवे रणजी टाफी के कोच, के0के0शर्मा ने। यह जानकारी जब मि0 जी0डी0शर्मा को हुई तो उन्होंने वकील के माध्यम से रेलवे को इन खिलाड़ियों के खिलाफ शिकायत करवा दी और रेलवे से शो काज़ नोटिस इन खिलाड़ियों को भिजवा दिया कि क्यों न रेलवे से अन्यत्र किसी और टीम में खेलने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाये?
          खिलाड़ी तो बेचारे ठहरे खिलाड़ी! वे क्या जानें गुणा-भाग का खेल,वे डर गये और उन्होंने आगरा क्रिकेट समिति की ओर से खेलना छोड़ दिया। किसी तरह से वह समिति सात-आठ साल तक सरवाइव कर पाई क्योंकि उसे ना तो यू0पी0सी0ए0 ने कोई तवज्जो दी ना ही किसी प्रकार की आर्थिक मदद। जी0डी0शर्मा गैंग के ही कैलाश नाथ टण्डन जो कि चालीस वर्षो से आगरा क्रिकेट संघ में सचिव के पद पर कब्जा जमाये थे अब यू0पी0सी0ए0 के उपाध्यक्ष बना दिये गये हैं। ये सारे वे पदाधिकारी हैं,जिन्हें क्रिकेट का बल्ला भी ठीक से पकड़ना नहीं आता और ना ही क्रिकेट की ए0बी0सी0डी0 आती है,लेकिन राजीव शुक्ला,ज्योति बाजपेई,मि0 पाठक और उघोगपति सिंहानिया की बदौलत क्रिकेट संघों पर मकड़ी की तरह कब्जा जमाये बैठे हैं।
          ध्यान रहे मि0 जी0डी0शर्मा ने यू0पी0सी0ए0 के राजीव शुक्ला को हुण्डई की एक सेडान कार गिफ्ट की है और यहॉं भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आये। एक अन्य व्यापारी को इन्होंने यह कहकर फंसाया कि भाई तू एक कार शुक्ला जी को गिफ्ट करदे, तेरा काम उनसे करा दूंगा! कार अपने शोरूम से दे देता हूँ जो ज्यादा से ज्यादा छूट दे सकता हूँ दे दूंगा। यानी कार गिफ्ट की खुद और ठग लिया दूसरे व्यापारी को। वापस आता हूँ पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी के इस्तीफे पर प्रगट की गई प्रतिक्रिया पर, इनकी कहानी क्रिकेट के इतिहास में प्रगट करूंगा।

‘‘यदि मल्लेश्वरी ने अपने पद से इस्तीफा दिया है तो कहीं न कहीं कोई सच्चाई जरूर होगी। सहदेव सिंह मनमर्जी करता होगा। इतने बड़े वेटलिफ्टर का संघ से अलग होना दुःख की बात है।
.....हरभजन सिंह,पूर्व अध्यक्ष,आई.डब्ल्यू.एल.एफ.

‘‘मैं यह नहीं कह सकता कि कौन गलत है और कौन सही। लेकिन पदमश्री कर्णम मल्लेश्वरी के फेडरेशन से हटने का एक गलत संदेश देश भर में जाएगा,जिससे वेटलिफ्टिंग का ही नुकसान होगा।
.....ललित पटेल, लक्ष्मण पुरस्कार विजेता
          इस स्तम्भकार का कहना है कि भारत के खेल मंत्री अजय माकन को इस ओर देखना चाहिए और अपने मंत्रालय को प्रभावी बनाना चाहिए वरना सारे फेडरेशन बीसीसीआई की राह पर चल निकलेंगे,जिससे खेल की तो ऐसी की तैसी ही हो जायेगी। देखा जाना चाहिए कि किस फेडरेशन को कितना अनुदान भारत सरकार का खेल मंत्रालय देता है और उसका इस्तेमाल किस मद में,कैसे और कौन कर रहा है। (सतीश प्रधान)

Tuesday, 22 November 2011

क्यों चुप हैं क्रिकेट के भगवान


काम्बली सच्चा, अजहर झूंठा
लेकिन मजबूत, अजहर का खूंटा


          1996 के विश्वकप सेमी फाइनल का वह मुकाबला जो कोलकाता के ईडन गार्डेन स्टेडियम पर श्रीलंका और भारत के बीच खेला गया,किसी ड्रामे से कम नहीं था, जिस पर वहां मौजूद क्रिकेट प्रेमियों ने कोल्ड ड्रिंक की बोतलें फेंकी, जूते-चप्पलों की बौछार करते हुए जबरदस्त हंगामा काटा एवं आग लगाकर उसका जबरदस्त विरोध प्रदर्षित किया, जिसके कारण मैच को बीच में ही रोकना पड़ा। इसके बाद जब मैच शरू किया गया तो पुनः जोरदार हंगामा होने लगा और अन्ततः जब विरोध प्रदर्शन ने थमने का नाम नहीं लिया तो 35 ओवर की समाप्ति पर मैच समाप्ति की घोषणा करते हुए,स्थापित नियमों के आधार पर परीक्षणोपरान्त श्रीलंका की टीम को विजयी घोषित कर दिया गया।
          उस समय दूरदर्शन पर मैच देख रहे करोड़ों लोगों के जेहन में दबकर रह गये सारे प्रश्न अब फिर से जीवन्त हो उठे हैं। उस समय के सीन को उन्होंने अब जब अपनी आंखों के सामने से गुजरते हुए देखा कि कैसे विनोद काम्बली रोते हुए क्रिकेट के मैदान से भागते हुए पैवेलियन आये थे,और अब जब उन्होंने स्टार न्यूज चैनल पर इसका रहस्योदघाटन किया है तो किस प्रकार से रो पड़े हैं,तो क्रिकेट प्रेमियों का खून खौल रहा है।
             मैच फिक्सिंग के इस करिश्माई करतब,जो पन्द्रह वर्ष पहले घटित हुआ,को दबाने की कोशिश में जो भी लोग लगे हैं,वे सब किसी न किसी प्रकार से उस मैच फिक्सिंग को आर्मी की कनात में दबाने की भरपूर कोशिश ही नहीं कर रहे हैं अपितू आगे भी यह इसी स्वरूप में जारी रहे,इसकी भी पटकथा लिख रहे हैंयदि विनोद काम्बली के रहस्योदघाटन में दम नहीं है तो अजीत वाडेकर,कपिल देव,राजीव शुक्ला,शरद पवार, मदन लाल,   ....... आदि ये सब बतायें कि विश्वकप सेमी फाइनल में आखिरकार वे क्या कारण थे कि स्टेडियम में मौजूद सारे क्रिकेट प्रेमियों ने अपना आपा ही नहीं खोया,अपितू जूते-चप्पलों और कोल्ड ड्रिंक की बोतलों की बौछार की? दर्शकों ने पागलपन की हद तक हंगामा क्यों काटा? क्यों नहीं वे दोबारा मैच देखने के लिए शांत हुए? हंगामें में किसी भी प्रकार की कमी ना आने की संभानाओं के कारण ही मैच को बीच में समाप्त कर रिजल्ट की घोषणा करनी पड़ी थी।

          अलावा इसके टी0वी0 पर मैच देख रहे करोड़ों लोग गुस्से में क्यों आ गये थे? कुछ ने तो अपने टी0वी0 ही फोड़ डाले थे,यह कहते हुए कि साले फिक्स करके मैच खेलते हैं! क्या सारे क्रिकेट प्रेमी जो मैदान पर थे या टी0वी0 देख रहे थे,सिरफिरे और पागल थे? जैसा कि विनोद काम्बली को अजहरूद्दीन घोषित करने की कोशिश कर रहे हैं। केवलमात्र अजहरूद्दीन और उनका साथ देने वाले ही स्वस्थ्य, दुरूस्त एवं मेडीकली फिट हैं,बाकी का पूरा हिन्दुस्तान पागल है! इस देश का हर वो इन्सान पागल है,चरित्रहीन है,सिरफिरा है, जो किसी सत्य को उदघाटित करता है अथवा करना चाहता है। एकदम दुरूस्त हालात में अजहरूद्दीन जैसे लोग ही रहते हैं जो इस देश की इज्जत को तार-तार कर रहे हैं एवं अच्छे-खासे इन्सान को पागल करार दिये जाने की साजिश रच रहे हैं। दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के बयान उनके पक्ष में आने का मतलब यह नहीं है कि वे पाक-साफ हैं। इस बयान के बाद तो अजहरूद्दीन का कथन और भी संदेहों से घिर गया है,क्योंकि दिग्विजय सिंह कभी भी, कहीं भी, किसी भी साफ सुथरे इन्सान का बचाव करते ही नहीं। उनके पास तो वह पंजा है,कि जिसकी पीठ पर लगा देंगे वहीं दाग लग जायेगा।
          कुछ का तो कहना है कि सारा विश्व जानता है कि 1996 को तो कीजिए दरकिनार बल्कि 1990 के बाद से होने वाले ज्यादातर मैचों में मैच फिक्सिंग या स्पॉट फिक्सिंग एक अनवरत चली आ रही प्रक्रिया है,जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन क्रिकेट के जानकार कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे समय में विनोद काम्बली से ऐसे रहस्योदघाटन की वजह भी एक साजिश है जो अजहरूद्दीन को फिर से कटघरे में खड़ा कर रही है,जब वे इस आरोप से बरी होने वाले हैं। कुरेदने पर पता चला कि अजहरूद्दीन,दरअसल अदालत से पाक-साफ बरी होने वाले हैं। मतलब यहॉं भी फिक्सिंग की संभावनाए प्रबल हैं,तभी तो कहा जा रहा है कि वे बेदाग बरी होने वाले हैं।
          काम्बली के रहस्यदोघाटन के जो भी कारण हों,वे एक तरफ हैं,लेकिन देश की अस्मिता से जुड़ा मैच फिक्सिंग का यह प्रश्न अंगद के पैर की तरह अपनी जगह पर जड़ता से खड़ा है,और देशद्रोहियों से जबाव मांग रहा है। इसके विरोध में इस सफाई के कोई मायने नहीं कि- विनोद काम्बली ने यह बात 1996 में ही क्यों नहीं उठाई! सभी को पता है कि जिन्न सालों-साल बोतल में बन्द रहता है,कोई फर्क नहीं पड़ता,लेकिन जब भी बोतल से बाहर आता है तो बवंडर मचना लाजिमी है,और तब सबकुछ तहस-नहस हो जाता है।
         1996 की मैच फिक्सिंग का वह जिन्न अब बोतल से बाहर आ चुका है। अब इस बात के कोई मायने नहीं कि 15 सालों बाद उस बोतल का ढ़क्कन खोलकर,मैच फिक्सिंग के जिन्न को विनोद काम्बली ने बाहर क्यों निकाला! अब जबकि मैच फिक्सिंग का जिन्न बाहर आ ही गया है तो यह साफ हो ही जाना चाहिए कि क्रिकेट के ये जादूगर, क्रिकेट प्रेमियों को कितने सालों से बेवकूफ बना रहे हैं। यह क्रिकेट खेल के असतित्व से भी जुड़ा प्रश्न है और इसी के साथ करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की आस्था से भी जुड़ा है,जिसकी बिना पर सचिन तेंदुलकर को भगवान घोषित कराये जाने की जबरदस्त हूक उठी है।

          देश क्या पूरे क्रिकेट जगत में इतना भयंकर तूफान आया हुआ है लेकिन क्रिकेट का यह भगवान मुंह में ताला लगाये खड़ा है। इस पृथ्वी पर जब भी अराजकता फैलती है, अत्याचार चरम पर पहुचता है,लोग त्राहिमाम-त्राहिमाम करने लगते हैं तो भगवान ही अवतार लेते हैं और शत्रुओं का नाश करके भोली-भाली जनता को शत्रुओं से मुक्ति दिलाते हैं,लेकिन भारत की इस धरती पर जिन्दा खड़ा क्रिकेट का यह भगवान जो 1996 के उस विश्व कप सेमी फाइनल का जीता जागता उदाहरण भी है,जिसने सारा नजा़रा अपनी आंखों के सामने होते हुए देखा ही नहीं है अपितु उसका एक हिस्सा भी रहा है,मुंह बन्द किये क्यों खड़ा है? देश को पहली बार पता लगा है कि भारत की धरती पर क्रिकेट के क्षेत्र में जन्मा क्रिकेट का यह भगवान किसी सही बात को स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्थिति में गूंगा हो जाता है,एवं बोलने की स्थिति में नहीं रहता।
          इस भगवान को एक योजना के तहत,भारत सरकार से भारत रत्न दिलवाने की मुहिम हो अथवा मैच फिक्सिंग का इतना बड़ा और गम्भीर संकट, जिसमें भारत की प्रतिष्ठा को जबरदस्त धक्का लग रहा है,एवं भारत का नाम भी बदनाम हो रहा है,इसमें से किसी भी विषय पर क्रिकेट के भगवान घोषित किये गये इस शख्स ने अपनी जुबान नहीं खोली है। क्या कारण है कि सचिन को सभी क्रिकेट प्रेमी भगवान मानते हैं और कहते हैं लेकिन उन्होंने कभी भी इसका खण्डन नहीं किया,इसका मतलब है कि वे भी मानते हैं कि वे भगवान हैं। इसीलिए उन्हें भारत रत्न देने की मांग पुरजोर पकड़ती जा रही है। 
          जबकि सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन के लिए स्वर कोकिला लता मंगेश्कर ने भारत रत्न देने की मांग की तो महानायक ने यह कहकर कि-मैं इतने बड़े सम्मान का अधिकारी नहीं  हूँ, अपने को इस योग्यता से कमतर आंका। इसी से महानता का पता चलता है। यही वजह है कि देश की करोड़ों करोड़ जनता उन्हें सदी का महानायक पुकार कर उनसे ज्यादा खुद को प्रफुल्लित करती है,जबकि क्रिकेट के ये भगवान तो वर्तमान में संकट और सवालों के घेरे में खड़े हैं।
         दो दर्जन जुबानों पर एक सा सवाल है कि विनोद काम्बली 15 सालों से चुप क्यों रहे,तब क्यों नहीं बोले? 15 सालों से करोड़ों क्रिकेट प्रेमी जनता चुप है अथवा काम्बली चुप रहे तो गुनाहगार हैं और आप दो दर्जन भर लोग, जिसमें अजहरूद्दीन,अजय जडेजा,अजय शर्मा,मनोज प्रभाकर मैच से प्रतिबन्धित किये गये,तब भी आप गुनाहगार नहीं हैं और हेकडी दिखाकर काम्बली का ही मुंह बन्द करने की कोशिश कर रहे हैं। खुले मैदान सत्य का गला घोटने का इससे बड़ा उदाहरण और कहां देखा जा सकता है! ऐसे औचित्यहीन कुतर्कों से काम्बली को निरूत्साहित किया जा सकता है,लेकिन क्रिकेट के दुनियाभर में मौजूद क्रिकेट प्रेमियों का मुंह बन्द नहीं किया जा सकता। क्रिकेट प्रेमियों की आस्था के साथ इतना बड़ा विश्वासघात किसी भयंकर कुठाराघात से कम नहीं है। यह दर्शकों की पीठ में छुरा घुसाने वाला अपराध है।
          भारत सरकार,भारत के उच्चतम न्यायालय,देश के विभिन्न प्रदेशों में गठित राज्य एवं जिला स्तरीय क्रिकेट एसोसियेशन तथा क्रिकेट से अन्यत्र खेलों के खिलाड़ियों को भी इस मैच फिक्सिंग से पर्दा उठाने के लिए अपने-अपने स्तर से तीव्र प्रयास करने चाहिए,और यदि काम्बली के बयान में सच्चाई न निकले तो उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए वरना समस्त दोषियों को दण्डित करने के साथ-साथ उनसे आर्थिक जुर्माना वसूल कर काम्बली को दिया जाना चाहिए। वैसे मैच फिक्सिंग का यह मामला प्रथम दृष्टया ही भरपूर सम्भावनाओं से ओत-प्रोत है(जिसकी पूरी पृष्ठभूमि स्पष्ट और उज्जवल है)। पन्द्रह साल पूर्व की घटना कोई बहुत पुरानी नहीं है,सिवाय इस तथ्य के की पन्द्रह वर्ष पूर्व विनोद काम्बली, सचिन तेंदुलकर से ज्यादा जाना पहचाना नाम था। भारत में तो वयस्कता की उम्र ही 18 वर्ष है। 15 साल वाले को उसके किये गलत कार्यों की यदि सजा मिलती है तो बाल अधिनियम के तहत ही मिलती है। उस हिसाब से भी मैच फिक्सिंग की यह दुघर्टना तो अभी इलाज किये जाने के काबिल है।
          इसलिए मूल सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि आखिरकार अजहरूद्दीन और अजय जडेजा को 4 साल बाद ही सही फिक्सिंग के कारण ही प्रतिबन्धित किया गया है। उनके खिलाफ आज भी अदालत में मामला विचाराधीन है। यदि मैच फिक्सिंग के आरोप गलत हैं तो उन्हें क्रिकेट से प्रतिबन्धित क्यों किया गया? ऐसी विषम परिस्थितियों में विनोद काम्बली के रहस्योदघाटन को खारिज किया जाना और अजहरूद्दीन की बात पर यकीन किया जाना दुर्भाग्यपूर्णं होगा,जबकि सीबीआई के एक अधिकारी को दिये गये बयान में वे स्वयं कबूल कर चुके हैं कि उन्हें दस लाख रुपये दिये गये,और वह अकेले ही नहीं हैं बल्कि अजय जड़ेजा और नयन मोंगिया भी शामिल थे। इसके अलावा जो अन्य मैच फिक्स थे,उसका भी उन्होंने खुलासा किया था।
          वैसे भी यदि इससे किसी सच्चाई का पता चलता है तो वह सामने आनी ही चाहिए। यदि इस सच्चाई को सामने लाना गड़े मुर्दे उखाड़ने वाली बात है तो आज पच्चीस साल बाद इकबाल मिर्ची को भारत लाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। तब तो सभी अपराधियों को क्लीन चिट दे देनी चाहिए! क्यों भाई दिग्विजय सिंह जी, फिर इकबाल मिर्ची की वकालत क्यों नहीं करते?
          कपिल देव का कहना है कि काम्बली 15 वर्ष पूर्व बोलता। क्या कपिल देव विश्वकप जीतने की घटना को भूल गये हैं,क्या आज पच्चीस सालों के बाद वे इसका उल्लेख कहीं नहीं करते हैं? सम्भवतः वह आज भी उन यादों को ऐसे संजोए होंगे जैसे यह कल की ही बात हो। इतने वरिष्ठ खिलाड़ी से ऐसे वकतव्य की उम्मीद किसी भी क्रिकेट प्रेमी को कतई नहीं थी। जिस प्रकार उनके लिए 25 वर्ष पूर्व विश्वकप की जीत आज भी खुशी का अनुभव देती हैठीक उसी प्रकार विनोद काम्बली के लिए पन्द्रह वर्ष पूर्व की वह मनहूस घड़ी आज भी दुख की टीस देती है,जिसके कारण उसका कैरियर तबाह हो गया। पन्द्रह साल बाद मुंह खोलने का मतलब यह कतई नहीं है कि अपराध पुराना हो गया,इसलिए अब इसकी जांच का कोई मतलब नहीं एवं अपराधी को ना पकड़े जाने का लाइसेन्स मिल गया है।
          1996 में की गई मैच फिक्सिंग आज के दिन में वो हवन है,जिसमें यदि कोई जानबूझकर हवन सामग्री की जगह पानी डालने की कोशिश करेगा तो पानी पैट्रोल का काम करेगा तथा आग और भडकेगी। इस आग की शान्ति और हवन का आयोजन तभी सफल होगा जब इसमें हवन सामग्री डाली जायेगी,और हवन की सामग्री है,उस समय की भारतीय टीम के खिलाड़ी। इस हवन सामग्री रूपी टीम को भी बड़ी बारीकी से जांचा-परखा जाना होगा कि इसके कनटेन्ट सही और शुद्ध हैं कि नहीं। राजनीति की चाह में क्रिकेट में राजनीति करने वाले खिलाड़ियों और धन अर्जित करने की चाह में क्रिकेट एसोसियेशन के माध्यम से क्रिकेट में घुसे ज्यादातर राजनीतिज्ञों ने भारत के इस सबसे बड़े खेल को मृत्यु के मुहाने पर ला खड़ा किया है,जिसका स्पष्ट गवाह है वर्तमान में हो रहे मैचों के दौरान खाली पड़े क्रिकेट के स्टेडियम।
          अजहरूद्दीन,काम्बली को पागल,चरित्रहीन और ना जाने क्या-क्या नहीं बता रहे हैं,जो वास्तव में अजहरूद्दीन के दिमाग को सेन्टर से हट जाने (एसेन्ट्रिक होने) का ही संकेत देते हैं। जिस प्रकार अजहरूद्दीन की पूरी गैंग काम्बली से सुबूत पेश करने की बात कर रही है,वे बतायें,स्वंय उनके या उनकी मण्डली के पास क्या सुबूत हैं कि वो मैच फिक्स नहीं था? जबकि उस मैच फिक्सिंग की सारी संभावनायें आजतक मौजूद हैं। अजहरूद्दीन केवल मात्र टीम बैठक का हवाला देकर,मैच फिक्सिंग के सत्य पर पर्दा डालना चाह रहे हैं। टीम का कैप्टन उन्हें इसलिए नही बनाया गया था कि सर्वसम्मति का फैसला दिखाकर मैच फिक्स करें। उनका व्यंगात्मक लहजे में कहना कि जब पूरी टीम फैसला ले रही थी तो काम्बली सो रहे थे। क्या वे सिद्ध कर सकते हैं कि टीम ने पहले फील्डिंग करने का फैसला लिया था और मीटिंग में काम्बली सो रहे थे। है उनके पास कोई सुबूत? क्या वे कोई वीडियो क्लिपिंग दिखा सकते हैं जिसमें मीटिंग चल रही हो तथा लालू यादव एवं देवेगौणा की तरह काम्बली सो रहे थे।
          बहरहाल इस बेचैनी भरे माहैाल में उस टीम के अन्य खिलाडी़ अपनी जुबान नहीं खोल रहे हैं,और उनमें से मात्र सचिन को छोड़कर सारे के सारे क्रिकेट से अलविदा हो चुके हैं, इनमें मनेाज प्रभाकर, अजय शर्मा, अजय जड़ेजा, नवजोत सिंह सिद्धू, प्रमुख हैं। इन खिलाड़ियों को आगे बढ़कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए,जिससे वर्तमान और भविष्य में उन जैसे यंग रहे खिलाड़ियों का भविष्य बर्वाद न हो, जैसा उनका हुआ है।
          उस समय के तेज गेंदबाज वेंकटपति राजू का उदाहरण अहम है। राजू ने खुलकर कह दिया है कि उस टीम बैठक में सिद्धू जैसे कुछ बल्लेबाज इस बात से सहमत नहीं थे कि टीम को पहले क्षेत्ररक्षण करना चाहिए। वेंकटपति राजू द्वारा खोले गये इस राज की भाजपा सांसद सिद्धू को पुष्टि करनी चाहिए। उन्हें सांसद होने के नाते अपने हम बिरादर दूसरे सांसद का बचाव नहीं करना चाहिए। यह उनकी क्रेडेबिलिटी का भी सवाल है। मूल सवाल,क्रिकेट,क्रिकेट प्रेमियों और देश की अस्मिता से जुड़ा है,इसलिए ऐसा नहीं है कि सिद्धू मुंह नहीं खोलेंगे और अजहरूद्दीन का साथ देंगे तो सही करार दिये जायेंगे। वैसे तो सिद्धू किसी भी बात को कहने के लिए बहुत बड़ा मुंह खोलते हैं और किसी भी विषय पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए उनके पास मुहावरों एवं लोकोक्तियों की कमी नहीं रहती है। फिर अब क्या हो गया गुरू! कहां छिपे हो गुरू? सामने क्यों नहीं आते गुरूरू............सच स्वीकार करना तो सीखो गुरू,वरना कामेडियन बनकर ही रह जाओगे गुरू।
          क्रिकेट से जुड़ा बहुत बड़ा जनमानस आज यह जान चुका है कि 1996 का वह मैच सौ प्रतिशत फिक्स था, फिर भी खिलाड़ियों को ईमानदारी के तराजू में तौलना चाहता है। विनोद काम्बली के रहस्योदघाटन की पुष्टि श्रीलंका टीम के मैनेजर श्री समीर दास गुप्ता,हैन्सी क्रोनिए,पूर्व क्यूरेटर प्रवीर मुखर्जी,पूर्व क्यूरेटर कल्याण मित्रा (मैं, कप्तान होता तो पहले बल्लेबाजी करता) के बयान कर रहे हैं। 1996 विश्वकप टीम के सलेक्टर सबरन मुखर्जी का कहना है कि, वे तो सरप्राइज ही हो गये जब सुना कि टॉस जीतकर इण्डियन टीम बोलिंग करने जा रही है। ये सारे बयान इस ओर स्पष्ट इशारा करते हैं कि 1996 का विश्वकप सेमीफाइनल में अनहोना हुआ,जिसे नहीं होना चाहिए था।
          आज ऐसा समय आ गया है कि सभी वरिष्ठ खिलाड़ियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जिन खिलाड़ियों पर हम गर्व करते हैं या भगवान की तरह पूजते हैं,वह सचिन हों या कपिल,सुनील गवास्कर,दिलीप वेंगसरकर,श्रीकान्त या फिर रवि शास्त्री,अगर आगे नहीं आते हैं तो कहीं ऐसा ना हो कि आगे आना वाला समय उन्हें माफ ना करे और उन्हें उनके प्यारे दर्शकों की निगाह में गिराकर अर्श से फर्श पर पहुचा दे। क्योंकि ये सभी वरिष्ठ खिलाड़ी 90 के दशक से मैदान पर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़े रहे हैं।
          इसकी जॉंच का तरीका केवल एक बचा है कि उस समय के समस्त खिलाड़ियों को एक साथ बुलाने की बजाय अकेले-अकेले बुलाकर यू0पी0पुलिस से इंटेरोगेट कराया जाये तथा इसका मुकदमा ब्रिटेन स्थित साउथवर्क कोर्ट के जस्टिस कुक के हवाले कर देना चाहिए जिसने सलमान बट, मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद आमेर को सजा सुनाई। ऐसे में भारत के खेलमंत्री श्री अजय माकन का यह बयान देश की प्रतिष्ठा के हित में दिखाई देता है कि -काम्बली के दावों की बीसीसीआई को जांच करनी चाहिए। उन्होने कहा कि यदि क्रिकेट बोर्ड जांच नहीं करता है तो उनका मंत्रालय दखल दे सकता है। माकन ने कहा कि जब टीम का कोई खिलाड़ी आरोप लगाता है तो उसकी पूरी जॉंच होनी ही चाहिए। खिलाड़ी के आरोप सही हों या गलत लोगों को सच जानने का अधिकार है, इसकी पूरी जॉंच होनी चाहिए और यदि कुछ गलत हुआ है तो दोषियों को सजा भी मिलनी चाहिए।
          इस स्तम्भकार का स्पष्ट मत है कि खेलमंत्री को ही इसमें दखल देना चाहिए, क्योंकि यह दो देशों के बीच का मामला है। मैच फिक्सिंग से फायदा श्रीलंका की टीम को ही ज्यादा हुआ। श्रीलंका की टीम को जब पता चला कि वह टॉस हार गई है तो उनकी टीम में मायूसी छा गई थी,क्योंकि उनकी टीम का भी डिसीजन यही था कि टॉस जीतने पर पहले बैटिंग करेंगे,लेकिन जैसे ही पता चलाकि अजहरूद्दीन ने पहले फील्डिंग करने का निर्णय लिया है,उनकी टीम के खिलाड़ी उछल पड़े,मानो उनकी जीत उसी समय पक्की हो गई थी। इसलिए निशाने पर उसको भी रखा जाना चाहिए,क्योंकि यह मात्र भारतीय टीम का ही मामला नहीं है,जो बीसीसीआई जांच करे और इतिश्री हो जाये, वह तो पहले ही चार खिलाड़ियों को खेल से प्रतिबंन्धित कर इस मैच फिक्सिंग की इतिश्री कर चुका है।
=         देश से बड़ा इस देश में कोई नहीं है,इसलिए राष्ट्रहित में मैच फिक्सिंग की इस घटना की जॉंच के लिए खेल मंत्री को अपने स्तर से आईसीसी से जांच किये जाने के लिए पत्र लिखना चाहिए, अथवा उच्चतम न्यायालय को इसकी जॉच के लिए एसआईटी का गठन कराना चाहिए,यदि इसके लिए किसी पीआईएल की आवश्यकता उच्चतम न्यायालय महसूस करता है तो इस लेख पर ही सज्ञान लिये जाने के लिए यह स्तम्भकार स्वीकृति प्रदान करता है। (सतीश प्रधान)

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