Thursday, 20 October 2011

जेट उड़ाने से कठिन है, फॉर्मूला-1 कार ड्राइविंग


          इण्डिया के ग्रेटर नोएडा स्थित, बुद्ध इन्टरनेशनल सर्किट पर 30 अक्टूबर 2011 को पहली फॉर्मूला-1 कार रेस इंडियन ग्राण्ड प्रिक्स के आयोजन से पहले जे0के0एशिया सीरीज और दिल्ली एमआरएफ चैम्पियनशिप का आयोजन 28-30 अक्टूबर के दौरान इसी ट्रैक पर होगा। पहला अभ्यास सत्र 28 अक्टूबर को सुबह 10 बजे और दूसरा दोपहर दो बजे से शुरू होना है, तीसरा और आखिरी अभ्यास सत्र 29 अक्टूबर को 11 बजे यानी क्वालीफाइंग रेस से
तीन घण्टा पूर्व होगा।                                        

  अभ्यास सत्रों के मध्य दर्शकों के मनोरंजन के लिए दिल्ली चैम्पियनशिप और जे0के0एशिया सीरीज की दो रेस सेटरडे और सण्डे को होनी हैं। जे0पी0 स्पोर्ट्स इंटरनेशनल लि0 के प्रबन्ध निदेशक एवं सीईओ श्री समीर गौण ने बताया कि वह भारत में पहली एफ-1 ग्राण्ड प्रिक्स के आयोजन से उतने ही रोमांचित हैं, जितना कि कोई आविष्कारक अपने आविष्कार से होता है, इसीलिए वह इसे वर्ष की सबसे यादगार रेस बनाना चाहते हैं। ध्यान रहे कि इस सत्र(2010) में 19 रेस होनी हैं। 15-16 अक्टूबर 2011 को योनगाम(Yeongam)में आयोजित कोरियन ग्राण्ड प्रिक्स रेस 16वीं थी। 17वीं इण्डियन ग्राण्ड प्रिक्स, बुद्ध इण्टरनेशनल सर्किट, ग्रेटर नोएडा में 60 लैप की फाइनल फॉर्मूला-1 रेस 30 अक्टूबर, सण्डे को दोपहर तीन बजे होगी। 18वीं अबुधाबी ग्राण्ड प्रिक्स, यास मरीना (Yas Marina) में 12 एवं 13 नवम्बर 2011 को तथा इस सत्र की अंतिम 19वीं ब्राजीलियन ग्राण्ड प्रिक्स 26-27 नवम्बर 2011 को इंटरलागोस (Interlagos) में समपन्न होनी है। 
  अब आइये इस रेस से जुड़ी कुछ खास जानकारी भी शेयर करते हैं। रेस की कार, पंख, इंजन, गीयर, स्टीयरिंग, टायर और ब्रेक के बारे में आपको जानकारी से लैस कराते हैं, जिससे कि आपका रोमांच भी 320 किलोमीटर प्रति घण्टा की स्पीड पकड़ सके।
कारः फॉर्मूला-1 कार, कार्बन-फाइबर और बेहद ही हल्के कलपुर्जो से बनी होती है। इसका न्यूनतम वजन भी तय किया गया है। नियम के अनुसार ड्राइवर सहित इसका वजन 640 किलोग्राम से कम नहीं होना चाहिए, लेकिन ज्यादातर कारों का वजन इससे कम ही होता है, वह भी लगभग 440 किलोग्राम। ऐसी स्थिति में टीमें कार का वजन बढ़ाने के लिए पूरक भार (ऐसा भार जो गाड़ी को स्थिर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये) का प्रयोग करती हैं। नियम के ही अनुसार एफ-1 कार की चौड़ाई 180 से0मी0 और उंचाई 95 से0मी0 से अधिक नहीं होनी चाहिए, जबकि इसकी लम्बाई के सन्दर्भ में नियम बिल्कुल मौन हैं।
पंख (विंग्स): फॉर्मूला-1 कार के सस्पेंशन, कार की चेसिस को उसके चकों (पहिए) से जोड़ने वाले आधार से लेकर उसके ड्राइवर के हेलमेट तक, प्रत्येक कोंण से एयरोडायनमिक्स का ध्यान रखा जाता है, लेकिन ध्यान रहे इन एयरोडायनमिक्स में सबसे खास ख्याल कार के पंख का ही रखा जाता है, जो कि 320 किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ्तार तक कार का संतुलन बनाये रखने में अपनी महत्वपूंर्ण भूमिका अदा करते हैं। इन पंखों को बनाने से पूर्व बाज़ पक्षी के पंख एवं उसके वर्किंग सिस्टम पर वर्षों रिसर्च की जा चुकी है। पंख,कार को जमीन पर उसकी पकड़ बनाने में मददगार साबित होते हैं,ठीक उसी तरह जैसे बाज़ पक्षी जब अपने शिकार पर झपट्टा मारता है तो उसके पंख मददगार होते हैं। फॉर्मूला वन कार में भी दो ही पंख होते हैं,एक आगे और एक पीछे।
इंजन: फॉर्मूला-1, कार में 2.4 लीटर, वी-8 इंजन का इस्तेमाल होता है जो 18000 राउण्ड प्रति मिनट (आर.पी.एम.) की स्पीड देता है। इससे कार का इंजन औसतन 320 किलोवॉट की उर्जा उत्सर्जित करता है, और इस प्रक्रिया में तापमान तकरीबन 1000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इंजन, ईधन को 20 प्रतिशत अधिक क्षमता से ऊर्जा में तब्दील करता है। फॉर्मूला वन कार का इंजन, ड्राइवर सीट और पिछले एक्सेल के बीच में स्थित होता है। तापमान और जबरदस्त गुरूत्वाकर्षक दबाव के कारण एक रेस के दौरान फॉर्मूला-1 कार ड्राइवर के शरीर से तकरीबन दो से चार लीटर पसीना बह जाता है।
गीयरः फॉर्मूला-1 कार में सात फॉरवर्ड गीयर और एक रिवर्स गीयर होता है। फॉर्मूला वन कार का गीयर बॉक्स कार्बन-टाइटेनियम का बना होता है और पूरी तौर पर ऑटोमैटिक होता है।
स्टीयरिंगः फॉर्मूला-1 कार का स्टीयरिंग सामान्य नहीं होता है, उसमें कई तरह के फंक्शनल स्विच बटन होते हैं। रेस के दौरान ड्राइवर स्टीयरिंग पर लगे इन स्विचों की मदद से क्लच ऑपरेट करते हैं, गीयर बदलते हैं, पैट्रोल और हवा के दबाव पर नज़र रखते हैं। स्टीयरिंग पर एक स्क्रीन भी लगी होती है, जिसमें ड्राइवर लैप टाइम, स्पीड एवं गीयर देख सकते हैं। फाइबर से ही बने इस स्टीयरिंग का वजन 1.3 किलोग्राम तक होता है।
टायरः फॉर्मूला-1 कार के टायर की चौड़ाई 245 मिलीमीटर से अधिक नहीं होती है। यह एक खास रबर के बने होते हैं। जहॉं एक सामान्य कार के टायर की उम्र 80,000 किलोमीटर होनी चाहिए, वहीं इन फॉर्मूला-1 कार के टायर की उम्र महज 300 किलोमीटर ही होती है।
ब्रेकः फॉर्मूला-1 कार के ब्रेक पैड 1000 डिग्री सेल्सियस से अधिक का तापमान सहने में सक्षम होते हैं। सर्किट पर ब्रेक के अलावा इंजन की गति कम करके भी रफ्तार पर नियन्त्रण करते हैं। फॉर्मूला-1 कार का ब्रेकिंग सिस्टम इतना जबरदस्त होता है कि महज 15 मीटर की दूरी के अन्दर ही 100 किलोमीटर प्रति घन्टे की स्पीड को जीरो पर लाया जा सकता है।
  रेस के दौरान सर्किट पर 300-320 किलोमीटर प्रति घन्टा की स्पीड से दौड़ती फॉर्मूला-1 कार में ड्राइवर को उच्च तापमान और जबरदस्त ग्रेविटेशनल फोर्स का सामना करना पड़ता है। इस स्पीड पर ग्रेविटेशनल फोर्स, सामान्य का तीन गुणा हो जाता है। सर्किट पर कुछ मोड़ ऐसे भी होते हैं, जहॉं से टर्न लेने पर यह फोर्स पांच गुणा भी हो जाता है। ड्राइवर जहॉं बैठता है, उसे कॉकपिट ही समझिये, जहॉं का तापमान किसी भट्टी से कम नहीं होता है। ऐसे हालातों में ड्राइवर की जान को पल-पल का खतरा बना रहता है। आर्यटन सेना जैसे चैम्पियन-ड्राइवर इस खेल में अपनी जान से हांथ धो बैठे हैं। जरा सी चूक हुई नहीं कि इस स्पीड मशीन को आग के गोले में तब्दील होने में एक सेकण्ड का भी समय नहीं लगता है। इसी वजह से एफआईए ने ड्राइवर की सुरक्षा के लिए खास-आवश्यक नियम बनाये हैं। इसमें ड्राइवर का सेफ्टी ड्रेस कोड सबसे अहम है।
जूतेः फॉर्मूला-1 ड्राइवर के जूते खास तरह के बनाये जाते हैं। इन्हें भी आग और तगड़े झटके झेलने के हिसाब से बनाया जाता है, लेकिन एक्सीलेटर और ब्रेक पर कन्ट्रोल के लिए इनके सोल को बेहद पतला रखा जाता है, ये कार्बन-फाइबर के बने होते हैं और दस हजार डॉलर से भी ज्यादा कीमत के होते हैं। जिस देश में डालर चलता है, वहॉं के हिसाब से मंहगे नहीं हैं लेकिन यदि इसे नेपाल देश की करेन्सी में बदलेंगे तो निश्चित ही बहुत ही मंहगे दिखाई पड़ेंगे।
ग्लब्सः ड्राइवर के दस्ताने भी एंटी फॉयर मैटीरियल के बने होते हैं। इन्हें कार्बन फाइबर से बनाया जाता है। इन्हें बनाते वक्त इनकी मोटाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। इनकी मोटाई 0.55 मिलीमीटर से ज्यादा नहीं होती है, जिससे ग्लब्स पहने के बाद भी ड्राइवर की अंगुलियां सामान्य तरीके से काम करती रहती हैं। ये भी तापमान रोधी, पसीना सोखनेवाले और बेहद आरामदायक होते हैं, जिससे पूरी रेस के दौरान लगातार स्टीयरिंग पकड़े रहने में ड्राइवर को कोई दिक्कत न महसूस हो।
शोल्ड स्ट्रिपः सूट में कंधे पर चैड़ी पट्टी लगी होती है, यह काफी मजबूत होती है जो दुघर्टना की स्थिति में ड्राइवर को जल्द से जल्द कार से बाहर खींचने के काम आती है। आग अथवा कार क्रैश होने की स्थिति में बचावकर्मी इसी पट्टी के सहारे ड्राइवर को फौरन खींचकर बाहर निकालते हैं।
गर्दन का बचावः सिर और गर्दन को एक सीध में रखने के लिए एक हार्ड-ब्रेक फ्रेम सिर से गर्दन के पीछे लगाया जाता है,जिससे दुघर्टना की स्थिति में गर्दन के मुड़ने का खतरा न्यूनतम हो जाता है।
बॉडी सूटः ड्राइवर को एक खास प्रकार का बॉडी सूट पहनना होता है, जिसका वजन 1.9 किलोग्राम होता है। यह अग्निरोधी होता है। यह 1500 डिग्री सेल्सियस के तापमान को आराम से सह सकता है। इसमें सिलाई नहीं होती है। यह सूट उच्च तकनीक से निर्मित फॉयर-प्रूफ आर्मीड प्लास्टिक से बनाया जाता है एवं इसका फैब्रिक कुछ इस तरह से तैयार किया जाता है कि यह ड्राइवर के शरीर के तापमान को सहनीय बनाता है। इस फैब्रिक में कई रोम-छिद्र होते हैं, जो तापमान को बढ़ने से रोकते हैं। बावजूद इसके, एक रेस के दौरान ड्राइवर के शरीर से दो से चार लीटर तक बहने वाले पसीने को यह आसानी से सोख लेता है। सूट पर लगा टीम का लोगो अलग से सिला या चिपकाया हुआ नही होता है, बल्कि यह सूट में ही उभारा जाता है।
मास्कः ड्राइवर हेलमेट के नीचे मास्क पहनते हैं। यह उसके पूरे सिर, चेहरे और गर्दन को कवर करते हुए कंधे तक पहुंचते हैं। चेहरे पर सिर्फ आख और नाक का हिस्सा ही खुला रहता है। ये मास्क भी पॉली- कार्बोनिक फाइबर के बने होते हैं। ड्राइवर के सिर और चेहरे से बहने वाले पसीने को यह सोख लेते हैं।
हेलमेटः ड्राइवर की सुरक्षा के लिहाज से हेलमेट सबसे खास होता है, क्योंकि ड्राइवर खुले कॉकपिट में बैठे होते हैं। हेलमेट की बनावट में एयरोडायनेमिक्स के सिद्धान्त को ध्यान में रखा जाता है। इसकी बाहरी परत, दो अन्तः परतों से बनी होती हैं। ऐसी ही हार्ड प्लास्टिक बुलेट प्रूफ जैकेट में भी इस्तेमाल की जाती है।

जेट विमान और एफ वन कार चलाने में अन्तर

1. जेट विमान हवा में उड़ाया जाता है, जबकि फॉर्मूला-1 कार जमीन पर दौड़ानी पड़ती है।
2. हवा में उड़ते जेट को लोग हवा में देखने के बजाय जमीन से देखते हैं,जबकि फॉर्मूला-1 कार जो कि जमीन पर ही दौड़ती है, और दर्शक जमीन स्थित दीर्घा से ही देखते हैं।
3. जेट विमान उड़ाने में पायलट को पसीना नहीं आता है, जबकि फॉर्मूला-1 कार ड्राइवर को एक रेस में दो से चार लीटर पसीना बहाना ही पड़ता है।
4. जेट में एक सेकण्ड को आख बन्द भी हो जाये तो भी कोई आफत नहीं आने वाली लेकिन फॉर्मूला-1 कार ड्राइवर की रेस के दौरान एक बटा दस सेकण्ड के लिए भी आंख बन्द हो जाये तो वह खुदा को प्यारा हो सकता है।
5. जेट उड़ाने में न्यूनतम रिस्क है, जबकि फॉर्मूला-1 कार रेस ड्राइवर को रिस्क ही रिस्क है।
6. जेट उड़ाना आसान है, जबकि फॉर्मूला-1 कार दौड़ाना उतना ही कठिन है, क्योंकि इसमें उतार-चढाव और कई मोड़ वाले सर्किट पर फॉर्मूला-1 कार को नियंत्रित करना बहुत ही कठिन कार्य है।
7. जेट, जब करतब दिखाते हैं तब रोमांचकारी लगते हैं, लेकिन फॉर्मूला-1 कार रेस का आयोजन ही रोमांच से भर देता है, और इस रेस को आंखों से देखना ही शरीर में सिरहन पैदा कर देता है।


सतीश प्रधान

27 comments:

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