Thursday, 26 May 2011

पप्पु के पापा की डिलीवरी हो गई.



         इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मनी लॉंड्रिंग मामले में समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव व सांसद अमर सिंह की याचिका खारिज कर, पप्पू के पापा की डिलीवरी का इंतजाम कर दिया है। f”kवाकान्त त्रिपाठी  की याचिका पर उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदे”kkलय को कई राज्यों में पaaaaaaaजीकृत कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के मामलों की जांच करने का निर्दे”k दिया है। याचिका की सुनवाई की तिथी जुलाई के प्रथम सप्ताह में नियत करते हुए न्यायालय ने ईडी से एक माह के भीतर जांच की प्रगति रिiksZV पे”k करने के साथ ही स्वंय भी उपस्थित रहने को कहा है।
         उक्त आदे”k न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा और न्यायमूर्ति एस.एस.तिवारी की खण्डपीठ ने अमर सिंह व f”koकान्त  त्रिपाठी की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया। याचिका पर राम जेठमलानी और गोपाल चतुर्वेदी के अलावा राज्य सरकार के वकील डीआर चौधरी व अपर महाधिवक्ता ने भी अपना पक्ष रखा। याचिका के अनुसार व’kZ 2003 में जब प्रदे”k में मुलायम सिंह की सरकार थी, राज्य सरकार ने अमर सिंह को उ0प्र0विकास परि’kद कk चेयरमैन नियुक्त किया था।
      चेयरमैन पद पर रहते हुए अमर सिंह ने मेसर्स पंकजा आर्ट एण्ड क्रेडिट प्रा0लि0 तथा मेसर्स सर्वोत्तम कैप्स लि0 को सरकारी ठेके दिए तथा सरकार को करोड़ों का चूना लगाया। ज्ञात हो कि उक्त दोनों कम्पनियों के अधिकां”k ksयर अमर सिंह की पत्नी व फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन के पास हैं। अमर सिंह ने अपने नियन्त्रणाधीन छह कम्पनियों को वि”ks’k लाभ पहुंचाया जो कि किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न नहीं थीं] फिर भी इन कम्पनियों की सम्पत्ति 400 करोड़ तक पहुaaWWWWच गई। अमर सिंह के टेप से और ढ़ेर सारी कारिस्तानियों का पता चल सकता है एवं उसके आधार पर वि”ks’k जांच की कार्रवाई की जा सकती है।
         अमर सिंह ने कहा है कि हाईकोर्ट द्वारा कराई जा रही जांच में वह दो’kh पाये जाते हैं तो कोई भी दण्ड भुगतने को तैयार हैं] वह कानून से ऊपर नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अपने ऊपर लगे आरोपों के सम्बन्ध में जांच के लिए वह dsUnªh;  वित्त मंत्री और कम्पनी मामलों के मंत्री को पहले ही पत्र लिख चुके हैं। लगता है अमर सिंह ऊर्फ पप्पू के पापा अभी भी इस न”ks में हैं कि अगर जांच में फंसे तब भी कोर्ट के आर्डर को दर-किनार कर सकते हैं। यह बात “kk;n उन्हें पहली बार समझ में आई है कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं] वरना तो मुलायम राज में वह कानून को जेब में रखकर चलते थे। यदि वास्तव में वह अपनी सभी कम्पनियों की जांच के लिए भारत सरकार के मंत्रालयों को पत्र भेज चुके हैं तो इसे कोर्ट में अगली सुनवाई के समय पे”k करें तथा उसकी एक प्रति bl Cykx dks भी भेजने का क’V करें।
      वैसे उन्होने क्या गलत नहीं किया इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी में रहते हुए पूरा समाजवाद लाने की कोf”k”k की। अमर सिंह ने पान की दुकान चलाने वाले  ट्रक ड्राइवर और घरेलू नौकरानी तक को कम्पनी का निदे”kक बना दिया वह भी उन्हेa बिना बताये। दरअसल वे उन्हें सरप्राइज देना चाहते थे। है ना बात समाजवाद की! और दूसरी कम्पनियाWa तो प्राइवेट लि0 और लिमिटेड कम्पनी में चेयरमैन रहे व्यक्ति को भी निदे”kक बनाने को तैयार नहीं हैं जबकि ऐसे चेयरमैन के पास बुद्वि है] विवेक है एवं सबसे बड़ी बात सामने वाले के समक्ष पे”k करने के लिए तार्किक kक्ति भी मौजूद है।
      ?kkटमपुर थाना क्षेत्र के आमौर निवासी पान विक्रेता दिलीप सिंह को भी अमर सिंह ने एक कम्पनी का डायरेक्टर बनाया हुआ था। जिन 23 लोगों ने अमर सिंह के खिलाफ हाईकोर्ट में हलफनामा दिया है उसमें यह पान विक्रेता दिलीप सिंह भी है। गौर तलब यह है कि ना तो उसके पास पैन कार्ड है ना ही किसी खाते का वह संचालन करता है] फिर भी आरओसी ने उसे डायरेक्टर बनाने पर कोई आपत्ति नहीं की।
      दिलीप सिंह के अलावा हलफनामा देने वालों में अधिकाaZa”k कोलकाता के रहने वाले हैं। अधिवक्ता श्री त्रिपाठी ने कहा कि अब किसी भी समय अमर सिंह की गिरफ्तारी हो सकती है। गिरफ्तार करके अमर सिंह को भी तिहाड़ जेल में करुणानिधि की आWख की पुतली कनिमोझी के साथ रख दिया जाये] जिससे वहां मौजूद अच्छी-अच्छी हस्तियों से देास्ती कर कुछ विकास की बात अमर सिंह कर सकते हैं।
      काने करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी सजा काट रही हत्यारिन “kkरदा जैन] पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रही पूर्व आईएफएस अधिकारी माधुरी गुप्ता]  सेक्स रैकेट चलाने वाली सोनू पंजाबन के साथ अमर सिंह अपनी “ks;रो- “kkयरी भी कर सकते हैं और किसी नई कम्पनी की नींव भी रख सकते हैं। सोनू पंजाबन तो अमर सिंह के लिए हजारों बिपा”kklq ले आयेगी]  बस फिर क्या है अमर चाचा के मजे ही मजे हैं।
      अमर सिंह को तिहाड़ में नीरा राडिया की जगह सोनू पंजाबन]  बरखा दत्त की जगह कनिमोझी मिलेंगीं और रतन टाटा एवं अनिल अम्बानी की जगह वह खुद हैं ही। फिर क्या कमी बची बस फटाफट एक कम्पनी बनायें और इन सबको रखने के बाद कम्पनी के प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई बिल आने से पहले “kqरु करा दें और उसका चेयरमैन बना दें अपने इण्डियन सरदार मनमोहन सिंह कोA पैसों की पूर्ति के लिए कुछ दिनों बाद आईएमएफ के चेयरमैन पद पर आहलूवालिया की नियुक्ति होने ही वाली है] फिर तो पैसों की बरसात ही बरसात है और अपने अमर सिंह की बल्ले-बल्ले। जय हो बिरला के दलाल की और जय कन्हैया लाल की।
सतीश प्रधान 

Sunday, 22 May 2011

कलमाड़ी पर थर्ड डिग्री क्यूँ नहीं


       दिल्ली – राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति घोटाले में गिरफ्तार पूर्व अध्यक्ष सुरेश  कलमाड़ी को विशेष  सी.बी.आई. अदालत ने लम्बे समय तक हिरासत में तिहाड़ जेल में रखने का पुख्ता इंतजाम कर दिया है। कलमाड़ी को सी.बी.आई. ने 25 अप्रैल को गिरफ्तार किया था। 25 अप्रैल से 3 मई तक सी.बी.आई. कलमाड़ी एण्ड कम्पनी (आयोजन समिति के पूर्व संयुक्त महानिदेशक  (खेल) एस0वी0प्रसाद और आयोजन समिति के पूर्व उपमहानिदेशक (व्यवस्था) सुरजीत लाल साथ में जेल में हैं) से कुछ खास नहीं उगलवा सकी थी। इसीलिए 4 मई को अदालत में पेश करने के बाद 14 दिन की रिमाण्ड मांगी गई जिसे विशेष सी.बी.आई. जज धर्मेन्द्र शर्मा ने मंजूर कर लिया।
       सी.बी.आई. को यह रिमाण्ड बार-बार नहीं मिलेगी इसीलिए सी.बी.आई. ने एक माह के भीतर ही कलमाड़ी के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर कलमाड़ी को तकनीकी आधार पर जमानत पाने का रास्ता पूरी तौर पर बन्द कर दिया है। कलमाड़ी के साथ आयोजन समिति के छह अधिकारियों को स्विस कम्पनी को टाइम स्कोरिंग एण्ड रिजल्ट का ठेका देने का आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा फरीदाबाद के जैम baVjus”kuy के दो मालिकों और हैदराबाद की ए0के0आर dUlVªD”ku  के मालिक के नाम भी आरोप पत्र में हैं।
इन सभी पर धोखाधड़ी फर्जी दस्तावेज़् बनाने और पद का दुरुपयोग कर सरकारी खजाने को चूना लगाने की साज़िश रचने का आरोप है। जो काम सिर्फ 62 करोड़ में स्पेन की कं0 करने को तैयार थी उसे इस मण्डली ने 158 करोड़ में करने का ठेका स्विस कं0 को दिया। सीबीआई को इन सभी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करना चाहिए। क्या थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करने के लिए सिर्फ भारत की निर्दोष जनता ही बनी है। देश को गधे की तरह 24 घण्टे चर रहे ये नेता थाने पहुंचते ही बीमार पड़ जाते हैं और अस्पताल में भर्ती होने का जुगाड़ लगाने लगते हैं।
       सुप्रीम कोर्ट को भारतीय चिकित्सा जगत को भी आगाह कर देना चाहिए कि जेल में बन्द किसी भी व्यक्ति के बन्द होने की स्थिति में उसकी चिकित्सा से संबंधित शिकायत पर देश हित में अपनी राय दें ना कि उसकी हैसियत को देखते हुए अथवा किसी तरह के प्रलोभन को देखते हुए। यदि इसके विपरीत किसी डाक्टर की गतिविधि पाई जाये तो उसका मेडिकल लाईसेन्स कम से कम दस वर्ष के लिए निलम्बित कर देना चाहिए।
       वैसे कलमाड़ी एण्ड कम्पनी के लिए थर्ड डिग्री के इस्तेमाल की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी। एक करारा थप्पड़ इन सभी अधिकारियों के सामने कलमाड़ी पर जड़ दिया जाये बस सारा कुछ स्वयं कलमाड़ी कबूल देंगे। लेकिन यहां यह भी देखा जाना है कि कलमाड़ी जेल के अन्दर से भी कई करोड़ का ऑफर  सी.बी.आई. को देने में सक्षम है। यहां यह भी उल्लेख किया जाना नितान्त आवश्यक है कि भारत में वित्तीय अपराध कोई अपराध ही नहीं माना जाता है। पता नहीं काला धन जमा करने वालों के खिलाफ इतने कड़े कानून क्यों नहीं हैं जितने कड़े कानून एक गरीब की जमीन वह भी जनहित के शब्दजाल  के नाम पर अधिग्रहीत करने के लिए बने हैं। एक गरीब की जमीन ये सरकार इमरजेन्सी सेक्सन (6@17) के तहत् जबरन अधिग्रहीत कर लेती है लेकिन भ्रष्ट तरीकों से कमाये गये कालेधन को हवाला के जरिए स्विस बैंक तथा अन्य विदेशी  बैंकों में जमा करने वाले भारतीयों के खिलाफ ऐसी धारा का प्राविधान नहीं रखा गया है।
       जनहित एवं राष्ट्रहित में ऐसा कानून बनना चाहिए जो ऐसे कृत्यों को राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में रखे। वास्तविक धरातल से इतर कई गुना ज्यादा अधिक की प्रोजेक्ट के लिए जनता से पब्लिक  ऑफर के तहत् शेयर से पैसा इकट्ठा करने वाली  कम्पनी के सारे निदेशकों की सम्पत्ति को इमरजेन्सी क्लाज़ के तहत् जब्त कर उनका डिन कौन्सिल करने का प्राविधान होना ही चाहिए जिससे वे कोई दूसरी कम्पनी न बना सके इसी के साथ उस चार्टेड एकाउन्टेन्ट कम्पनी का लाईसेन्स भी रद्द किया जाना चाहिए।
सतीश प्रधान

Saturday, 21 May 2011

एक शख्सियत जो विदा हो गई।





एक खांटी किसान, एक सच्चा नेता ,एक बेलाग व्यक्तित्व एवं एक इंसान इस दुष्ट दुनिया से विदा हो गया। किसी ने कहा है कि- दुनिया का सबसे असाधारण काम है साधारण इन्सान बनना। और सच मानिये यह असाधारण काम किया चैkधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने। वह शुरू से आखिर तक साधारण इन्सान ही रहे। वह हमेशा  किसान रहे और खेती एवं किसानी के काम में ही लगे रहे।
किसानों के मसीहा महात्मा और बाबा के नाम से जाने जाने वाले चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत जो किसानों के लिए शेर की तरह दहाड़े और  शेर की ही तरह मौन हो गये। सादा जीवन उच्च विचार को अपना आदर्श बनाने वाले टिकैत अपने घर की दीवार की लिपाई भी स्वंय करते थे तथा उसके लिए मिट्टी भी स्वंय खेादते थे। उन्होंने कभी अपने आपको नेता नहीं माना। वह हमेशा किसान ही रहे और खेती- किसानी में ही लगे रहे।  
वैसे तो चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने आदर्श वर्ष की उम्र से ही किसानों के हक की लड़ाई में शामिल होना शुरू कर दिया था किन्तु खाप ने चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत को 52 वर्ष की उम्र में पकड़ी पहनाई थी। उस पकड़ी की लाज़ उन्होंने अपनी अन्तिम साँस तक निभाई।
सातवीं तक ही शिक्षा ग्रहण करने वाले चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत का कहना था कि डीजल या पैट्रोल की कीमत के अनुपात में किसानों को फसल का मूल्य मिलना चाहिए। चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत यह मांग करते रहे कि 1967 को आधार वर्ष मानकर किसान की फसलों का मूल्य तय किया जाना चाहिए। धुन के धनी टिकैत इतना गूढ़ अर्थशास्त्र समझते थे इसका अन्दाजा कोई नहीं लगा सकता। इसके अलावा वह फौज की रणनीति के तहत कार्य करने में माहिर थे। कहीं भी आन्दोलन करने से पूर्व वह वहॉं पहले अपने दूतों को जायज़ा लेने भेजते थे जिसे आर्मी की भाषा में रेकी कहते हैं। वह एकदम कमान्डोज़ की भाँति घेराबन्दी करते थे।
प्रशासन को मुसीबत में डालने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका ढूंढा था। वह पषुओं के साथ गिरफ्तारी देने का। यदि किसानों को हिरासत में लिया जाता था तो थानों की हालत किसी  पशुशाला जैसी ही हो जाती थी। इसी कारण उन्हें गिरफ्तार करने में प्रशासन को भी पसीने आने लगते थे।
चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत और भारतीय किसान यूनियन का खौफ भ्रष्ट अधिकारियों पर इतना था कि उस दौर में मलाईदार विभाग के अधिकारी इस भ्रष्ट पट्टी में अपना ट्रान्सफर नहीं चाहते थे और जो पद पर थे वे वहॉं से भागना चाहते थे। किसानों को टिकैत के नेतृत्व के बाद अब निर्बल किसान के रुप में देखना गलत फहमी होगी। यह बात अलग है कि किसान अब भी बेमौत मारे जा रहे हैं। दोष उनका केवल इतना है कि उनके पास जो जमीन है उसे सरकार जबरदस्ती उनसे छीनना चाहती है और किसान डण्डे के जोर पर पूंजीपति लैण्ड माफियाओं को औने-पौने दाम पर देना नहीं चाहते। क्या इस तरह से जमीन अधिग्रहीत करके उद्योगपतियों को देना सीलिंग एक्ट की मूल भावना के विपरीत नहीं है।
जब हवाला के व्यापारियों टैक्स की चोरी करके हजा़रों करोड़ के स्वामी बने पूंजीपतियों से सरकार उनकी दौलत नहीं छीन सकती तो किसान से उसकी अपनी पुश्तैनी जमीन जिससे उसके घर-परिवार का भरण पोषण होता है गुण्डई के बल पर कैसे अधिग्रहीत कर सकती है। यह सरासर नाइंसाफी गुण्डई और लैण्ड माफियाओं को प्रश्रय देना हीं कहा जायेगा। सरकार जनमानस के भले के लिए बनती है चन्द पूंजीपतियों की तिजोरी बड़ी करने के लिए नहीं। अब चैाधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की भरपाई कौन करेगा यह तो अब खांटी किसान को ही सोचना होगा।
सतीश प्रधान 

Friday, 20 May 2011

सुप्रीम कोर्ट जिंदाबाद



      लखनऊ-एक तुम ही बचे हो भारत में जो डायलिसिस पर पड़ी भारतीय जनता को जिन्दा रखे हो, वरना तो इण्डियन सरदार मनमोहन सिंह एण्ड कम्पनी ने इस देश की ऐसी की तैसी करके रख दी है। गाली नहीं लिख सकता, इसीलिए कुण्ठा में ऐसी की तैसी लिखकर ही दिल को ठंडक पहुंचाने का प्रयास कर रहा हूँ
     इस देश में नेता, नेता को बचा रहा है, अफसर, नेता को बचा रहा है। ये दोनों फंसते हैं तो वकील उन्हें बचा रहे हैं। और इन सबको पाल रहा है या यूं कहिए बचा रहा है पूंजीपति। सबसे ज्यादा मजे में इस हिन्दुस्तान में यदि कोई है तो वह है उद्योगपति/पूंजीपति। कुल मिलाकर भ्रश्ट, भ्रष्ट को बचा रहा है, लेकिन जनता है कि सबको बचा रही है और खुद मरी जा रही है। उसके खून में ग्लूकोज़ की कमी हो गई है। वह इतनी कमरतोड़ मंहगाई एवं दिन-रात लुटने के बाद भी सड़क पर उतरने को तैयार नहीं दिखाई देती।
     मेरी कुण्ठा से भारत का सुप्रीम कोर्ट भी इत्तेफाक रखता है, इसकी बानगी आप नीचे उद्धृत अंश से देख सकते हैं। 
         सम्पत्ति का अधिकार, संवैधानिक अधिकार है।

-सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया-
     सम्पत्ति का अधिकार, संवैधानिक अधिकार है, और सरकार मनमाने तरीके से किसी व्यक्ति को उसकी भूमि से वंचित नहीं कर सकती है। न्यायमूर्ति जी.एस.सिंद्यवी और न्यायमूर्ति ए.के.गांगुली की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा है कि जरुरत के नाम पर निजी संस्थानों के लिए भूमि अधिग्रहण करने में सरकार के काम को अदालतों को सन्देह की नज़र से देखना चाहिए।
     पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति सिंद्यवी ने कहा कि अदालतों को सतही नज़रिया नहीं अपनाना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक न्याय के संवैधानिक लक्ष्यों को ध्यान में रखकर मामले में फैसला करना चाहिए। सम्पत्ति का अधिकार यद्यपि मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन यह अब भी महत्वपूंर्ण संवैधानिक अधिकार है, और यदि संविधान के अनुच्छेद 300ए के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से कानून के प्राधिकार के अलावा किसी भी तरह से वंचित नहीं किया जा सकता है। 
          सीबीआई कारपोरेट दिग्गजों को बचा रही है।

-सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया-

     यह टिप्पणी माननीय कोर्ट ने 2-जी स्पैक्ट्रम द्योटाले में कारपोरेट दलाल नीरा राडिया और अन्य के खिलाफ आयकर चोरी की जॉंच की धीमी गति पर की है। जॉंच में सीबीआई, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय एवं आर.बी.आई तबतक तेजी नहीं दिखायेंगे, जबतक माननीय सुप्रीम कोर्ट इसकी सुस्ती में धन सप्लाई की खोज़ की जॉंच के आदेश नहीं देगा और जबतक किसी एक विभाग के मुखिया को इसमें बर्खास्त नहीं करेगा। बड़ी मोटी खाल के हैं ये अधिकारी।

       ये आंकड़े दिमाग को झकझोर कर रख देने वाले हैं।

-सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया-

      यह टिप्पणी मा0 सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी स्पैक्ट्रम द्योटाले में आयकर विभाग की ओर से सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई पहली रिर्पोट में VªkUtsD”ku के आंकड़ों को देखकर करनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट सन्न रह गया, और उसे यह कहना पड़ा कि ये आंकड़े दिमाग को झकझोर कर रख देने वाले हैं। पीठ ने कहा कि हम लोगों ने अपनी जिन्दगी में इतने जीरो कभी नहीं देखे। यहॉं तक कि इसके आधे जीरो भी नहीं देखे हैं। इतने जीरो तो सिर्फ स्कूल की गणित की किताब में होते हैं।

अदालत यह महसूस करती है कि जॉंच विषेश जॉंच दल को सौंपी जानी चाहिए, साथ ही इस मामले की जॉंच हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या अन्य सक्षम व्यक्ति की निगरानी में की जानी चाहिए।  
-सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया-
      सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि विदेश में कालाधन रखने वाले सभी भारतीयों की जॉंच हो। भारत सरकार के ढुलमुल रवैये और यह कहने पर की कालेधन के मुद्दे पर कई एजेन्सियॉं जॉंच कार्य कर रही हैं तथा कोई रिजल्ट नहीं निकल रहा है। सुप्रीम कोर्ट को आर.बी.आई. और पासपोर्ट के मामले में सीबीआई को जॉंच के लिए आदेश देने चाहिए।

जॉच हसन अली पर ही क्यों टिकी है।

-सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया-
       घोड़ा व्यापारी एवं हवाला कारोबारी हसन अली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हम बहुत ही सादगी और सीधे तौर पर पूछ रहे हैं कि क्या स्विस बैंक में खाता रखने वाला और कोई व्यक्ति सन्देह के घेरे में नहीं है ?

     न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एस.एस.निज्जर की खण्डपीठ ने विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने वालों के नाम का खुलासा करने एवं एस.आई.टी. के गठन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
     रामजेठमलानी और अन्य ने कालेधन को विदेश से वापस लाने की अपील की है, इसी के साथ रामजेठमलानी, डी.एम.के. प्रमुख करुणानिधी की बेटी कनिमोझी जो कि 2-जी स्पैक्ट्रम द्योटाले में फंसी हैं, को बचाने के लिए भी पैरवी कर रहे हैं और सुना गया है कि इस कार्य के लिए उन्होंने एक करोड़ की फीस वसूली है। यह कैसा दोहरा चरित्र है जो एक ओर स्विस बैंक के खातेदारों का नाम खुलवाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों को बचाना चाहता है जो तबियत से इस देश को लूट रहे हैं।
     रामजेठमलानी की सारी काबलियत मा0 सुप्रीम कोर्ट ने घुसेड़ दी। उसने अनतत्वोगत्वा कनिमोझी को तिहाड़ जेल पहुंचा ही दिया, लेकिन इतनी परिणति ही काफी नहीं है। इन सबसे दस गुनी रकम का रिकवरी सर्टीफिकेट जारी किया जाना चाहिए जितने का इन्होंने द्योटाला किया है।
     राष्ट्रीय क्षितिज पर यह Li’Vदेश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने बीड़ा उठाया हुआ है वह निसन्देह सराहना के योग्य है।
     मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में चलाया जा रहा अभियान क्लीन इण्डिया को जितना ज्यादा से ज्यादा सर्पोट हम दे पायेंगे, उतना ज्यादा से ज्यादा हम सुखी और खुशीपूर्वक रह पायेंगे। सुप्रीम कोर्ट के इसी बेलाग प्रयास पर बोलने को क्या चिल्लाने का मन करता है कि सुप्रीम कोर्ट जिन्दाबाद, सुप्रीम कोर्ट जिन्दाबाद............. सुप्रीम कोर्ट अमर रहे।
     आज की तारीख में जितने भी बड़े मगरमच्छ हैं, चाहे वह ए.राजा हो अथवा कलमाड़ी। रिलायन्स के अधिकारी हों या अन्य। सभी को अपनी हैसियत समझ में आ गई होगी। भ्रष्टाचार के अगेन्स्ट में जितना भी कुछ हो रहा है वह केवल सुप्रीम कोर्ट का ही डण्डा है, वरना तो हमारे इण्डियन सरदार मनमोहन सिंह इतने ढ़ीठ हैं कि कुछ भी करने वाले नहीं हैं। वह तो स्विस बैंक में भारतीय मगरमच्छों के जमा कालेधन को भी दोहरी कर नीति के चक्कर में फंसा कर किसी का भी नाम ना जाहिर करने का मन बना चुके हैं।
     अब देखना यही है कि सुप्रीम कोर्ट आफ इण्डिया के चाबुक में कितना दम है। उसे निःसन्देह वह सब करना चाहिए जो इस देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट को ही भारत को हांगकांग बनाना है। भारतीय जनता अन्ना हजा़रे से कहीं ज्यादा सुप्रीम कोर्ट का साथ देगी, यदि सुप्रीम कोर्ट ईमानदारी से इसी तरह कार्रवाई करता रहा तो।
      विधायिका, कार्यपालिका और चौथा खम्भा जो इन्हीं दोनों के नेक्सस का पार्ट है, धीरे-धीरे स्वंय ही सुधार जायेगा, यदि सुप्रीम कोर्ट अपना तेवर बरकरार रखे। क्या कहा जाये कितने ही इलैक्ट्रानिक चैनल और प्रिन्टमीडिया के संस्थान विदेश से ब्लैंक चेक पाते हैं। जाहिर है ये ब्लैंक चेक ईमानदारी से काम करने के लिए तो नहीं ही आते होंगे। ये तो राड़िया, बरखादत्त, सिंद्यवी जैसों के लिए आते हैं कि खूब भ्रष्टाचार करो और हमारे मन मुताबिक काम करो।
       एक चैनल को तो केवल इसलिए ब्लैंक चेक आता है कि वह कैसे गुजरात में केवल मुस्लिम और ईसाइयों पर हुई छोटी सी भी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित करें। मीडिया, सरकारों का गुलाम हो गया है। मान्यता प्राप्त पत्रकार पैदा करके सरकार ने ईमानदार पत्रकारिता की कमर तोड़ दी है। आसानी से समझा जा सकता है कि मान्यता किसे और क्यों दी जाती है। यहॉं इसकी समीक्षा किया जाना आवश्यक है कि क्या अंग्रेज सरकार भारतीय उन पत्रकारों को मान्यता देती थी जो देश के स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देते थे तथा अंग्रेज सरकार के काले कारनामों का पर्दाफाश करते थे।
lrh'k iz/kku

Tuesday, 10 May 2011

इज्जतविहीन प्रधानमंत्री


        उच्च पदों पर महान भ्रष्टों को नियुक्त करने वाला प्रधानमंत्री ईमानदार कैसे हो सकता है। इसकी समीक्षा कौन करेगा। क्या भारत में ऐसा कोई पद या प्रतिष्ठान है जो इसकी जांच करे कि भ्रष्टों को प्रश्रय देने वाला और अति भ्रष्टों को उच्चतम पदों पर बिठाने वाले की जांच करे। अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं है , इसीलिए जन लोकपाल की बात हो रही है।
      प्रसार भारती के सी000- बी.एस.लाली,  मुख्य सतर्कता आयुक्त, पी.जे.थॉमस और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद पर के.जी.बालाकृष्णन जैसे भ्रष्ट लोगों की नियुक्ति आखिरकार ईएस एमएमएस (इण्डियन सरदार मनमोहन सिंह) ने ही की है। ये तो वो नाम हैं जो किन्हीं कारणों से चर्चा में आ गये वरना तो एक से एक भ्रष्ट लोगों को शह मनमोहन सिंह ने ही दे रखी है।
      यह भी विशेष रूप से ध्यान दिये जाने योग्य है कि किस तरह नियन्त्रक एवं महालेखा परीक्षक को धमकाने और लांछित करने की कोशिश की गई और किस प्रकार यह कहकर उच्चतम न्यायालय को  भी जबरदस्त  दबाव  में लेने  की कोशिश  मनमोहन सिंह  द्वारा की गई और कहा कि ....उच्चतम न्यायालय को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए।
      जिस सी0बी0आई0 के कारण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर न जाने कितनी बार संसद में और संसद के बाहर लांछन लगे उसे वास्तव में स्वायत्त बनाने के बारे में कहीं कोई हलचल नहीं हो रही है। ऐसे कोई प्रयास कहीं किसी भी स्तर पर कभी भी नहीं किये गये। भले ही मनमोहन सिंह समय-समय पर शासनतंत्र को सक्षम और पारदर्शी बनाने के लिए भाषण देते रहे हों लेकिन तथ्य यह है कि खुद उनकी सरकार बड़े जतन से दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट भी दबाये हुए है।
      आखिरकार जब शासन का मुखिया या यूं कहिए कि इस देश का प्रधानमंत्री ही उक्त रिपोर्ट को दबाकर उस पर बैठा हुआ है तो किसी भी प्रकार के सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती है। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि जिस मनमोहन सिंह की खुद की इज़्ज़त तार-तार हो गई है उसकी सरकार की इज़्ज़त को कोई पाक-साफ कैसे बता सकता है।
सतीश प्रधान 

Monday, 9 May 2011

लादेन एनकाउन्टर असली या फर्जी


   
अमेरिका की किसी बात पर यकीन नहीं, यह भी तो हो सकता है कि यह सब ड्रामा हो। लादेन था तो उन्हीं का आदमीलादेन मरा भी या नहीं, क्या भरोसा।
                                                 ‘मौलाना कल्बे जव्वादशिया आलिम

 समुद्र में दफनाना इस्लामी रिवायत नहीं। समुद्र में तो दफनाया ही नहीं जा सकता। कोई कितना ही बुरा क्यों न हो, आखिरत के कुछ उसूल होते हैं। जिनका पालन तो होना ही चाहिए।
 ‘डॉ0 मौलाना जैनुस्साजिदीन’ (अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के दीनयात के पूर्व अध्यक्ष और आलिम)

समुद्र में तो तैराया जाता है, दफनाया नहीं जाता। यह नामुमकिन बात है, हमको अमेरिका की बातों पर यकीन नहीं।
                       ‘कारी शफीकुर्रहमान कासमीvkWy इण्डिया मुस्लिम कौंसिल के महासचिव

कोई कितना भी बड़ा आतंकी क्यों न हो, लेकिन उसके अन्तिम संस्कार में धार्मिक मान्यताओं और संवेदनशीलता का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए|
           ‘दिग्विजय सिंहकॉंग्रेस पार्टी के महासचिव एवं म0प्र0 के पूर्व मुख्यमंत्री

दुर्दान्त आतंकवादी घोषित किये गये ओसामा बिन लादेन को समुद्र में दफनाने की बात उलेमा-ए-दीन को हजम नहीं हो रही है । उलेमा का कहना है कि समुद्र में तो समाधि दी जाती है, दफनाया नहीं जा सकता ।

उन्होंने अमेरिका से यह पूछा है कि वह यह बताये कि कौन से इस्लामी रीति-रिवाजों के तहत लादेन को दफनाया गया। वैसे तो अमेरिका के प्रेसीडेन्ट ओबामा भी मुस्लिम ही हैं, जो इसका डायरेक्ट लाइव देख रहे थे।  वही अपने वीडियो को फिर से देखें और फिर दुनिया को दिखायें कि किस तरीके से लादेन को समुद्र में दफनाया गया। उलेमा चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि .... समुद्र में दफनाने का अजूबा भी अमेरिका ही कर सकता है।

      उलेमा को अमेरिका के दावे पर अब भी यकीन नहीं है। उलेमा को क्या कहिएमुझे भी इस दावे और उसके पक्ष में दिखाये गये वीडियोप्रसारित खबरों और किये गये कृत्यों एवं प्रसारित बयानफिर संशोधित बयान आदि से यह निष्कर्ष निकालने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि यह एनकाउन्टर भी वैसा ही हैजैसा हमारे मुम्बई पुलिस के एनकाउन्टर स्पेशलिस्ट शर्मा किया करते थे। फर्क केवल इतना है कि एनकाउन्टर का शतक बनाने वाले महाराष्ट्रीयन दरोगा शर्मा जी जेल में हैं और विश्व के दरोगा अमेरिका को कौन छू सकता है। लेकिन यह सच है कि भूत हिन्दुस्तान में भी होते हैंइंग्लैण्ड में भी होते हैं और अमेरिका में भी हैं। कौन सा भूत किसको कहॉं और कब पकड़ेगा पता नहीं।

उलेमा का कहना है कि अमेरिका पहले भी ओसामा बिन लादेन को मारने का दावा कर चुका है। दारूल उलूम वक्फ देवबन्द के उस्ताद मुफ्ती आरिफ कासमी और अरबी के मशहूर आलिम मौलाना नदीमुल वासदी कहते हैं कि अमेरिका का कदम पूरी तरह गैरशरई है। दोस्त हो या दुश्मन, मरने के बाद किसी के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जाताजैसा अमेरिका ने किया। समुद्र में कैसे दफनाया जा सकता है भला।

उलेमा ने कहा कि समुद्री सफर के दौरान यदि किसी की मौत हो जाये और किनारे तक igqWapuk कठिन हो, तभी समुद्र में आखिरत दी जाती है। यहॉं तो मारा बताया गया जमीन पर और उसके मृत शरीर को ले उड़े हवाई जहाज में, फिर दफनाने की बात कर रहे हैं समुद्र में। कौन सी स्टोरी बनाई है अमेरिका ने।

अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के दीनयात के पूर्व अध्यक्ष और आलिम डॉ0 मौलाना जैनुस्साजिदीन ने कहा कि समुद्र में दफनाना इस्लामी रिवायत नहीं है। समुद्र में तो दफनाया ही नहीं जा सकता। दफन शब्द तो जमीन का हिस्सा है।

कुरआन-ए-पाक की आयत है कि जमीन से ही हमने तुमको पैदा किया, इसी से हम तुमको दाखिल कर रहे हैं और इसी से हम निकालेंगे। किसी को दफनाते हुए यही पढ़ा जाता है। जाहिर है यह नहीं हुआ होगा, और यदि हुआ है तो उस शख्स को तुरन्त दुनिया के सामने लाया जाना चाहिए, वह शख्स पाकिस्तान की धरती पर आकर, कुरआन-ए-पाक की कसम खाकर बोले कि उसने ओसामा बिन लादेन को समुद्र में दफनाते समय इस आयत को पढ़ा था।

दो दिनों से लगातार इलैक्ट्रॉनिक चैनलों द्वारा ओसामा के सम्बन्ध में प्रसारित खबरों का विश्लेषण करने के पश्चात् इस निष्कर्ष पर आसानी से igqWapk जा सकता है कि यह हिस्ट्री नहीं मिस्ट्री है। जब एक बार यह खबर अमेरिका द्वारा प्रसारित कर दी गई कि अमेरिकी अभियान के दौरान ओसामा बिन लादेन ने खुद ही मोर्चा संभाला हुआ था और ताबड़तोड़ जवाबी फायरिंग की थी। व्हाईट हाऊस के मुताबिक उसने अमेरिकी कमांडोज का डटकर विरोध किया था तो फिर उसे संशोधित बयान जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी। संशोधित बयान में व्हाईट हाऊस का कहना है कि जब अमेरिकी सील कमांडोज ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया तो उस समय वह निहत्था था।

24 घंटे के अन्दर ही जारी किये गये बयान से पलट जाना निश्चित रूप से सन्देह पैदा करता है। व्हाईट हाऊस का कहना है कि ओसामा बिन लादेन की हवेली में न टेलीफोन थाऔर ना ही इन्टरनेटजबकि वीडियो में एक जगह एअर डिशदिखाई दी है। वहीं दूसरी ओर इजरायली खुफिया एजेन्सी का कहना है कि ओसामा की हवेली में फोन, इन्टरनेट कनैक्शन सहित आधुनिक तकनीक के समस्त उपकरण मौजूद थे।बात यह भी खुलकर सामने आ रही है कि यह सब ओबामा द्वारा जिनकी अपनी ख्याति अमेरिका में घटती जा रही है, अपना अगला चुनाव जीतने के चक्कर में अमेरिकी जनता की vkWaa[k में धूल झोंकने के लिए अपनाया गया हथकण्डा है।

दुनियां का इतना दुर्दान्त आतंकवादी और अलकायदा का सरगना, ओसामा बिन लादेन एक एनकाउन्टर में मार दिया जाये और वह एक भी गोली ना चला पाये, कैसे सम्भव है। ये तो वैसी ही कहानी लग रही है जैसी हमारे यहां गुजरात में गढ़ी गई थी, जिसकी पोल धीरे-धीरे खुल रही है। हमने तो मुख्तार अंसारी के ही वीरता के किस्से सुन रखे हैं जब उन्हें कोई नहीं छू सकता तो लादेन तो कई गुना आगे हैउसे 40 आदमियों का गिरोह मार देऔर उस गिरोह का एक सदस्य भी ना मारा जाये, हो ही नहीं सकता। यह तो वैसी ही कहानी हो गई कि कोई बच्चे को सुनाये कि चूहा एक जिन्दे सांप को खा गया, लेकिन इस कहानी पर बच्चा भी यकीन नहीं करेगा।

ओसामा बिन लादेन की कहानी तो अभी तब तक चलनी है जब तक उसका सही खुलासा नहीं हो जातालेकिन लादेन की पत्नी और उसके बच्चों को भी कमान्डोज उठाकर ले गये, जायज नहीं है। पत्नी और बच्चों ने क्या अपराध किया है। जब आप किसी को सम्मानित करते हैं या मैग्सेसे पुरूस्कार देते हैं तो क्या उसकी पत्नी और बच्चों को भी सम्मानित करते हैंकदापि नहीं। फिर किस बिना पर आप किसी को सजा दे रहे हैंतो उसकी बेकसूर पत्नी और बच्चों को सजा दे रहे हैं। कहां गया आपका मानवाधिकार कानून। क्या यही मानवाधिकार हैजो अमेरिका के लिए अलगइंग्लैण्ड के लिए अलगभारत के लिए अलग और पाकिस्तान के लिए अलग है।

क्या यह अमेरिकी कार्रवाही, एक देश का दूसरे देश पर हमला नहीं है। यदि यह हमला नहीं है तो इसका मतलब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को इस कृत्य की जानकारी थी और वह झूठ बोल रहे हैं और यदि वह सत्य बोल रहे हैं तो यह अमेरिका का पाकिस्तान पर हमला ही तो हुआ।
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Sunday, 1 May 2011

ताबूत घोटाले के जनक का नया घोटाला

  
         भ्रष्टाचार के खिलाफ जन्तर-मन्तर पर अनशन करके जन लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी में जगह पाने वाले अण्णा हजारे सेना से ही सेवा निवृत हुए हैं। सेना में किस कदर और कितना भ्रष्टाचार है, उसका भी खुलासा हजारे साहब को करना चाहिए। जहॉं एक ओर उच्चतम न्यायालय की गिरती साख को वहॉं के मुख्य न्यायाधीश समेत कुछ अन्य न्यायाधीशों ने काफी हद तक संभालने की कोशिश की है, सेना में भी व्याप्त जबरदस्त भ्रष्टाचार को खत्म करने की पहल सेना के ही सेवा निवृत अण्णा हजारे को करनी चाहिए.
        देश के बजट का एक-चैथाई हिस्सा जिस सेना को दिया जाता हो और उसका कोई आडिट भी ना हो वह भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है अथवा नहीं, गम्भीर चिन्ता का विषय है। गोपनीयता के नाम पर देश की सुरक्षा के लिए बनाई गई इस एजेन्सी में चारों ओर भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। चाहे राशन की खरीद हो या उसका वितरण। चाहे उपकरण की खरीद हो अथवा टैंक की। चाहे वर्दी खरीदनी हो अथवा वर्दी सिलवानी हो। गाड़ी खरीदनी हो या अण्डे। मामला काम लेने का हो या छुट्टी देने का, सभी ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। आदर्श सोसाईटी का मामला पूरे देश की आँखों के सामने है। यह सोसाईटी अण्णा साहब के महाराष्ट्र प्रदेश के मुम्बई में बनी थी। सेना का बड़े-से-बड़ा अधिकारी इस घोटाले में संलिप्त पाया गया, फिर भी वे सारे अधिकारी सेवा में हैं।
       जिस देश की सेना के ब्रिगेडियर,मेजर जनरल,लेफ्टिनेंट जनरल जब एक-एक फ्लैट के लिए भ्रष्ट आचरण करने को तैयार हैं, तो वो देश को कब का गिरवी रख चुके होंगे। जिस तरह देश के बजट का एक-चैथाई हिस्सा इनको दिया जाता है उसी तरह जन लोकपाल बिल में एक-चैथाई हिस्से में इनके लिए व्यवस्था होनी चाहिए। भ्रष्टाचार में सेना का जितना बड़ा अधिकारी पकड़ा जाये उसको सेवा से बर्खास्त करते हुए उसकी सारी सम्पत्ति जब्त करते हुए उसे 10, 20 या 30 वर्ष का कठोरतम कारावास दिया जाये तथा लाल किले में निरूद्ध किया जाये। सितम्बर 2011 तक 300 करोड़ रूपये के 10,800 नाईट विजन डिवाईस (रात में देखने की क्षमता वाले यंत्र) खरीदे जाने हैं। सेना के जिन लोगों को दिन में ही दिखाई नहीं दे रहा, उन्हें रात में देखने की आवश्यकता ही क्या है। रात में जो कुछ भी गलत होता है, वह दिन में किये गये की परिणति ही तो होती है।
        2009 से खरीदे जा रहे इन घटिया यंत्रों को लेकर सुरक्षा बलों में अधिकतम असंतोष है। पिछले दिनों केन्द्रीय गृह मंत्रालय की एक बैठक में उस नाईट विजन डिवाईस की खरीद पर चर्चा हुई थी, जिसमें फिर से भारत सरकार के उद्यम, भारत इलैक्ट्रानिक्स लि0 को अधिकृत करने की रणनीति तय की गई। कुछ अर्धसैनिक बलों के मुखिया ने इसका कड़ा विरोध किया तथा टैण्डर के माध्यम से यंत्र खरीदे जाने की बात कही। ध्यान रहे कि पूर्व में ढाई हजार करोड रूपये के जो यंत्र खरीदे गये वे एकदम घटिया थे । ऐसे यंत्र हमारे सुरक्षा बलों को मुहैया कराना उनकी जिन्दगी के साथ खेलना है। इस सौदे को मंजूर कराने के लिए फर्जी ट्रायल का सहारा लिया गया। ज्ञात हो कि गृह मंत्रालय मे निदेशक रैन्क के अधिकारी आर0एस0शर्मा ने इस सौदे को अंतिम मंजूरी दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। यह वही शर्मा हैं जिन्हें पिछले वर्ष घटिया बुलेट प्रूफ जैकेट खरीद घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। बावजूद इसके शर्मा जी की बल्ले - बल्ले है।
       देखिये खरीददारी से पहले उपकरण की ट्रायल का आयोजन किया गया तो वह गुड़गांव में। जिन उपकरणों का इस्तेमाल होना था बीहड़ जंगलों में वह भी रात में, उनका परीक्षण दिन में हो रहा है गुड़गांव जैसे मल्टी-नेशनल सिटी सेन्टर में।गुड़गांव में हुए इस ट्रायल से कई अफसर संतुष्ट नहीं थे तथा कई आपत्तियां जताई गई थीं, जिसे रद्दी की टोकरी में डालते हुए रक्षा मंत्रालय के उद्यम बीईएल को 34 हजार उपकरणों की खरीद का ठेका दे दिया गया। ये नाईट विजन डिवाईस, राइफलों पर लगानी थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि बीईएल इन यंत्रों को नहीं बनाता है, उसने तो इजराइली कम्पनी ‘प्रिज्मटेक’ से एमओयू किया है और अपना 90 प्रतिशत आर्डर उसे ट्रान्सफर कर दिया। इससे भी ज्यादा अंधेर यह कि प्रिज्मटेक के पास भी इन नाईट विजन डिवाईस में इस्तेमाल होने वाली ट्यूब को बनाने की तकनीक नहीं थी। दुनिया में इस ट्यूब को बनाने की अव्वल कम्पनी फ्रांस की ‘फोटोनिस’ है।
       इजराइली कम्पनी प्रिज्मटेक ने फोटोनिस कम्पनी से मात्र 2000 ट्यूब ही खरीदीं, लेकिन बीईएल की मार्फत भारत को 14 हजार यंत्र सप्लाई किये। यानी बांकी के 12000 यंत्रों में किसी दूसरी कम्पनी की ट्यूब लगी थीं। इन उपकरणों की लाईफ 10 वर्ष बताई गयी थी, किन्तु 12 प्रतिशत यंत्र ढाई वर्ष में ही खराब हो गये। ये तगड़ा गोल-माल है, जिसमें गृह मंत्रालय एवं रक्षा मंत्रालय दोनों मिले हुए हैं। 
 सतीश प्रधान