Wednesday, 31 August 2011

देश को मिल गया मसीहा



          भारत गणराज्य के वर्तमान प्रधानमंत्री किसी समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने में एकदम असमर्थ हैं। जनलोकपाल के प्रति पहले ही सहानुभूति पूर्वक विचार के लिए तैयार हो जाते तो एक 75 वर्षीय बुजुर्ग मा0 अण्णा हजारे जी को इतने दिनों तक अनशन पर नहीं रहना पड़ता,  इसलिए उनकी जगह पर कांग्रेस को प्रणव दा को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए। मनमोहन को सार्वजनिक-राजनीतिक जीवन में सबकुछ मिल चुका है। सात वर्ष से वह लगातार प्रधानमंत्री पद पर हैं। यह साधारण उपलब्धि नहीं कही जायेगी, क्योंकि ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान में ही सम्भव है, वरना देखिए गद्दाफी लुका-छिपा घूम रहा है। ईमानदारी के सिरमौर बनने वाले सरदार जी  को अब राष्ट्रहित में स्वंय ही प्रधानमंत्री पद से मुक्ति पा लेनी चाहिए, वरना आगे क्या हो कौन जाने। इस देश को वास्तव में मसीहा मिल गया है।
      अण्णा के मामले में सरकार ने असंवेदना, अपरिपक्वता, अदूरदर्शिता का परिचय ही नहीं दिया अपितु एक नेक आन्दोलन को सिब्बल के जरिए स्वामी अग्निवेष जैसे एजेन्ट को अण्णा टीम में घुसाने और उसे बदनाम करने की पूरी कोशिश की। तभी तो मनीष जैसे लोगों से गाली दिलवाई गई, और बाद में वक्त की नजाकत को देखते हुए उससे माफी भी मंगवाई। ऐसे को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया, क्योंकि पता नहीं ये खोटे सिक्के कब काम आ जायें। जो निर्णय प्रारम्भ में हो सकता था,  उसके लिए देश आन्दोलित हुआ, लेकिन अच्छा हुआ। वयोवृद्ध अण्णा को अनशन करना पड़ा, क्योंकि भगवान ऐसा चाहते थे। इस अवधि में ज्ञात हुआ कि सरकार अपना इकबाल पूरी तरह समाप्त कर  चुकी है। बेशक वह बहुमत में होगी,  लेकिन अण्णा ने पूरी दुनिया के सामने सिद्ध कर दिया  कि असल में जनता उनके साथ है।
      प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने अण्णा के आन्दोलन को असंवैधानिक बताया, संविधान, प्रजातंत्र और संसद की सर्वोच्चता के बेतुके तर्क रखे । वस्तुतः मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप से किसी समस्या को समाधान की स्थिति तक पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं। यह उनकी नियुक्ति से जुड़ा मसला  है। वह प्रजातंत्र की बात करते हैं लेकिन उनको इस पद पर आसीन करने में प्रजा की इच्छा बिल्कुल शामिल नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण पद पर होने के बाद भी वह आठ दिन तक राजनीतिक पहल करने की स्थिति में नहीं थे। गनीमत यहीं तक नहीं थी, उन्होंने कपिल सिब्बल और पी. चिदम्बरम जैसे सहयोगियों को आगे रखा, सोचा कि उनकी वकालत लोकपाल पर भारी पड़ जायेगी।
      कपिल भी उन्हीं की तरह निकले,  जिनका राजनीति में आना घटना प्रधान है। वह जमीनी पृष्ठभूमि से राजनीति में नहीं है। केवल इतना अन्तर है कि कपिल सिब्बल संयोग कहिए या जनता की गलतफहमी कि वह लोकसभा चुनाव जीत गए। मनमोहन को चुनाव जीतना अभीतक नसीब    नहीं हुआ है। लेकिन जमीन से इनकी भी दूरी में ज्यादा फर्क नहीं है। इसलिए ये मनीष तिवारी या दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को किनारे करने की बजाय इनकी छिछली हरकत पर इतराते रहे।   इनको ए राजा, कलमाड़ी आदि नेता सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे नजर नहीं आये,       जो शब्द उन्होंने अण्णा के लिए प्रयुक्त करवाये। सरकार और पार्टी खामोश रही। इस    प्रकार सरकार और पार्टी  दोनों का नजरिया जाहिर हुआ। उसकी नजर में भ्रष्ट किसे माना जाता     है, यह पता चला। प्रधानमंत्री प्रभावशून्य और कठपुतली ही दिखाई दिए, या समझिये वह अपने को कठपुतली ही दिखाना चाहते हों।
      संप्रग सरकार संवेदनहीनता का परिचय शुरू से ही देती रही, उसे खाद्यान्न का सड़ जाना मंजूर हुआ, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देष के बावजूद, निर्धनों में उस अनाज को बांटना मंजूर नहीं हुआ। मंहगाई रोकने के प्रयास नहीं किए गये। सामान्य जनता को होने  वाली कठिनाई के प्रति उसने कभी संवेदना नहीं दिखाई। पछहत्तर वर्षीय अण्णा हजारे के अनशन का सातवां दिन था। मनमोहन सिंह इस गम्भीर मसले पर विचार विमर्श करने के बजाय कोलकाता की एक दिवसीय यात्रा पर चले गये। यह ठीक है कि उनका कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था। वहां आई.आई.एम. में गाउन ओढ़कर उन्हें लिखित भाषण पढ़ना था। प्रधानमंत्री पद के दायित्व और मानवीय संवेदना का तकाजा यह था कि मनमोहन सिंह इस कार्यक्रम में शामिल होने का कार्यक्रम स्थगित कर देते। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि वहां के लोग मनमोहन सिंह को देखने-सुनने के लिए एकदम व्याकुल थे। वह सुसज्जित बन्द हॉल में भाषण पढ़ रहे थे। बाहर कोलकाता के नागरिक उनकी यात्रा का विरोध कर रहे थे, और अन्दर मेधावी छात्र उनसे डिग्री न लेने के लिए काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि अण्णा के अनशन का समाधान निकालने के लिए प्रधानमंत्री को नईदिल्ली में ही रहना चाहिए था। वापस लौटने के दो दिन बाद रायता फैलाने के लिए सरदार जी ने सर्वदलीय बैठक रखी। तब तक अन्ना की सेहत बिगड़ती रही।
     किसी को खुली लूट की छूट देना, उसका बचाव करना, आरोपों को जानबूझ कर नजरअंदाज   करना ईमानदारी का लक्षण नहीं है। एक ईमानदार प्रधानमंत्री की सुख-सुविधा, सुरक्षा, आवास आदि पर सरकारी खजाने से बहुत बड़ी धनराशि खर्च की जाती है। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अनेक खर्चीली सुविधाओं की गारण्टी मिलती है। ऐसे में निजी ईमानदारी पर आत्ममुग्ध होना,  कोई उदाहरण पेश नहीं करता है। उन्हें अपने सहयोगियों व प्रशासन को ईमानदार रहने के लिए बाध्य करना चाहिए था। अन्यथा उनकी निजी ईमानदारी भी भ्रष्टाचार के साथ समझौते के दायरे में ही आती है। वैभवशाली प्रधानमंत्री पद के लिए बेईमानी से समझौता करना किस आक्सफोर्ड की डिक्शनरी में ईमानदारी के अंतर्गत आता है।
      वैसे यहॉं कि जनता को इस पर भी विचार करना चाहिए कि इतने बड़े लोकतांत्रिक देश,      भारत के प्रधानमंत्री पद पर बैठे सरदार मनमोहन सिंह के कितने ही अरमान मन में ही धरे रह   जाते हैं। बतौर प्रधानमंत्री समय-समय पर दिखने वाले उनके अरमानों पर नजर डालिए, वह मंहगाई रोकना चाहते है, वह भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहते हैं, वह आतंकी हमले रोकना चाहते हैं,वह दोषियों को कड़ी सजा दिलाना चाहते है, पर विडम्बना देखिए उनके भाग्य की कि वह कुछ कर नहीं पाते। अपनी दुरदशा पर दृश्टिपात करते हुए ही उन्होंने कहा कि वह अब हर हालत में शक्तिशाली लोकपाल चाहते  हैं। साथ ही कहीं जनता यह न समझ ले कि वह तुरन्त अपने से तगडे लोकपाल की नियुक्ति न कर दें, यह भी जोड़ दिया कि संसदीय प्रक्रिया में समय लगता है, इसलिए अभी इंतजार कीजिए।
     क्या मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य पर विश्वास किया जा सकता है। क्या मजबूत और प्रभावी लोकपाल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से देश निश्चिंत हो सकता है। कठिनाई यह है कि भारत गणराज्य के वर्तमान प्रधानमंत्री किसी समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने की स्थिति में ही नहीं हैं। इस महत्वपूर्ण पद पर वह जनता की पसन्द से नहीं हैं। शायद इसीलिए वह जनभावना को समझने में समय गवांना नहीं चाहते हैं। शायद इसीलिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सलाह पर कानून बनाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है, और ना ही उस पर सर्वदलीय बैठक की आवष्यकता ही वह महसूस करते है। सोनिया जी का, अमेरिका का हांथ उनके सिर पर है, इसलिए वह जो चाहेंगे करेंगे, आप क्या कर लेंगे। बाकी उनके किये पर ताली बजाने के लिए पूरी कांग्रेस उनके साथ है।
     ताजा उदाहरण देखिए! स्पोर्ट्स बिल पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की जरूरत इसके लिए नही समझी गई, क्योंकि उसकी कैबिनेट में मंत्री पदपर विराजमान बहुत से मंत्री प्रदेशीय क्रिकेट एसोसियेशन के अध्यक्ष हैं, और उन्होंने ही इसका विरोध किया। सशक्त लोकपाल के प्रति पहले ही ईमानदारी से उसमें प्राविधान कराकर बिल रख देते तो ऐसे लेने के देने तो न पड़ते। मेरा तो मानना है कि अब भी कुछ करने की जरूरत नहीं है। फिर से पूरे हिन्दुस्तान को बेवकूफ बना सकते हैं। मा0 अण्णा जी को जो पत्र पहुंचाया है, उसे सिंघवी, अमर सिंह और लालू यादव से खारिज करा दें, बस हो गया काम हिन्दुस्तान का। मनमोहन सिंह अपने को कितना ही ईमानदार दिखाने का नाटक करें,   वह मा0 अण्णा हजारे जी की हद की दिवानगी का अनुभव इस जिन्दगी में तो कदापि नहीं कर सकते। इसके लिए उनको दूसरी जिन्दगी लेनी पडेगी और अण्णा बनना पड़ेगा, जो इस जिन्दगी में किसी भी तरीके से सम्भव नहीं है। मनमोहन को तो सार्वजनिक, राजनीतिक जीवन में बहुत कुछ मिल गया है, लेकिन उन्होने इस भगत सिंह के देश को क्या दिया, इसको वह बिस्तर पर सोते जाते वक्त सोचें? शायद उनके अन्तरमन से कोई आवाज आये और उनको कुछ अच्छा करने के लिए झकझोरे। अब इस देश की जनता को ईमानदारी की परिभाषा पर नये सिरे से विचार- विमर्श करने की तीव्र आवश्यकता आन पड़ी है।   सतीश प्रधान  

Sunday, 21 August 2011

अपने पतन से घबराई सरकार को हुई जनता की दरकार


      अन्ना हजारे को असंवैधानिक और गैरकानूनी रूप से उनके आवास से अनशन करने से पूर्व ही गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजने वाली मास्टरमाइण्ड मनमोहन सरकार अनतत्वोगत्वा एक दिन के आन्दोलन पर ही मजबूत पैरों से घुटने के बल आ गई और जन्तर मन्तर पर रामदेव की गिरफ्तारी और उनके सह्योगियों को आतंकियों जैसे व्यवहार से टेरराइज करने वाली सरकार के जरूरत से ज्यादा काबिल, कपिल सिब्बल, पी.चिदम्बरम, दिग्विजय, अभिषेक सिंघवी जैसों की पीठ थपाथपाने लगी। उसे यह गलत फहमी हो गई कि जनता को अथवा जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सत्ता की शक्ति से आसानी से कुचला जा सकता है।
      मनमोहन सरकार को बाबा रामदेव का आन्दोलन भी भारी पड़ता यदि बाबा रामदेव लेडीज सलवार-कमीज पहनकर भागे न होते! अनशन करने आये थे, तो अनशन के हिसाब से चलते। करना था अनशन और इजाजत मांगी योग शिविर लगाने की। जब योग शिविर लगाने की इजाजत ही दो दिन की मिली, एवं लिखकर पहले ही दे आये कि दो दिन में रामलीला मैदान खाली कर देंगे तो फिर उस पर अनशन का आसन क्यों लगा लिया? योग कराने के बहाने अनशन स्थल पर जम जाने और फिर नंगी पुलिसिया कार्रवाई से भयभीत होने की उनकी कार्यशैली ने ही उन्हें कमजोर करके नेपथ्य में छोड़ दिया। रामदेव की डरपोक कार्य शैली से ही केन्द्र सरकार के इरादे आक्रामक हो गये। अपनी इस उपलब्धि पर पगलाई सरकार को यह गुमान हो गया कि वह इस देश में जो चाहे, जैसा चाहे कर सकती है। वकालती दिमाग पर सरदारी दिमाग मात खा गया। वह भूल गया कि अंग्रेज बहादुर उससे बड़ा गुण्डा था, लेकिन सभी प्रकार के दमन में महारत हासिल रखने वाला भी महात्मा गॉंधी को गोली नहीं मार पाया। दुर्भाग्य देखिए इस देश का कि उन्हें अपने ही देश के काले हिन्दुस्तानी ने गोली मार दी। गोली मारी अथवा मरवा दी गई, अभी भी यह खोज का ही विषय है।
      लगभग ऐसी ही मानसिकता के बहुत से लोग मीडिया में भी हैं जो एनआरएचएम के डा0 सचान के साथ घटी घटना को अण्णा के साथ दोहराने की बात कर रहे थे। आठवॉं और दसवॉं पास अपने ही समाचार-पत्र के स्वयंभू ब्यूरो प्रमुख बनने के बाद, ऐसे तथाकथित पत्रकारों को यह भ्रम हो गया कि वे भी बुद्धिजीवी हैं। वे संविधान और संसद की व्याखा करने लगे और पागलों की तरह कहने लगे कि अण्णा संसद से उपर नहीं हैं। क्या अण्णा को किसी ने कहते सुना कि उन्होंने कहा हो कि वे संसद से ऊपर हैं? जब ऐसा कहा ही नहीं गया तो फर्जी नगाड़ा पीटने का क्या औचित्य? संसद में अपने प्रधानमंत्री ने भी रिजर्व बैंक के पूर्व अनुभव के आधार पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की अपनी पुरानी शैली का प्रयोग करते हुए कहा कि संविधान और संसद से बड़ा कोई नहीं। अरे आज पूरा हिन्दुस्तान देख रहा है कि संसद से ऊपर उनके कपिल सिब्बल और संविधान से ऊपर स्वंय मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ही है।
      क्या समय आ गया है कि भ्रष्टाचार पर बहस वह कर रहा है, जिसका दाना-पानी भ्रष्टाचार के दम पर टिका है। जनता की आकस्मिक और आपातकालीन जरुरतों के लिए बनाये गये मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से लाखों करोड़ों पी जाने वाले व्यक्ति अण्णा के खिलाफ आग उगल रहे हैं। भूतपूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से करोड़ों रुपया पाये महोदय उनका साथ छोड़कर अब कांग्रेस के यहॉं हाजिरी लगा रहे हैं और दिखावा ऐसा कि गोया सारी केन्द्र सरकार उनकी मर्जी से चल रही है। बाकी फिर कभी...............
      अहंकार और नशे में धुत्त सरकार को अण्णा के आन्दोलन की जो रफ्तार दिखाई दी उससे उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसे एक नहीं लाखों अण्णा हजारे दिखाई देने लगे। ठीक रामदेव के विपरीत हुआ। तब पुलिसिया कार्रवाई से रामदेव हदस में आये थे, लेकिन अबकी बार पूरी की पूरी सरकार ही हदस में आ गई। जनता की ताकत सरकारों को तब दिखाई देती है, जब वह मूंह के बल गिरने के कगार पर होती है। भारत के प्रधानमंत्री पद पर बैठा जो सरदार लाल किले की प्राचीर से एवं संसद में अपने हेकड़ी भरे अन्दाज में यह कह रहा था कि कोई भी व्यक्ति संविधान और संसद से बड़ा नहीं है, उसी सरदार ने अण्णा की गिरफ्तारी से लेकर उनकी रिहाई तक के बीच की गई कार्रवाई से संवैधानिक व्यवस्था का ऐसा चीर हरण किया कि उसे इतिहास में दर्ज कर लिया गया है।
       सुबह-सुबह गिरफ्तारी, फिर तिहाड़ जेल, तदउपरान्त रात्रि को रिहाई ने सिद्ध कर दिया कि संविधान के एक मात्र ज्ञाता कपिल सिब्बल, पी चिदम्बरम और सरदार जी ही हैं। इस देश में खुशवन्त सिंह के बाप शोभा सिंह जैसे लोगों की तादाद बहुत बढ़ गई है। भ्रष्टाचार की असली देन कांग्रेस पार्टी ही है। अंग्रेज ऐसे लोगों के हांथ भारत की सत्ता सौंप कर गया जो स्वंय भारतीय मानसिकता के नहीं थे। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान उसी मानसिकता की देन है। भारत के सिर पर जबरदस्ती बैठे प्रधानमंत्री सरदार जी का यह स्पष्टीकरण किसके गले उतरने वाला था कि अण्णा के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से केन्द्र सरकार का लेना-देना नहीं। अब कहॉं नेपथ्य में चली गई दिल्ली सरकार और जान बचाने सामने आ गई केन्द्र सरकार! अब तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का सांसद बेटा ही कह रहा है कि सरकार ने केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण ही देखा, इसे राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से नहीं देखा तथा अण्णा हजारे को गिरफ्तार करने की भूल की गई। अण्णा के पत्र का भारत का प्रधानमंत्री जवाब देता है कि अण्णा दिल्ली पुलिस के पास जायें। प्रधानमंत्री कार्यालय का इससे कोई लेना-देना नहीं। अब क्यों केन्द्रीय मंत्रियों को दिल्ली पुलिस का प्रवक्ता बनना पड़ रहा है?
      यह वही सरकार है जो दिल्ली पुलिस को आगे करके पीछे से सारे नाटक का मंचन कर रही थी। यह वही मनमोहन की सरकार है जिसकी नाक के नीचे प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक पर कब्जा जमाये बैठे थे, और वह चैन की बंसी बजा रही थी। जनता की परेशानियों को देखते हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना चाबुक चलाया तब जाकर सरकार हरकत में आई थी। तमाम और खास लोगों को अण्णा की गिरफ्तारी से आपातकाल का एहसास हुआ तो कोई गलत नहीं है। अण्णा हजारे से निपटने या निपटाने की रणनीति कांग्रेस को सरकार से जिन्दगी भर के लिए दूर करने वास्ते काफी है। बहुत से अपरिपक्व लोगों का कहना है कि यह कार्पोरेट घरानों का खेल है। लेकिन क्या कार्पोरेट घराना कांग्रेस के साथ नहीं है? अण्णा हजारे के साथ है! देखिए बाक्स में।

          अण्णा के साथ नहीं है, कार्पोरेट घराना
        भले ही पूरा देश अण्णा के साथ हो और देशभर में इस आन्दोलन को फैलाने का जज्बा रखता हो लेकिन उघोग जगत जिसे इंडिया इंक के नाम से जाना जाता है सरदार मनमोहन की कृपा से इस बार अण्णा हजारे के साथ नहीं है। पांच माह पहले जब अण्णा ने पहली बार भूख हड़ताल की थी, तब पूरा उघोग जगत उनके साथ था, जिसे सरदार जी ने अपने दबाब में लेकर अपने साथ कर लिया। देश के दो सबसे बड़े और प्रमुख उघोग चेम्बर फिक्की और सीआईआई ने अण्णा की गिरफ्तारी पर सरकार समर्थित बयान जारी किया। ये दोनों संगठन इस वजह से भी नाराज हो गये, क्योंकि अण्णा हजारे ने 15 अगस्त के संवाददाता सम्मेलन में कई बार कहा कि यह सरकार उघोगपतियों की है और उद्योगपतियों के इशारे पर आम आदमी को नुकसान पहुंचा रही है। एक प्रमुख उद्योगपति ने कहा भी कि अण्णा का बयान 1960 और 1970 के दशक की याद दिला गया जब देश में हर गडबड़ी के लिए उघोग जगत को दोषी ठहराया जाता था। 
       कांग्रेस के साथ तो नेशनल छोड़िये मल्टी-नेशनल्स के मालिकान जुडे हुए हैं। वैसे भी कांग्रेस किस मल्टी-नेशनल से कम है। वह तो अपने आप में एक घराना है। कार्पोरेट घराना तो पक्ष-विपक्ष, विधायक-सांसद, प्रिन्ट मीडिया-इलैक्टानिक मीडिया, उसमें कार्य करने वाले और तेज-तर्रार बोलने वाले, मन्दिर-मस्जिद, गिरजा-गुरूद्वारा, राजनीतिक पार्टियों-माफियाओं, शासन-प्रशासन, रंगमंच वालों, नर्तकियों-कवियों और ना जाने किन-किन को चन्दा, अनुदान और माहवारी देता है। तो क्या सब भ्रष्ट हो गये। उसकी नियति ही है चन्दा देना। अगर किरण बेदी की किसी संस्था को चन्दा, अनुदान अथवा कोई प्रोजेक्ट मिलता है तो क्या इसी बिना पर आप उन्हें करप्ट घोषित कर देंगे! जिस सरकार ने अपनी सारी ऐजेन्सी भ्रष्टाचारियों के पीछे न लगाकर, अण्णा हजारे के पीछे लगा दी हो कि जाओ कुछ भी ढूंढ कर लाओ! जिसका प्रवक्ता मनीष तिवारी प्रेस कान्फ्रेन्स में श्री अण्णा हजारे को भारतीय आर्मी का भगोड़ा बताता हो और भारतीय आर्मी ने यह प्रमाण दिया हो कि अण्णा को ससम्मान सेवानिवृति देने के साथ ही कई पदक भी उन्हें प्रदान किय गये थे, तो एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता की गलत बयानी का क्या अर्थ निकाला जाये! बावजूद इसके कुछ भी गलत न निकलने पर भी उसके प्रवक्ता मनीष तिवारी ने प्रलाप लगाया कि अण्णा हजारे तो ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में सना है।
        मनीष तिवारी जैसों को शर्म नहीं आती कि किस मुंह से अण्णा को जेल से बाहर निकाला ? मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, चिदम्बरम, अम्बिका सोनी जैसे बददिमाग लोगों की जब तक कांग्रेस बलि नहीं लेगी उसके सोचने समझने की शक्ति वापस नहीं आ सकती। कांग्रेस ने यह जो बड़बोले और दम्भी नेताओं की फौज इक्ठ्ठी कर रखी है, वही उसके पतन का कारण भी बनेगी। भारत वह देश है जहॉं के लोग माता सीता पर भी आरोप लगाने से नहीं चूके तो ये तो अण्णा हजारे हैं। यह देश लोटा चोरी में जेल गये लेागों को स्वतंत्रता सेनानी बताता है और स्वतंत्रता सेनानी की मुखबिरी एवं उसके खिलाफ गवाही देने वाले को प्रधानमंत्री का पद देता है। उसके नाम के आगे सर की उपाधि लगाता है, उसके नाम पर तिराहे, चैराहे और सड़क का नामकरण किया जाता है। दरअसल ऐसा करता वही है जो स्वंय मुखौटा ओढ़े भारतीय जनता को बेवकूफ बना रहा होता है। ऐसी मानसिकता के लेाग जब इस देश पर अब भी शासन कर रहे हैं तो कैसे यकीन किया जाये कि इस देश में गोरे राज नहीं कर रहे हैं? इस देश में देशी मुखौटे में अंग्रेजी मानसिकता के काले भुसण्ड लोग ही आज भी सत्ता में विराजमान हैं।
        मंहगाई, भ्रष्टाचार, हताशा और निराशा में पनपे अनशनों के दौर ने देश के आमलोगों को उद्वेलित कर दिया है। बाबा रामदेव के आन्दोलन पर पुलिसिया अत्याचार और स्वामी निगमानन्द के मौन अनशन से दुर्भाग्यपूर्णं निधन की खबर ने देश को झकझोर कर रख दिया है। स्वामी निगमानन्द गंगा में प्रदूषण के विरोध में आमरण अनशन कर रहे थे, किन्तु किसी ने भी उनकी मौत होने तक उनपर ध्यान नहीं दिया। सरकार के खिलाफ अनशन करना किसी भी अत्याचारी सरकार को नहीं सुहाता। वह खाकी वर्दी को अपना गुलाम समझकर उनसे अनशन कुचलवाने का ही प्रयास करती है। वह नशे में भूल जाती है कि खाकी वर्दी का जन्म जनता के जान-माल की रक्षा के लिए किया गया है, लेकिन ठीक इसके विपरीत वह जनता की जान और माल इस खाकी वर्दी की ठोकर पर रख देती है। कितनों को पता है कि इसी उ0प्र0 में एकबार पीएसी रिवोल्ट कर चुकी है, तब यहॉं की सरकार को ही जान के लाले पड़ गये थे। भगवान करे ऐसा पूरे देश में ना हो इसीलिए भारत सरकार को सलाह दी जाती है कि नशे को किनारे रखकर सड़क पर धीरे-धीरे आ रही जनता के मिजाज को भांपकर उसके अनुरुप कार्रवाई करे।
        64 सालों से जनता लॉली पॉप ही खा रही है। अब वह जो मांगने निकली है, उसे शराफत से नहीं मिला तो उसके परिणाम की जिम्मेदार मनमोहन सरकार की होगी। समस्या पर किसी समझदारी का परिचय देते हुए भ्रष्टाचार पर तुरन्त अंकुश लगाया जाये तथा तुरन्त कडा जनलोकपाल अधिनियम बनाया जाये। मनमोहन मण्डली ने इस देश को बहुत लूट लिया। इस देश में पैदा होने का कुछ तो धर्म निभायें। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि अब उनकी नेकनामी और बदनामी केवल उनतक ही सिमट कर नहीं रह पायेगी, बल्कि पूरे सरदारों के नाम पर गिनी जायेगी। अण्णा का यह अनशन भारत में राजनीतिक अनशन के इतिहास पर एक नज़र डालने का सही समय है।
        विनम्र विरोध के इस अदभुत हथियार का प्रयोग करने वाले सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति महात्मा गॉंधी थे, लेकिन ऐसा नहीं है कि अकेले वही ऐसे व्यक्ति थे। कुछ और लोगों ने भी इसका इस्तेमाल किया, जिन्हें आज जानबूझकर भुला दिया गया है। महात्मा गॉंधी अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के भी रोल मॉडल हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि वह महात्मा गॉंधी हो गये। इसी प्रकार अण्णा हजारे भी महात्मा गॉंधी के अहिंसक आन्दोलन से प्रेरित हैं तो वह भी महात्मा गाँधी न तो हो गये और ना ही उन्होंने कभी ऐसा कहा। उनका तो कहना है कि यदि महात्मा गाँधी की भाषा सरकार नहीं समझेगी तो वह वीर शिवाजी की भाषा भी जानते हैं। वर्तमान का क्षणिक समय, सरकारी पागलखाने की भीड़ द्वारा एक सामान्य चित्त व्यक्ति को पागल और बेवकूफ बनाने का चल रहा है।
          जिन और लोगों ने अहिंसक आन्दोलन का सहारा लिया उनमें और अन्यानेक लोग भी थे। लाखों कोलकातावासियों के लिए जतिन दास का नाम महज एक सुविधाजनक मैट्रो स्टेशन है, जहॉं से वे दक्षिण कोलकाता के व्यस्त चौराहे हाजरा तक जाने के लिए उतरते हैं। भीड़ में ऐसे इक्का-दुक्का ही मिलेंगे जो यह बता सकें कि इस मैट्रो स्टेशन और इससे सटे पार्क का नाम जतिन दास क्यों है? जतिन दास ब्रिटिश राज में भारतीय जेलों में राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले दुव्र्यवहार के विरोध में 64 दिन तक अनशन करने के बाद शहीद हो गये थे। जतिन ने लाहौर जेल में 13 जुलाई 1929 को अन्य बन्दियों के साथ अनशन शुरू किया था। अंग्रेजों ने उनका अनशन तुड़वाने के लिए तमाम हथकण्डे अपनाये किन्तु जतिन दास को भोजन लेने के लिए मजबूर नहीं कर पाये।
          जतिन दास प्रसिद्ध हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। लाहौर जेल में बन्द उनके तीन साथियों- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई, जबकि जतिनदास 13 सितम्बर 1929 को ही शहीद हो गये थे। पूरी दुनिया में भारत के अलावा आयरलैण्ड ही ऐसा देश है जहॉं भूख हड़ताल विरोध का एक नियमित माध्यम है। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव से पहले इस देश के राजनीतिक प्रतिष्ठान को हिला देने वाला और हमेशा के लिए भारत का नक्शा बदल देने वाला आमरण अनशन 1952 में हुआ था।
    19 अक्टूबर 1952 को श्रीरामलू अलग आन्ध्रा प्रदेश की मांग पर मद्रास के बीचों-बीच आमरण अनशन पर बैठ गये थे। इससे पूर्व उन्होंने आजादी से पहले 1946 में भी मन्दिरों में निम्न जातियों के प्रवेश के लिए आमरण अनशन किया था। 1952 में केन्द्र में कांग्रेस की ही सरकार थी, जो भाषा के आधार पर नए राज्यों के गठन के खिलाफ थी। श्रीरामलू अनशन पर थे, और उनकी हालत बिगड़ने के बावजूद नेहरू इससे विचलित नहीं हुए, जैसे सरदार जी नहीं हो रहे हैं। नेहरू ने घोषणा भी कर दी कि वह अनशन से विचलित होने वाले नहीं हैं। प्रधानमंत्री के अविचलित रहने के बावजूद आन्ध्र समर्थक श्रीरामलू के पक्ष में लोग लामबन्द होते गये और मद्रास प्रेसीडेन्सी के तेलुगू भाषी क्षेत्रो में जोरदार आन्दोलन शुरू हो गया। 58 दिन के अनशन के बाद 15 दिसम्बर 1952 को श्रीरामलू की मृत्यु हो गई। जैसे ही उनके निधन की खबर फैली स्वतः स्फूर्त विरोध प्रदर्शन, लूटपाट और दंगे पूरे राज्य में फैल गये। अन्ततः अविचलित नेहरू को विचलित होना पड़ा और पृथक राज्य आन्ध्रा प्रदेश का गठन करना पड़ा।
         सरकार तो सरकार है, छोटी मोटी मीडिया से जुड़ी अपंजीकृत समितियां के सदस्य और अध्यक्ष भी जब अहंकार में डूबकर अपनी हैसियत भूल जाते हैं और अपने को मुख्यमंत्री समझने लगते हैं तो प्रधानमंत्री की तो बात ही और है। 1 अक्टूबर 1953 को जब आन्ध्रा प्रदेश का जन्म हुआ और राजधानी कुरनूल में कार्यक्रम का आयोजन हुआ तो उसमें शामिल होने वाले दो प्रमुख अतिथियों में प्रधानमंत्री नेहरू और मद्रास के मुख्यमंत्री राजगोपालाचारी ही थे। जबकि ये दोनों ही आन्ध्रा प्रदेश के गठन के कट्टर विरोधी थे। आन्ध्रा प्रदेश के बाद अधिकाधिक राज्यों जैसे केरल, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात आदि का गठन भी भाषाई आधार पर ही हुआ है। यदि नेहरू का चिन्तन, राजनीतिक सूझ-बूझ और विजन दुरूस्त होता तो श्रीरामलू की जान बच सकती थी। श्रीरामलू के आन्दोलन और अण्णा हजारे के आन्दोलन में जमीन-आसमान का फर्क है। श्रीरामलू की समस्या एक प्रदेश के गठन की थी, अण्णा हजारे की समस्या पूरे देश की है। उस आन्दोलन से एक राज्य का गठन हुआ था और केन्द्र सरकार बच गई थी। इसबार जन लोकपाल भी बनेगा और सरकार भी निपट जायेगी। आप नदी किनारे बैठकर चिंगारी से लगी आग की भीषड़ता का अन्दाजा नहीं लगा सकते!
           जिस जनशक्ति के उभार के लिए कांग्रेस सरकार के युवराज और सोनिया के लला मोटर साइकिल पर भट्टा-पारसौल, चोरी-छिपे गये थे और दो दिनों तक अपनी मनमानी की थी, क्या प्रदेश सरकार ने उन्हें फतेहगढ़ की जेल में ठूंस दिया था? जहॉं राख के ढे़र में सैकड़ों लाशों के दफन होने का उन्होंने आरोप लगाया- क्या उनके प्रदेश आगमन पर सरकार ने कोई पाबन्दी लगा दी। जिस बुन्देलखण्ड में जनवरी 2011 से अबतक 570 किसानों ने आत्म हत्या कर ली उसे ज्वलन्त समस्या न मानकर केवल दो किसानों के मारे जाने पर इतने बड़े झूंठ का किला तैयार किया जो राख के विश्लेषण के बाद स्वतः ढह गया। इस कृत्य पर क्या लला राहुल को प्रदेश सरकार ने गिरफ्तार किया! नहीं! क्या राहुल के अनशन पर 22 शर्तों के प्रतिबन्ध के साथ अनुमति दी जाती है? नहीं! बल्कि वे तो प्रदेश में घुसने और कहीं पहुंचने से पहले प्रशासन को इसकी जानकारी देने की भी औपचारिकता नहीं निभाते, तो क्या यह नियम विरुद्ध और प्रदेश सरकार को ठेंगे पर रखने की बात नहीं है। आप पूरे देश की सम्पत्ति धनानन्द की तरह बटोर कर विदेश में जमा करें, ये संविधान सम्मत है और कोई इसके खिलाफ आवाज उठाये तो भ्रष्ट! मल्लिका शेरावत, कपिल सिब्बल से कहे कि मुझसे बड़े नंगे तो तुम! तुमने तो पूरी सरकार को नंगा कर दिया, मैं तो केवल अपना शरीर ही नंगा करती हू! तो है कोई जवाब सिब्बल के पास।
        लोकपाल बिल पर केन्द्र सरकार के मंत्रियों के ऐसे-ऐसे जवाब आये कि सुनकर लगा ये तो द्वारपाल रखे जाने की भी येाग्यता नहीं रखते और सूचना, सूचना प्रौद्योगिकी इत्यादि मंत्रालयों की बागडोर संभाले हुए हैं। सत्याग्रह आन्दोलन पर अण्णा हजारे को तिहाड़ जेल में बन्द करने के सरकार के कदम को कोई सिरफिरा ही सही ठहरा सकता है। यहॉं यह बताना नितान्त जरूरी हो गया है कि पराजय के कगार पर खड़ा हर तानाशाह जनता की आवाज को बन्दूक और तोप की ताकत से ही कुचलने की रणनीति अपनाता है, और उस पर ऐंठकर कहता है कि-है कोई माई का लाल जो मेरे सामने आये। वह भूल जाता है कि माई/नियति ने उसके लिए क्या सोचा हुआ है, ये तो उसे पता ही नहीं है।
        मनमोहन सरकार यह नहीं समझ पा रही है कि उसकी ही कांग्रेस सरकार की आयरन लेडी इन्दिरा गॉंधी को इमरजेन्सी लगाने का खामियाजा ही नहीं भुगतना पड़ा था, अपितु मॉफी भी मांगनी पड़ी थी। हाईकोर्ट इलाहाबाद के एक जज माननीय जगमोहन लाल सिन्हा ने इन्दिरा गॉंधी की बैण्ड बजा दी थी। इस समय तो सिन्हा जैसे कई एक जज मा0 सुप्रीम कोर्ट की शोभा बढ़ा रहे हैं। एक 74 वर्ष का नौजवान गॉंधीवादी, जीवन की अन्तिम बेला में, वेश्या प्रवत्ति के भ्रष्टाचार के खिलाफ आम नागरिक के ज्वार का नेतृत्व करने आया है तो आप की सरकार उसे जेल में ठूंस देगी? महाराष्ट्रीयन और यू0पी0-बिहार की विभाजन रेखा के बीच बांधने का प्रयास करेगी! एक ईमानदार शख्सियत को जबरन भ्रष्ट बताने की कोशिश एक राष्ट्रीय पार्टी के मंच से उसका प्रवक्ता करेगा। मनीष तिवारी ने एक ऐसे बुजुर्ग पर जो कभी जोर से नहीं बोलता, अपशब्द नहीं कहता, जो सरकार से बात करने के लिए हमेशा तत्पर रहता है, जिसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिल लाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के मुखियाओं के दरवाजे खटखटाये लेकिन उसके विरुद्ध आपका प्रवक्ता विष वमन करेगा, आप सत्ता के नशे में उसे जबरदस्ती जेल भेज देंगे। इसका खामियाजा तो आपको भुगतना ही पड़ेगा।
         जो नेता, जानवरों का पूरा चारा खा गया वह अण्णा हजारे के खिलाफ बोल रहा है, केवल इसलिए कि कांग्रेस कुछ झूठन उसकी झोली में भी डाल दे। कड़े से कड़ा लोकपाल अधिनियम का प्रारूप बनाने की बात सोनिया गॉधी, सरदार जी, कपिल सिब्बल, पी चिदम्बरम आदि ने की थी, लेकिन उसके बाद देश को बेवकूफ बनाने का काम किया। श्री अण्णा हजारे ने एकदम सही कहा कि सरकार ने धोका दिया। सरकार ने इस भारत में मीडिया का एक एल्सेशियन वर्ग पैदा कर दिया जो लेाकपाल के औचित्य पर ही सवाल उठाने लगा। इतने बड़े मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री को 125 करोड़ की जनता के पास मैसेज भिजवाने के लिए सिर्फ पांच सम्पादक ही मिले, वह भी क्षेत्रीय अखबारों के! जिन्होंने सरदार जी के स्वल्पाहार के बाद ही अपने सुर उनके सुर से मिलाने शुरू कर दिये और समझने लगे कि क्या कोई जान पायेगा! इन सम्पादकों में एक आलोक मेहता प्रमुख हैं, जिन्होंने इस समय आईबीएन-7 पर परिचर्चा के दौरान भी जनता को खूब भरमाने की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्य उनका कि उनकी बात में जनता को साजिश की बू आती दिखाई दी।
        सरकार के मंत्री टेलीविज़न पर कहते देखे गये कि इस बिल से क्या स्कूल में एडमीशन मिल जायेगा? क्या इससे आपका राशन कार्ड बन जायेगा? क्या इससे अस्पताल में भर्ती हो जायेंगे? क्या इससे आपको नौकरी मिल जायेगी? इसका सीधा मतलब है कि छह दशक से शासन करने के बाद भी आम नागरिक को आपने कुछ नहीं दिया सिवाय भ्रम के। फिर किस बिना पर आप सत्ता पर काबिज हैं, आपको तो सत्ता से जितनी जल्दी हो उखाड़ फेंका जाना चाहिए।
        अण्णा को बदनाम करने के लिए एक और मुहिम चलाई गई कि अण्णा संघ से जुड़े हैं और संघ परिवार से समर्थन लेकर काम कर रहे हैं। जैसे संघ परिवार कोई आतंकवादी है! जबकि आतंकवादी को अपने दामाद से भी ज्यादा पूज रहे हैं! आरएसएस वाले भी इस देश के सम्मानित और जिम्मेदार नागरिक हैं। मुझे आज यह लिखने में कोई गुरेज नहीं है कि वे ऐसे कांग्रेसियों से कहीं बेहतर हैं। मैं स्वंय भी एक स्वतन्त्रता सेनानी का पुत्र हूँ, जिसने भारत माता को आजाद कराने के लिए तीन साल की जेल की कड़ी सजा काटी थी, जो एक कांग्रेसी थे, लेकिन आज की कांग्रेस के इस चरित्र को देखते हुए यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि उसकी नीयत में खोट ही खोट हैं और उसकी परिणति अपने अन्त की ओर है। मुझे यह लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि कांग्रेस पर विदेशियों ने कब्जा कर लिया है। भारतीय मानसिकता के कांग्रेसी अब इसमें छटपटाहट महसूस कर रहे हैं।
          राजीव गॉंधी की हत्या से पूर्व उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पॉलिटिकल कू की खबर, उन्हीं के मुख्यमंत्रित्वकाल में छापकर, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी को इसी पत्रकार ने सचेत किया था, किन्तु समय से उस रिर्पोट, जो रॉ द्वारा प्रधानमंत्री के सामने क्रास्ड फाइल में रखी गई थी, पर ध्यान ने देने और उसे नजरअन्दाज करने का ही परिणाम था कि वो अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिस 65 करोड़ की दलाली का झूंठा ताना बाना बुनकर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भोले-भाले और मित्रबाज राजीव गॉंधी को बदनाम किया, उसका बाद में पता चला कि वह दलाली तो राजीव गांधी ने ली ही नहीं थी। ठीक उसी तरह कपिल सिब्बल एण्ड कम्पनी अण्णा हजारे को बदनाम ही नहीं कर रही है, अपितु कांग्रेस सरकार के ताबूत में कीलों का जखीरा ठोंक रही है। कांग्रेस जबतक कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह आदि आधा दर्जन लोगों की बलि नहीं लेगी, उसके सिर से अण्णा नाम का भूत उतरने वाला नहीं।
          सरकार को गुमराह करने के एवज में शीघ्रतिशीघ्र मंत्रीमण्डल से कपिल सिब्बल की छुट्टी कर देनी चाहिए, अन्यथा की स्थिति में कांग्रेस को क्या-क्या भोगना पड़ेगा, यह तो वक्त ही बतायेगा। अण्णा हजारे के सत्याग्रह आन्दोलन पर उंगली वो उठा रहे हैं जो घुटन्ना पहने हैं, जिसे नई पीढ़ी बरमूडा कहती है। अण्णा हजारे के सत्याग्रह आन्दोलन पर उंगली वे लोग उठा रहे हैं, जो कश्मीर के जिहाद को समर्थन देते हैं, और आतंकवादियों व अलगाववादियों से हांथ मिलाकर देश-विरेाधी मंचों पर स्थान साझा करने से नहीं डरते। वे देश भर के संगठनों की सार्वजनिक सक्रियता से भयभीत हो उठते हैं, जो विदेशी रेडियो और चैनलों में कार्यरत हैं, अथवा ऐसे प्रिन्ट मीडिया से जुड़े हैं, जिनके प्रबन्धतंत्र के पास विदेशी सोसाइटियों से लाखों डॉलर प्रतिमाह आते हैं।
        अगली बार ऐसे समाचार-पत्रों की लिस्ट पेश की जायेगी जिनके पास लाखों की विदेशी सहायता आती है। एक के पास तो ब्लैंक चेक आता है। उ0प्र0 विधानसभा में अवमानना की कार्यवाही चार घण्टे तक झेलने वाले भारी भरकम प्रबन्ध सम्पादक के संस्थान को भी विदेशी सोसाइटी से ब्लैंक चेक आता है। इस देश की आम जनता को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ईमानदार नेतृत्व की तलाश थी, जो उसे अण्णा हजारे के रूप में मिल गया है। अब तो यह निर्विवाद रूप से साबित हो चुका है कि अण्णा की मुहिम को राजनीतिक सत्ता की ताकत से कतई नहीं रोका जा सकता है। कांग्रेस के पास दो हथियार दिखाई देते थे, मनमोहन सिंह की ईमानदारी और राहुल गॉंधी का युवा नेतृत्व, लेकिन देानों ही हथियार खिलौने वाले निकले। न तो मनमोहन ईमानदार निकले, ना ही राहुल का नेतृत्व प्रभावशाली निकला। दिग्विजय सिंह के साथ ने उन्हें भी झूंठ की मशीन बना दिया।
      भट्टा-पारसौल के उनके बयान और फिर उनकी किसान नेताओं के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात पर कोई कार्रवाई न होना और इसके बाद बिठौरों में सैकड़ों किसानों के जला दिये जाने के झूंठे और भ्रम तथा हिंसा फैलाने वाले बयानों ने उन्हें स्वंय कटघरे में खड़ा कर दिया। वर्तमान समय में कांग्रेस के दोनों तथाकथित हथियार टॉय-टॉय फिस्स ही नजर आ रहे हैं। मनमोहन सिंह और सोनिया गॉंधी दिमाग खोलकर यह समझें कि इस राजनीतिक संकट से उबरने का एक ही उपाय उनके पास शेष है। अनसुलझे और अभिमानी मंत्रियों की मंत्रीमण्डल से छुट्टी के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
         जनमानस अब सड़क पर आ गया है, और जब जनता सड़क पर आती है तो सरकार क्या संसद को भी सुनना पड़ता है। संसद को एक प्रभावी लोकपाल कानून बनाना चाहिए। जबानी जमा खर्च के दिन लद गये। सत्ता में होने के कारण कांग्रेस ही संकट में है। बाकी राजनीतिक दलों को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि कांगेस और उसकी सरकार से नाराज लोग उन्हें गले लगा लेंगे। कांग्रेस इसी डर से गल्ती और गुण्डई दोनों कर रही है कि इस आन्दोलन का चुनावी फायदा कहीं भाजपा को न मिल जाये। भाजपा को फायदा होगा या नहीं यह तो उनकी करनी बतायेगी, लेकिन कांग्रेस की लुटिया जरूर डूबने वाली है। सतीश प्रधान




संविधान से ऊपर नहीं है संसद

             इस देश में कानून का राज (रूल ऑफ लॉ) चलता है। ये हमारे संविधान के मूल ढ़ांचे का हिस्सा है। इसे संसद भी नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती, बल्कि वह भी इससे बंधी है। रूल ऑफ लॉ, भूमि अधिग्रहण के उन मामलों में भी लागू होता है, जहॉं कानून को अदालत में चुनौती देने से संवैधानिक छूट मिली हुई है। यह बात सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सम्पत्ति पर अधिकार के कानून की व्याख्या करते हुए अपने फैसले में कही है।
            मुख्य न्यायाधीश माननीय एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने भूमि अधिग्रहण कानून को चुनौती देने वाली के0टी0 प्लांटेशन प्रा0लि0 की याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि वैसे तो कानून के शासन यानी रूल ऑफ लॉ की अवधारणा हमारे संविधान में कहीं देखने को नहीं मिलती, फिर भी यह हमारे संविधान के मूल ढ़ाचे का हिस्सा है। इसे संसद भी नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती। बल्कि ये संसद पर बाध्यकारी हैं। केशवानन्द भारती के मामले में दिए गये फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रूल ऑफ लॉ के सिद्धान्त को सबसे महत्वपूंर्ण हिस्सा माना है। संविधान पीठ ने कहा है कि एक तरफ तो रूल ऑफ लॉ संसद की सर्वोच्चता निर्धारित करता है, लेकिन दूसरी तरफ संविधान के ऊपर संसद की सम्प्रभुता को नकारता है, यानी संसद संविधान के ऊपर नहीं है।

    कोर्ट ने कहा है कि वैसे तो सैद्धान्तिक तौर पर रूल ऑफ लॉ के कोई विशिष्ट चिन्ह नहीं हैं, लेकिन ये कई रूपों में नजर आता है। जैसे प्राकृत न्याय के सिद्धान्त का उल्लंघन रूल ऑफ लॉ को कम करके आंकता है। मनमानापन या तर्क संगत न होना रूल ऑफ लॉ का उल्लंघन हो सकता है लेकिन ये उल्लंघन किसी कानून को अवैध ठहराने का आधार नहीं हो सकते। इसके लिए रूल ऑफ लॉ का उल्लंघन इतना गंभीर होना चाहिए कि वह संविधान के मूल ढ़ाचे और लोकतांत्रिक सिद्धान्तों को कमजोर करता हो।
सतीश प्रधान 


Monday, 15 August 2011

हताशा और निराशा की जननी है मंहगाई


वर्ल्ड बैंक के तथाकथित अनुभवी एवं अर्थ विशेषज्ञ डा0 मनमोहन सिंह एवं उनकी टीम के आहलूवालिया, उपाध्यक्ष केन्द्रीय योजना आयोग, डा0 सुब्बाराव, गवर्नर आर.बी.आई. रंगराजन, भूतपूर्व गवर्नर, आर.बी.आई, वर्तमान गृहमंत्री चिदम्बरम एवं वर्तमान वित्तमंत्री प्रणव दा की मंहगाई घटाने की सारी कवायद धरी की धरी रह गई। दरअसल ये टीम और इसके लीडर अंग्रेजी मानसिकता के द्योतक हैं। डा0 मनमोहन सिंह और योजना आयोग के उपाध्यक्ष आहलूवालिया अर्थशास्त्री नहीं बल्कि अनर्थशास्त्री हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक, जिसका नेतृत्व वर्तमान में डा0 सुब्बाराव कर रहे हैं, ये सब धरातल से ऊपर 25वीं मंजिल पर बैठे हैं, जहॉं से हर भारतीय कॉंकरोच दिखाई देता है। इसी के विदर्भ में रहे रंगराजन भी वैसी ही मानसिकता वाले हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक एकदम सफेद हांथी है, उसपर तुर्रा यह कि वह भारत की सभी बैंकों का केन्द्रीय बैंक है। वह बैंकों की नियामक संस्था माना जाता है, उसकी सफलता जीरो भी हो तो ठीक है, लेकिन वह तो माइनस में घुसी हुई है। देखिए, अमेरिका को! उसकी क्रेडिट रेटिंग ट्रिपल ए से फिसलकर डबल ए प्लस पर आने के बाद भी उसके मुकाबले भारत का रुपये का अवमूल्यन होता जा रहा है। दिनांक 8 अगस्त 11 को 1000 डॉलर, 44761 रुपये का था जो रेटिंग घटने के बाद 1000 डॉलर, दिनांक 11 अगस्त 11 को 45407 रुपये का हो गया। उपरोक्त सारे अर्थशास्त्रीयो की टीम बताये कि ऐसा कैसे हो रहा है?  अगर किसी कन्ट्री की साख गिरने के बाद भी उसकी करेन्सी मजबूत हो रही है तो इससे सुखद और कोई दूसरी बात हो ही नहीं सकती!

अगर क्रेडिट रेटिंग घटने से करेन्सी मजबूत होती तो, सबसे नीचे के पायदान पर पड़ी कन्ट्री की करेन्सी सबसे मजबूत होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा भी तो नहीं है। ये सारा जगलरी का खेल है, जो अमेरिका से संचालित हो रहा है, जिसकी संचालन टीम में हमारी उपरोक्त टीम भी बराबर की पार्टनर है, जो हिन्दुस्तान की ऐसी की तैसी करने में पूरे मनोयोग से लगी है। ये टीम पूरे भारत से बदला ले रही है। किस बात का बदला ले रही है, यह तो मनमोहन सिंह और आहलूवालिया ही बता सकते हैं। तीन साउथ इण्डियन, एक कम्यूनिस्टी विचारधारा का पोषक और एक सरदार की पूरी टीम का लीडर भी एक घुन्ना और चुप्पा सरदार है, जो सम्भवतः 1984 के सिख दंगों का बदला पूरे भारतवर्ष से लेने की ठान चुका है,  इसीलिए वह ना तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ बोलता है और ना ही भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई करता है। उसे अन्ना हजारे भ्रष्ट दिखाई देतें हैं, करोड़ों करोड़ का घोटाला करने वाले उसकी कैबीनेट में हैं, जिनकी सरपरस्ती वह करता है, लेकिन उनकी बात वह नहीं करता है। यह विदेशी आक्रांताओं से भी बड़ा आक्रान्ता है जो अपनी ही धरती का है। अलावा इसके कोई अन्य कारण नज़र ही नहीं आता है।

बैंक कर्ज की लगातार बढ़ती ब्याज दरों के बाद भी मंहगाई रुकने का नाम नहीं ले रही, इसका सीधा मतलब है कि कर्ज की दरों और मंहगाई का कोई आपसी रिस्ता नहीं है। आरबीआई ने बेशर्मी के साथ कह दिया कि खाद्य वस्तुओं की मंहगाई घटने वाली नहीं बल्कि इसी चोट पर एक और चोट करते हुए उसने लगे हांथ यह भी कह दिया कि उसके सर्वे आंकलन के अनुसार जून 2012 तक यह दर 12.9 प्रतिशत तक पहुंच जायेगी, जबकि मार्च 2011 को यह दर 10.05 प्रतिशत ही थी।  इसका सीधा मतलब है कि मंहगाई की दर अभी 28 प्रतिशत और बढ़ेगी! यानी आगे के लगभग एक साल तक भी आरबीआई कुछ उपाय करने में अक्षम है। ऐसे रिजर्व बैंक से क्या फायदा? इसे या तो समाप्त कर देना चाहिए अथवा इसकी स्वायत्ता खत्म कर देनी चाहिए।

भारत में खाद्यान का सर्वोच्च 24.1 करोड़ टन उत्पादन हुआ। अनाज इतना पैदा हुआ कि रखने की जगह नहीं मिली, अनाज खुले में पड़ा सड रहा है। सरकार के पास बफर स्टॉक में 6.5 करोड़ टन अनाज पड़ा है। आलू और प्याज का भी इफरात में उत्पादन हुआ है। करोड़ों टन अनाज सड़ने की स्थिति के बाद भी जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि इससे तो अच्छा है कि इसे गरीबों में बॉंट दिया जाये तब भी सरकार ने अपनी    संवेदनहीनता, हठधर्मिता दिखाते हुए,सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को दरकिनार करते हुए टिप्पणी की गई कि सरकार अपनी नीति अपने हिसाब से तय करेगी एवं उसने अनाज मुफ्त बांटने से साफ इंकार कर दिया। ऐसी नीति तो अंग्रेज की ही हो सकती थी कि अनाज को सड़ा दो लेकिन ब्लडी इण्डियन को मुफ्त में ना बांटो।

हिन्दुस्तान अब अमेरिकियों द्वारा संचालित हो रहा है। वह जमाने गये जब ईस्ट इंण्डिया कम्पनी यहॉं राज करती थी और उसके कर्ता-धर्ता भी भारत में ही रहते थे। अब तो कई एक ईस्ट इण्डिया कम्पनियां भारत में हैं, लेकिन उनके असली मालिक यहॉं भारत में नही बैठते हैं। जबसे यूनियन कार्बाइड का भोपाल गैस काण्ड हुआ है, एक भी मल्टी नेशनल कम्पनी का मालिक भारत में नहीं बैठता है, वह विदेश से ही इसका संचालन करता है। भारत में इन मल्टीनेशनल कम्पनी में यहीं के भारतीय इण्डिया हेड बनाकर बैठा दिये जाते हैं जो अपने और अपने परिवार की सुख-सुविधा के लिए वह सब करते हैं, जो देश के विरुद्ध होता है। ये सारे विदेशियो के गुलाम हैं, इनकी सोच बिल्कुल गुलामों वाली है और इनकी नियति ही गुलाम बने रहने की है। जिस प्रकार मुम्बई के डिब्बेवाले प्रतिष्ठान के प्रबन्धन ने पूरे विश्व को चौंका दिया था और बड़े-बड़े प्रबन्ध संस्थानों के कर्ता-धर्ता समेत इंग्लैण्ड की महारानी भी डिब्बेवाले के यहॉं उसके प्रबन्धन के गुर सीखने आई थीं, ठीक उसी प्रकार महगाई पर रोक लगाने का फार्मूला शुद्ध भारतीय ही दे सकता है, ना कि कोई विदेशी अथवा उसका गुलाम! भारतीय करेन्सी को विदेशी बैंकों में जमा करने वाले तो कदापि नहीं।


भारतीयों की सोच में बदल की गुंजाइश रखने वाला हमारा मीडिया तंत्र, यह तो नहीं कहा जा सकता कि नकारा हो गया है, लेकिन यह स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि वह लालची, मौकापरस्त और खुदगर्ज अवश्य हो गया है। मीडिया का एक बुजुर्ग हिस्सा आई.एस.आई. एजेन्ट गुलाम नबी फई के तंत्र में है और मजा लूटकर भारतीयता को चोट पहुंचा रहा है। कुछ हिस्सा भारत में दिनोंदिन बढ़ती मंहगाई पर भारत सरकार को आडे हांथों लेने के बजाय, अमेरिकी कर्ज के मर्ज का इलाज ढूँढ रहा है। दैनिक जागरण के राजनीतिक सम्पादक, प्रशांत मिश्र ने अमेरिका के काल्पनिक संकट के इलाज की दुकान खोली है, उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की मृत्यु शैय्या पर पड़ी लाश नहीं दिखाई देती। वे जनता को यह बताने में सक्षम नहीं हैं कि भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री नहीं बल्कि भारत के लिए अनर्थशास्त्री हैं, जो केवल अमेरिका के भले के लिए भारत के प्रधानमंत्री का पद घेरे हुए हैं, लेकिन वह तबका अमेरिका की गिरती साख से चिंतित है।

प्रशांत मिश्र जी ने 1917 में प्रथम बार स्थापित अमेरिकी साख का गुणगान करते हुए वर्तमान में पहली बार ही उसकी साख को गिरते हुए देखा है, जबकि वास्तविकता यह है कि उसकी साख वर्ष 1981 में भी गिरी थी। ओवरआल साख तो उसकी गुण्डई और बदमाशी की है, जिसमें वह नम्बर वन है, जो उसका अन्त होने पर ही गिरेगी। हमारे नीति नियन्ताओं ने मंहगाई बढ़ाने के ही फार्मूले पढ़े हैं, उन्होंने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजाबाद, दुष्टता और एकबार येन-केन-प्रकारेण चुन लिए जाने के बाद पूरे पांच साल तक राज करने के ही पाठ पढ़े हैं, इसलिए उनको मंहगाई घटाने के प्रयास करने ही नहीं हैं। जब उनके अपने व्यक्तिगत खजाने बेशुमार दौलत से भरे पड़े हैं तो उन्हें मंहगाई से क्या लेना देना। केक और बर्गर खाने वालों को गेहू और दाल की बढ़ती कीमत से क्या सरोकार।
सतीश प्रधान

Monday, 8 August 2011

बुन्देलखण्ड में पनपेगा नक्सलवाद-राजा बुन्देला


बुन्देलखण्ड में सरकारी आँकड़ों के अनुसार विगत जनवरी से अब तक 570 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि सच्चाई निश्चित रुप से इससे अलग और चौकाने वाली ही है। इसी बुन्देलखण्ड से सात विधायक उ0प्र0 और म0प्र0 में मंत्री पद पाये हुए हैं। इस तरह इस क्षेत्र से उ0प्र0 के चार और म0प्र0 के पॉंच सांसद, संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह और अपने देश के लला यहॉं पहुंचकर कई एक घोषणा कर चुके है, लेकिन नतीजा ढ़ाक के तीन पात से बढ़कर कुछ भी नहीं।

मनरेगा की गडबडियों में बुन्देलखण्ड सबसे ऊपर पाया गया है, लेकिन किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। देश के नक्शे में बुन्देलखण्ड ऐसी तस्वीर पेश करता है जैसे लाचारी और बेबसी ही उसकी नियति है। यह हमारे अनर्थशास्त्री और अमेरिका के दुलारे डा0 मनमोहन सिंह, आहलूवालिया, रंगराजन, प्रणव मुखर्जी, चिदम्बरम, रिजर्व बैंक आफ इंडिया, योजना आयोग समेत पूरी कैबीनेट के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस इनसे तो लज्जा की बात करना अपने मुख पर ही थूकने जैसा है। 

उ0प्र0 के लोग हसरत भरी निगाहों से इंतजार कर रहे हैं कि किसानों के हक के लिए सियासत का जो बन्दा पदयात्रा पर निकला था, एक दिन यहॉ के लोगों का दुखदर्द भी बांटेगा, लेकिन वे यह देखकर निराश हैं कि वह बन्दा नोएडा, अलीगढ़, बुलन्दशहर छोड़कर बुन्देलखण्ड की ओर देखने को भी तैयार नहीं है।बुन्देलखण्डवासियों का कहना है कि हम अपनी सात नदियों से दूसरों को पानी पिलाते हैं लेकिन खुद प्यासे रहते हैं?  उनकी इसी प्यास को बुझाने निकले हैं बुन्देलखण्ड के राजा बुन्देला और उन्होंने इसके लिए कांग्रेस छोड़कर बुन्देलखण्ड कांग्रेस के नाम से एक नई पार्टी गठित की है, उसकी पहली प्रेस कान्फ्रेन्स में उन्होंने जो घोषणा की है, उसकी बानगी देखिए।

नवगठित बुन्देलखण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष और बॉलीवुड सितारे राजा बुन्देला ने आगाह किया है कि यदि बुन्देलखण्ड प्रदेश अलग न बना तो वहॉं फैली भुखमरी, तबाही और उपेक्षित जनता नक्सलवाद की ओर प्रभावित होगी। राजा बुन्देला का कहना अतिश्योक्ति नहीं है, क्योंकि भारत में जहॉं भी नक्सलवाद है, वहॉं की परिस्थितियां भी ऐसी ही रही हैं। उनकी इस बात में तो सौ प्रतिशत दम है। कोई भी सरकार नक्सलवाद के रुटकॉज को ढंढ़ने का प्रयास नहीं करना चाहती, उसके निदान की बात तो दूर की कौड़ी है। यदि रुटकॉज ढूंढ़कर उसका इलाज किया जाये तो नक्सलवाद अपने आप खत्म हो जायेगा। कम और बेस्तर बुन्देलखण्ड के हालात भी ऐसे ही हैं। यहॉं की समस्या को केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार के पाले में फैंकने से काम बनने वाला नहीं। दोनों सरकारों को सम्मलित प्रयास करने ही होंगे।

बुन्देलखण्ड में यह कहावत मशहूर होती जा रही है कि बुन्देलखण्डवासी अपनी सात नदियों से दूसरों को पानी पिलाते हैं लेकिन खुद प्यासे रह जाते हैं। यहॉं से 37 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में और 34 विधायक मध्य प्रदेश की विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी प्रकार उ0प्र0 से 4 और म0प्र0 से 5 सांसद भी चुने जाते हैं, बावजूद इसके बुन्देलखण्ड का किसान त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। इसका सीधा मतलब है कि यहॉं से जो प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा और लोकसभा में जा रहे हैं, वे यहॉं की जनता के लिए कोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के एक दशक बाद भी वहॉं की मूल समस्या का अन्त नहीं हुआ है। विशेष पैकेज के नाम पर ही वह आज भी जिन्दा है। उसने अपनी कमाई के श्रोत आजतक नहीं खोजे हैं। उसकी कमाई का क्या जरिया है और कितनी रेवन्यू उसके पास आती है, तथा कबतक वह आत्म निर्भर हो जायेगा, इसको बताने वाला कोई नहीं है। इसी परिप्रेक्ष्य में अगर राजा बुन्देला भी यह बताते चलें कि बुन्देलखण्ड की कमाई का जरिया यह होगा और उसका इस्तेमाल वहॉं की जनता के लिए ना होकर बुन्देलखण्ड के बाहर के लोगों के लिए हो रहा है तो बात समझ में आती है, लेकिन यदि उस क्षेत्र से कोई कमाई ही नहीं है तो उसे अलग राज्य बनाना वहॉं की जनता के साथ छलावा और बेईमानी है।

यदि वहॉं से चुने जाने वाले विधायक और सांसद वहॉं की जनता के लिए कुछ सोंचें तो अब भी बहुत कुछ हो सकता है। वरना तो ऐसे ही विधायक और सांसद प्रथक राज्य के बाद भी चुने जायेंगे जो फिर लालबत्ती के फेर में पडे़गे। अलग राज्य बनाने पर कई दशक तक इसे केन्द्र सरकार के विशेष पैकेज के सहारे ही चलना पड़ेगा। इसी के साथ पूरे मंत्रीमण्डल का करोड़ों रुपये का भार भी उसी केन्द्र के पैकेज से ही निकलेगा जो अनतत्वोगत्वा बुन्देलखण्ड वासियों के मत्थे ही पड़ेगा।

इस देश में तबतक सुधार आने वाला नहीं जबतक जनता के पास विधायक और सांसद को वापस बुलाने का अधिकार नहीं मिलता। जनता जिस विधायक/सांसद को जिस पार्टी के बैनर तले चुनकर भेजती है और वह उसके बाद किसी अन्य पार्टी में जाता है अथवा पार्टी उसे निकाल देती है तो उसकी सदस्यता स्वतः खत्म हो जानी चाहिए। 

राजा बुन्देला ने पूर्व में कहा है कि यहॉं की नदियों बेतवा, चम्बल, केन, धसान, टोंच, शहजाद और जामनी से ही आगरा, कानपुर, लखनऊ और इलाहाबाद को पानी भेजा जाता है। आगरा के ताज के लिए यहॉं का पानी भेजकर विश्व पर्यटन को रिझाया जाता है। मेरा कहना है कि राजा बुन्देला इसी पानी को बुन्देलखण्ड के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ऐसा करने से उन्हें कौन रोक रहा है।

राजा बुन्देला इस सच को स्वीकारें कि बुन्देलखण्ड के दबंगों ने पानी पर अपना एकाधिकार कर लिया है। सुनकर आप चैंकेंगे कि इसी आजाद भारत में आज भी बुन्देलखण्ड के कुओं के पास कमजोरॉ को फटकने नहीं दिया जाता है। ये 37 विधायक और 4 सांसद क्या कर रहे हैं? क्या ये सब दबंगों के सामने बौने हैं याकि ये ही दबंग है, अथवा इनमें से कुछ दबंग हैं! ये सारे वहॉं की जनता के लिए खड़े हो जाये तो इनसे बड़ा दबंग कौन? यदि सरकारें इनकी भी नहीं सुन रही हैं तो सुप्रीमकोर्ट में पीआईएल दाखिल कीजिए, देखिए कैसे सुप्रीमकोर्ट सुनवाई करता है।

जहॉं मात्र छह माह में 570 किसान आत्महत्या कर चुके हों वहॉ की जनता की सुप्रीमकोर्ट सुनवाई ना करे हो ही नहीं सकता। पीआईएल दाखिल करने के लिए हष्ट-पुष्ट, तन्दरुस्त, दो हांथ और दो पैर होना जरुरी नहीं है। एक हांथ एक पैर के भी हैं तो काम चलेगा। कमजोर और अन्धे हैं तो भी काम चलेगा, लेकिन भाई जान! रहियेगा जनता के प्रति ईमानदार। पीआईएल को तगड़ी कमाई का जरिया और अपने बदनाम नाम को नेकनामी में तब्दील करने के लिए पीआईएल मत कीजियेगा।

प्रथक राज्य बुन्देला को मुख्यमंत्री का पद तो दिला सकता है लेकिन वहॉं आत्महत्यायें नहीं रुकवा सकता? पहले आत्म हत्या रोकने के प्रयास होने चाहिए, बाकी बात बाद में। आत्महत्यायें रोकने के लिए जमीनी प्रयास करने होंगे, केवलमात्र पैकेज के ऐलान और प्रथक राज्य की मांग से वहॉं के निवासियों का भला होने वाला नहीं है। बुन्देलखण्ड कांग्रेस गठित करने वाले राजा बुन्देला ने लखनऊ  में आयोजित अपनी पहली प्रेसवार्ता में राहुल गॉंधी पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया। साथ ही यह भी कहा कि राहुल ही नहीं सोनिया ने भी उन्हें वर्ष 2004 में फिल्मी दुनिया से बुलाकर बुन्देलखण्ड राज्य बनाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन अब राहुल राज्य के बजाय पैकेज के जरिए क्षेत्र के विकास की बात कर रहे हैं। यदि ऐसा है भी तो क्या गलत है? पृथक राज्य बनने के बाद क्या बगैर केन्द्र के पैकेज के बुन्देलखण्ड सरवाइव कर सकता है?

राजा बुन्देला ने विधान सभा की 37 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात की है। राजा बुन्देला का यह नारा कि अपना सी.एम., अपना डी.एम., अपनी धरती, अपनी भर्ती सुनने में आकर्शक लगता है, लेकिन क्या यह बुन्देलखण्ड-वासियों को उत्तर प्रदेश से अलग नहीं कर देगा, जैसा कि महाराश्ट्रीयन सोचता है। क्या पूरे भारत की धरती उनकी नहीं है? जबतक पूरे भारत को एक मानकर नेतागण नहीं चलेंगे तबतक इस भारत में भुखमरी मर नहीं सकती।

राजा बुन्देला को सबसे पहले बुन्देलखण्ड के 82 प्रतिशत किसानों और मजदूरों के लिए कोई कारगर स्कीम सोचनी होगी। खुजराहो, महोबा, चित्रकूट, छतरपुर जैसे ऐतिहासिक स्थल के पर्यटन की योजना बनानी होगी। खदान और पत्थर पर आधारित उघोग की तलाश कर उसकी प्रोजेक्ट रिर्पाट तैयार करनी होगी। इसके बाद इसे लेकर वह जनता के बीच जायें और फिर अपनी बात रखें, तब बात बनेगी।

अलग राज्य बनने के बाद होगा यही कि उघोग स्थापित करने के नाम पर इन्हीं 82 प्रतिशत किसानों की जमीनें फिर से इमरजेन्सी क्लॉज लगाकर औने पौने दाम पर अधिग्रहीत कर ली जायेंगी, जो आत्महत्या कर रहे किसानों के प्रतिशत को कई गुना बढ़ा देंगी। आत्महत्या कर रहे किसानों के साथ सरकारी गोली से मरने वाले किसानों की भी तो बढोत्तरी हो जायेगी। बुन्देला जी मुख्यमंत्री बनने की सोचने से पहले इन गरीब किसानों की भी सुध लीजिए।
सतीश प्रधान

Sunday, 7 August 2011

गद्दार के नाम पर होगा दिल्ली का चौक



     भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस नाम के चैराहे का नाम सर शोभा सिंह, के नाम पर करने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री केा सिफारिश पत्र लिखा है। सरदार शोभा सिंह, औरतों पर भोण्डा एवं मरी हुई शक्सियत पर मनचाहा लेखन करने वाले सरदार खुशवन्त सिंह के पिता हैं। शायद आपको पता न हो कि सरदार खुशवन्त के पिता गद्दार और देशद्रोही थे जिन्होंने देशभक्त भगत सिंह के खिलाफ अंग्रेजों की अदालत में उनके विरुद्ध गवाही दी थी।
    खुशवन्त सिंह का नाम उन्हीं पत्रकारों की लिस्ट में है जिसमें कुलदीप नैय्यर,  बरखा दत्त,  वीर सिंघवी, निर्मला देशपाण्डे, अरुंधति राय, प्रभु चावला और राजेन्द्र सच्चर जैसे लोग हैं। ये सारे पत्रकार, समाजसेवी या आप जो समझें देश की प्रतिश्ठा दांव पर लगाते रहे हैं। फिर चाहे यह एक आई.एस.आई. एजेन्ट गुलाम नबी फई के सेमिनार/कार्यशला में उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवा पर विदेश जाने का ही मामला क्यों ना हो। इन सारों को फई की कोटरी का सदस्य समझना ही ज्यादा मुफीद होगा।
    यहॉं हम सरदार खुशवन्त सिंह की ही बात करते हैं, जो सुरा-सुन्दरी के शौकीन होने के साथ-साथ दिवंगत हुई महान हस्तियों पर ही खबर लिखने में महारत हासिल किये हुये हैं। चूंकि मुर्दे तो इनके लेख का खंडन करने आने वाले नहीं! इसलिए इनके जो मन में आता है और जो इनकी इज्जत में चार चॉंद लगा दे,वैसा ही लेख यह प्रस्तुत कर देते हैं। खुशवन्त सिंह के मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं लेकिन लड़कियों के मामले में एकदम गिद्ध हैं। इन्हीं महोदय के पिता श्री थे शोभा सिंह, जिन्होंने शहीद भगत सिंह के खिलॉफ अंग्रेजों की अदालत में गवाही दी थी जिसके कारण भगत सिंह केा फांसी पर लटकाया गया।
     अंग्रेज बड़ी सरगर्मी से भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए किसी गद्दार की तलाश कर रहे थे। आखिरकार उन्होंने एक नहीं बल्कि दो लालची, देशद्रोही और गद्दारों को ढंढ ही लिया। उनमें एक निकले सरदार खुशवन्त सिंह के बाप और दूसरा निकला शादी लाल। दोनों का ही नाम श से शुरु होता है और अब जिस चौक को इस गद्दार के नाम पर किये जाने की सिफारिश जिस मुख्यमंत्री से की गई है, उस भद्र महिला का नाम भी श से शीला दीक्षित है, जो दिल्ली राज्य की मुख्यमंत्री हैं।
     शहीद भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने के कारण ही शोभा सिंह और शादी लाल को अंग्रेजों ने खूबसारी दौलत के साथ ‘सर’ की उपाधि से भी नवाजा। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशूमार दौलत और करोडों के सरकारी निर्माण कार्य के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार सम्पत्ति मिली। शयामली, मुजफ्फरनगर में आज भी शादीलाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब का कारखाना है। यह अलग बात है कि शादी लाल को गॉंव वालों का तिरस्कार भी झेलना पड़ा एवं उसके मरने पर वहॉं के किसी भी दुकानदार ने कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
     शादी लाल के लडकों को कफन का टुकड़ा भी शोभा सिंह ने दिल्ली से उपलब्ध कराया, तब जाकर इस गद्दार एवं देशद्रोही शादी लाल का क्रियाकर्म हुआ। शोभा सिंह इस मामले में किस्मत वाला रहा। इसे और इसके पिता सुजान सिंह, जिसके नाम से यमुनापार दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है, को राजधानी दिल्ली में हजारेां एकड जमीन मिली और खूब दौलत भी। इसी के बेटे खुशवन्त सिंह ने अपने बाप का दाग मिटाने के लिए अपने पिता के कुकर्मो को छिपाने के लिए आईएसआई एजेन्ट गुलाम नबी फई की ही तरह मैमोरियल लेक्चर/पत्रकारिता शुरु करके बड़ी-बड़ी हस्तियों से सम्बन्ध बनाने शुरु कर दिये।
     शोभा सिंह के नाम पर एक चैरिटेबिल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता। दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखम्भा रोड़ पर जिस स्कूल को मार्डन स्कूल के नाम से लोग जानते हैं वह इसी गद्दार शोभा सिंह को खैरात में मिली जमीन पर शान से खड़ा है।
     खुशवन्त सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अर्पैल 1929 को उस वक्त सेन्ट्रल असेम्बली में मौजूद था जहॉं भगत सिंह और उनके साथियों ने धुंए वाला बम फेंका था। पिता को बचाने के लिए सरदार खुशवन्त सिंह यह तो कह रहे हैं कि उसके पिता असेम्बली में मौजूद थे, लेकिन यह नहीं बता रहे हैं कि उनके बाप और शादी लाल की गवाही पर ही भगत सिंह को फांसी पर लटकाया गया। यदि शोभा सिंह और शादी लाल, भगत सिंह के खिलाफ गवाही न देते तो निष्चित रुप से भगत सिंह को फांसी पर लटकाना अंग्रेजों के लिए मुमकिन न हो पाता।
     खुशवन्त सिंह का बाप शोभा सिंह 1978 तक जिन्दा रहा और दिल्ली के हर छोटे-बडे आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि जाता रहा। हांलाकि बहुत सी जगह उसे अपमानित भी होना पडता था, लेकिन इसका वह अभ्यस्त था, क्योंकि अगर उसके पास करेक्टर नाम की चीज होती तो वह ऐसा घिनौना कृत्य न करता। हराम की मिली दौलत और जमीन से खुशवन्त सिंह ने एक ट्रस्ट बना लिया और हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाने लगे जैसा कि पाकिस्तानी एजन्ट गुलाम नबी फई आयोजित कराता रहा जिसमें हमारे देश के नामचीन और देशभक्त पत्रकार, समाजसेवी और पूर्व जज बड़े मजे से शिरकत करते रहे हैं, वह भी इस खुशफहमी में कि का कोई जाने पईय्ये। 
     मैमोरियल लेक्चर में आने वाले बहुत से लोग अज्ञानतावश ही इस गद्दार की फोटो पर माल्यार्पण कर देते थे, जैसे कि हम और आप किसी प्रसिद्ध मन्दिर में जाये तो कईएक मूर्ति आपको ऐसी मिल जायेंगी कि आप जानते ही नहीं कि ये देवता हैं या राक्षस लेकिन आप पुश्प अर्पित कर देते हैं। भले ही वहॉं पुजारी के स्व0 पर-दादा की मूर्ति लगी हो लेकिन आप भोलेपन में अज्ञानतावश उसपर भी पुश्पवर्षा कर देते हैं। ठीक वैसा ही शोभा सिंह की फोटो के साथ होता रहा, वरना मैमोरियल लेक्चर के स्थान पर फोटो रखने का क्या औचित्य?
     अब इस देश के नन्हे, जो एकदम भोलेभाले हों और जिन्हें कुछ न पता हो, उन्हें नन्हा कहा जाता है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो कि एक सरदार हैं, एक दूसरे सरदार खुशवन्त सिंह के गद्दार स्व0 पिता सरदार शोभा सिंह के नाम से दिल्ली के विन्डसर प्लेस का नाम, सर शोभा सिंह के नाम पर रखने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सिफारिशी पत्र लिखा है। घ्यान रहे इनका भी नाम श से शीला दीक्षित ही है।
     अब आप स्वयं समझ लाजीए एक देशद्रोही को पुरस्कार कौन देगा? अंग्रेजों ने दिया क्योंकि शोभा सिंह ने उनके लिए हिन्दुस्तानी देशभक्त के साथ गद्दारी की और वर्तमान में सरदार मनमोहन सिंह उसे पुरस्कृत करने जा रहे हैं, तो यह कौन हुए! इससे तो अच्छा था कि इस चौक का नाम भिंडरावाला चौक रख दिया जाता। एकसाथ कईएक सरदारों को खुश किया जा सकता था। इससे एक नहीं लाखों सरदार खुश हो जाते, इस एक को खुश करने से क्या फायदा?
      इससे तो हमारे लखनऊ के वे पत्रकार ज्यादा अच्छे हैं जो औरतों के विषय में भौण्डा लेखन तो नहीं कर पाते, बल्कि औरतों को इज्जत के साथ बड़े-बड़े नेताओं से मिलवाने का काम करते हैं। लेखन-वेखन को मारिये गोली, वे तो इतने भोले हैं कि जिस भाषा के अखबार में काम करते हैं उस भाषा में अपना और अपने बाप का नाम भी नहीं लिख सकते लेकिन उनके बाप ने खुशवन्त सिंह के बाप की तरह गद्दारी नहीं की, किसी देशभक्त को सूली पर नहीं चढ़वाया। इसीलिए उनकी पहचान खुशवन्त सिंह के स्तर की नहीं हो पाई है, लेकिन बड़ी सिद्दत से वे दूसरे प्रयोजन से अपना नाम अमर करने में लगे हैं। वाह रे खुशवन्त सिंह खूब बढ़ाई तेरे बाप शोभा सिंह ने इस भारत की शोभा, और इस पर आलम यह कि उसके नाम पर दिल्ली का चौक होने जा रहा है।
सतीश प्रधान