Sunday, 1 July 2012

पत्रकारों की सम्पत्ति का खुलासा क्यों नहीं?


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने अपनी सरकार की छवि साफ सुथरी रखने के लिए अपने सभी मंत्रियों के वास्ते आचार संहिता तय कर दी है। मुख्यमंत्री ने न सिर्फ मंत्रियों को अपनी व परिवार के सभी सदस्यों की संपत्ति घोषित करने का निर्देश दिया है अपितु पांच हजार से अधिक का उपहार लेना भी प्रतिबंधित कर दिया है। इसके लिए उन्होंने सभी मंत्रियों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के प्राविधानों को भी पत्र में संलग्नक के रूप में भेजा है। मंत्री को अपने उन रिश्तेदारों का भी विवरण देना होगा जो उनपर आश्रित हैं। यह विवरण सिर्फ अचल सम्पत्ति तक ही सीमित नहीं है, अपितु यदि किसी के पास शेयर हैं, नकदी व ज्वैलरी है तो इसका भी विवरण देना होगा। पाँच हजार से अधिक मूल्य के उपहार को उन्होंने सरकारी सम्पत्ति घोषित कर दिया है।
ऐसी स्थिति में जबकि उ0प्र0 के मुख्यमंत्री ने मंत्रियों के लिए सम्पत्ति के खुलासे को अनिवार्य कर दिया है, और जब आई0ए0एस0, आई0पी0एस0 एवं पी0सी0एस0 अधिकारियों पर सम्पत्ति की घोषणा करने के लिए न्यायालय तक दखल दे चुका है तो राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकार इससे अछूते क्यों हैं? यहॉं पर समस्त पत्रकारों की बात नहीं की जा रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश के राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए तो इसे अपरिहार्य बनाया ही जाना चाहिए। चौथा खम्भा कहलाने में हमें बड़ा गर्व महसूस होता है, लेकिन जब बाकी तीनों खम्भों के लिए सम्पत्ति का खुलासा करना अपरिहार्य हो गया है, तो फिर राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों पर ये प्रतिबन्ध क्यों नहीं? श्री अखिलेश यादव का यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय एवं प्रशंसनीय है।
मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों को निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे अपनी सम्पत्ति का खुलासा तीस दिन के अन्दर करें, अन्यथा कि स्थिति में उनकी मुख्यालय पर मान्यता निरस्त कर देनी चाहिए। इसी प्रकार जो पत्रकार मुख्यालय की मान्यता के लिए आवेदन करता है या उसकी सिफारिश/संस्तुति जो संस्थान करता है उसे उसके आवेदन के साथ सम्पत्ति के खुलासे का प्रमाण संलग्न करना चाहिए एवं बगैर इसके उस पत्रकार को राज्य मुख्यालय की मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। सूचना निदेशक, सूचना सचिव, सचिव मुख्यमंत्री एवं प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री को ऐसा प्रारूप तैयार कराना चाहिए जिससे पत्रकार आन-लाइन सम्पत्ति की घोषणा कर सकें। साथ ही प्रतिवर्ष इसको अद्यतित किये जाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
ध्यान रहे इसी लखनऊ में ऐसे-ऐसे पत्रकार हैं जो करोड़पति ही नहीं अपितु अरबपति हैं। पत्रकारिता से वेतन के नाम पर उनको पन्द्रह हजार भी वेतन नहीं मिलता है, लेकिन करोड़ों की अचल सम्पत्ति के वे मालिक हैं, बड़ी-बड़ी स्पोट्‌र्स यूटिलिटी व्हीकिल्स (एस0यू0वी0) से वे अपने तो घूमते ही हैं, कुछ तथाकथित बड़े कहलाने वाले पत्रकारों को भी ऐसे वाहन उपलब्ध कराकर उनकी आत्मा को तृप्त करते हुए ओबलाइज करते हैं। यही तथाकथित बड़े कहलाने वाले पत्रकार उन जैसे संदिग्ध एवं आय से अधिक सम्पत्ति धारण करने वाले पत्रकारों को प्रश्रय एवं संरक्षण दिये हुए हैं।
संदिग्ध एवं गलत धन्धों में लिप्त, बिल्डर और माफिया पत्रकारिता के पेशे में घुसकर अपने जैसे ही लोगों को पत्रकार का ठप्पा लगाकर सचिवालय एनेक्सी के मीडिया सेन्टर में घुसा चुके हैं। गैराज से अखबार निकालने वाले लोग आज की तारीख में कई करोड़ के आसामी ही नहीं हैं अपितु इनका नेक्सस इतना तगड़ा है कि कई एस0पी0, सी0ओ0, दारोगा इनके नेक्सस का हिस्सा हैं। इनकी सच्चाई का जो भी पत्रकार खुलासा करने की हिम्मत करता है, उसे यह जबरन फंसाने के लिए फर्जी एफ0आई0आर0 विभिन्न थानों में लिखवा देते हैं, जिसमें यही दरोगा, सी0ओ0, एस0पी0 और तो और एस0एस0पी0 (आई0जी0रेन्क के अधिकारी तक) इनकी खुले आम चाहे-अनचाहे मदद करते हैं।
क्या इससे कोई इंकार कर सकता है कि आई0बी0 की सूचना पर जो सतर्कता, सचिवालय मुख्य भवन, सचिवालय एनेक्सी, बापू भवन, राज्यपाल भवन के लिए बरतनी पड़ी उसमें किसी ऐसी व्यक्ति का हांथ नहीं है, जो पत्रकारिता के पेशे में घुसा हुआ है। जब महाराष्ट्र की शिक्षामंत्री की संलिप्तता आतंकवादियों से हो सकती है, तो पत्रकारिता के पेशे में ऐसे भेड़ियों की क्यों नहीं, आखिरकार इसकी गारण्टी कौन देगा। इसलिए राज्य मुख्यालय पर मान्यता पाये और मान्यता चाहने वाले पत्रकारों की जॉंच एल0आई0यू0 के स्थान पर आई0बी0 से होनी चाहिए।
सचिवालय एनेक्सी में लगे सी0सी0टी0वी0 कैमरों की रिकार्डिंग में क्या इसकी मॉनीटरिंग होती है कि कौन व्यक्ति कैसे और किस व्यवस्था के तहत पंचम तल तक पहुंच रहा है, और वहॉं कर क्या रहा है। ट्रान्सफर-पोस्टिंग के धन्धे में लगे इन तथाकथित पत्रकारों की जॉंच आखिरकार क्यों नहीं होती? कोई अपने को सचिव मुख्यमंत्री श्रीमती अनीता सिंह का खास बताता है तो कोई अपने को शम्भू सिंह यादव का। इनमें से एक अपने को मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव का खास बताता है, जबकि मुख्यमंत्री के यहॉं उसकी एन्ट्री ही बन्द है। आखिरकार ये कैसे हो रहा है कि जब कोई भी पत्रकार पंचमतल पर बैठे अधिकारियों की मर्जी से बने पास के बगैर वहॉं नहीं पहुंच सकता तो ये कैसे ऊपर पहुंच जाते हैं? ग्रह विभाग में तिलचट्टे की तरह घुसे इन पत्रकारों की निगरानी का समय आ गया है।
अब समय आ गया है जब मुख्यालय पर पत्रकार मान्यता दिये जाने की अधिनियम के तहत नियमावली बने तथा पन्द्रह वर्ष से कम अनुभव रखने वाले किसी भी पत्रकार को राज्य मुख्यालय की मान्यता प्रदान न की जाये, भले ही वह कितने ही बड़े ग्रुप से ताल्लुक क्यों ना रखता हो, उसे लिखना-पढ़ना आता हो, जिस भाषा के समाचार-पत्र से वह मान्यता चाह रहा है उस भाषा का उसे ज्ञान हो, साथ ही ए-4 साइज का एक पन्ना वह लिखने में तो सक्षम हो, क्योंकि राज्य मुख्यालय पर एक से एक वरिष्ठ अधिकारी से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री तक यहॉं बैठते हैं, इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उनसे पत्रकार के रूप में मिलने वाले व्यक्ति को लिखना-पढ़ना आता हो, सलीका आता हो, और कुल मिलाकर वह सभ्य हो।
पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसके नाम पर कोई भी कहीं भी घुस सकता है। इसलिए अब इसपर निगरानी की आवश्यकता आन पड़ी है। पत्रकार मान्यता नियमावली के प्रख्यापन के साथ ही पत्रकार आवास आवंटन नियमावली-1985 को भी संशोधित किये जाने की आवश्यकता है। कितने ही पत्रकार ऐसे हैं, जिनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उनके घर वाले उस सरकारी आवास पर जबरन कब्जा बनाये हुए हैं और अपने निजी मकान को अस्सी-अस्सी हजार रूपये किराये पर उठाये हुए हैं। सरकारी आवास निरस्त होने के बावजूद उनके खिलाफ पब्लिक प्रिमाइसेज इविक्शन एक्ट के तहत कार्रवाई ना होना ही सबसे बड़ा दुखद पहलू है।
(सतीश प्रधान)

Monday, 18 June 2012

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा



लगभग 44 वर्ष की उम्र तक पत्रकारिता से दूर-दूर तक का नाता ना रखने वाले एवं प्रबन्धकीय पद पर कार्य करने वाले एक व्यक्ति नेअचानक रातों-रात लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक समाचार-पत्र, जनसत्ता एक्सप्रेस (फ्रेन्चाइजी के तहत वर्तमान में बन्द हो चुके) के तत्कालीन अनुबन्धकर्ता एवं स्वामी डा0 अखिलेश दास की मेहरबानी से महाप्रबन्धक होने के बावजूद सम्पादक का चार्ज ले लिया और पत्रकार बन गये। डा0 अखिलेश दास ने भी बगैर यह विचार किये कि इस महाप्रबन्धक का पत्रकारिता से कोई लेना-देना ही नहीं है, फिर भी सम्पादकीय विभाग में एक से एक पत्रकारों के मौजूद रहने के बाद भी उन सबको नजरअन्दाज करते हुए समाचार-पत्र का सम्पादक बना दिया। मि0 दास एक बिजनेसमैन हैं और उन्होंने अपने फायदे के लिए ही ऐसा कर डाला। दोनों पद एक व्यक्ति को देकर उन्होंने सम्पादक को दी जाने वाली सेलरी को आराम से बचा लिया।
इस प्रकार सीनियर प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों को आम की पेटी एवं उपहार के बल पर अपने को जिन्दा रखने वाले इस व्यक्ति, मि0 पंकज वर्मा ने महाप्रबन्धक एवं सम्पादक का चार्ज लेते ही समाचार-पत्र के ब्यूरो प्रमुख की मेहरबानी से दिनांक 31 जनवरी 2004 को राज्य सम्पत्ति विभाग का शासकीय आवास, राजभवन कालोनी में नं0-1 आवंटित करा लिया। वर्ष 2005 में मि0 पंकज वर्मा को डा0 अखिलेश दास ने विज्ञापन के धन में हेरा-फेरी करने के आरोप में नौकरी से भी निकाल बाहर किया।
पंकज वर्मा के पत्रकार न रहने और मेसर्स शोंख टैक्नोलॉजी इण्टरनेशनल लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेन्ट का पद पाने और इसके बाद हेरम्ब टाइम्स में राजनीतिक सम्पादक होने और फिर वारिस-ए-अवध का संवाददाता दर्शाने की स्थिति में विशेष सचिव एवं राज्य सम्पत्ति अधिकारी, उ0प्र0 शासन ने 15 फरवरी 2006 को उनका आवंटन आदेश निरस्त कर दिया। इस आदेश के विरूद्ध मि0 पंकज वर्मा ने वर्ष 2006 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में रिट पिटीसन संख्या-1272 दाखिल की।

जिसकी पूरी तरह से सुनवाई करने के बाद विद्धान न्यायाधीषों क्रमशः श्री संजय मिश्रा एवं श्री राजीव शर्मा ने रिट पिटीसन संख्या-1272 पर फाइनल आर्डर किया कि- 
                   The impugned order does not suffer from any error in law and as such, the writ petition having  no merit is accordingly dismissed. 

इसके बाद मि0 पंकज वर्मा ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में संख्या-18145 से वर्ष 2007 में एस0एल0पी0 दाखिल कर दी।
माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 05 अक्टूबर 2007 को हुई पहली सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Upon hearing counsel the court made the following ORDER-
              Issue notice. Status quo shall be maintained in the meantime. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 04 फरवरी 2008 को हुई दूसरी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Ms Shalini Kumar, learned Advocate appearing on behalf of Ms. Niranjana Singh, Advocate on Record accepts notice for all the respondents and seeks time to file Vakalatnama & Counter Affidavit. 
              They may do so, before 29th Feb. 2008. 
              List the matter on 29th Feb. 2008.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 29 फरवरी 2008, को हुई तीसरी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Office is directed to rectify the data base so as to disclose the names of all the concerned Advocates in the Cause List who have filed their appearance. 
               List the matter before the Hon’ble Court. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 21 अप्रैल 2008, को हुई चैथी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Two weeks time is granted to file rejoinder affidavit.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 14 जुलाई 2008, को हुई पांचवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-

             We find that the petitioners counsel had made a request by letter dated 16/04/2008 for grant of time & time was accordingly granted on 21/04/2008. 
             Again similar request is made by writing an identical letter. We see no ground for extending the time.The request for extending further time to file a rejoinder is rejected. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 19 अगस्त 2008, को हुई छठी सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Place before appropriate Bench.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 13 अक्टूबर 2008, को हुई सातवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Order dated 14/07/2008 is recalled. Rejoinder affidavit be filled within two days.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 01 जनवरी 2009, को हुई आठवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Pleadings are complete. List this matter for hearing in the last week of Feb.2009. In the meantime, the State Govt. is at liberty to take a decision on the representation stated to have been filed by the petitioner if the said representation is still pending for decision.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 23 फरवरी 2009, को हुई नौवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             In view of the letter circulated on behalf of learned counsel for the petitioner, list after four weeks.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 27 मार्च 2009, को हुई दसवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
            On the joint request made by the parties, list this matter after the ensuing Summer Vacation.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 06 जुलाई 2009 को ग्यारहवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             List for final disposal in Nov. 2009.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 17 सितम्बर 2010 को हुई बारहवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             The matter is adjourned for eight weeks.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 26 अगस्त 2011 को हुई फाइनल सुनवाई में एस0एल0पी0संख्या-18145 को न्यायमूर्ति माननीय श्री आर.बी रविन्द्रन और न्यायमूर्ति माननीय श्री ए0के0पटनायक ने अंतिम रूप से निस्तारित करते हुए आदेश दिये कि-
           
         Upon hearing counsel the Court made the following ORDER-
             Special Leave Petition is dismissed.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी पंकज वर्मा के वकील महोदयों ने टाइम-पर टाइम लेने और कोर्ट का समय जाया करने की असफल कोशिश की, एवं मा0 सुप्रीम कोर्ट की जल्द निपटारे की मंशा के बाद भी चार साल लग गये। मि0 पंकज वर्मा ने इस प्रकार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल करके छह साल आराम से गुजार दिये और अब 26 अगस्त 2011 को दिये गये सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी अनादर करते हुए आराम से उसी सरकारी आवास में अवैध एवं अविधिक कब्जा जमाये हुए हैं।

जिस आवास को खाली कराने के लिए राज्य सम्पत्ति विभाग ने जनता के धन के लाखों रूपये वकीलों की फीस के रूप में खर्च कर डाले और दोनों ने मिलकर माननीय हाई कोर्ट और माननीय सुप्रीम कोर्ट का समय भी बर्बाद किया, उसी आवास को पुलिस बल से कब्जा मुक्त कराने की कोई मंशा राज्य सम्पत्ति विभाग की नहीं दिखाई देती। नहीं तो क्या कारण है कि 26 अगस्त 2011 को मा0 सुप्रीम कोर्ट से फैसला राज्य सम्पत्ति विभाग के पक्ष में होने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग आज दिनांक 18 जून 2012 तक मि0 पंकज वर्मा से शासकीय आवास रिक्त नहीं करा पाया है? जब मि0 पंकज वर्मा से आवास खाली ही नहीं कराना था तो आवंटन आदेश रद्द ही क्यों किया गया? और मा0 हाईकोर्ट में एवं मा0 सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवाद ही क्यों किया गया? यदि प्रतिवाद सही किया गया तो राज्य सम्पत्ति विभाग मि0 पंकज वर्मा के खिलाफ पब्लिक प्रिमाइसेज (इविक्सन) एक्ट के तहत बेदखली की कार्रवाई क्यों नहीं करता है?

मि0 पंकज वर्मा ने भी वकीलों की फौज पर लाखों रूपये बहाये, आखिरकार इतना धन मि0 पंकज वर्मा कहॉं से लाये? इनके पास आय से अधिक सम्पत्ति की आखिरकार जॉंच क्यों नहीं होनी चाहिए? उ0प्र0की राजधानी लखनऊ में तकरीबन तीन दर्जन पत्रकार ऐसे हैं जो करोड़पति हैं, एक दर्जन ऐसे हैं जो अरबपति हैं और प्रदेश की मीडिया को, नौकरशाही को एवं सरकार को अपनी उंगली पर नचाते हैं एवं पत्रकारिता की ऐसी की तैसी कर रखी है। प्रदेश के समस्त मान्यता प्राप्त पत्रकारों की आय से अधिक सम्पत्ति की जॉंच तो होनी ही चाहिए, यदि देश के इस चौथे खम्भे को दुरूस्त रखना है तो।

मि0 पंकज वर्मा और राज्य सम्पत्ति विभाग, दोनों ने मिलकर क्या माननीय उच्च एवं उच्चतम न्यायालय का वक्त बर्बाद करते हुए उसके दिये गये आदेश को ठेंगा नहीं दिखाया। यदि यह मुकदमा दोनों न्यायालय में ना लगा होता तो मा0 दोनों न्यायालयों को किसी और विशेष मुकदमे को निपटाने का समय मिला होता एवं वास्तव में किसी गरीब-गुरबे की सुनवाई हुई होती और उसे राहत मिली होती। यहॉं तो कुल मिलाकर माननीय न्यायालयों को ही बेवकूफ बनाने में दोनों पक्ष एकमत रहे

उत्तर प्रदेश में ज्यादातर पत्रकारों ने इसी तरह फर्जी तरीके से सरकारी आवास पाये हुए हैं। अपना मकान होते हुए भी (जिसे सरकार ने 40 प्रतिशत की सबसिडी पर दिया है) उसे अस्सी-अस्सी हजार रूपये प्रतिमाह किराये पर उठाकर, राज्य सम्पत्ति विभाग में झूंठा शपथ-पत्र प्रस्तुत कर कई दशकों से सरकारी आवास पर कब्जा जमाये हुए हैं और संस्थान से रिटायर होने के बावजूद पत्रकार मान्यता पाने के लिए और आवास पर कब्जा बरकरार रखने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र पत्रकार की श्रेणी बनवाकर शासकीय आवास पर कब्जा किये हुए हैं। कितने तो करोड़ों की अचल सम्पत्ति रखने के बाद भी सरकारी आवास पर काबिज हैं। क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि 70 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति भी पत्रकार बने रहकर सरकारी आवास घेरे हुए हैं और आर्थिक रूप से कमजोर एवं नौजवान, कर्मठ लगभग तीन दर्जन पत्रकार सरकारी आवास पाने से वंचित हैं और किसी तरह से गुजर-बसर कर रहे हैं।

माननीय मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट श्री एस0एच0 कपाड़िया जी से अनुरोध है कि मेरी इस अपील को पब्लिक इंटीरेस्ट लिटिगेसन की तरह ट्रीट करते हुए मुझ समेत समस्त पक्ष को नोटिस जारी करना चाहें, जिससे भविष्य में आपके न्यायालय तक पहुंचने वाला वादी और प्रतिवादी आपके आदेश का अक्षरशः पालन करे, उसके साथ ढ़ींगा-मुस्ती करने की हिम्मत ना दिखा पाये।

उपरोक्त की हार्ड कॉपी मय आवश्यक कागजातों के द्वारा रजिस्ट्री आपके पास इस उम्मीद से भेज रहा हॅूं कि आपके आदेश के बाद भी मि0 पंकज वर्मा का निरस्त आवास संख्या-1, राजभवन कालोनी, लखनऊ जो मुझे 30 मई 2012 को आवंटित किया गया है,उस पर अभी तक मि0 पंकज वर्मा का कब्जा किस प्रकार से बना हुआ है? आवास निरस्तीकरण के बाद फैसला आने पर भी राज्य सम्पत्ति विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
(सतीश प्रधान)
http://janawaz.com/archives/2020

Sunday, 27 May 2012

आगे बढ़ो, पीछे नहीं- बराक ओबामा



अमेरिका के ओहायो में आगे बढ़ो के नारे से चुनाव अभियान की शुरूआत करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए अपने शासनकाल की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल के कार्यकाल में उन्होंने देश को आर्थिक मन्दी से बाहर निकाला है और दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर वह अपने इस प्रयास को और आगे बढ़ायेंगे।

रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार मिट रोमनी पर टिप्पणी करते हुए ओबामा ने कहा कि देश कभी भी ऐसे नेता का चुनाव नहीं करेगा जो उसे पीछे ले जाये। यह चुनाव महज एक चुनाव नहीं है। यह मध्यमवर्गीय अमेरिकियों के कलए करो या मरो जैसा ही है। लक्ष्य का पीछा करते करते हम बहुत आगे आ चुके हैं और ऐसे में पीछे नहीं मुड़ सकते। ये चुनाव मेरे लिए खास है। ओबामा ने यह स्वीकार किया कि चुनाव में कांटे की टक्कर होगी।

मिट रोमनी के लिए उन्होंने कहा कि वे एक अच्छे इंसान और व्यापारी हैं। इसलिए उनकी हर नीति से सिर्फ अमीरों को ही लाभ मिलेगा, गरीबों और मध्यमवर्ग को नहीं। इस छोटे से वाक्य में उन्होंने बहुत कुछ कह डाला जो उनकी चतुराई को उजागर करता है। मेरा भी मानना है कि अमेरिकी जनता को बराक ओबामा को एक मौका और देना चाहिए। एक टर्म किसी देश की समस्या को पूर्णंरूप से सुलझाने के लिए पर्याप्त नहीं होता है। निःसन्देह उन्होंने अमेरिकी जनता के लिए बहुत कुछ किया है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
घट रही है ओबामा की सम्पत्ति
भारत में जहॉ अपने नेताओं के चुनाव जीतने के बाद उनकी सम्पत्ति में बेतहाशा वृद्धि होती है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सम्पत्ति में कमी आना यह प्रदर्शित करता है कि उन्होंने अपने देश में कोई भ्रष्टाचार नहीं किया।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा के पास फिलहाल 26 लाख डॉलर (करीब 14 करोड़ रूपये) से लेकर 83 लाख डॉलर (करीब 45 करोड़ रूपये)की सम्पत्ति है जबकि वर्ष 2010 में उनकी सम्पत्ति करीब 18 लाख डॉलर (करीब 9 करोड़ 80 लाख रूपये) से एक करोड़ 20 लाख डॉलर (लगभग 65 करोड़ रूपये) के बीच थी। राष्ट्रपति द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक उनके पास जेपीमार्गेन चेज बैंक में भी 10 लाख डॉलर (करीब 5 करोड़ रूपये) जमा हैं। बैंक फिलहाल अमेरिकी संघीय जांच एजेन्सर एफबीआई की जांच के घेरे में है। बैंक द्वारा पिछले हफ्ते दो अरब डॉलर (करीब 108 अरब रूपये) के नुकसान के रहस्योदघाटन के बाद एफबीआई ने उसके खिलाफ जांच शुरू कर दी है। ओबामा ने यह जानकारी राष्ट्रपति चुनाव अभियान के बीच में दी है। वहीं उनके प्रतिद्वन्दी रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार मिट रोमनी की सम्पत्ति 19 करोड़ डॉलर (करीब 10 अरब रूपये)से 25 करोड़ डॉलर (करीब 13 अरब रूपये) के बीच है।

Saturday, 26 May 2012

बीएसपी बचाओ, मायावती हटाओ



पार्टी की एकमात्र डिक्टेटर और राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती के खिलाफ आखिरकार विरोध के स्वर उभर ही आये। उ0प्र0 विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ बहुजन समाज पार्टी के मिशनरी लोगों ने अनतत्वोगत्वा मोर्चा खोल ही दिया। इसके लिए दिल्ली में एक पब्लिक मीटिंग की गई, जिसमें अच्छी-खासी भीड़ एकत्र हुई। इसमें देशभर से आये लोगों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। यह पब्लिक मीटिंग ‘बहुजन मूवमेन्ट बचाओ’ राष्ट्रीय आन्दोलन के तत्वाधान में आयोजित की गई।
मीटिंग में बसपा के संस्थापक सदस्य रामप्रसाद मेहरा ने कहा कि कांशीराम ने सामाजिक परिवर्तन एवं बहुजन समाज की आर्थिक मुक्ति के जिस उद्देश्य से पार्टी की स्थापना की थी, उनकी असमय मृत्यु के बाद मायावती ने उस मकसद को समाप्त कर दिया। असंख्य जिम्मेदार कार्यकर्ताओं व संगठन के अहम पदों पर कार्य करने वाले मिशनरी कार्यकर्ताओं को निष्कासित करने के लिए षडयन्त्र रचे गये। नतीजतन कुछ कर्मठ कार्यकर्ता घर बैठ गए तो कुछ ने दूसरी पार्टीयों का दामन थाम लिया। इसके कारण बसपा आज अपराधियों, भ्रष्टाचारियों, दलालों, लुटेरों व मनुवादियों की शरणस्थली बनकर रह गई है।

पार्टी के पूर्व सांसद प्रमोद कुरील व वरिष्ठ कार्यकर्ता एलबी पटेल ने कहा कि पार्टी को फिर से कांशीराम के सपनों की पार्टी बनाने के लिए बसपा से मायावती को हटाना होगा। इसके लिए देशभर में सभी बसपा कार्यकर्ता एकजुट होकर लोगों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं की जागरूक करेंगे। पूरे देश में मायावती हटाओ-बीएसपी बचाओ अभियान चलाया जायेगा। यह जागरूकता अभियान कितना सफल होगा यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन इतना तो निष्कर्ष निकलता ही है कि आखिरकार नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनाई तो दी।

Sunday, 6 May 2012

शिक्षा में 700 करोड़ का घोटाला


          धन्धेबाजों ने कर डाला शिक्षा में भी 700 करोड़ का घोटाला। शुरूआती दौर में जिन कॉलेजों का नाम आया है, उसमें ये प्रमुख हैं।
डॉ0एम0सी0सक्सेना कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी,धैला रोड़,लखनऊ।
डॉ0एम0सी0सक्सेना इन्सटीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड मैनेजमेन्ट,धैला रोड़,लखनऊ।
डॉ0एम0सी0सक्सेना कॉलेज ऑफ फॉमेसी,धैला रोड़,लखनऊ।
रामेश्वरम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
रामेश्वरम इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
टीडीएल कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,सुल्तानपुर रोड़,लखनऊ।
बोरा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट साइंसेज,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
बोरा इंस्टीट्यूट ऑफ एलाइड हेल्थ साइंसेज,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वायरनमेन्ट एण्ड मैनेजमेन्ट,कुर्सी रोड़,लखनऊ।
आर्यकुल कॉलेज ऑफ मैनेजमेन्ट,बिजनौर रोड़,लखनऊ।
आर्यकुल कॉलेज  ऑफ  फॉमेसी बिजनौर रोड़,लखनऊ।
आरआर इंस्टीट्यूट  ऑफ  मार्डन टेक्नोलॉजी,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
इंस्टीट्यूट  ऑफ  टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,मामपुर बाना़,बीकेटी,लखनऊ।
आईटीएम स्कूल  ऑफ  मैनेजमेन्ट, मामपुर बाना़,बीकेटी,लखनऊ।
जीसीआरजी मेमोरियल ट्रस्ट ग्रुप  ऑफ  इंस्टीट्यूशन्स,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
जीसीआरजी मेमोरियल ट्रस्ट ग्रुप  ऑफ  इंस्टीट्यूशन्स,फैकल्टी  ऑफ  मैनेजमेन्ट,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
जीसीआरजी मेमोरियल ट्रस्ट ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स,फैकल्टी आफ इंजीनियरिंग,सीतापुर रोड़,लखनऊ।
मोतीलाल रस्तोगी स्कूल ऑफ मैनेजमेन्ट,सरोजनी नगर,लखनऊ।
आर्यावर्त इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,रायबरेली रोड़,लखनऊ।
हाइजिया इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स एजूकेशन एण्ड रिसर्च,धैला रोड़,लखनऊ।
लखनऊ मॉडल इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट,मोहनलाल गंज,लखनऊ।
लखनऊ मॉडल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,मोहनलाल गंज,लखनऊ।
काकोरी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,बिस्मिल नगर,लखनऊ।
बंसल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी सीतापुर रोड़,लखनऊ।
एमजी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,बंथरा,लखनऊ।
भालचन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एण्ड मैनेजमेन्ट,हरदोई रोड़,लखनऊ।
गोयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड मैनेजमेन्ट,फैजाबाद रोड़,लखनऊ।
गोयल इंस्टीट्यूट ऑफ फॉमेसी एण्ड साइंसेज,फैजाबाद रोड़,लखनऊ।
श्री रामस्वरूप मेमारियल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड मैनेजमेन्ट,फैजाबाद रोड़,लखनऊ।
श्री रामस्वरूप मेमारियल कॉलेज ऑफ मैनेजमेन्ट,फैजाबाद रोड़,लखनऊ।
          जॉंच के पहले चरण में उपरोक्त 31 संस्थानों को चुना गया है। शिक्षा के नाम पर किये गये 7 अरब के इस घोटाले में तकनीकी एवं प्रबन्धन संस्थान सबसे आगे हैं। इनमें अनुसूचित जाति के युवकों के दस्तावेज इकठ्ठा करके केवल कागजों पर प्रवेश दिखा कर उनको मिलने वाली सहायता की लूट कर ली गई। ऐसे संस्थानों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं जनजाति एक्ट के तहत ही एफआईआर लिखकर कार्रवाई होनी चाहिए।
  इटावा,औरेया,मैनपुरी,बांदा,हमीरपुर,आदि जिलों के अनुसूचित जाति के युवकों के दस्तावेजों के आधार पर केवल कागजों में प्रवेश दिखाकर करोड़ों रूपये हड़प लिए गए। ऐसे छात्रों की शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति की राशि समाज कल्याण से अनियमित तरीके से प्राप्त कर ली गई,जिसमें निश्चित रूप् से समाज कल्याण विभाग की भी अहम भूमिका रही है। कॉलेजों ने समाज कल्याण से फर्जी तरीके से दो से आठ करोड़ रूपये तक निकाल लिए।
कॉलेजों ने जीबीटीयू में पंजीकृत छात्र संख्या और समाज कल्याण को शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के लिए भेजी गई सूची में भी हेराफेरी की। कॉलेजों ने फर्जी मार्कशीट बनाकर समाज कल्याण से धन लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आश्चर्य तो इस बात का है कि इनमें से पॉच लोग अखबार चलाने का भी धन्धा कर रहे हैं।
शासन ने बीस से अधिक प्रशासनिक अधिकारियों की टीम जॉच के लिए बनाई है तथा जॉच जिलाधिकारियों को सौंप दी गई है,तथा जॉंच के विभिन्न बिन्दुओं की गहन पड़ताल करने का निर्देश दिया गया है। इन सब कॉलेजों को पकड़ा जाना कोई कठिन कार्य नहीं है। कॉलेजों ने अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों का फर्जी प्रवेश प्रथम वर्ष में ही दिखाया होगा? क्योंकि जब वास्तव में छात्र हैं ही नही तो परीक्षा में कैसे शामिल हो सकते हैं,जिस वजह से दूसरे वर्ष में वे कैसे पहुंच सकते हैं? कॉलेज में प्रथम वर्ष में प्रवेशित विद्यार्थी(जीबीटीयू में पंजीकृत),परीक्षा में शामिल विद्यार्थीयों की संख्या और समाज कल्याण विभाग की शुल्क प्रतिपूर्ति एवं छात्रवृत्ति के लिए भेजी गई सूची की मिलान करके इस धोखाधड़ी को आसानी से उजागर करते हुए इनके प्रबन्धतंत्र के खिलाफ आईपीसी की धारा के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
कई कॉलेजों के जीटीबीयू में प्रथम वर्ष में पंजीकृत छात्र और समाज कल्याण विभाग को भेजी गई सूची में दर्शाए गए छात्रों की संख्या में बहुत बड़ा अन्तर है,और ऐसा समाचार-पत्रों का प्रकाशन करने वाले लोगों ने भी किया है। क्या समाचार-पत्र का प्रकाशन महज इसीलिए तो नहीं किया गया? इससे अधिक कोई जानकारी पाठक रखते हों तो कृपया jnnnine@gmail.com पर ईमेल करें।(सतीश प्रधान)

परमाणु बिजली से तौबा


          विश्व में जहॉं एक ओर विकासशील देश परमाणु ऊर्जा के लिए जीतोड़ गफलत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पूंर्ण रूप से विकसित जापान इस प्रकार की खतरनाक एटामिक पॉवर इनर्जी (परमाणु विद्युत ऊर्जा) से किनारा करने में लगा है। विश्वयुद्ध के दौरान अपने दो शहरों, हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमला झेल चुके जापान में परमाणु ऊर्जा का उत्पादन आज से धीर-धीरे कम होते हुए अतीत की बात हो जायेगी।
          जापान में ही पिछले साल फुकुशिमा परमाणु ऊर्जा सयंत्र से फैले विकिरण ने उपरोक्त दो शहरों पर हुई परमाणु तबाही को पुर्नजीवित कर दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि जापानी परमाणु ऊर्जा संस्थान होकाइदो इलेक्ट्रिक पॉवर कम्पनी ने जापान के आखिरी सक्रिय परमाणु रिएक्टर से विद्युत उत्पादन को 5 मई से बन्द करना शुरू कर दिया है। अपनी जनता के प्रति वफादार और शुभचिन्तक जापान ऐसा पहला देश बन गया है जो परमाणु क्षमता सम्पन्न होने के बावजूद उसके दुष्परिणामों से चिंतित होते हुए अब परमाणु ऊर्जा से मुक्त हो जायेगा। परमाणु ऊर्जा के उपयोग में जापान का दुनिया में तीसरा स्थान था। परमाणु ऊर्जा से अंतिम रूप से मुक्त होने की स्थिति 4 मई 1970 के बाद पहली बार आई है।
          1970 तक जापान में दो परमाणु ऊर्जा संयंत्र थे जिन्हें 4 मई 1970 को रखरखाव के लिए पॉंच दिनों तक बन्द रखा गया था। पिछले साल मार्च में जब भूकम्प और सुनामी के कारण फुकुशिमा परमाणु संयंत्र से रेडियोधर्मी रेज़ का रिसाव हुआ और विकिरण फैला तो भारी तबाही मची और जनता का परमाणु ऊर्जा से मोह भंग हो गया, जिसका असर वहॉं की सरकार पर पड़ा, और उसी कारण से होकाइदो इलेक्ट्रिक पॉवर कम्पनी ने ऐलान किया कि उसने शम पॉंच बजे से उत्तरी जापान स्थित तोमारी परमाणु संयंत्र की 912 मेगावाट की क्षमता वाली तीन नम्बर की इकाई से बिजली का उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार से उगते सूरज के देश में सभी 50 परमाणु रिएक्टरों से ऊर्जा उत्पादित करने के सूरज को अस्त कर दिया गया। (सतीश प्रधान)

Sunday, 15 April 2012

नज़ारा ऑखों का....रस्सी जल गई, ऐंठन नहीं गई

          लखनऊ 14 अप्रैल। उपरोक्त लोकोक्ति प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं सुश्री मायावती पर एक दम खरी उतरती है,क्योंकि आज भी वे जिस ठसके में चल रही हैं वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले किसी राजनेता की हो ही नही सकती। इसे तो विशुद्ध तानाशाही ही कहा जा सकता है जो लोकतंत्र को पैरों तले रौंद कर खड़ी होती है। चौदह अप्रैल को डा0 भीम राव अम्बेडकर की 121वीं जयन्ती पर गोमती नगर स्थित सामाजिक परिर्वतन स्थल पर अम्बेडकर की मूर्ति को श्रद्धांजली अर्पित करने हेतु बहुजन समाज पार्टी की ओर से मीडिया को एक ईमेल भेजा गया जिसमें प्रातः साढे 10 बजे बसपा की नेत्री सुश्री मायावती द्वारा श्रद्धांजली अर्पित किये जाने की कवरेज किये जाने का अनुरोध था।
          प्रातः 10:15 से ही पत्रकारगण सामाजिक परिर्वतन स्थल पर एकत्र हो गये लेकिन वह 10:15 की जगह 11:40 मिनट पर सामाजिक परिर्वतन स्थल की बजाय अम्बेडकर पार्क में पहुंची तथा वहॉ से सीधे हूटर और सॉयरन बजवाती हुई सामाजिक परिर्वतन स्थल पर बगैर रूके (जहॉ पर दो दर्जन से अधिक कैमरामैन और पत्रकार कवरेज के लिए इंतजार कर रहे थे) सीधे चली गर्इं। ऐसा नही है कि उन्हें अपनी गाडी में से पत्रकारगण दिखाई न दिये हों अथवा उनके साथ में चल रहे अन्य लोगों ने यह नज़ारा न देखा हो, लेकिन अपने दम्भ में लबालब भरी मायावती ऐसे नदारत हो गयीं कि एकत्रित लोगों को यह अन्तर उजागर करने पर मजबूर होना पडा कि देखिये एक वर्तमान का संस्कारवान और शालीन मुख्यमंत्री है जो बगैर किसी सायरन, बगैर किसी हूटर,बगैर चलते ट्रैफिक को रूकवाये बडी शालीनता से कार के अंदर से ही जनता को नमस्कार करते हुए गुजर जाता हैं वहीं दूसरी ओर इस प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती हैं,जिन्हें आम जनता (जिसमें उनके समाज के भी लोग हैं) से नफरत है, मीडिया से महानफरत और हूटर, सायरन, काले रंग के गाडी के शीशे, सिक्योरिटी के ताम-झाम से बेहद लगाव है। उन्हें 15 फिट उंची चाहारदीवारी से बेलाग मोहब्बत है, लेकिन खुले मैदान में आने में शर्म आती है।
          वर्तमान में उत्तर प्रदेश की बागडोर ऐसी शख्सियत के हाथ में है जो अपने को अकबर महान की श्रेणी में लाने की कोशिश कर रहा है। यह बात दीगर है कि उनके पास अभी नौ क्या बीरबल जैसा एक रत्न भी नहीं है। सुना तो है कि उनके पास आईआईएम की एक टीम है जो उन्हें सलाह देती है, लेकिन मेरे विश्लेषण के हिसाब से उनकी पूरी टीम में शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व हो जो उन्हें बेलाग, बेबाग, उचित और जनता के कल्याणार्थ सलाह दे पा रहा हो।
          मीडिया को सामाजिक परिर्वतन स्थल पर आमंत्रित करके नजरे़ छुपा कर भाग जाने का क्या औचित्य? मीडिया को क्या सुश्री मायावती अपना गुलाम समझती हैं कि पहुंचना हो 12 बजे और मीडिया को बुला लें 10:30 बजे। क्या इससे यह नही समझना चाहिए कि वे अभी भी सत्ता के नशे में हैं, जबकि उन्हें तो मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने जिस भी उॅचाई को प्राप्त किया है, उसके बेस में मीडिया की ही मेहरबानी है। यह बात दीगर है जब वह सत्ता में आर्इं तो मीडिया के उस वर्ग को भूल गर्इं जिसने उनकी जान बचाई थी और उस वर्ग को मलाई चट कराई जो उनके सचिव डा0 विजय शंकर पाण्डे और नवनीत सहगल के लगुए-भगुए थे।
          सामाजिक परिर्वतन स्थल से प्रातः11:47 पर लौटते वक्त कालीदास मार्ग का चक्कर लगाने का निर्णय इस उद्देश्य के साथ लिया गया कि देखा जाय कि मुख्यमंत्री के आवास के सामने वाली सड़क का क्या नज़ारा है। कालीदास मार्ग के मेन हाइटगेट से निकलते समय वहॉ की चेक पोस्ट पर बैठी पुलिस ने न तो रौबीले अंदाज में रोकने की कोशिश की और न ही तलाशी ली। आहिस्ता-आहिस्ता गाड़ी जब 5-कालीदास मार्ग की ओर बढ़ी तो दिखाई दिया,गरीबों की रहन सहन वाला एक दीन-हीन हुजूम जो पैदल ही उस रास्ते से गुज़र रहा था जो उसकी ही बहिन जी की सरकार में उस सड़क को देखने के लिए तरस गया था। उसी भीड़ में यह भी सुनाई दिया कि वाह! क्या मुख्यमंत्री है! कितनी सादगी से रहता है! एक अपनी बहिन जी रहीं, जो हम कभी भी इह सड़क पर आ ही नही पाये। बतावो हमरे लिए भी इह सडक बन्द रही। का मतलब बहिन जी के मुख्यमंत्री रहिन का?
          5-कालीदास मार्ग पर लगा सिक्योरिटी का कोई भी बंदा संगीन ताने,टेरर का माहौल उत्पन्न करते दिखाई नहीं दिया। इससे आगे बढ़ने पर 4-5 साइकिलों पर दूधिये अपने मस्त अंदाज में साइकिल पर दूध की केन लटकाये गुजरते दिखाई दिये। इन्हीं के पीछे पूरा मुंह ढ़के लेकिन केवल ऑखें खुली रखकर 2-3 लड़कियां पैदल ही बिना किसी भय के रास्ता पार करते दिखाई दीं। इस पूरे नजारे ने यह सिद्ध कर दिया कि उत्तर प्रदेश से कर्नल गद्दाफी का शासन खत्म हो गया है और वास्तव में सच्चा लोकतंत्र बहाल हो गया है।
The Security personnel deployed at the time of CM-Mayawati, now has been lifted by the succeeded CM-Akhilesh yadav
          इस सच्चे लोकतंत्र का सबसे बडा उदाहरण है मेरी कलम,जो आज सरपट दौड रही है,जिसकी स्याही सुश्री मायावती के शासन काल में पेन से बाहर आने में डरती थी। दो पत्रकारों को मायावती राज में प्रमुख सचिव रहे डा0 विजय शंकर पाण्डे ने ऐसा प्रताड़ित किया कि वे पूरे बसपा के शासन काल में सचिवालय तक में आने से घबराते रहे, बावजूद इसके कि उनके प्रवेश पर लगी रोक को माननीय हाईकोर्ट ने बदस्तूर चालू कर दिया था। उनका कहना था कि माननीय हाईकोर्ट के आदेश का क्या औचित्य रह जायेगा यदि डा0 विजय शंकर पाण्डे ने सचिवालय ऐनक्सी में हमारे प्रवेश करने पर आईपीसी की किसी दूसरी धारा में हमें जेल में बंद करा दिया! यह भी सत्य है कि इस पूरी घटना से सुश्री मायावती का कोई लेना देना नहीं था। इसके कर्ता-धर्ता थे घोड़ा व्यापारी और काले धन के सौदागर हसन अली के दोस्त डा0 विजय शंकर पांडे।
          एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष के ये वाक्य मेरे कान में अब भी गूंज रहे हैं कि जो मीडिया इमरजन्सी में नही डरा,वही मीडिया सुश्री मायावती की अघोषित इमरजेंसी में क्यों थर-थर कांप रहा था? इसका जवाब मैं कलम के माध्यम से अब दे रहा हॅू। दरअसल उस समय मीडिया इसलिए कांप रहा था क्योंकि मीडिया तो नौकर है अपने अधिष्ठान का, और अधिष्ठान है पूंजीपतियों के हाथ में, जिसने मीडिया में प्रवेश किया है, केवल मात्र अपने गोरखधंधे को बचाने के लिए, इससे फायदा कमाने के लिए और मीडिया का इस्तेमाल कर लाइजनिंग करते हुए अपना रसूख बढ़ाने के लिए। उस मालिक के अधीन कार्य करने वाले बहुतेरे पत्रकारों का अपना परिवार है,बाल हैं,बच्चे हैं,जिन पर न तो सरकार मेहरबानी करती है ना ही मालिक। इसलिए उनकी आवाज कैसे निकले। जो सुबह-शाम की दाल रोटी में ही परेशान हैं उसकी कैसी आवाज? और जिसकी सुबह शाम दारू और रंगीनियों में गुजर रही है उसकी आवाज ही कहॉ निकलती है,वो तो केवल बहकता है और गुलामी में ही जिन्दगी जीता है।
          यदि सरकारें मीडिया को चाटूकार ना बनाएं और चाटूकारों को अपने से दूर रखे तथा बिल्डर-माफिया, पूंजीपतियों के अखबारों एवं इलेक्ट्रानिक चैनलों को सरकारी मदद देना बंद कर दें तो उस सरकार को उसके द्वारा किये जा रहे कार्यौ की समीक्षा स्वयं मिल जायेगी और वह आसानी से जान जायेगी कि वह कितने पानी में है। वह झूठी प्रसंशा,झूठे आकडों और झूठे प्रचार से अपने को गढ्ढे में गिरने से निश्चित रूप से बचा ले जायेगी।
अभी-अभी पुनः बसपा के कार्यालय से उसके सचिव राम अवतार मित्तल की ओर से डा0 भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती पर 15 अप्रैल को जिला आगरा में खेरिया एयरपोर्ट के निकट धनौली मैदान पर आयोजित की जाने वाली रैली की कवरेज के लिए मीडिया को आमंत्रित किया गया है,यह बताते हुए कि इस कार्यक्रम में पूरे प्रदेश से पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी व प्रमुख कार्यकर्ता भाग लेंगे। अब इससे मीडिया को क्या लेना देना कि इसमें जिम्मेदार पदाधिकारी भाग लेंगे कि गैर जिम्मेदार? यदि बसपा की ओर से यह बताया जाता कि उसकी पार्टी के ये गैर जिम्मेदार पदाधिकारी हैं जो भाग नही लेंगे तो बात बनती। अब लखनऊ का मीडिया तो किस श्रद्धा से बसपा का कार्यक्रम कवर करेगा बसपा ही जाने,लेकिन आज से मैं तो मुंह पिटाने से रहा।
          अन्त में मेरी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को सलाह है कि वे अपने साथ नौ नही मात्र तीन रत्न ही ढूंढ़ कर रख लें तो निश्चित रूप से वह उत्तर प्रदेश पर अगले 25 वर्षो तक निरंतर राज करते रहेंगे। ये अतिश्योक्ति अथवा चमचागिरी में कहे गये शब्द नही है,अपितु क्रूड एनालिसिस और उनका व्यक्तित्व है जो उन्हें किसी भी उंचाई पर पहुंचने से रोक नहीं सकता, यदि उन्होंने अपनी कार्यशैली में इसी तरह इजाफा किया तो। (सतीश प्रधान)

Sunday, 4 March 2012

अंर्तराष्ट्रीय मूल्य के बराबर क्यों नहीं भारत में कोयले का मूल्य?


          देश के शीर्ष उघोगपतियों ने भारत की जनता को घुप्प अंधेरे में देखकर और उनके हाल पर द्रवित होते हुए तथाकथित जाने-माने अर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह से व्यक्तिगत रूप से मिलकर भारत के ऊर्जा संकट को दूर करने की गुहार लगाई है। विश्व के कैक्टस, विश्व बैंक ने भी स्वंय तैयार एक अध्ययन के माध्यम से ऊर्जा की उपलब्धता को भारत देश के विकास में एक प्रमुख बाधा बताते हुए उसकी रिर्पोट प्रस्तुत की है। दरअसल ये सारे प्रयास अमीर को और अधिक अमीर बनाने तथा गरीब को और अधिक गरीब बनाने के, चतुराई पूर्वक खेले गये नुस्खे भर हैं। सच्चाई को एक किनारे करते हुए केवल अपने मुनाफे को दिन-प्रतिदिन बढ़ाने की जुगत में लगा रहने वाला प्रत्येक उद्योगपति हर समय अपने फायदे की ही बात सोचता है। वह गरीबों को बिजली मुहैय्या कराने के लिए परेशान नहीं है, बल्कि वह बिजली उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले कोयले के घरेलू उत्पादन और उसके मूल्य को सस्ता रखने के लिए बेहाल है।
          दरअसल उघोगपति बिजली का अधिक से अधिक उत्पादन करने के उत्सुक तो हैं, लेकिन सस्ते भारतीय कोयले से ही बिजली के उत्पादन की शर्त पर। वे चाहते हैं कि उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं, दोनों को लाभ हो, इसलिए उन्होंने फॉर्मूला ढ़ूंढा है कि कोयले का दाम सस्ता रहे तो बिजली का दाम कम होने पर भी उत्पादक लाभ कमा सकेंगे और उपभोक्ता को सस्ती बिजली मिल जायेगी। इसलिए उद्यमियों की मांग है कि कोल इण्डिया द्वारा कोयले के उत्पादन में वृद्धि की जाये और उन्हें सस्ते एवं सबसिडाइज्ड रेट पर कोयला उपलब्ध कराया जाये।
          भारत की 122 करोड़ जनता को पश्चिमी देशों की वर्तमान खपत के बराबर बिजली उपलब्ध कराना भारत की सरकारों के लिए आसान नहीं है, वह भी ऐसे हालात में जबकि इस देश में जिस गॉंव से एक किलोमीटर दूर से भी यदि बिजली का हाईटेंशन केबिल गुजर गया तो वह पूरा गॉंव का गॉंव ही विद्युतीकृत मान लिया जाता है। इसी से आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि इस देश के अधिकतर गॉंवों के हालात कैसे हो सकते हैं। ऐसे ही निरीह लोगों की खातिर, एक अकेले अपने घर का 76 लाख प्रतिमाह का बिजली का बिल देने वाला हमारा उद्योग जगत गम्भीर रूप से चिंतित है और भारत की जनता को सस्ते में बिजली मुहैय्या कराने का बेसब्री से इच्छुक है। जैसे जनहित के नाम पर निरीह किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहण के माध्यम से जबरन छीनी जाती है, ठीक उसी प्रकार उनको सस्ते में खाद्यान्न, बिजली, गैस, केरोसिन आयल आदि दिये जाने के नाम पर उन्हें छलने की योजना सलीके से बनाई जाती है।
          सोचनीय प्रश्न यह उठता है कि कोल इण्डिया पर कोयले के घरेलू उत्पादन के लिए इतना जबरदस्त दबाव क्यों? यदि घरेलू उत्पादन कम है तो कोयले का आयात किया जाये, इसमें क्या परेशानी है? उद्यमियों की मांग कुटिलता से भरी, नाजायज और जनता को ठगने वाली ही दिखाई देती है। इन्हें पता है कि धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, फिर भी उनका अंधाधुन्ध दोहन करने के लिए ये उतावले  हैं,  जो भविष्य में निश्चित रूप से भारी संकट पैदा करेगा। इसलिए कोयले, तेल एवं यूरेनियम का दाम बढ़ाकर ऊर्जा की खपत पर अंकुश लगाना ही भारत देश के हित में ही नहीं है, बल्कि जनहित में है। वरना भविश्य की पीढी के लिए हम धरती को खोखला छोड़ने के अलावा और कुछ नहीं दे पायेंगे।
          जबकि दूसरी ओर हमारी संस्कृति यह है कि हम अपने बच्चों क्या पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए इतना छोड़कर मरना चाहते हैं कि उन्हें कुछ करना ही ना पडे़ और वे चैन से बैठे-बैठे खायें। अरबों-खरबों की काली कमाई, सैकड़ों मन चांदी, सैकड़ों किलो सोना, हीरे-जवाहरात, बंगले, कोठी और फार्म हाऊस, और ना जाने क्या-क्या! अपनी आस-औलाद के नाम करने के बाद भी मन नहीं भरता रूकने का। लेकिन किस कीमत पर यह तय नहीं कर पाये हैं, क्योंकि उतना सोचने की इनकी शक्ति ही नहीं है। अमीर केवल गरीब की रोटी छीनकर अपनी तिजोरी भरने में ही लगा हुआ है। वह विश्व का नम्बर एक अमीर होने की ललक में वह सब भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार करने को तैयार है, जिसका परिणाम भले ही उसे सुख-चैन से ना रहने दे।
          आर्थिक विकास का मतलब उत्पादन और खपत में वृद्धि होता है, जिसके लिए ऊर्जा की अधिक जरूरत होती है। पृथ्वी की ऊर्जा पैदा करने की शक्ति सीमित है, इसलिए हमें कम ऊर्जा से अधिक उत्पादन के रास्ते पर चलना होगा। प्रत्येक देश के लिए जरूरी होता है कि वह अपने देश में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप ही उत्पादन करे। जिन देशों में पानी की कमी है, उन देशों में अंगूर और गन्ने की फसल उगाना बेवकूफी है। इसीलिए सऊदी अरब, तेल के निर्यात से विकास कर रहा है। इसी प्रकार भारत को पश्चिमी देशों के ऊर्जा मॉडल को अपनाना निहायत ही बेवकूफी भरा प्रश्न है। ऊर्जा के उत्पादन के लिए हमें अपने संसाधनों पर नज़र डालते हुए उसके विकल्प के उपाय सोचने होंगे, हम जापान की नकल नहीं कर सकते।

          इन्दिरा गॉंधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेन्ट रिसर्च, मुम्बई के एक अध्ययन में पाया गया है कि ऊर्जा की खपत तथा आर्थिक विकास में सम्बन्ध नहीं दिखाई देता। इसी अध्ययन में निष्कर्ष निकला है कि आर्थिक विकास से ऊर्जा की खपत बढ़ती है और यह सम्बन्ध एक दिशा में चलता है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा संरक्षण के कदमों का आर्थिक विकास पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा, यानी ऊर्जा की खपत कम होने पर भी आर्थिक विकास प्रभावित नहीं होगा। आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा का महत्व कम होने का कारण है, सेवा क्षेत्र का विस्तार। भारत की आय में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 1971 में 32 फीसदी से बढ़कर 2006 में 54 फीसदी हो गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस 54 फीसदी आय को अर्जित करने में देश की केवल 8 फीसदी ऊर्जा ही लगी। सॉफ्टवेयर, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, सिनेमा इत्यादि में ऊर्जा कम लगती है।
          इसलिए ऊर्जा संकट से निपटने का सीधा हल है कि हम ऊर्जा सघन उद्योगों जैसे स्टील एवंएल्यूमीनियम के उत्पादन को निरूत्साहित करें। सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने तथा देश में भरपूर गन्ने की फसल होने के कारण उसकी खोई से बिजली पैदा करने के संयंत्रों को प्रोत्साहित करें और उस बिजली के वितरण की व्यवस्था सरकार सुनिश्चित कराये। गन्ने की खोई से बनायी जाने वाली विद्युत से उस पूरे शहर की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है जहॉंपर इसका उत्पादन किया जाये। इस पर यदि सरकारें कार्य करें तो मेरा दावा है कि ऊर्जा संकट को ऊर्जा की अधिकता में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी प्रकार मोटे अनाजों की पैदावार को बढ़ाने के उपाय किये जाये जिसमें कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
          देश के उद्योगपतियों की पीड़ा में एक गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। असल विषय ऊर्जा के मूल्य का है। बिजली मंहगी होती है तो बिजली उत्पादित करने वाले उद्यमियों को लाभ, किन्तु खपत करने वाले उद्यमियों को हानि होती है। इसके विपरीत बिजली का दाम कम रखा जाता है तो उत्पादकों को हानि एवं उपभोक्ताओं को लाभ होता है, चूंकि हमारे उद्यमी सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की परिभाषा पर अमल करते हैं इसलिए चाहते हैं कि उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं दोनों को ही लाभ हो। इसका फॉर्मूला उन्होंने पी0एम0 को सुझाया है कि कोयले का दाम सस्ता रहे तो बिजली का दाम कम होने पर भी उत्पादक लाभ कमा सकेंगे और उपभोक्ता को सस्ती बिजली मिल जाएगी, इसीलिए वे कोयले के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं।
          ऊर्जा के संकट से इस तरह भी आसानी निपटा जा सकता है। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के अनुसार 2004 से 2012 के बीच बिजली की घरेलू खपत में 7.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है जबकि सिंचाई, उद्योग तथा कामर्शियल के लिए बिजली की खपत में मात्र 2.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब हुआ कि बिजली की जरूरत फ्रिज और एयर कंडीशनर चलाने के लिए ज्यादा और उत्पादन के लिए कम है। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि देश के आर्थिक विकास के लिए बिजली का उत्पादन बढ़ाना कोई अपरिहार्य चुनौती नहीं है।
          क्रूर सच्चाई यह है कि बिजली की जरूरत मध्यम एवं उच्च वर्ग की विलासितापूर्णं जिन्दगी जीने के लिए अधिक है। शीर्श उद्योगपति मुकेश भाई अम्बानी के घर का मासिक बिजली का बिल ही 76 लाख रूपये से कम का नहीं आता है। दिल्ली की कोठियों में चार व्यक्ति के परिवार का मासिक बिजली का बिल 50,000 होना सामान्य सी बात हो गई है। चार व्यक्तियों के परिवार में आठ-आठ कारें हैं जो प्रतिदिन सैकड़ों लीटर पैट्रोल फूंकती हैं। इस प्रकार की ऊर्जा की बर्बादी के  लिए सस्ता घरेलू कोयला उपलब्ध कराकर पोषित करना कौन सी बुद्धिमानी एवं देशहित में है?
          गरीबों को बिजली उपलब्ध कराने के नाम पर हम बिजली का उत्पादन बढ़ा रहे हैं और उत्पादित बिजली को उच्च वर्ग के ऐशोआराम के लिए सस्ते में उपलब्ध करा रहे हैं। गरीब के गॉंव से एक किलोमीटर दूर से भी यदि बिजली का तार चला गया तो उस पूरे गॉंव को ही विद्युतीकृत मान लेने की परिभाषा सरकार ने आखिरकार क्यों गढ़ी हुई है। उच्च वर्ग के बिजली उपभोग पर अंकुश लगाने की कवायद क्यों नहीं की जा रही है? यदि उत्पादित बिजली का 25 प्रतिशत हिस्सा गॉंव के उपभोग के लिए सुरक्षित कर दिया जाये तो देश के हर घर में बिजली उपलब्ध हो जायेगी, यह मेरा दावा है।
          मेरा सुझाव है कि तुरन्त कोयले का दाम बढ़ाकर अन्र्तराष्ट्रीय मूल्य के बराबर कर देना चाहिए। आर्थिक विकास के लिए हमें सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना होगा। ऊर्जा सघन उद्योगों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसी के साथ उत्पादित बिजली के दाम भी मध्यम (जिनकी प्रतिमाह बिजली की खपत 1000 यूनिट से अधिक है) एवं उच्च वर्ग के लिए बढ़ा दिये जाने चाहिए, जिससे उत्पादक कम्पनियों को लाभ हो तथा खपत पर अंकुश लगे। उत्पादित बिजली का 25 प्रतिशत गॉव की जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सस्ते मूल्य पर दिया जाना चाहिए। गन्ने की खोई से बिजली उत्पादन की यूनिटों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उनके द्वारा उत्पादित बिजली की वितरण व्यवस्था बिजली निगम को संभालनी चाहिए। इसी के साथ 1000 यूनिट प्रतिमाह से अधिक खर्च करने पर प्रति यूनिट 25 रूपये तथा 1000 यूनिट से 2500 यूनिट प्रतिमाह खर्च करने वाले से 50 रूपये प्रति यूनिट एवं इससे ऊपर उपभोग करने वाले से 100 रूपया प्रति यूनिट चार्ज किया जाना चाहिए। (सतीश प्रधान)


Monday, 20 February 2012

भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार

          भारत में जमीन की रजिस्ट्री, खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, जिन्दा को मृतक दर्शाकर उसकी भूमि हड़पने (वर्ष 2009 तक अकेले उ0प्र0 में सम्पत्ति हड़पने के लिए राजस्व विभाग के अभिलेखों में 221 कृषकों को जिन्दा रहते मृत दिखाया गया) तथा विरासत दर्ज करने के साथ-साथ भूमि के अधिग्रहण में हर वर्ष हजारों करोड़ रूपयों की भारी भरकम रकम घूस के रूप में सरकार, सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। ध्यान रहे ये जमीनें यहॉं की जनता की अपनी पुश्तैनी हैं। जिन पुश्तैनी जमीनों को जनहित के नाम पर सरकारें, कानून की आड़ में पुलिस के बल पर जबरन अधिग्रहीत कर उसके उपयोग को लैण्ड यूज के माध्यम से रिहायशी, कामर्शियल, औद्योगिक एवं पर्यटन करके भूमि अधिग्रहण का खेल, खेल रही हैं, उनमें करोड़ों रूपयों का वारा न्यारा हो रहा है।
          स्ंयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन, एफ0ए0ओ0 (फूड एण्ड एग्रीकल्चर आरगेनाइजेशन) एवं ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल ने मिलकर एक अध्ययन किया है, जिसमें भारत में जमीन की रजिस्ट्री, उसकी नकल आदि में ही 3700 करोड़ की रिश्वत सरकारी अधिकारियों द्वारा लिये जाने का निष्कर्ष निकाला गया है। दोनों संगठनों ने संयुक्त रूप से भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक अध्ययन रिर्पोट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि कमजोर प्रशासन की वजह से जमीन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। इस अध्ययन के अनुसार जमीन सम्बन्धी मामलों में भ्रष्टाचार देश के विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। यह अध्ययन 61 देशों में किया गया है तथा अध्ययन के मुताबिक जमीन को लेकर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार छोटी-छोटी रिश्वत के रूप में विद्यमान है। वहीं दूसरी ओर ऊंचे स्तर पर सरकारी ताकत, राजनीतिक रूतबे और कार्पोरेट अर्थतन्त्र के गठजोड के कारण, यह बहुत बड़े स्कैम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
          सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों को कार्पोरेट घराने जमीन हथियाने या कहिए अपना बहुत बड़ा लैण्ड बैंक बनाने के लिए उन्हें मूंह मांगी रिश्वत और सुरा-सुन्दरी की सुविधा देकर अपने मन मुताबिक नचा रहे हैं। अंर्तराष्ट्रीय स्तर की इन दो बड़ी संस्थाओं ने जमीन से जुड़े इस सबसे बड़े सच पर पर्दा डालने का काम क्यों किया आश्चर्य का विषय है! अध्ययन के माध्यम से घूस की जिस रकम का खुलासा किया गया है, उसका वास्तविकता से कोसों दूर का भी नाता नहीं है। यह रकम 70 करोड़ डॉलर बताई गई है, जबकि यह असली घूस 34500 करोड़ रूपये का पसंगा भी नहीं है।
          भारत के ही एक राज्य में केवल भू-अधिग्रहण मामले में ही 70 करोड़ डॉलर से दस गुना अधिक यानी 34500 करोड़ रूपये, सरकार, सरकारी प्रशासनिक अधिकारियों यथा भूमि अध्याप्ति अधिकारी, ए0डी0एम0, जिलाधिकारी, आयुक्त, सचिव, तथा राजस्व से जुड़े अधिकारियों यथा तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल के साथ ही राजनीतिक व्यक्तियों को रिश्वत के रूप में दी गई है, जिसमें राजनीति के निचले पायदान पर बैठा ग्राम प्रधान भी भरपूर लाभान्वित हुआ है। पंचायत-पंचायत, ब्लॉक-ब्लॉक, तहसील-तहसील, परगना-परगना, जिला-जिला भारतीय भूमिधरों को गिरोहबन्द तरीके से लूटा गया है। उनकी पुश्तैनी जमीन पर राजस्व से जुड़े अधिकारियों ने गिद्ध दृष्टि लगाकर उनका दोहन किया है। इन सबके बीच अभी चकबन्दी विभाग की चर्चा होना बाकी है।
          देश को स्वतन्त्र हुए 64 वर्ष हो गये लेकिन क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि अभीतक उत्तर प्रदेश में चकबन्दी ही पूरी नहीं हो पाई है। क्या यह दुर्भाग्य अथवा लूट का विषय नहीं है कि आजतक चकबन्दी विभाग बदस्तूर चालू है। लूट के दम पर खड़ा यह विभाग आजतक मजे मारते हुए मलाई काट रहा है। सहायक चकबन्दी अधिकारी स्तर के कई कर्मचारी करोड़पति हैं। जनता की सहूलियत के लिए बनाया गया यह विभाग जनता के लिए लुटेरा बन चुका है। दोनों संगठनों ने ऐसा अध्ययन 61 देशों में किया जाना बताया है, जिसमें भारत भी एक है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों से ऐसे लचर अध्ययन की उम्मीद नहीं की जाती है। इन संस्थानों ने या तो अध्ययन ही लचर तरीके से किया अथवा उसकी रिर्पोट प्रस्तुत करने में गोल-माल कर दिया। या जिन संस्थाओं/एन0जी0ओ0 के माध्यम से इसका अध्ययन कराया गया उनको राजस्व विभाग और यहॉं के किसानों/भू-मालिकों की तकलीफ का अन्दाजा ही नहीं था। उन्हें शायद पता ही नहीं कि राजस्व विभाग का एक अदना सा कर्मचारी लेखपाल, किसी जागीरदार से कम नहीं है।
          भारत की जमीन का एक-एक इंच टुकड़ा, बगैर लेखपाल की सहमति के आप इधर से ऊधर नहीं कर सकते। भारत का सुप्रीम कोर्ट और राजस्व अधिनियम चिल्ला-चिल्ला कर कुछ भी कहते हों, लेकिन वह नियम के हिसाब से तभी काम करेगा जब उसकी जेब गरम हो जायेगी। खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, और वसीयत दर्ज कराने एवं जमीन की रजिस्ट्री कराने में कई हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष सरकारी कर्मचारियों की जेब में चले जाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्व विभाग के इन अदने से कर्मचारियों (लेखपाल) के पास सैकड़ों बीघे के फार्म हाऊस के साथ ही करोड़ों रूपये के बैंक बैलेन्स हैं।
          अध्ययन में यह बताया गया है कि जमीन सम्बन्धी भ्रष्टाचार भारत तक ही सीमित नहीं है, यह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ऐसा अध्ययन भारत के लिए किसने किया और किस स्टेट एवं जनपद में किया गया पता नहीं। हिन्दुस्तान में सारा खेल जमीन का ही है। यह हिन्दुस्तान ही है, जहॉं मुस्लिमों ने 700 वर्षों तक शासन किया और उसके बाद अंग्रेजों ने 200  वर्षों  तक शासन किया। इसके बाद देश स्वतन्त्र हुआ और यहीं के तथाकथित गोरे दिखने वाले दिल के कालों के हांथ में अंग्रेजों ने सत्ता सौंप दी। असली काला तो गोली खाकर हे-राम हो गया और गोरे से दिखने वाले कालों ने यहॉं के राजाओं का प्रीवीपर्स छीन लिया। 543 इस्टेट 543 संसदीय क्षेत्र में तब्दील हो गये। राजाओं की जगह सांसद आ गये और बस बन गया झमाझम लोकतन्त्र।
          राजाओं को सरवाइव करने के लिए अपनी जमीनें बेंचनी पड़ रही हैं। धीरे-धीरे विकास के नाम पर यहॉं की जनता की एवं राजाओं की जमीनें इन नये पैदा हो रहे सांसदों, ब्यूरोक्रेट्स और कार्पोरेट घरानों के हांथ में आना शुरू हो गईं। असली राजाओं का वंश तबाह होने लगा और नकली राजाओं की फौज खड़ी होने लगी। वाजिदअली शाह के खान्दानी चाय बेचने लगे और चाय बेचने वालों के खान्दानी एवं नहर के किनारे से सत्ता में आये लोग विकास के नाम पर लूट मचाकर विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने लगे।
          आज की तारीख में सत्ता से जुड़ा कौन सा ऐसा सांसद है जिसकी हैसियत किसी राजा से कम है। केवल घड़ी का डायल बदला है, अन्दर खाने वही 35 रूपये वाली मशीन लगी है जो आपके हांथ की घड़ी भी चला देगी और घंटाघर की घड़ी भी। क्या इन दोनों ऐजेन्सियों का संयुक्त अध्ययन एक औपचारिकता तो नहीं थी? अध्ययन किसी और मकसद की पूर्ति के लिए किया गया और परिणाम कुछ और दिखाया गया है।
          एफ0ए0ओ0 के अध्ययन में तो यह स्पष्ट रूप से आना ही चाहिए था कि पहले कितने हेक्टेयर पर कृषि होती थी और वर्तमान में कितने हेक्टेयर क्षेत्र पर कृषि हो रही है। कौन-कौन सी पैदावार की कमी आ गई है। कौन सी फसल नदारत हो गई है, और किसकी पैदावार बढ़ गई है। पूर्व में उत्पादन कितना था और अब कितना रह गया है। कृषि क्षेत्र कितना सिकुड़ गया है, आदि-आदि। खाद्यान्न जो भी पैदा होता है, गोदामों की कमी, ऊंचे परिवहन भाड़े के कारण या तो खपत की जगह तक ही नहीं पहुंच पाता अथवा एफ0सी0आई0 के गोदामों में सड़ा दिया जाता है । व्यक्ति और खाद्यान्न के बीच के गैप को पूरा करने के लिए मंत्रीगण आयात का रास्ता खोलते हैं और करोड़ों डॉलर खर्च दिखाकर उसका कमीशन विदेशी बैंकों में जमा करा देते हैं। ऐसे ही कालेधन को भारत में लाने की मांग हो रही है।(सतीश प्रधान)

Saturday, 18 February 2012

ऐलोपैथ के दम का नहीं, सब कुछ

          सोनिया गॉंधी द्वारा अपरोक्ष रूप से संचालित मनमोहन सरकार जहॉं एक ओर बाबा रामदेव को परेशान करके उन्हें बेइज्जत करने और उन्हें बदनाम करने का कोई मौका न चूकने का प्रयत्न करती है, वहीं दूसरी ओर भारत का केन्द्रीय योजना आयोग, आयुर्वेद एवं योग गुरू बाबा रामदेव के गुणों एवं उनकी गहन जानकारी का इस्तेमाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में करना चाहता है। इसीलिए वह चाहता है कि भारत की सरकार योग गुरू बाबा रामदेव की ओर दोस्ती का हांथ बढ़ाए।
          योजना आयोग ने स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसी कई सिफारिशें की हैं। उसने ऐलोपैथ डॉक्टरों को भी आयुर्वेद और योग के नुस्खे पढ़ाने को बेहद जरूरी बताया है। कहावत है कि जब जागो तभी सवेरा, इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि चलिए देर से ही सही, योजना आयोग को यह सोचने पर मजबूर तो होना पड़ा कि आयुर्वेद और योग हमारी थाती हैं और इससे किसी भी तरह की बीमारी से आसानी से एवं बगैर किसी साइड इफैक्ट के पार पाया जा सकता है। आयुर्वेद हो अथवा होम्योपैथी, इनमें सर्जरी की आवश्यकता ही नहीं होती, इसीलिए बगैर सर्जरी इसके द्वारा सम्पूर्ण इलाज सम्भव है। सर्जरी की आवश्यकता ऐलोपैथ में होती है, इनमें नहीं।
          ऐलोपैथी में सर्जरी की व्यवस्था के ही कारण मानवअंग तस्करी जोर-शोर से फलफूल रही है। आज के समय में किसी की भी किडनी निकाल लेना कोई बड़ी बात नहीं है। अभी हाल ही में ऐसा मामला लखनऊ में पकड़ा गया है जहॉं बिल्कुल बेवकूफ बनाकर कई लोगों की किडनी निकाल ली गई। नोएडा का बहुचर्चित निठारी काण्ड भी इसी का नतीजा था, लेकिन इसके तस्कर देश के समाने नहीं लाये गये, क्योंकि वे नामचीन लोग थे।
          योजना आयोग की स्वास्थ्य सम्बन्धी संचालन समिति ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हर हिन्दुस्तानी तक इलाज के साधनों को मुहैय्या करवाना बेहद जरूरी बताया है। उसने सारे तथ्य एकत्र कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सिर्फ ऐलोपैथी के दम पर यह काम पूरा किया जाना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। इस लिहाज से आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी जैसी इलाज की विधियों की अधिक से अधिक मदद ली जानी चाहिए। अपनी सिफारिश में उसने पारम्परिक चिकित्सा पद्वतियों में काम कर रहे बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ जैसे गैर-सरकारी संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए इनकी मदद करने को बेहद जरूरी बताया है। सरकार के लिए बाबा रामदेव जैसे योग और आयुर्वेद के गुरूओं की मदद लेना क्यों जरूरी बताया गया है, इस विषय पर आयोग के एक सदस्य का कहना है कि सरकार खुद ही दवा बनाने की विधि तय करे, फिर दवा बनाए, इसके बाद सभी तक इसे पहुचाए और फिर उस पर नज़र भी रखे यह एक तो मुमकिन नहीं, दूसरे यह सरकार का काम भी नहीं है।
          इसी पर मेरा मानना है कि सरकार का काम न तो किसी चीज का उत्पादन करना है, ना ही उसकी मार्केटिंग करना है, ना ही उसका वितरण करना। सरकार का काम तो जनहितकारी नीति बनाना और उसका पालन सुनिश्चित कराना होता है। सरकारें यदि लाभ कमाने के फेर में लग जायेंगी तो हो गया कल्याण! सारे सरकारी निगम इसीलिए बन्दी के कगार पर, जबरदस्त घाटे में और दुखदायी हो गये कि उसमें बैठे सरकारी अधिकारी और उसे देखने वाले मंत्री अपने-अपने लाभ के लिए उस निगम का दोहन करने लगे।
          योजना आयोग से पहली बार ऐसी कोई सिफारिश बाहर आई है, जिससे लगता है कि वास्तव में योजना आयोग यहॉं की जनता के स्वास्थ्य के प्रति फिकरमन्द है। उसका कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन बाबा रामदेव जैसे कुछ संगठनों और लोगों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। उसका मानना कि इस सिफारिश की पूर्ति के लिए आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों को आगे बढ़ाना ही होगा।
          इसी के साथ योजना आयोग चाहता है कि ऐलोपैथ के डॉक्टर अब योग और आयुर्वेद से नाक-भौं सिकोड़ना बन्द कर खुद भी अपने मरीजों पर इन्हें आजमाएं। आयोग ने साफ तौर पर सिफारिश की है कि ऐलोपैथी चिकित्सा के एमबीबीएस पाट्यक्रम में योग और आयुर्वेद को भी शामिल किया जाये। योजना आयोग के अनुसार आयुर्वेद, योग, यूनानी, और होम्योपैथी जैसी पद्वतियों को शामिल करते हुए अनिवार्य स्वास्थ्य पैकेज और लोक स्वास्थ्य के आदर्श माड्यूल तैयार किए जाएं और उन्हें इन पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाये।
प्रतिष्ठित सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों का हवाला देते हुए उसने कहा है कि एम्स जैसे अस्पतालों में भी आयुर्वेद और योगा जैसी पद्वतियों के विशेषज्ञों को जरूर शामिल किया जाये। इलाज के साथ ही गम्भीर बीमारियों के मामले में उसके बाद की देख-भाल के लिए भी इसे जरूरी बताया है। वर्तमान में भारत में पारम्परिक चिकित्सा पद्वति के 7.87 लाख डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं। देशभर में ऐसे 3277 अस्पताल, 24289 दवाखाने, 489 कॉलेज और 8644 दवा निर्माण इकाईयां चल रही हैं।
          अन्त में आपको ऐसे आयुर्वेद विशेषज्ञ चिकित्सक के बारे में संक्षेप में बता दूं, जिन्होंने अपनी योग्यता, अनुभव एवं हुनर के बल पर किंग जार्ज मेडीकल कॉलेज और संजय गॉंधी आर्युविज्ञान संस्थान से कैन्सर एवं अन्य गम्भीर बीमारी से ग्रस्त ऐसे मरीजों (अन्तिम समय में यह कहकर लौटाये गये मरीज कि अब इन्हें घर ले जाइये और ऊपर वाले को याद कीजिए) को जिनका अन्त समय निकट था, आयुर्वेद चिकित्सा पद्वति के बल पर न केवल उनके जीवन को आगे बढ़ाया बल्कि उन्हें ठीक भी किया है। उनके इसी प्रयास पर आर्युविज्ञान संस्थान के महानिदेशक उनसे मिलने और उन्हें धन्यवाद देने उनके घर तक गये। ऐसे महान आयुर्वेद चिकित्सक के बारे में पूरी पोस्ट अलग से प्रस्तुत की जायेगी, जिससे गम्भीर बीमारी से जूझ रहे मरीजगण उसका लाभ उठा सकें। (सतीश प्रधान)

Friday, 17 February 2012

क्लीनिकल परीक्षण का फॉलोअप

          दिनांक 5 फरवरी 2012 को ’ऐसे डॉक्टर और केमिस्ट दोनों ठग’ शीषर्क की पोस्ट में आपने पढ़ा कि कैसे हिन्दुस्तान में दवाओं का परीक्षण बिना किसी हिचक व रोक-टोक के यहॉं के चिकित्सालयों, मेडीकल रिसर्च सेन्टर्स, पी0जी0आई0 आदि में किया जा रहा है, जिसमें कितने ही हजार लोगों की जान बगैर यह जाने चली गई कि उनके शरीर के साथ बिना उनकी सहमति के दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। इसी बिना पर तथ्यों पर आधारित एक जनहित याचिका गैर सरकारी संगठन स्वास्थ्य अधिकार मंच ने वकील संजय पारिख के माध्यम से भारत के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर मांग की है, कि आम लोगों पर दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण पर रोक लगाई जाये साथ ही परीक्षण सम्बन्धी नियम कानूनों को चाक चैबन्द करने पर भी जोर दिया जाये।
          संजय पारिख का कहना था कि बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियां ठेके पर रिसर्च कम्पनियों से ये काम कराती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1727 लोगों की ऐसे परीक्षणों से मौत हो चुकी है। ऐसा खेल सिर्फ इन्दौर में ही नहीं अपितू ये पूरे देश में चल रहा है। दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण के लिए भारत के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश राज्य में पिछले साल जून में पूरी हुई राज्य सरकार की जॉंच में यह साबित हो चुका है कि सिर्फ इसी मामले में 3307 लोगों पर ऐसे परीक्षण गैर कानूनी रूप से किये गये। इनमें से 81 मरीजों को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कई मामलों में तो पाया गया कि मुख्य शोधकर्ता ही एथिकल कमेटी के सदस्य भी थे। परीक्षण के लिए भारत में वर्ष 1945 से जो नियम चल रहे थे, उन्हें जनवरी 2005 में बदल कर कम्पनियों के लिए आसान कर दिया गया।
          दरअसल ये बदलाव किया ही गया था इन कम्पनियों के दवाब में। इसके तहत भारत में पहले और दूसरे फेज के परीक्षण काफी आसान कर दिये गये। इसके बाद से सारी दवा कम्पनियों ने परीक्षणों के लिए भारत का रूख कर लिया, क्योंकि यहॉं पर आम आदमी की जान की कीमत बहुत सस्ती और कभी-कभी तो एकदम मुफ्त की होती है। नई दवा मूल रूप से जहॉं खोजी गई होती है, वहॉं या तो उसका क्लीनिकल परीक्षण करने की इजाजत नहीं होती, या फिर यह काम बहुत मंहगा होता है। वैसे तो नियमों में यह प्राविधान होना चाहिए कि केवल भारत में खोजी गई दवाओं के ही क्लीनिकल परीक्षण भारत में होंगे। विदेश में खोजी गई दवा का परीक्षण भारत में किये जाने का क्या औचित्य? लेकिन पता नहीं कि याचिका में इस सम्बन्ध में मांग की गई है अथवा नहीं। याचिका पर सज्ञान लेते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और मेडीकल काउन्सिल ऑफ इण्डिया को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में याचिका का जवाब दाखिल करने को कहा है। देखना शेष है कि अब होता क्या है। (सतीश प्रधान)





Sunday, 12 February 2012

ब्रिटिश लुटेरे

          ब्रिटेन में भारतीय मूल के निवासियों को निशाने पर रखते हुए उनके घरों में सोने की लूट के वास्ते सेंधमारी की जा रही है। दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप के लोग अपनी रूढ़िवादी परम्परा को संजोये हुए, आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए सोना बचाकर रखते हैं। सोने का संग्रहण ही भारतीयों के लिए मुसीबत बन गया है। ब्रिटेन में हथियारबन्द ब्रिटिश लुटेरे मैटल डिटेक्टर के साथ वहॉं बसे भारतीय मूल के निवासियों के घरों में सेंधमारी करके सबकुछ लूटे ले रहे हैं।
          एशियाई मूल के लोगों के घरों में सेंधमारी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए ब्रिटेन की पुलिस ने उन इलाकों में विशेष जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय किया है, जहॉं भारतीय उप महाद्वीप के लोग अधिक संख्या में रहते हैं। भारतीय मूल के लोग बर्मिघम, स्लॉज, ईलिंग, लीसेस्टर, मैनचेस्टर, और ब्रेडफोर्ड में रहते हैं, इसीलिए यह अभियान विशेष तौर पर यहीं चलाया जा रहा है। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही है। ब्रिटेन में मन्दी के बावजूद सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, इसी कारण सेंधमार सोने की चोरी को अंजाम दे रहे हैं।
          सोने की रीसेल वैल्यू चूँकि अच्छी है और निशाने पर भारतीय मूल के ही लोग हैं, इसी कारण अपराधियों को भी पता है कि उनके साथ उनकी पुलिस कड़ाई से पेश नहीं आयेगी। वरना क्या कारण है कि विश्वभर में प्रसिद्ध स्कॉटलैण्ड पुलिस के मौजूद रहते केवल भारतीयों के साथ ही इस तरह की घटनायें हो रही हैं। सेन्ट्रल लन्दन स्थित द बैंक ऑफ इंग्लैण्ड के खजाने में 4600 टन स्वर्ण भण्डार सुरक्षित है। सोने की बिस्कुटनुमा 24 कैरेट वाली सिल्लियों के इस भण्डार की कीमत 10035.61 अरब रूपये है। आर्थिक मन्दी से जूझ रहे इंग्लैण्ड -वासियों के लिए इस खजाने का क्या औचित्य है, जब वे मंदी के कारण गलत राह पकड़ रहे हैं। क्या यह ब्रिटेनवासियों के लिए शर्मिंदगी का विषय नहीं है।
          इस खजाने से पूरे विश्व को इंग्लैण्ड यह समझाने की भले ही असफल कोशिश करे कि वह समृद्धशाली है, लेकन सत्यता यह है कि जबतक वह अपने सोने के भण्डार को बेचता नहीं है उसके यहॉं छाई मन्दी के दौर में ऐसी खोखली समृद्धि का क्या फायदा? वर्ष 1991 में भारत पर 163000 करोड़ रूपये का कर्ज था और जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री स्व0 चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार ने 67 टन सोना गिरवी रखकर आई.एम.एफ. से दो अरब डॉलर का कर्ज लिया था।
          भारत की इस नीति का अनुशरण करके ब्रिटेन अपने यहॉ सुरक्षित सोने के भण्डार में से कुछ टन सोना भारत को बेंचकर अपने यहॉं आई मन्दी से सामना करने के साथ ही सेंधमारी करने वाले लोगों में हो रहे इजाफे को कम जरूर कर सकता है। इसी के साथ ब्रिटेन मन्दी की मार से भी राहत पा सकता है। ब्रिटेनवासी कृपया इस पोस्ट पर अपने कमेन्ट प्रेषित कर वस्तुस्थिति से अवगत कराना चाहें। (सतीश प्रधान)