Sunday, 29 January 2012

आईएसआई एजेण्ट पर आरोप तय

          भारत की पूर्व राजनयिक माधुरी गुप्ता द्वारा आईएसआई को संवेदनशील दस्तावेज दिए जाने के मामले में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने आरोप तय करते हुए उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत दे दी है।इस मामले में अब 22 मार्च से अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू होगी। तीस हजारी कोर्ट के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश पवन कुमार जैन ने 53 वर्षीय माधुरी पर जासूसी के लिए सरकारी गोपनीयता कानून की धारा-3 और धारा-5 तथा आइपीसी की धारा-120 बी के तहत आरोप तय कर दिये हैं।
                    इन्हीं माधुरी गुप्ता के माध्यम से आईएसआई कनेक्शन रखने वाले एक पत्रकार के बारे में लखनऊ से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार-पत्र, उत्पीड़न की पुकार ने विस्तृत रपट अभी हाल ही में प्रकाशित की है, निश्चित तौर पर यह खबर जबरदस्त संदेह एवं सनसनाहट उत्पन्न करती है। समाचार-पत्र की प्रति एवं उसे प्रकाशित करने वाले प्रकाशक की छानबीन कर वस्तुस्थिति से अवगत होने की कोशिश की जा रही है और सत्यता का भान होते ही विस्तृत रपट पोस्ट की जायेगी। (सतीश प्रधान)

Friday, 27 January 2012

धर्मान्तरण से दूर रहें ईसाई संगठनः जयराम रमेश

          भारत के केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कड़े शब्दों में कहा है कि कैथालिक चर्च द्वारा संचालित संगठन माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास कराने में मदद करें, लेकिन लक्ष्मण रेखा का सम्मान करें और धर्मान्तरण की गतिविधियॉं नहीं चलाएं। जाहिर है एक केन्द्रीय मंत्री ने ऐसी सीख बिना वजह नहीं दी है, जरूर इसके पीछे का इतिहास संदिग्ध दिखाई देता है! ऐसी टिप्पणी से सहमत होना लाजिमी है कि कैथोलिक संगठन जरूर धर्मान्तरण के खेल में संलग्न होंगे।

          जयराम रमेश ने कैथोलिक संगठन कैरिटस इण्डिया के स्वर्ण जयन्ती समारोह का उदघाटन करते हुए कहा कि मैं कैरिटस इण्डिया से धर्मान्तरण में शामिल न होने की भावना के सम्मान की उम्मीद करता हूं। यह उद्देश्य नहीं है। उन्होंने कहा कि उद्देश्य आपके जैसे संगठनों की शक्तियों को सरकार और आदिवासी समुदायों के बीच विश्वास की कमी को तोड़ने में हमारी मदद में इस्तेमाल किये जाने का है। यह हमारा उद्देश्य है।
आर्कबिशपों और बिशपों सहित कैथोलिक पादरी श्रोताओं की खचाखच भरी भीड़ को सम्बोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि वह कैरिटस इण्डिया के बारे में कैथोलिक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि कैथोलिक द्वारा संचालित सामाजिक संगठन के रूप में बात कर रहे हैं। माओवादियों के प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि चुनौती यह है कि हम माओवादी हिंसा के समूचे मुद्दे से किस तरह निपटें जो आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैल रही है।
          जयराम रमेश ने कहा कि उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि सभी मध्य भारतीय आदिवासी इलाके आज उस बुराई की चपेट में हैं जिसे हमारे प्रधानमंत्री हमारे देश की सबसे गम्भीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती करार दे चुके हैं। जयराम रमेश ने कहा कि एक ऐसी विचारधारा की वजह से इन इलाकों में लोग शांति, सामान्य स्थिति और सौहार्द लाने में सक्षम नहीं हो पा रहे, जो सभी लोकतांत्रिक संस्थानों को उखाड़ फेंकने पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि कैरिटस इण्डिया और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठनों को इन क्षेत्रों में महत्वपूंर्ण भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन सामाजिक संगठनों को एक लक्ष्मण रेखा का सम्मान करना चाहिए। माओवाद प्रभावित इलाकों में कैरिटस इण्डिया को शामिल किए जाने पर भाजपा शासित राज्य झारखण्ड में संभावित विरोध को देखते हुए रमेश ने कहा कि आपको इसके लिए तैयार रहना चाहिए। (रीता सक्सेना)



Wednesday, 25 January 2012

ये हस्ती हिन्दुस्तान की

नेताजी के योगदान को भुलाने की साजिश
          नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान की जानकारी देश के ग्रह मंत्रालय के पास नहीं है अथवा जानबूझकर मिटा दी गई है, यह जॉंच का विषय हो सकता है क्योंकि सूचना के अधिकार के तहत जब ग्रह मंत्रालय से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर जानकारी मांगी गई तो उसने किसी जानकारी के वजूद से ही इनकार कर दिया। जानकारी मांगने वाले का इरादा चाहे जो भी रहा हो, लेकिन सुभाष चंद्र बोस को लेकर इस देश की चिंता अब इस पर सिमटकर रह गई है कि वे अभी जिंदा भी हैं अथवा जान-बूझकर भ्रम की स्थिति बनाये रखी गई है? या फिर विमान दुर्घटना में उनका निधन हुआ नहीं तो वे कहां गए? इस रहस्य में दिलचस्पी रखने वाले और देशप्रेमी लोग तो यहॉं तक कहते हैं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अगर जिंदा होते तो देश की सूरत क्या आज ऐसी होती, जैसी दिख रही है। परन्तु उससे भी दुखद एवं आघात देने वाली बात पिछले कई दशकों से उनके नाम पर की जाने वाली अनैतिक व अनैतिहासिक राजनीति की है। 
          दरअसल, इसी राजनीति ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में आम लोगों के बीच तमाम भ्रामक धारणाएं प्रचालित कर उनके व्यक्तित्व को विवादित बनाने की चेष्ठा की है। पहली बात, आजाद हिन्द फौज का गठन सुभाष चन्द्र बोस के जीवन की सर्वाधिक चर्चित घटना अवश्य थी, परन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण नहीं। उनकी सबसे बड़ी पहचान 1930 और 40 के दशक के युवा समाजवादी नेता के रूप में होनी चाहिए। जब सुभाश चन्द्र बोस और जवाहर लाल नेहरू ने मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मूल कार्यक्रम में मौलिक अधिकार व राष्ट्रीय आर्थिक नीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल कराया था।  
          1938 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने। उन्होंने एक राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया और नेहरू को उसका अध्यक्ष बनाया। यानी कांग्रेस के भीतर बिताए गए सुभाष बाबू के राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक दो दशक अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तनों के वाहक थे, जिनकी पूरी तरह से उपेक्षा कर दी जाती है। ऐसा दिखाया जाता है कि उनके जीवन के आखिरी संघर्षमय दिनों का ही उनके संपूर्ण जीवन में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान है। दूसरे, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी के आपसी सम्बन्धों को बेहद कटुतापूर्ण ढंग से बयान करना गांधीवादियों का पुराना शगल रहा है। वास्तव में गांधी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के मतभेद पूरी तरह विचारधारा के ही थे। दोनों की राजनीतिक समझ भिन्न थी, परन्तु दोनों ही शख्सियतों के आपसी सम्बन्ध अन्त तक बहुत महत्वपूर्ण बने रहे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद गांधी ने उन्हें 23 नवंबर, 1939 को लिखे एक पत्र में कहा-तुम मेरी खोई हुई भेंड़ हो। अगर मेरा प्रेम पवित्र और रास्ता सच्चा है तो एक दिन मैं पांऊगा कि तुम अपने घर वापस आ गए हो। सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस छोड़ने के बाद 9 जनवरी 1940 को गांधी जी ने ‘हरिजन’ में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तुलना कस्तूरबा और अपने सबसे बड़े पुत्र के साथ करते हुए लिखा- मैंने सुभाष को हमेशा अपने पुत्र की तरह माना है।
          दूसरी ओर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की सरकार की घोषणा करते हुए उसे बेहद भावपूर्ण तरीके से अपने ‘राष्ट्रपिता’ को समर्पित किया। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा- मैं सिर्फ तब तक तुम्हारा नेता हॅू, जब तक हम भारत की धरती पर कदम नहीं रख लेते। उसके बाद हम सबके सर्वोच्च और एकमात्र नेता राष्ट्रपिता होंगे। यहां तक कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के बाद उनके भाई शरतचन्द्र बोस, गांधी जी के अनुयायी बने रहे। गांधी के सबसे संकटपूर्ण समय में नोआखाली में भी वे उनके साथ थे।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा पट्टाभि सीतारमैया की पराजय के बाद गांधीजी के बयान को परिप्रेक्ष्य से काटकर प्रस्तुत किया जाता है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने वह चुनाव वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ के मुद्दे पर लड़ा था। दक्षिणपंथी धड़े में अधिकांश निष्ठावान गांधीवादी नेता आते थे। इसलिए स्वाभाविक रूप से सीतारमैया को गांधीजी का आशीर्वाद प्राप्त था। इसी संदर्भ में गांधी जी ने उपरोक्त बयान दिया था। परन्तु इसी बयान में उन्होंने सुभाष बाबू को उनकी जीत पर बधाई देते हुए उन्हें पूरी तरह वामपंथी कांग्रेस कार्यकारिणी के निर्माण का न्यौता भी दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान यह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रमुख मांग थी। हालांकि गलतफहमियों के चलते गतिरोध गहराता गया और अंततः 29 अप्रैल, 1939 को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी गरिमा के साथ कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि यदि वे इस देश के सर्वोच्च नेता का विश्वास हासिल न कर सके तो उनकी विजय का कोई अर्थ नहीं है।  
          आजादी के बाद काफी लम्बे समय तक नेताजी के जीवित होने सम्ंबन्धी अफवाहें आम जनता के बीच खूब प्रचारित एवं प्रचालित की गई, जिनका फायदा ढपोरशंखी साधुओं ने खुद को नेताजी बताकर उठाने की खूब कोशिशें भी कीं, जिनमें टाट वाले बाबा का नाम लिया जाना प्रासंगिक ही होगा। यह कितना खेदजनक है कि लोग मानते हैं कि नेताजी अपनी गिरफ्तारी के बाद ब्रिटेन को सौंपे जाने के डर से भूमिगत रहे। जो व्यक्ति दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य से टकराने का साहस रखता हो, वह देश में अपने ही लोगों के सामने आने की ताकत नहीं जुटा सकेगा क्या ऐसा एहसास दिलाया जाना कटुतापूंर्ण नहीं है? और ऐसा मानना नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अदम्य साहसी व्यक्तित्व का सबसे बड़ा अपमान नहीं है। 
          नेताजी की मृत्यु की घटना की जांच के लिए बने शाहनवाज कमीशन पर नेहरू की इच्छा के दबाव में गलत रिपोर्ट देने का आरोप लगाया जाता है। बताया जाता है कि नेहरू, नेताजी की लोकप्रियता से घबराते थे और इसलिए उन्होंने ब्रिटेन के साथ नेताजी की गिरफ्तारी का गुप्त समझौता कर लिया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि शाहनवाज आईएनए (आजाद हिन्द फौज) के उन तीन शीर्ष कमाण्डरों में से एक थे, जिन्हें गिरफ्तार कर लाल किले का प्रसिद्ध मुकदमा चलाया गया था। नेहरू ने उन्हें पाकिस्तान से बुलाकर जांच आयोग का अध्यक्ष बनाया था। कैप्टन शाहनवाज एवं जवाहरलाल नेहरू की संदेहास्पद भूमिका का कोई सबूत नि उपलब्ध होते हुए भी अगर यह आरोप बार-बार सामने आता है, तो कुछ तो ऐसा है ही जो सन्देह के घेरे में है। यानी सुभाषचन्द्र बोस के ऐतिहासिक योगदान और उनकी व्यक्तिगत गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम गृह मंत्रालय ने कोई अनजाने में नहीं किया है। यह काम तो पिछले काफी समय से एक सोची समझी राणनीति के तहत किया जाता रहा है। लोगों के बीच नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आधी-अधूरी तस्वीर जानबूझकर एक षडयंत्र के तहत पेश की जाती रही है।
          नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को राष्ट्रीय आंदोलन की मूल धारा से साजिशन काटकर अलगा कर दिया गया है। एक महान राजनीतिक व्यक्तित्व, जिसने अपना सम्पूंर्ण जीवन प्रगतिशील और धर्म-निरपेक्षता के संघर्ष में समर्पित कर दिया, उसकी आत्मा को सुखद एहसास दिलाने में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस असफल रही तो उनकी तस्वीर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपने कार्यालयों में लगाने की हिम्मत और दरियादिली दिखाई। आखिरकार धर्म-निरपेक्षता की परिभाषा किससे सीखी जाये? कांग्रेस से अथवा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से! 
 (सतीश प्रधान)

Tuesday, 17 January 2012

अमेरिका को अश्वेत और भारत को श्वेत राष्ट्रनायक की ही जरूरत

          वर्ष 2008 में अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने बराक ओबामा उस प्रतिभा, क्षमता, कौशल और रणनीतिक व्यक्तित्व के धनी हैं, जिसकी जरूरत अमेरिका जैसे देश को वर्तमान में तो है ही, आगे भी पड़ती रहेगी। पिछले तीस सालों से अमेरिका में मंदी का दौर चल रहा है। कई दशकों से धौंस और दादागिरी के बूते दुनिया पर राज कर रहे अमेरिका ने दरकती-टूटती पूंजीवादी व्यवस्था की खामियों को विश्व से छिपाये रखा। कर्ज लेकर घी पीने की ठसक ने वहॉं बैंकिंग प्रणाली को अन्दर ही अन्दर खोखला कर दिया, लेकिन जार्ज बुश का अमेरिका अकबर दी ग्रेट होने का महान प्रपंच रचता रहा। तीन दशकों से अमेरिका में नौकरियां घट रही हैं। इराक पर बमबारी और अमेरिकी फौजों की देश से बाहर बनाई गई छावनियों पर होने वाले व्यय ने अमेरिका को मन्दी के दौर में ले जाने का कार्य किया।

          उन्हीं बुश की रणनीति से प्रभावित रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार रिक सांटोराम भी औरान के परमाणु संयंत्र पर हमला कराने का वादा अमेरिकी जनता से करते हैं तो क्षोभ होता है। यह जानते हुए भी कि इस वर्ष क्रिसमस के मौके पर खून जमा देने वाली सर्द हवाओं के बीच लोग क्रिसमस मनाने नहीं, बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर डेरा डाले बैठे रहे। अमेरिका में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। शेयर मार्केट, मुक्त बाजार और पूंजीवादी अर्थतन्त्र के विरूद्ध लोगों की नाराजगी सातवें आसमान पर है। ऐसा ही हाल भारत का है, लेकिन यहॉं के अश्वेत, अश्वेतों को ही लूट रहे हैं। यहॉं की जनता को भी अभी पता नहीं चल रहा है कि क्या और क्यों ऐसा हो रहा है।
       
          कहा जा सकता है कि लम्बे समय के बाद दुनियाभर में बहुसंख्यक कामकाजी आबादी अल्पसंख्यक पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ी हुई है। अमरीका में यह एक प्रतिशत अमीरों के खिलाफ  निन्नयानवे प्रतिशत आम लोगों का जबरदस्त गुस्सा है। लोगों का कहना है कि अमेरिका में कंजरवेटिज्म ने घटिया पूंजीवाद को मनमानी करने दी और उसे आला मुकाम दे दिया। बड़े अमेरिकी कार्पोरेट घरानों ने अपने अल्पकालिक लाभ के लिए उन मूल्यों और संस्कारों को त्याग दिया जिसके लिए कभी अमेरिका को उस पर नाज था।
          अपने भारत में भी कार्पोरेट सेक्टर का यही हाल है। वे देश में उद्योग लगाने को तब आतुर रहते हैं जब उन्हें टैक्स में जबरदस्त छूट मुहैय्या हो, बिल्कुल सस्ते में यानी कौडी के तीन के दाम में कृषकों की जमीन सरकार द्वारा जबरिया अधिग्रहीत कर उन्हें दे दी जाये और इसके बाद भी उनके उत्पादों पर ब्रिकी का मूल्य तय करने में उनकी ही मनमानी चले। सरकारों द्वारा इतना करने के बाद भी वे सरकार को धौंसियाते रहते हैं कि यहॉं भ्रष्टाचार और लालफीताशाही है इसलिए हम विदेश में निवेश करेंगे। यानी मोटी मलाई से घी बनायेंगे हिन्दुस्तान में और उस करेन्सी को ले जायेंगे विदेश में। क्या कार्पोरेट सेक्टर का कोई सूरमा कह सकता है कि ब्यूरोक्रेशी को भ्रष्ट करने में उसका हांथ नहीं है? जो ऐसा कहने की हिम्मत रखता हो मुझसे बात कर सकता है, मैं बताऊंगा कैसे और किस तरीके से आप जैसे महान लोगों ने भ्रष्टाचार को बढ़ाकर लालफीताशाही को जन्म दिया है। 
          अमेरिका में घटिया पूंजीवादी व्यवस्था ने पॉंव पसारना शुरू किया और वॉल स्ट्रीट द्वारा संचालित इस व्यवस्था ने अतिधनाड्य लोगों को तो और अमीर बना दिया, लेकिन नौकरियों के खत्म होने, छटनी होने के अलावा और कोई भविष्य न होने के कारण बहुसंख्यक आबादी को मृत्यु के कुएं में धकेल दिया, ठीक यही हालात भारत में चल रहे हैं। अमेरिका दिल फरेब रंगीनियों में डूबता चला गया। मॉल्स की संस्कृति फलने-फूलने लगी। इस एक प्रतिशत से नकल के चक्कर में निन्नयानवे प्रतिशत लोग कर्ज लेकर घी पीने लगे, और अब उसके दुष्परिणाम दुनिया के सामने हैं। भारत में भी मॉल कल्चर फेल हो रहा है, इसी कारण उसे जमाने के लिए रिटेल सेक्टर में एफडीआई को ग्रुप ऑफ मिनिस्टर ने मंजूरी दे दी है।
  बराक ओबामा के हांथ में एक बर्बाद अमेरिका आया। ऐसी विषम परिस्थितियों में ही श्वेत अमेरिकी नागरिकों ने अपने देश की कमान किसी श्वेत को ना देकर एक अश्वेत बराक ओबामा के हांथ में दी कि अब इस देश को कोई अश्वेत ही बचा पायेगा। लेकिन तीस साल के विनाश को मात्र तीन सालों में कोई भी व्यक्ति चाहकर भी चहुंओर विकास की अलख नहीं जगा सकता। खर्च में कटौती करने, अपनी फौज को वापस अपने देश में लाने और उन परिवारों को राहत पहुंचाने के नाम पर ही राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दुनियाभर में डेरा डाले पड़ी अपनी सेनाओं को वापस बुलाने की मुहिम चालू की है। इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से उसका बोरिया बिस्तर समेटे जाना इसी बात का प्रमाण है।
  पटरी पर से उतरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को काफी हद तक वे ही पटरी पर लाये हैं और अब भी जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं कि किसी तरह से उसे बचाया जाये। इसीलिए उन्होंने कहा है कि अब समय आउटसोर्सिंग के बजाय इनसोर्सिंग का है। उन्होंने रोजगार के अवसर देश से बाहर भेजने के बजाय देश के भीतर ही रोजगार देने पर जोर दिया। ओबामा ने कहा है कि आने वाले दिनों में वे ऐसी नीतियां बनाएंगे जो आऊटसोर्सिंग को हतोत्साहित करेंगी तथा विदेशों से रोजगार वापस लाने वाली कम्पनियों को प्रोत्साहन देंगी। देश को अपने साप्ताहिक सम्बोधन में उन्होंने कहा कि आपने आऊटसोर्सिंग के बार में सुना था, अब इनसोर्सिंग की बात कीजिए। 
          इस सम्बोधन का वीडियो व्हाइट हाऊस की वेबसाइट पर उपलब्ध है जिसमें ओबामा ने मेड इन अमरीका उत्पादों को दिखाया है। ओबामा ने कहा कि ये उत्पाद आमतौर पर नहीं दिखते हों, लेकिन वे तीन गर्वित करने वाले शब्दों से बंधे हैं, मेड इन अमरीका। अमेरिकी श्रमिकों ने इन्हें अमरीकी कारखानों में बनाया और इन्हें देश के अन्दर और दुनिया भर के ग्राहकों को भेजा। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों को बनाने वाली कम्पनियां एक उम्मीद बढ़ाने वाले क्रम का हिस्सा हैं, जो विदेशों से नौकरियां वापस ला रही हैं।
          ओबामा ने कहा कि रोजगारों की इनसोर्सिंग करने वाले कारोबारी अधिकारियों को उन्होंने इसी सप्ताह व्हाइट हाऊस में एक मंच में बुलाया था। राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि मैंने उन सीईओ से वही बात कही जो मैं किसी भी उद्योगपति से कहना चाहूंगाः कि आप और अधिक रोजगार देश में लाने के लिए क्या कर सकते हैं, और मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि आपके साथ ऐसी सरकार होगी जो आपकी सफलता के लिए हर सम्भव कदम उठायेगी। ओबामा ने कहा कि इसीलिए अगले कुछ सप्ताह में मैं नए कर प्रस्ताव पेश करूंगा जो रोजगार वापस लाने तथा अमेरिका में निवेश करने वाली कम्पनियों को पुरस्कृत करेंगे। इनमें उन कम्पनियों के लिए कर छूट समाप्त की जाएगी जो रोजगार विदेश भेजती हैं। ओबामा ने अमरीकी सरकार के ढ़ांचे तथा कार्य परिचालन को भी चुस्त दुरूस्त बनाने का आह्वान किया ताकि यह 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के अनुरूप बन सके, इसी के साथ यह लिखने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्र को सुरक्षित भी बनाया है।
          ओबामा के ही कारण अमेरिका जैसा राष्ट्र अवसाद की स्थिति में जाने से बच गया। उद्योग जगत को भी उन्होंने हर सम्भव बचाने की कोशिेश की। यह अलग बात है कि अमेरिकी बच्चों एवं युवाओं में बढ़ते मोटापे के कारण उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने पीजा, बर्गर बनाने वाली कम्पनियों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने की जुर्रत की, जिसके लिए अमेरिकी जनता को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। लेकिन साथ ही यह स्तम्भकार उनसे अपील करता है कि ऐसी कम्पनियों को कोई और क्षेत्र अपनाने की सीख वे दें, तथा इन कम्पनियों को भारत में अपना व्यापार फैलाने की इजाजत कतई ना दें।
  जब भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गॉंधी और हमारे भगवान हनुमान जी को वे उसी श्रद्धा से मानते हैं, जिससे की हम तो फिर जो कम्पनियां अमेरिकी समाज में मोटापा बढ़ा रही हैं, उन्हें थुल-थुल और आलसी बना रही हैं, ऐसी कम्पनियों को भारत भेजकर वे क्यों हमारे परिवार के साथ अन्याय कर रहे हैं। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी समाज की स्वास्थ्य सेवा पर आने वाले खर्च को कम करने एवं भविष्य में किसी भी स्थिति में दिवालियेपन से बचने के उपाय करने शुरू कर दिये हैं। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान की धरती पर ही एनकाउन्टर कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, इसके जरिए उन्होंने निश्चित रूप से अलकायदा को कमजोर किया है।
  अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए उन्होंने बहुत कुछ किया है, जबकि वे डा0 मनमोहन सिंह जैसे अनर्थशास्त्री नहीं हैं, लेकिन वे अपने देश की मुद्रा को (स्टैण्डर्ड एण्ड पूअर्स संस्था द्वारा क्रेडिट रेटिंग ट्रिपल ए से डबल ए पर गिराने के बाद भी) मजबूती प्रदान कराना जानते हैं। अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग जब घटी थी तो तथाकथित मजबूत अनर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह के देश में एक डॉलर 43 रूपये का था, जो आज की तारीख में 52 रूपये है। इसका सीधा मतलब है कि किसी अर्थशास्त्री को देश के प्रधानमंत्री के पद पर बैठाना उस देश की मुद्रा की ऐसी की तैसी कराने के अलावा और कुछ भी नहीं है। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि देश की बागडोर किसी अर्थशास्त्री को सौंपा जाना, देश को कुएं में धकेलने जैसा है।
           देश की बागडोर ऐसे व्यक्तिव के हांथ होनी चाहिए जो देश की जनता एवं देश को सर्वोपरि मानते हुए ही नीतियों का निर्धारण करे। इस मायने में बराक ओबामा एकदम तत्परता से आगे बढ़ रहे हैं। वैसे भी उनमें श्वेत से अपने को बेहतर कुछकर दिखाने की जबरदस्त ललक है। ऐसी ललक किसी श्वेत में इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि उसके दिमाग में हमेशा यह रहता है कि वह तो उन्हीं में से एक है, इसलिए उस पर ऐसा कोई आरोप नहीं लग सकता, जैसा अश्वेत ओबामा पर लगाया जा सकता है, इसी ठसक में वह वे फैसले भी ले लेता है, जो अमेरिकी जनता के हित में नहीं होते हैं।
          इस स्तम्भकार का विश्लेषण यही कहता है कि अमेरिकी जनता के हित में यही है कि एक मौका और बराक ओबामा को प्रदान करे, और पूरी जिन्दगी इसका विश्लेष्ण करे कि एक अश्वेत ओबामा जिसने दो टर्म इस देश की कमान संभाली, अमेरिकी नागरिकों को क्या दिया और उसके अलावा बने रहे श्वेत राष्ट्रपतियों की लीडरशिप में उन्हें क्या मिला? अमेरिका में राष्ट्रपति का एक टर्म कोई बहुत बड़ा मायने नहीं रखता, इसलिए राष्ट्रपति बराक ओबामा को एक और टर्म प्रदान कर प्रयोग किया जाना ही चाहिए कि एक अश्वेत राष्ट्रपति ने अमेरिका को क्या दिया।
          राष्ट्रपति का पद पाने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार रिक सांटोराम का अमेरिकी जनता से यह वादा करना कि अगर वे राष्ट्रपति बनते हैं तो औरान परमाणु संयंत्र पर हमला करवा देंगे, निहायत ही मूर्खतापूर्णं वादा है। ऐसा वादा अथवा बयान एक सनक से अधिक कुछ और नहीं है, जो अमेरिकी नागरिकों को फायदे के अलावा नुकसान अधिक पहुंचायेगा।
        एक तरफ रणनीतिक कौशल देखिए ओबामा का कि उन्होंने अमेरिका के अपने व्हाइट हाऊस में बैठे-बैठे पाकिस्तान में आराम से सो रहे कुख्यात आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को ढे़र करा दिया और एक भी पाकिस्तानी जनता हताहत नहीं हुई, ना ही अमेरिकी फौज का कोई रखवाला हताहत हुआ। इससे उनके रण कौशल की रणनीति का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आपरेशन से पाकिस्तान की जनता भी खुश हुई और अमेरिकी जनता के तो कहने ही क्या! इसके विपरीत यदि यह मान लिया जाये कि रिक सांटोराम राष्ट्रपति बन गये और उन्होंने अपने वादे के अनुसार औरान के परमाणु संयंत्र पर हमला करा भी दिया तो इससे अमेरिकी नागरिकों को क्या मिलेगा? क्या गारन्टी है कि हवाई हमला कराने के दौरान अमेरिकी फौज के जाबांज हताहत नहीं होंगे! क्या इससे परमाणु युद्ध की शुरूआत नहीं होगी? ऐसे कितने ही प्रश्न तब उभरकर सामने आयेंगे जब ऐसा हमला कराया जायेगा।
          औरान में लाखों निरीह लोग मारे जायेंगे, विकिरण फैलने से लाखों लोग अन्धे, विकलांग और जाने क्या-क्या नहीं होगे। क्या उस देश की पुस्त दर पुस्त अपाहिज पैदा नहीं होगी? इस सबका कलंक क्या अमेरिकी जनता के सिर नहीं पड़ेगा? ऐसे कृत्य किसका भला करेंगे? अमेरिका के प्रति जबरदस्त नफरत फैलाकर रिक सांटोराम अमेरिकी नागरिकों को क्या मुहैय्या करायेंगे? मेरी राय में तो रिपब्लिकन पार्टी को ऐसे सनक मिजाज मानसिकता वाले नेता को कोई भी बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपनी चाहिए।
            यह स्तम्भकार निश्चित रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि अमेरिकी नागरिकों के हित में यही है कि अगला राष्ट्रपति भी अश्वेत बराक ओबामा को ही बनायें, और उस श्वेत लीडर को भारत भेज दें, जिसे वे बहुत पसन्द करते हैं। वह हिन्दुस्तान सुधार देगा और ओबामा अमेरिका। अपने कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति ओबामा ने जितने भी निर्णय लिए हैं, निश्चित रूप से वे अमेरिका के हित में ही रहे हैं। एक चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इसलिए यह वह समय है जब अमेरिकी जनता को उनका साथ अपनी कन्ट्री के हित में देना चाहिए, बाकी रही उनकी मर्जी, उनका देश। मेरा स्पष्ट मत है कि अमेरिकी जनता अपने मत का प्रयोग बराक ओबामा के ही पक्ष में करके उन्हें नवम्बर 2012 में होने वाले चुनाव में पुनः एक और टर्म के लिए अमेरिका का राष्ट्रपति बनायेगी।   
अमेरिका जैसे प्रभावशाली राष्ट्र का पुनः नेतृत्व संभालने की शुभकामनाओं के साथ अग्रिम बधाई।  (सतीश प्रधान)

Thursday, 12 January 2012

वेटिकन सिटी के स्कैनर पर इण्डिया

          इटली की वैभवशाली राजधानी रोम में बसा वेटिकन सिटी, जिसे हॉली सी भी कहा जाता है, दुनिया का सबसे छोटा देश है, जो रोम के अन्दर ही स्थित है और जिसका कंट्री कोड 39, क्षेत्रफल 44 हेक्टेयर एवं जनसंख्या एक हजार से भी कम (लगभग आठ सौ उनतीस) है। यहाँ पर इटेलियन,लैटिन, फ्रेंच एवं अन्य भाषायें बोली जाती हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि विश्व का सबसे बड़ा हेल्थ स्पा, विश्व के इस सबसे छोटे देश, वेटिकन सिटी में है।
           इस देश का अपना अलग कानून, अपनी राजभाषा, यहॉं तक की अपनी करेन्सी, अपना पोस्ट आफिस और अपना रेडियो स्टेशन भी है। वास्तव में यह ईसाइ धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय रोमन कैथोलिक चर्च का केन्द्र (सेन्टर) है, जिसकी सत्ता और सम्पूंर्ण शक्ति इस सम्प्रदाय के सर्वोच्चाधीष धर्मगुरू पोप के हांथों में रहती है। 1929 से इसे एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में मान्यता मिली हुई है। वेटिकन सिटी अपने खुद के पासर्पोट भी जारी करता है, जो पोप, पादरियों, कॉर्डिनल्स और स्विस गार्ड के सदस्यों (जो वेटिकन सिटी में सैन्य बल के रूप में कार्यरत हैं) को दिये जाते हैं। वेटिकन सिटी सारे विश्व में फैले कैथोलिक सम्प्रदाय के अनुयायियों की आस्था का केन्द्रबिन्दु है। इसकी मुख्य पहचान इसके सेन्टर में स्थित सैन पियेत्रो नाम के भव्य हॉल से है, जहॉं लाखों की संख्या में ईसाइ समुदाय के लोग एकत्र होकर अपने सर्वोच्चाधीष धर्मगुरू पोप का विशेष अवसरों पर दिया जाने वाला उपदेश ग्रहण करते हैं।
          इसी वेटिकन सिटी का स्कैनर आजकल भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के बरेली जनपद के बरेली कैथोलिक धर्मप्रान्त रीजन पर लगा हुआ है। दरअसल कैथोलिक धर्मप्रान्त रीजन बरेली के बिशप एंथोनी फर्र्नाडिस का कार्यकाल इसी वर्ष पूरा होने जा रहा है, जो विगत दो दशक से यहॉं कार्यरत हैं। नये बिशप की तलाश में वेटिकन सिटी की नज़र इस धर्मप्रान्त पर लगातार बनी हुई है। कैथोलिक चर्च में बिशप का ओहदा बहुत महत्वपूंर्ण होता है क्योंकि चर्च और उससे संचालित स्कूल व सोशल सर्विस सेन्टर्स के बिशप ही मुखिया होते हैं।बरेली कैथोलिक धर्मप्रान्त क्षेत्र में उत्तर प्रदेश राज्य के तीन जनपद, बरेली, पीलीभीत और शाहजहॉंपुर, उत्तराखण्ड राज्य के छह जनपद क्रमशः ऊधमसिंह नगर, नैनीताल, अल्मोडा, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ आते हैं। इन सभी नौ जनपदों में कैथोलिक चर्च और उनके सोशल सर्विस सेन्टर्स और स्कूलों की सारी व्यवस्था बिशप एंथोनी फर्नांडिस ही देख रहे हैं। श्री एंथोनी वर्ष 1989 में बरेली धर्मप्रान्त के बिशप बने और अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई उल्लेखनीय और ऐतिहासिक कार्य किये हैं, जिसके कारण उत्तर भारत रीजन के कैथोलिक बिशप में उनका स्थान अहम और सम्मानित है।
          कैथोलिक चर्च की सारी गतिविधियॉं रोम स्थित रोमन कैथोलिक चर्च के निर्देश पर ही संचालित की जाती हैं। पोप इसके प्रमुख एवं सर्वोच्चाधीष हैं। चर्च के नियमानुसार धर्मप्रान्त क्षेत्र स्तर पर प्रत्येक बिशप का कार्यकाल उनकी 75 वर्ष की उम्र तक ही होता है, इसके बाद उन्हें रिटायर होना पड़ता है। चूंकि बिशप एंथोनी फर्नांडिस को इसी वर्ष रिटायर होना है, इसी नाते बरेली धर्मप्रान्त के लिए नये बिशप को लेकर सरगर्मियां भी तेज हैं और पूरे धर्मप्रान्त पर वेटिकन सिटी का स्कैनर लगा हुआ है।
          कहा जाता है कि कैथोलिक बिशप के चयन में इलेक्शन की प्रक्रिया नहीं है। नियमानुसार प्रत्येक धर्मप्रान्त के बिशप का चयन रीजन के सभी बिशप मिलकर सर्वानुमति से करते हैं। बरेली रीजन में दस धर्मप्रान्त हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और राजस्थान को मिलाकर बरेली एक रीजन है। इस बरेली रीजन में दस धर्मप्रान्त हैं इन सभी धर्मप्रान्तों के बिशप, बरेली धर्मप्रान्त रीजन के बिशप का चयन करेंगे। इसी वर्ष यह प्रक्रिया शुरू होनी है, जिसके बाद ये सारे बिशप किसी एक के नाम पर अपनी सहमति रोमन कैथोलिक चर्च के दिल्ली स्थित प्रतिनिधियों के जरिए पोप को भेजेंगे। अन्त में जब सर्वोच्चाधीष पोप उस नाम पर अपनी मुहर लगा देंगे, तभी नये बिशप का नाम घोषित कर दिया जायेगा। (सतीश प्रधान)   

Monday, 9 January 2012

दवा कम्पनियों का स्लॉटर हाऊस है हिन्दुस्तान

पिछले पांच वर्षों में दवा कम्पनियों ने अपनी नई दवाओं की रिसर्च के लिए हिन्दुस्तानियों को परीक्षण के तौर पर इस्तेमाल करते हुए इस देश को दवा परीक्षण का स्लॉटर हाऊस बना डाला है। हिन्दुस्तान में इन कम्पनियों द्वारा किया जाने वाला यह प्रयोग पश्चिमी देशों की तुलना में काफी सस्ता,सख्त नियम कानून से बचाव वाला और दुविधामुक्त है। हिन्दुस्तान में इस समय डेढ़ करोड़ लोगों पर तकरीबन 1600 दवाओं के परीक्षण प्रोग्राम चलाये जा रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जिन मरीजों पर ये परीक्षण किये जा रहे हैं,उन्हें इस बात का तनिक भी अन्दाजा नहीं है कि उनके शरीर का इस्तेमाल ये डॉक्टर,परीक्षण के लिए कर रहे हैं,क्योंकि उनको विश्वास में लिये बगैर ही नामी-गिरामी सरकारी संस्थान और मेडीकल कॉलेज (जैसे एम्स एवं किंग जार्ज मेडीकल कालेज एण्ड हास्पिटल) के चिकित्सक अपने निजी फायदे के लिए मरीजों पर इन दवाओं का परीक्षण धड़ल्ले से कर रहे हैं।

Kidney cancer patients denied life-saving drugs by NHS rationing body NICE


Read more: http://www.dailymail.co.uk/health/article-1174592/Kidney-cancer-patients-denied-life-saving-drugs-NHS-rationing-body-NICE.html#ixzz1iYxBL22X


रिसर्च प्रोजेक्ट के नाम पर दवा कम्पनियॉं उन्हें परीक्षण के लिए नई-नई दवायें देती हैं। इसके बदले में वे चिकित्सकों को विदेश घुमाती हैं और मोटा आर्थिक पैकेज देती हैं अलग से। इन दवा कम्पनियों में ज्यादातर ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोपीय देश की हैं। यद्यपि इन्हें लेकर ना तो कोई निश्चित आंकड़े उपलब्ध हैं,और ना ही उपलब्ध हो सकते हैं,फिर भी यह अरबों रूपयों का करोबार है,जो बड़े चैन से हिन्दुस्तान में निर्बाध गति से चल रहा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 2007 से 2010 के बीच हिन्दुस्तान में इन दवा परीक्षणों से 1730 लोगों की मृत्यु हो गई वह भी बिल्कुल मुफ्त में। पिछले वर्ष 670  हिन्दुस्तानियों  की दवा परीक्षण से मौत हुई है, जिनमें बड़ी मुश्किल से 8 लोगों को इंस्योरेन्स की राशि दवा कम्पनियों द्वारा दी गई, जबकि दवा कम्पनियों ने नई दवा को मार्केट में हिट कराने के लिए 3600 करोड़ रूपये खर्च किये।

Whose Testing Animals we are?

Human testing,_Animal testing,Monkey in lab
Last year in India, 670 Indians lost their lives in medical experiments, But only 8 got the insurance amount from the pharmaceutical companies. Drug Controller General of India (DCGI), Dr. Surinder Singh seeking explanation to the 9 drug companies for this incident. After his letter exposed in media, The drug companies promising to settle the insurance amounts to all victims. But there are more to be fixed in this prob..
  • Pharmacy a booming industry, trillions of money involving in this business(Business!?). Pharmaceutical companies spending nearly  Rs. 3600 Crores  for a  new medicine to hit the market. They have to cross many stages of research for that and The very important stage of the research is the Human Testing. Without proving that the medicine don't harm the human, the drug can't hit the market.
  • There are tough laws in rich countries for human testing, The company have to assure the safety of the human and they should take care all the expenses of that person. Its too expensive in those countries,If they do the same in poor countries it costs 60% less.   So the Pharmaceutical companies targeting the emerging countries like India. 
  • In 2005, there are only 100 experiments conducted in India, But today its at least 1000. There are 100 casualties before 3 years but now the number hits to 670.
  • The drug companies targeting only poor and ignorant people. In Andra(Kammam District), 14,000 scheduled tribe girls were used for an Oral Cancer medical experiment. The girls and their parents were not even  know that this kind of experiment going on. During the experiment, 6 girls were died. Then only the whole experiment thing came to spot light.
  • The apex medical research institution of India AIIMS(All India Institute of Medical Science) also not spare for this testing thing. Its hard to say 49 babies were killed in an experiment last year. 4142 babies were used in that experiment, in that, 2728 babies were under the age of 1.
  • "For research and testing use the Indian Babies" said the US Govt. That means all the drug companies got OK from their end.So, Indian babies gonna be the Testing animals in coming days.
  • How come the Indian Govt and officials letting these things happen, Corruption? .What state of morality this is?, Whose testing animals we are?.
  • The safety laws differs state to state in India, So the companies easily escaping from the laws.
भोपाल का गैस हादसा भी एक परीक्षण ही था, जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई,लाखों लोग अपंग और अपाहिज हो गये तथा पीढी दर पीढी विकलांग पैदा होने को मजबूर है। सुविज्ञ सूत्रों ने बताया है कि वैसे तो ये परीक्षण ज्यादातर अनपढ़,गरीब और आदिवासियों पर किये जाते हैं, लेकिन पैसों के लिए अन्धे हो रहे डॉक्टर इसका परीक्षण किस पर न कर लें, कोई भरोसा नहीं। जाहिर है परीक्षण उसी पर होगा जो इन रिसर्च-कम-मेडिकल हॉस्पिटल में जा रहा होगा और डॉक्टर्स को भगवान मान रहा होगा। ध्यान रखिए भगवान केवल एक है, जो आपको दिखाई नहीं दे सकता और जो सशरीर दिख रहा है वह भगवान नहीं है।
विशेष रूप से ऐसे परीक्षण ज्यादातर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और आन्ध्रा प्रदेश में सुनने को मिले हैं। दिल्ली में भी ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं, इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये परीक्षण देश के अन्य प्रदेशों में नहीं हो रहे होंगे। पश्चिमी देशों की कम्पनियों द्वारा परीक्षणों के लिये चुना जाने वाला हिन्दुस्तान अकेला देश नहीं है। दुनियाभर के 178 देशों में इस तरह के करीब एक लाख बीस हजार दवा परीक्षण बदस्तूर जारी हैं। इन परीक्षणों में इंसान को पशु से अधिक कुछ और नहीं समझा जाता है,वरना आप जानते है कि बायोलॉजी में परीक्षण के लिए मेढ़क को ही चुना जाता है, क्योंकि एक तो वह सीधा होता है, दूसरे उससे किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न नहीं होता है और तीसरे वह आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

इसी प्रकार से चूहों पर भी विभिन्न प्रकार के प्रयोग और परीक्षण किये जाते हैं। ध्यान रहे कि स्पेस में सबसे पहले कुत्ते-बिल्ली और चूहे ही बतौर परीक्षण भेजे जाते हैं। इसी व्यवस्था के तहत जिन देशों के इंसान को ये दवा कम्पनियां कुत्ता, बिल्ली, मेढ़क, खरगोश और चूहा समझते हैं, उन देशों में नई दवाओं का परीक्षण ये उन देशों के चिकित्सकों को अवैध धन देकर बड़े आराम से कराते हैं। यानि इंसान को पशु से अधिक कुछ नहीं समझा जाता। चीन, इण्डोनेशिया और थाईलैंण्ड भी उन देशों में शुमार है जहॉं ये परीक्षण किये जाते हैं। इन देशों में होने वाले प्रयोगों और आंकड़ों के आधार पर ही युरोपीय ड्रग कन्ट्रोलर के पास दवा कम्पनियां अपनी दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति मांगती हैं।
जानकारों के अनुसार दवा कम्पनियों के शोध विभाग के लिए हिन्दुस्तान इसलिए आकर्षक बाजार है क्योंकि यहां कि 120 करोड़ की आबादी, दवा परीक्षण वास्ते डॉक्टर्स के लिए अच्छी फसल तो है ही उनमें जीन विविधता भी सबसे अधिक है। यहॉं के ज्यादातर डॉक्टर्स इन प्रयोंगों के लिए उतावले बैठे रहते हैं, क्योंकि यहॉं परीक्षण फेल होने जाने पर भी उनके ऊपर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो सकती है क्योंकि यहॉं पर ऐसा कोई सख्त कानून है ही नहीं। हिन्दुस्तान के सरकारी अस्पतालों में भी दवा परीक्षणों को आसानी से मंजूरी दे दी जाती है। इसे पढ़ने के बाद यदि आप चिंतित हों तो किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर रिसर्च कर सकते हैं कि कौन सा डॉक्टर आजकल किस रिसर्च प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है। महज इसी कारण ज्यादातर डॉक्टर्स दवाओं का पर्चा अथवा कौन सी दवा मरीज को दी जा रही है लिख कर देते ही नहीं।

आन्ध्रा प्रदेश के कम्माम जिले में अनुसूचित जनजाति की 14,000 लड़कियों पर ओरल कैन्सर मेडीकल प्रयोग किया गया। इन लड़कियों के माता पिता को पता ही नहीं था कि उनके बच्चों के ऊपर दवाओं का प्रयोग किया जा रहा है। परीक्षण के दौरान ही जब 6 लड़कियों की मृत्यु हो गई तब इस बात का पता लगा कि डॉक्टर इन 14,000 लड़कियों पर दवा का प्रयोग कर रहे थे। ऐसे डॉक्टरों को तो सरेआम कोड़े लगाने चाहिए जो बगैर उनकी इच्छा के उन्हें मूर्ख बनाकर,अपने व्यक्गित फायदे के लिए उनपर दवाओं का परीक्षण कर रहे थे।

हिन्दुस्तान में मेडीकल का शीर्ष संस्थान एम्स भी ऐसे परीक्षणों से पीछे नहीं है पिछले वर्ष 49 बच्चे एक परीक्षण में काल के गाल में समा गये। 4142 बच्चों पर ये परीक्षण किये जा रहे थे, जिसमें से 2728 बच्चों की उम्र मात्र एक वर्ष से भी कम थी।
इन दवा कम्पनियों के खिलाफ सक्रिय दिल्ली के डॉ0 चन्द्र गुलाटी बताते हैं कि हिन्दुस्तान में दवा परीक्षणों को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती जाती है। डॉक्टर लापरवाही करते हैं, वे ना तो नैतिक मूल्यों की परवाह करते हैं और ना ही किसी तरह की इंसानियत दिखाते हैं। हिन्दुस्तान में जान की कीमत बहुत ही सस्ती है। संसद में स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने भी स्वीकार किया है कि 2010 में दवा परीक्षणों में मारे गये 22 लोगों के परिवारीजनों को विदेशी कम्पनियों ने मात्र 2 लाख 38 रूपये प्रतिव्यक्ति की दर से भुगतान किया। इसे कन्वर्ट करिए डालर में तो यह हुआ 4500 डालर। अब किसी अमेरिकन से पूछिए क्या वह 4,50,000 डालर में ही सही अपना शरीर इन दवा कम्पनियों को बतौर परीक्षण देने को तैयार होगा। कदापि नहीं! इसीलिए इन दवा कम्पनियों को अपनी दवा के परीक्षण के लिए भारत,चीन,इंडोनेशिया और थाईलैण्ड स्वर्ग नज़र आते हैं।

डॉ0 गुलाटी का कहना है कि विदेशी कम्पनियां महंगी दवाओं का बाज़ार तैयार करने के लिए भारतीयों का इस्तेमाल बिल्कुल चूहे,बिल्ली,मेंढ़क और खरगोश के तर्ज पर एकदम सस्ते में कर लेती हैं। हिन्दुस्तान के ज्यादातर मरीजों को पता ही नहीं होता कि उनका इलाज हो रहा है अथवा उनपर परीक्षण। वे सिर्फ डॉक्टर को भगवान मानकर जो वो कहता है वे दवाएं लेने को राजी हो जाते हैं,जो अभी परीक्षण के स्तर पर ही होती हैं,क्योंकि डॉक्टर उन्हें बताता ही नहीं कि उसे ये दवाईयां बतौर परीक्षण दी जा रही हैं। देश में आये दिन महल के रूप में खडे़ होते डॉक्टर के बंगले इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं। (सतीश प्रधान)   

Crude Experiments
on Innocent People

A Personal Commentary


      Vaccinations are crude experiments on innocent people. It must have been hard at first for sensible folks to believe that health could be achieved by allowing needles filled with putrid matter to be poked into their bodies. Yet, many otherwise rational human beings came to accept this practice as a logical means to achieving well-being. Many still do.
The original purpose of vaccines was to eradicate infectious disease and to ease the pain, disability, and "unnecessary" death associated with it. These hopes still underlie the decisions made by medical personnel. Other modes of healthcare, however, are also available, including our capacity to assume personal responsibility for the decisions we make about our body, and to uphold our faith in God.
Dear doctors and medical scientists: Your "adverse" and "frightening" microorganisms have no mystical power over many of us. We know that some are "dangerous" in combination with other factors. You would be the first to mock any culture upholding a belief in witchcraft, voodoo, or arcane spirits. Yet, with your germ theories and scare tactics, you cast spells and hold power over many people.
The root assumption that germs are the cause of disease must be seriously reexamined. Brilliant men and women throughout the world challenge this unsound theory. If disease is caused not by germs but rather by the choices we make regarding the care of our bodies, then allopathic medicine is built upon a straw foundation. Yet, the power of a myth can be strong. Thus, like captivating charlatans who claim that only they can remove an evil spell, you have created a belief that only you can free people from these dreadful microscopic entities. You hold the magic needle (and bewitching drugs) high above your head to signify their dominance.
The people, they are frightened; who knows when they or their loved ones may be stricken? They flock to you in hordes. Please free them of these fears. Others, those who question what you're doing, or know what you're about, must be forced to participate in your perilous rituals against their will. In a twisted bit of honesty, we are told that your power will not work if too many people refuse to play along. "Look over there," you say to anyone who will listen. "Those outcasts will not join our scheme. They do not love their children, and they do not give a damn about you and I. They will spread disease, and all of us will die."
Allopathic medicine is responsible for saving many lives. New technologies allow medical specialists to alleviate pain and prolong life. But how do we measure the practicality of vaccination when full disclosure of the facts, including knowledge of the immediate and long-term consequences of the shots, is not permitted? This vaccine dilemma affects every aspect of society. Some researchers estimate that thousands, perhaps millions, of children throughout the world are damaged by vaccines every year. Authorities who understand the magnitude of this problem must wish it would simply go away. The ramifications are too great to contemplate.
People in power -- drug company CEOs, medical authorities, and U.S. lawmakers -- must reason that if great numbers of people are being damaged by the vaccines, how are we ever going to compensate them? And if the true extent of vaccine damage is publicly acknowledged, how are we ever going to maintain faith in the medical model? The prevailing procedures in defense of the allopathic myth therefore continue unaltered. And studies mimic the only conclusions comfortable enough to bear: vaccines are not only safe and effective, but lifesaving beyond measure.
At the same time, many doctors, scientists, and legalized drug pushers sincerely believe they've outwitted Mother Nature. And many lawmakers are genuinely convinced that acknowledging public fear about the dangers of vaccines, and offering parents an option against vaccinating their children, represent grave threats to national and international health. They honestly believe that if too many people are permitted to abstain from participating in the medical myth, great epidemics will ensue.
Yet, how many products have the medical, scientific, and defense communities endorsed, with full blessings from the government -- thalidomide, Agent Orange, experimental drugs -- only to regret it years later? Will we ever wake up? Health practices that require submission to achieve compliance can never be based upon higher principles, especially when intelligent men and women throughout the world debate the merits of mandatory vaccines, supporting their conclusions with scientific studies as well.
The budding practice of immunology has caused more damage than if researchers would have left well enough alone. The innate wisdom and immunological balance of the human body is altered and weakened when matter from an animal or germ is inserted into it. Today, the problem is more immense. New diseases, from ungodly pathogenic mixtures, have been created, as well as new drugs and vaccines to ward off these nefarious influences. These begat even more diseases, the need for new potions, and a perpetual cycle of sickness was established. Yet, even the magnitude of this health-related quandary pales in comparison with the loss of confidence in life itself, and faith in God to guide our path.
Ideas and Truth: Reality and truth often appear to exist in the discernible realm of concrete expression rather than in the ethereal region where thoughts are formed. Consequently, our assumptions about life are frequently related to the "facts" as we perceive them (vaccines seem to work), and not to the ideas that hold our attention from behind the scenes. This is why it is so easy to overlook the obvious (vaccines are ineffective and dangerous). If we do not examine the origin of our beliefs, we accept them as true despite all evidence to the contrary.
No one should underestimate the power of an idea to obscure the truth. For example, a vaccine may or may not benefit society. However, when the vaccine ideais bolstered through repetition, coercion (!), and an irrational fear of disease, the illusion of benefit will appear -- even when objective criteria indicate otherwise. If we are told often enough that something is true, we are likely to start believing it. But truth would bring families to the vaccine clinics on their own, without compulsory laws.
Several examples on this site show how information that does not support the vaccine theory is conveniently disregarded. In fact, there are numerous examples throughout history where ideas were accepted in place of truth because they were promoted with vim and vigor. For example, the earth was thought to be flat long after being proved otherwise because people in power continued to promote that idea. The truth was suppressed because it conflicted with the established beliefs of the time. In the process, myths masked reality, and an idea took precedence over truth.
The Salem Witch Hunts of the 1600s and the Nazi experiments on human subjects during World War II are two more examples where extreme oppression occurred at the expense of truth -- and lives -- simply because people in power made certain claims. But claims are merely statements of belief whether 1 or 1 million people believe them to be true. They fall short of truth when reality is denied.
More recently, a mother of two young boys claimed they were abducted and won the nation's sympathy as everyone naturally assumed her story was true. Buttruth is sometimes hidden from our view when masked by ideas in which we so desperately want to believe. In the end we were all horrified to discover this woman killed her babies.
Truth is truth, no matter how ghastly it may appear to be. No one wanted to believe that this innocent-seeming young mother drowned her own children, yet that is what occurred. In a similar manner, no one wants to believe that the vaccine idea is a dangerously flawed concept, and that the promoters of this hazardous practice are compelling mothers to maim and kill their own babies as well. But, if something is or is not true, it is or is not true, no matter how often and passionately people in power state their doctrine. Ideas must be born of truth or they will die, and die they must for new ideas and greater truth will take their place.
Now we come to the immediate problem: as more and more people begin to exercise their spiritual right to choose for or against vaccines for themselves and their family members, a clash of ideas will occur. It is occurring now. Many doctors already refuse to serve clients who disagree with their dogma. Others threaten to report "troublemakers" to their legal henchmen -- "authorities" who will enforce compliance with the occult rituals. Parents, too, are fleeing arrogant and uncaring health practitioners. Yet, these moms and dads only want to know the truth, and merely seek to exercise their right to choose how to raise and care for the pristine beings within their care.
The Solution: The answer to the vaccine dilemma is simple: 1) full disclosure, and 2) freedom of choice. Information must be readily accessible, and everyonemust be free to choose his or her own pathway to health. Parents must retain authority regarding how they raise their children. No one has a right to interfere, even with the best of intentions. Responsible, fully informed mothers and fathers can interpret information and make decisions for their families and themselves.
Dear doctors: You are not our caretakers by decree. We'll let you know when we want your opinions or your aid. Then, by invitation, you may participate in our lives. So don't stick your filthy needles in our bodies, or in the bodies of our children -- unless we ask you to. Although you may sincerely believe these injections will achieve a worthy goal, we may not agree.
Also, don't tell us that you know more about these matters than we do; this insults our intelligence and our parental instincts. Knowledge is a single factor with many blind sides. Somewhere in the course of your studies you missed an important lesson -- that the body is a beautiful instrument of creation. It has a supreme intelligence of its own. Nature plays an important role as well. And don't underestimate the power of the mind. Your placebos can attest to this phenomenon. So stop forcing others to submit to your crude and detrimental practices.
You say that your technique for achieving optimal health is beneficial, but that it requires full participation -- mandatory compliance (!) -- to realize its noble goal. So you force your human subjects to submit to your procedures against their will, or against the will of their rightful guardians. You violate their bodies and you trespass on their souls. But we are not your human guinea pigs. We have intelligent aspirations and our own ideas about how to achieve them.
Dear doctors and other medical scientists: After you take the initial step and realize the vaccine issue is truly one of choice -- the freedom to select our own view of the world -- and not a matter of rampant and deadly disease, as you are prone to see it, your path will become much easier. You will no longer hold the unbearable weight of protecting the planet from wretched infectious disease. And you will no longer be responsible for the damage and the death that will ensue when people choose your offerings and later regret it. Once they know that the shots are not compulsory, and that they hold a certain risk, you will be karmically freed from your self-imposed custodianship.
Today, however, you are responsible for every single life that is affected by your dark and pernicious magic. All your bogus studies and clever manipulations cannot nullify this accountability. Refusing to disclose the facts is a cowardly and sinister act as well. But you may change your ways today. Stop coercing people to act against their will. You are not God, and have no right to choose another person's fate.
After enough people have begun exercising their right to choose for or against the shots, the truth will begin to emerge. If unvaccinated people die from a disease, we must respect that it was their choice to go unvaccinated, or the choice of family members who deeply loved them. That family should not be persecuted and exhibited before the public, at least not any more than the family of a vaccine-damaged child should be. Each child and family member needs our love and understanding. And if the outcome scares other people into lining up to get the shots, that will be their choice as well, just as others will reject the vaccines following stories of serious vaccine-related damage. In other words, natural "marketplace" forces will determine who chooses to be vaccinated and who rejects the shots.
Longitudinal Studies: At this time, legitimate scientific research, using genuine control groups, needs to be conducted. Longitudinal studies (over time) of vaccinated versus unvaccinated children are needed to accurately measure the true extent of adverse events and the actual incidence of disease. To determine the true effects of a new vaccine it should be administered to one group of children (the vaccinated) and not to another (the vaccine-free), according to the wishes of their parents, of course. Then, to assess the benefits and risks of the vaccine, several factors must be evaluated, starting with the incidence and severity of the sickness. How many children in the vaccinated group caught the disease against which they were vaccinated? How many in the unvaccinated group?
Acute and chronic afflictions should be tracked as well -- the number and severity of major and minor ailments. For instance, are children in one group more susceptible to ear infections, multiple sclerosis, or childhood leukemia? Children in both populations should be evaluated from early childhood through adulthood for vision, hearing, fine motor coordination, IQ, learning disabilities, emotional development, socialization, psychological stability, levels of socioeconomic attainment, and other measures of developmental well-being. Control-group tracking will produce honest information on which to base future decisions.
Children Need to Be Screened: In the meantime, children need to be screened for contraindications before receiving any shots. The vaccine administrator should be required to ask parents specific questions designed to evaluate the likelihood of a severe reaction. A checklist for this purpose should be used. Is the child allergic to eggs? Has the child been well during the last few days? What is the family health history? Did you notice anything unusual or out of the ordinary -- possible adverse vaccine reactions -- following previous shots? These are the sort of questions that need to be asked. On the other hand, screenings will not guarantee your child's safety. There are no assurances against vaccine damage other than abstaining from the shots.
Maintaining Professional Integrity: In spite of the inherent dangers associated with vaccines, longitudinal studies and rigorous screening procedures are not yet what the doctors have ordered. Instead, the medical community is moving full speed ahead -- on a crash course with an irrevocable fate of global proportions. Vaccine policymakers harbor grand plans to conquer with some sort of pill or injection just about any imaginable condition: colds, diarrhea, cancer -- even conception! But they should be considering ways instead to compromise on this issue and maintain their professional integrity. Once again, I recommend beginning this process by 1) providing easy access to unbiased vaccine information, and 2) encouraging freedom of choice. This gargantuan plight needs to be confronted; it isn't going away on its own.
The government wants to establish a national computerized vaccine tracking system. Now is the time for the designers to assess their motivations. Is it to monitor families who are resisting or to begin the process of assessing the ramifications of choice -- the true risks and benefits? Will these computers represent Big Brother at his worst, a sinister plan to manipulate the masses -- ploy fodder for the CDC and other members of the medical fraternity -- or will they be overseen by an impartial committee of concerned people? In other words, is the fox still guarding the chicken coop? These are questions lawmakers need to consider -- in spite of their personal views or political ties concerning this matter. Come forward, brave and moral leaders. Take a stand for the future and do the right thing. This issue is too large to keep under wraps much longer anyway. The masses are catching on, and time is running out.
To those of you who, after reading this expose', are moved to experience the collective pain of humanity, be sure to allow the information time to settle in. There is a lot to process, and you will need time to adjust to the realizations. Your mixed feelings are only natural -- compassion for the babies, empathy for the parents, horror at the perpetrators, as well as a chilling sense of the global ramifications. For anyone else who may be angered or confused by the information presented here, try to realize that I am not the shadow; I am simply reflecting it for all to see. I am sorry if you are offended or horrified by the perceived implications.







Adieu

Dear members of the medical vaccine community: I forgive you. However, I cannot speak for other moms and dads; their anguish needs time to heal. It may not show, but I also love you. I love you for what you originally tried to accomplish, and in spite of what you've done. Some of you are beacons of light on the wrong path. If you know it, step off. Take another route. There are many ways to contribute to humanity.



This article was excerpted from the vaccine archives of Neil Z. Miller.
 (सतीश प्रधान)

Sunday, 8 January 2012

असली लोकतंत्र अमेरिका में है, भारत में नहीं


बुद्धिमान, राष्ट्रभक्त और कामयाब नेतृत्व के धनी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी पत्नी  और बच्चों के साथ

          लोकतंत्र की बात की जाय तो भारत के मुकाबले अमेरिका में लोकतंत्र ज्यादा मज़बूत  है।  भारत में तो सत्ता,वसीयत से संचालित हो रही है। अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की अलग-अलग वसीयतें हैं। कांग्रेस पार्टी,नेहरू परिवार की वसीयत से संचालित हो रही है,तो समाजवादी पार्टी,मुलायम सिंह यादव के वसीयतनामे से। राष्ट्रीय जनता दल,लालू यादव के वसीयतनामे से संचालित है तो एम.जी.रामचन्द्रन की अन्नाद्रमुक उनकी प्रेमिका जयललिता के वसीयतनामे से। ले-देकर मुख्य रूप से इस देश की तीन ही राजनीतिक पार्टियां हैं जो बगैर किसी वसीयतनामे के संचालित हो रही हैं,जिनमें एक है भारतीय जनता पार्टी, दूसरी है,बहुजन समाज पार्टी तथा तीसरी है कम्युनिस्ट पार्टी। इन तीनों पार्टियों का यदि विश्लेषण किया जाये तो कम्युनिस्ट पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ही आज की तारीख में ऐसी राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी है,जो न तो वसीयतनामे से संचालित हो रही है और न ही आज तक ऐसा कुछ देखने-सुनने को मिला है कि बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने अपने किसी रिश्तेदार को सांसद, विधायक, पार्षद अथवा ग्राम प्रधान बनवा दिया हो।
          वंशवाद की बेल पर फलफूल रही दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत है हिन्दुस्तान। भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी खास व्यक्ति अथवा परिवार से ही जानी जाती हैं, जैसे कि औद्योगिक घराने जाने-पहचाने जाते हैं,उनके पुरखों के नाम से। परिवार और पार्टी एक-दूसरे के पर्यायवाची हो गये हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का चाहे वह कितना ही अच्छा हो,सभ्य एवं सुसंस्कृत हो,ईमानदार हो, जनता के भले की सोचता हो, जिसका मोरेल ऊंचा हो,जिसमें राष्ट्रभक्ति कूट-कूट कर भरी हो,यदि किसी राजनीतिक परिवार का सदस्य या कृपापात्र नहीं है तो सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
          कहा जाता है भारत, अमेरिका की नकल करता है, उसके इशारे पर नाचता है तथा उसके द्वारा निर्देशित नीतियों को अपने देश में जबरन लागू भी कराता है, लेकिन मुझे तो लगता है कि भारत का राजवंश, अभी तक अमेरिका की बेहतरीन लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही अनुशरण ही नहीं कर पाया है। कौन नहीं जानता कि अमेरिकी इतिहास ने जब करवट ली तो श्वेत जनता ने अपने यहां एक अश्वेत व्यक्ति बराक ओबामा को राष्ट्रपति का पद सौंप दिया। 
          श्वेत जो कि अश्वेतों से बेइंतहा नफरत करते हैं,उन्होंने ऐसा इतिहास रचा कि पूरे विश्व को उसका कायल होना पड़ा। समय था वर्ष 2009, अमेरिका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति का चयन,पूरा जगत स्तब्ध,चहुं ओर एक ही सवाल? आखिरकार कौन है यह राष्ट्रपति। सच मानिये राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की घोषणा से पहले बहुत कम लोग ही बराक ओबामा के बारे में जानते थे। नीचे के स्तर पर सुस्थापित, सक्षम, पैने, होशियार, बुद्धिमान, काबिल और कामयाब नेतृत्व के धनी बराक ओबामा जैसे व्यक्तित्व का अमेरिका जैसे देश की बागडोर संभालकर विश्व पटल पर छा जाना किसी बहुत बड़े चमत्कार से कम नहीं है। इसे कहते हैं बेहतरीन लोकतंत्र की नायाब मिसाल, जिसकी आधारशिला रखी है पूरे अमेरिकी समाज ने और आज जिसके वाहक हैं राष्ट्रपति बराक ओबामा। क्या आप सपने में भी सोच सकते हैं कि भारत में ऐसे व्यक्तित्व का कोई ओबामा,किसी गैर राजनीतिक परिवार से निकलकर सत्ता के शीर्ष पर पहुंच सकता है? कदापि नहीं। यहां सरदार जी के बारे में जरा भी सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे तो राजवंश परिवार के एक मैनेजर भर हैं जो भारतीय इस्टेट की देखभाल, राजवंश के इशारे पर कर रहे हैं।
          भारतीय लोकतंत्र में, बात चाहे जीतने वाले उम्मीदवार की, की जाये अथवा युवा नेतृत्व की, चयन की प्रक्रिया घर से ही शुरू होती है और घर में ही लक्ष्य की प्राप्ति कर लेती है। शुरुआत करते हैं देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस से। वर्तमान में नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी का नेतृत्व भारत के मत्थे मढ़ने के लिये उनकी माँ सोनिया गांधी छटपटा रही हैं। कांग्रेस में परिवारवाद की बीमारी, कैंसर के रोग की तरह है जिसके निदानपूंर्ण इलाज के लिए अभी भी रिसर्च की आवश्यकता है।
          वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करते-करते भारतीय जनता पार्टी को भी वंशवाद का रोग लग गया है, यह अलग बात है कि भाजपा में उसने अभी राजवंश का रूप नहीं लिया है। भाजपा के अन्दरखाने तो परिवारवाद फल-फूल रहा है लेकिन शुक्र है कि राष्ट्रीय नेतृत्व किसी वसीयतनामे से संचालित नहीं हो रहा है। कांग्रेस के विरोध स्वरूप उपजे अन्य राजनीतिक दलों की बात करें तो राष्ट्रीय जनता दल के लालू यादव ने अपने सत्ता से हटने के बाद अपनी पत्नी राबड़ी देवी को ही बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। उनका दल एक तरह से वंशवाद की परिभाषा तले ही आता है। उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में हिस्सा ले रही समाजवादी पार्टी के स्वत्वाधिकारी एवं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अपने सगे बेटे अखिलेश यादव को पार्टी का नया चेहरा बना दिया है। यह पार्टी भी वंशवाद का ही अनुशरण कर रही है।
          समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं, मुलायम सिंह यादव। उनके भाई, रामगोपाल यादव, पार्टी के महासचिव होने के साथ-साथ राज्यसभा सदस्य एवं पार्टी के प्रवक्ता भी बना दिये गये हैं। प्रवक्ता का पद अभी हाल ही में उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन सिंह से छीनकर दिया गया है। घ्यान रहे मोहन सिंह उनके परिवार से नहीं थे इसीलिए पद छीनने में कोई ज्यादा सोचने समझने की जरूरत नहीं पड़ी। मुलायम सिंह के दूसरे भाई शिवपाल सिंह यादव, उ.प्र.के निवर्तमान नेता विरोधी दल तथा विधायक हैं। मुलायम सिंह यादव के सुपुत्र अखिलेश यादव, उ.प्र.समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं सांसद हैं। इनकी पत्नी डिम्पल यादव भी फिरोजाबाद से संसदीय चुनाव लड़ी थीं,हार गयीं वरना वह भी सांसद होतीं। मुलायम के भतीजे धर्मेन्द्र यादव भी सांसद हैं। लोगों का ऐसा कहना है कि इस परिवार का कोई सदस्य ऐसा नहीं है जो 25 वर्ष से अधिक का हो और विधायक अथवा सांसद न हो। कुल मिलाकर, यह एक लिमिटेड कम्पनी ही है,जिसके 51 प्रतिशत शेयर इसी परिवार के पास हैं और सारा प्रबन्धतंत्र इन्हीं के हाथ में है। पूरा परिवार जब खाने की टेबल पर बैठ जाये समझ लीजिए समाजवादी पार्टी की कैबीनेट बैठी हुई है।
          इसी सप्ताह इस कम्पनी में नरेश अग्रवाल अपने पूरे कुनबे सहित यह कहकर समाहित हो गये हैं कि अब जाकर राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ हूं। जब तक मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बना लेता चैन से नहीं बैठने वाला। ऐसा कहकर उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि वे जिसे चाहें मुख्यमंत्री बना सकते हैं क्योंकि उनमें स्वंय मुख्यमंत्री बनने की क्षमता नहीं है,इसलिए किसी दूसरे नेता को ही मुख्यमंत्री बनवाना उनकी मजबूरी है। उन्होंने कहा कि जो गलती हुई उसके लिये क्षमा चाहता हूं। नेता जी आपका ऋण अदा करके ही रहूंगा। (30 दिसम्बर को समाजवादी पार्टी ज्वाइन करते वक्त नरेश अग्रवाल द्वारा व्यक्त किये गये उदगार)  इससे पूर्व जब 28 मई 2008 को सपा छोड़कर बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुए थे तो क्या कहा था, वह भी देखिए।
          समाजवादी पार्टी, परिवार तक सीमित रह गयी है। अब पूरा राजनीतिक जीवन मैं बहिन जी को अर्पित कर रहा हूं। मेरे बाद मेरा बेटा नितिन उनके साथ रहेगा। मायावती जी भावी प्रधानमंत्री ही नहीं देश की कर्णधार भी हैं। उनकी कथनी-करनी में कभी अन्तर नहीं रहा है। बहुजन समाज पार्टी से सांसद एवं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव नरेश अग्रवाल अपने पूरे कुनबे सहित फिर से हांथी से फिसलकर गिर पड़े और साइकिल पर सवार हो गये हैं। उनके पुत्र नितिन अग्रवाल,हरदोई से बसपा विधायक हैं। नरेश अग्रवाल के भाई व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल, इनकी पत्नी व जिला पंचायत अध्यक्ष कामिनी अग्रवाल और पूर्व विधान परिषद सदस्य राजकुमार अग्रवाल,बावन की बसपा विधायक राजेश्वरी ने सपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। परिवारवाद की यह संक्रमणीय बीमारी वह कांग्रेस से ही लेकर आये हैं।
          नरेश अग्रवाल मूल रूप से कांग्रेसी हैं। वह कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं। वर्ष 1997 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपनी लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी बना ली थी और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री बने थे। इसके बाद वह समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री बने। 2007 में वह सपा के टिकट से ही जीते लेकिन पांच सालों के घने अंधेरे की रेप्लिका देखने के बाद 28 मई 2008 को वह इसी तरह बसपा में शामिल हुए थे। बसपा ने उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाने के बाद राज्यसभा सदस्य भी बनवा दिया। अब जबकि उनका कार्यकाल अप्रैल 2012 में समाप्त हो रहा है, अपने नफे-नुकसान का आंकलन करते हुए (चुकि वे वैश्य जाति के हैं) पूरे परिवार सहित सपा में चले गये हैं।
          राष्ट्रीय स्तर की बहुजन समाज पार्टी जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती हैं, जरूर राजवंश की बीमारी से ग्रस्त नहीं हैं,लेकिन उनकी पार्टी में भी परिवारवाद की वंशबेल के रूप में छोटे-छोटे मनी प्लान्ट बड़ी खूबशूरती से फल-फूल रहे हैं। बसपा में राजवंश तो दिखाई नहीं दिया, बावजूद इसके कि सुश्री मायावती का भरा-पूरा परिवार है। उनके परिवार में माता-पिता, भाई-बहन सभी मौजूद हैं, इसके बाद भी उनका एक भी परिवारी न तो विधायक है, न ही सांसद। लेकिन उनकी पार्टी परिवारवाद को सींचने का काम क्यों कर रही है,चिंतन का विषय है। उनकी सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी, विधान परिषद की सदस्य बना दी गयी हैं। बसपा सांसद, बृजेश पाठक की पत्नी नम्रता पाठक, उन्नाव से बसपा प्रत्याशी हैं तथा उनके साले अरविन्द त्रिपाठी भी विधान परिषद सदस्य हैं। बहुजन समाज पार्टी में ही रामवीर उपाध्याय, ऊर्जा मंत्री की पत्नी सीमा उपाध्याय, बसपा सांसद हैं, उनके भाई मुकुल उपाध्याय, विधान परिषद सदस्य हैं तथा एक अन्य भाई डिबाई विधान सभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा के ही मंत्री हैं, स्वामी प्रसाद मौर्या, जिनके पुत्र एवं पुत्री बसपा से प्रत्याशी बनाये गये हैं। बसपा के ही एमएलसी हैं, रामचन्द्र प्रधान, जिनके भाई धर्मेन्द्र प्रधान जिला पंचायत अध्यक्ष हैं और पत्नी अनीता प्रधान को राजनीति में लाने की तैयारी है।
          जम्मू-काश्मीर में शेख अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला के बाद अब उमर अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की कमान संभाले हुए हैं। विपक्ष की भूमिका में मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पुत्री महबूबा ही हैं। महाराष्ट्र में ठाकरे और शरद पवार परिवारवाद की मैट्रो ट्रेन को स्पीड पकड़ाये हुए हैं। पंजाब में प्रकाश सिह बादल का पूरा परिवार राजनीति में प्रवेश कर गया है। प्रकाश सिह बादल, मुख्यमंत्री और अकाली दल के मुखिया हैं। इनके बेटे सुखबीर सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री एवं पार्टी अध्यक्ष हैं। इनकी पुत्रवधू हरसिमरत कौर बादल,सांसद हैं। पुत्र सुखबीर के साले विक्रम मजीठिया, विधायक और युवा अकाली दल के अध्यक्ष है। बादल के भतीजे, मनप्रीत बादल, पूर्व मंत्री हैं तथा नई पार्टी का गठन किया है। बादल के दामाद आदेश प्रताप सिह कैरों,कैबिनेट मंत्री हैं, जो सुरिन्दर प्रताप सिंह केरों, पूर्व सांसद के पुत्र तथा स्व0 प्रताप सिंह कैरो पूर्व मुख्यमंत्री के पौत्र हैं।
          ओडीशा में बीजू पटनायक के बाद,उनकी पार्टी ने उनके बेटे नवीन पटनायक को ही सबसे उपयुक्त माना है। राजस्थान में विपक्ष में बैठी वसुन्धरा राजे ने अपने बेटे दुश्यंत सिंह को सांसद बनवा दिया। वसुन्धरा राजे द्वारा, ऐसा किया जाना अचरज उत्पन्न नहीं करता क्योंकि वह तो राजवंश की हैं ही। मध्य प्रदेश का ग्वालियर क्षेत्र परिवारवादी राजनीति का ही नमूना है। तमिलनाडु में कलैगनार कुनबा और उसकी सियासत तमिलनाडु को ही नहीं अपितु केन्द्र को भी प्रभावित करता है। सूबे की सत्ता में बैठी अन्नाद्रुमक पार्टी में एम.जी.रामचन्द्रन की राजनीतिक विरासत पत्नी के बजाये प्रेमिका जे. जयललिता के हाथ में होना भी परिवारवाद के अन्तर्गत ही कहा जायेगा। 

         आन्ध्र प्रदेश में फिल्म अभिनेता स्व.एन.टी.रामाराव का परिवार पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में विराजमान हैं। बेटी डी पुरंदेश्वरी केन्द्र की कांग्रेस सरकार में मंत्री है तो दामाद चन्द्रबाबू नायडू विपक्ष की तेलगुदेशम पार्टी के बरसों से मुखिया हैं। राजवंश की पोषक,कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी ने जो फार्मूला अपने लिये अपनाया हुआ है, उसी फार्मूले के आधार पर, हेलीकॉप्टर हादसे में मारे गये मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की जगह उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी को आन्ध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया, जिसके फलस्वरूप कांग्रेस को विभाजन झेलना पड़ा।
          भारतीय राजनीति में वंशवाद अथवा परिवारवाद की परम्परा बड़ी तेजी से फल-फूल रही है और यह प्रवृत्ति देश हित के बजाय स्वहित का पोषण कर रही है, इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के लिये हानिकारक ही नहीं अपितु खतरनाक भी है। (सतीश प्रधान)