Monday, 20 February 2012

भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार

          भारत में जमीन की रजिस्ट्री, खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, जिन्दा को मृतक दर्शाकर उसकी भूमि हड़पने (वर्ष 2009 तक अकेले उ0प्र0 में सम्पत्ति हड़पने के लिए राजस्व विभाग के अभिलेखों में 221 कृषकों को जिन्दा रहते मृत दिखाया गया) तथा विरासत दर्ज करने के साथ-साथ भूमि के अधिग्रहण में हर वर्ष हजारों करोड़ रूपयों की भारी भरकम रकम घूस के रूप में सरकार, सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। ध्यान रहे ये जमीनें यहॉं की जनता की अपनी पुश्तैनी हैं। जिन पुश्तैनी जमीनों को जनहित के नाम पर सरकारें, कानून की आड़ में पुलिस के बल पर जबरन अधिग्रहीत कर उसके उपयोग को लैण्ड यूज के माध्यम से रिहायशी, कामर्शियल, औद्योगिक एवं पर्यटन करके भूमि अधिग्रहण का खेल, खेल रही हैं, उनमें करोड़ों रूपयों का वारा न्यारा हो रहा है।
          स्ंयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन, एफ0ए0ओ0 (फूड एण्ड एग्रीकल्चर आरगेनाइजेशन) एवं ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल ने मिलकर एक अध्ययन किया है, जिसमें भारत में जमीन की रजिस्ट्री, उसकी नकल आदि में ही 3700 करोड़ की रिश्वत सरकारी अधिकारियों द्वारा लिये जाने का निष्कर्ष निकाला गया है। दोनों संगठनों ने संयुक्त रूप से भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक अध्ययन रिर्पोट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि कमजोर प्रशासन की वजह से जमीन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। इस अध्ययन के अनुसार जमीन सम्बन्धी मामलों में भ्रष्टाचार देश के विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। यह अध्ययन 61 देशों में किया गया है तथा अध्ययन के मुताबिक जमीन को लेकर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार छोटी-छोटी रिश्वत के रूप में विद्यमान है। वहीं दूसरी ओर ऊंचे स्तर पर सरकारी ताकत, राजनीतिक रूतबे और कार्पोरेट अर्थतन्त्र के गठजोड के कारण, यह बहुत बड़े स्कैम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
          सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों को कार्पोरेट घराने जमीन हथियाने या कहिए अपना बहुत बड़ा लैण्ड बैंक बनाने के लिए उन्हें मूंह मांगी रिश्वत और सुरा-सुन्दरी की सुविधा देकर अपने मन मुताबिक नचा रहे हैं। अंर्तराष्ट्रीय स्तर की इन दो बड़ी संस्थाओं ने जमीन से जुड़े इस सबसे बड़े सच पर पर्दा डालने का काम क्यों किया आश्चर्य का विषय है! अध्ययन के माध्यम से घूस की जिस रकम का खुलासा किया गया है, उसका वास्तविकता से कोसों दूर का भी नाता नहीं है। यह रकम 70 करोड़ डॉलर बताई गई है, जबकि यह असली घूस 34500 करोड़ रूपये का पसंगा भी नहीं है।
          भारत के ही एक राज्य में केवल भू-अधिग्रहण मामले में ही 70 करोड़ डॉलर से दस गुना अधिक यानी 34500 करोड़ रूपये, सरकार, सरकारी प्रशासनिक अधिकारियों यथा भूमि अध्याप्ति अधिकारी, ए0डी0एम0, जिलाधिकारी, आयुक्त, सचिव, तथा राजस्व से जुड़े अधिकारियों यथा तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल के साथ ही राजनीतिक व्यक्तियों को रिश्वत के रूप में दी गई है, जिसमें राजनीति के निचले पायदान पर बैठा ग्राम प्रधान भी भरपूर लाभान्वित हुआ है। पंचायत-पंचायत, ब्लॉक-ब्लॉक, तहसील-तहसील, परगना-परगना, जिला-जिला भारतीय भूमिधरों को गिरोहबन्द तरीके से लूटा गया है। उनकी पुश्तैनी जमीन पर राजस्व से जुड़े अधिकारियों ने गिद्ध दृष्टि लगाकर उनका दोहन किया है। इन सबके बीच अभी चकबन्दी विभाग की चर्चा होना बाकी है।
          देश को स्वतन्त्र हुए 64 वर्ष हो गये लेकिन क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि अभीतक उत्तर प्रदेश में चकबन्दी ही पूरी नहीं हो पाई है। क्या यह दुर्भाग्य अथवा लूट का विषय नहीं है कि आजतक चकबन्दी विभाग बदस्तूर चालू है। लूट के दम पर खड़ा यह विभाग आजतक मजे मारते हुए मलाई काट रहा है। सहायक चकबन्दी अधिकारी स्तर के कई कर्मचारी करोड़पति हैं। जनता की सहूलियत के लिए बनाया गया यह विभाग जनता के लिए लुटेरा बन चुका है। दोनों संगठनों ने ऐसा अध्ययन 61 देशों में किया जाना बताया है, जिसमें भारत भी एक है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों से ऐसे लचर अध्ययन की उम्मीद नहीं की जाती है। इन संस्थानों ने या तो अध्ययन ही लचर तरीके से किया अथवा उसकी रिर्पोट प्रस्तुत करने में गोल-माल कर दिया। या जिन संस्थाओं/एन0जी0ओ0 के माध्यम से इसका अध्ययन कराया गया उनको राजस्व विभाग और यहॉं के किसानों/भू-मालिकों की तकलीफ का अन्दाजा ही नहीं था। उन्हें शायद पता ही नहीं कि राजस्व विभाग का एक अदना सा कर्मचारी लेखपाल, किसी जागीरदार से कम नहीं है।
          भारत की जमीन का एक-एक इंच टुकड़ा, बगैर लेखपाल की सहमति के आप इधर से ऊधर नहीं कर सकते। भारत का सुप्रीम कोर्ट और राजस्व अधिनियम चिल्ला-चिल्ला कर कुछ भी कहते हों, लेकिन वह नियम के हिसाब से तभी काम करेगा जब उसकी जेब गरम हो जायेगी। खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, और वसीयत दर्ज कराने एवं जमीन की रजिस्ट्री कराने में कई हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष सरकारी कर्मचारियों की जेब में चले जाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्व विभाग के इन अदने से कर्मचारियों (लेखपाल) के पास सैकड़ों बीघे के फार्म हाऊस के साथ ही करोड़ों रूपये के बैंक बैलेन्स हैं।
          अध्ययन में यह बताया गया है कि जमीन सम्बन्धी भ्रष्टाचार भारत तक ही सीमित नहीं है, यह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ऐसा अध्ययन भारत के लिए किसने किया और किस स्टेट एवं जनपद में किया गया पता नहीं। हिन्दुस्तान में सारा खेल जमीन का ही है। यह हिन्दुस्तान ही है, जहॉं मुस्लिमों ने 700 वर्षों तक शासन किया और उसके बाद अंग्रेजों ने 200  वर्षों  तक शासन किया। इसके बाद देश स्वतन्त्र हुआ और यहीं के तथाकथित गोरे दिखने वाले दिल के कालों के हांथ में अंग्रेजों ने सत्ता सौंप दी। असली काला तो गोली खाकर हे-राम हो गया और गोरे से दिखने वाले कालों ने यहॉं के राजाओं का प्रीवीपर्स छीन लिया। 543 इस्टेट 543 संसदीय क्षेत्र में तब्दील हो गये। राजाओं की जगह सांसद आ गये और बस बन गया झमाझम लोकतन्त्र।
          राजाओं को सरवाइव करने के लिए अपनी जमीनें बेंचनी पड़ रही हैं। धीरे-धीरे विकास के नाम पर यहॉं की जनता की एवं राजाओं की जमीनें इन नये पैदा हो रहे सांसदों, ब्यूरोक्रेट्स और कार्पोरेट घरानों के हांथ में आना शुरू हो गईं। असली राजाओं का वंश तबाह होने लगा और नकली राजाओं की फौज खड़ी होने लगी। वाजिदअली शाह के खान्दानी चाय बेचने लगे और चाय बेचने वालों के खान्दानी एवं नहर के किनारे से सत्ता में आये लोग विकास के नाम पर लूट मचाकर विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने लगे।
          आज की तारीख में सत्ता से जुड़ा कौन सा ऐसा सांसद है जिसकी हैसियत किसी राजा से कम है। केवल घड़ी का डायल बदला है, अन्दर खाने वही 35 रूपये वाली मशीन लगी है जो आपके हांथ की घड़ी भी चला देगी और घंटाघर की घड़ी भी। क्या इन दोनों ऐजेन्सियों का संयुक्त अध्ययन एक औपचारिकता तो नहीं थी? अध्ययन किसी और मकसद की पूर्ति के लिए किया गया और परिणाम कुछ और दिखाया गया है।
          एफ0ए0ओ0 के अध्ययन में तो यह स्पष्ट रूप से आना ही चाहिए था कि पहले कितने हेक्टेयर पर कृषि होती थी और वर्तमान में कितने हेक्टेयर क्षेत्र पर कृषि हो रही है। कौन-कौन सी पैदावार की कमी आ गई है। कौन सी फसल नदारत हो गई है, और किसकी पैदावार बढ़ गई है। पूर्व में उत्पादन कितना था और अब कितना रह गया है। कृषि क्षेत्र कितना सिकुड़ गया है, आदि-आदि। खाद्यान्न जो भी पैदा होता है, गोदामों की कमी, ऊंचे परिवहन भाड़े के कारण या तो खपत की जगह तक ही नहीं पहुंच पाता अथवा एफ0सी0आई0 के गोदामों में सड़ा दिया जाता है । व्यक्ति और खाद्यान्न के बीच के गैप को पूरा करने के लिए मंत्रीगण आयात का रास्ता खोलते हैं और करोड़ों डॉलर खर्च दिखाकर उसका कमीशन विदेशी बैंकों में जमा करा देते हैं। ऐसे ही कालेधन को भारत में लाने की मांग हो रही है।(सतीश प्रधान)

Saturday, 18 February 2012

ऐलोपैथ के दम का नहीं, सब कुछ

          सोनिया गॉंधी द्वारा अपरोक्ष रूप से संचालित मनमोहन सरकार जहॉं एक ओर बाबा रामदेव को परेशान करके उन्हें बेइज्जत करने और उन्हें बदनाम करने का कोई मौका न चूकने का प्रयत्न करती है, वहीं दूसरी ओर भारत का केन्द्रीय योजना आयोग, आयुर्वेद एवं योग गुरू बाबा रामदेव के गुणों एवं उनकी गहन जानकारी का इस्तेमाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में करना चाहता है। इसीलिए वह चाहता है कि भारत की सरकार योग गुरू बाबा रामदेव की ओर दोस्ती का हांथ बढ़ाए।
          योजना आयोग ने स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसी कई सिफारिशें की हैं। उसने ऐलोपैथ डॉक्टरों को भी आयुर्वेद और योग के नुस्खे पढ़ाने को बेहद जरूरी बताया है। कहावत है कि जब जागो तभी सवेरा, इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि चलिए देर से ही सही, योजना आयोग को यह सोचने पर मजबूर तो होना पड़ा कि आयुर्वेद और योग हमारी थाती हैं और इससे किसी भी तरह की बीमारी से आसानी से एवं बगैर किसी साइड इफैक्ट के पार पाया जा सकता है। आयुर्वेद हो अथवा होम्योपैथी, इनमें सर्जरी की आवश्यकता ही नहीं होती, इसीलिए बगैर सर्जरी इसके द्वारा सम्पूर्ण इलाज सम्भव है। सर्जरी की आवश्यकता ऐलोपैथ में होती है, इनमें नहीं।
          ऐलोपैथी में सर्जरी की व्यवस्था के ही कारण मानवअंग तस्करी जोर-शोर से फलफूल रही है। आज के समय में किसी की भी किडनी निकाल लेना कोई बड़ी बात नहीं है। अभी हाल ही में ऐसा मामला लखनऊ में पकड़ा गया है जहॉं बिल्कुल बेवकूफ बनाकर कई लोगों की किडनी निकाल ली गई। नोएडा का बहुचर्चित निठारी काण्ड भी इसी का नतीजा था, लेकिन इसके तस्कर देश के समाने नहीं लाये गये, क्योंकि वे नामचीन लोग थे।
          योजना आयोग की स्वास्थ्य सम्बन्धी संचालन समिति ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हर हिन्दुस्तानी तक इलाज के साधनों को मुहैय्या करवाना बेहद जरूरी बताया है। उसने सारे तथ्य एकत्र कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सिर्फ ऐलोपैथी के दम पर यह काम पूरा किया जाना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। इस लिहाज से आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी जैसी इलाज की विधियों की अधिक से अधिक मदद ली जानी चाहिए। अपनी सिफारिश में उसने पारम्परिक चिकित्सा पद्वतियों में काम कर रहे बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ जैसे गैर-सरकारी संगठन के काम को बढ़ावा देने के लिए इनकी मदद करने को बेहद जरूरी बताया है। सरकार के लिए बाबा रामदेव जैसे योग और आयुर्वेद के गुरूओं की मदद लेना क्यों जरूरी बताया गया है, इस विषय पर आयोग के एक सदस्य का कहना है कि सरकार खुद ही दवा बनाने की विधि तय करे, फिर दवा बनाए, इसके बाद सभी तक इसे पहुचाए और फिर उस पर नज़र भी रखे यह एक तो मुमकिन नहीं, दूसरे यह सरकार का काम भी नहीं है।
          इसी पर मेरा मानना है कि सरकार का काम न तो किसी चीज का उत्पादन करना है, ना ही उसकी मार्केटिंग करना है, ना ही उसका वितरण करना। सरकार का काम तो जनहितकारी नीति बनाना और उसका पालन सुनिश्चित कराना होता है। सरकारें यदि लाभ कमाने के फेर में लग जायेंगी तो हो गया कल्याण! सारे सरकारी निगम इसीलिए बन्दी के कगार पर, जबरदस्त घाटे में और दुखदायी हो गये कि उसमें बैठे सरकारी अधिकारी और उसे देखने वाले मंत्री अपने-अपने लाभ के लिए उस निगम का दोहन करने लगे।
          योजना आयोग से पहली बार ऐसी कोई सिफारिश बाहर आई है, जिससे लगता है कि वास्तव में योजना आयोग यहॉं की जनता के स्वास्थ्य के प्रति फिकरमन्द है। उसका कहना है कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन बाबा रामदेव जैसे कुछ संगठनों और लोगों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। उसका मानना कि इस सिफारिश की पूर्ति के लिए आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों को आगे बढ़ाना ही होगा।
          इसी के साथ योजना आयोग चाहता है कि ऐलोपैथ के डॉक्टर अब योग और आयुर्वेद से नाक-भौं सिकोड़ना बन्द कर खुद भी अपने मरीजों पर इन्हें आजमाएं। आयोग ने साफ तौर पर सिफारिश की है कि ऐलोपैथी चिकित्सा के एमबीबीएस पाट्यक्रम में योग और आयुर्वेद को भी शामिल किया जाये। योजना आयोग के अनुसार आयुर्वेद, योग, यूनानी, और होम्योपैथी जैसी पद्वतियों को शामिल करते हुए अनिवार्य स्वास्थ्य पैकेज और लोक स्वास्थ्य के आदर्श माड्यूल तैयार किए जाएं और उन्हें इन पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाये।
प्रतिष्ठित सरकारी एवं प्राइवेट अस्पतालों का हवाला देते हुए उसने कहा है कि एम्स जैसे अस्पतालों में भी आयुर्वेद और योगा जैसी पद्वतियों के विशेषज्ञों को जरूर शामिल किया जाये। इलाज के साथ ही गम्भीर बीमारियों के मामले में उसके बाद की देख-भाल के लिए भी इसे जरूरी बताया है। वर्तमान में भारत में पारम्परिक चिकित्सा पद्वति के 7.87 लाख डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं। देशभर में ऐसे 3277 अस्पताल, 24289 दवाखाने, 489 कॉलेज और 8644 दवा निर्माण इकाईयां चल रही हैं।
          अन्त में आपको ऐसे आयुर्वेद विशेषज्ञ चिकित्सक के बारे में संक्षेप में बता दूं, जिन्होंने अपनी योग्यता, अनुभव एवं हुनर के बल पर किंग जार्ज मेडीकल कॉलेज और संजय गॉंधी आर्युविज्ञान संस्थान से कैन्सर एवं अन्य गम्भीर बीमारी से ग्रस्त ऐसे मरीजों (अन्तिम समय में यह कहकर लौटाये गये मरीज कि अब इन्हें घर ले जाइये और ऊपर वाले को याद कीजिए) को जिनका अन्त समय निकट था, आयुर्वेद चिकित्सा पद्वति के बल पर न केवल उनके जीवन को आगे बढ़ाया बल्कि उन्हें ठीक भी किया है। उनके इसी प्रयास पर आर्युविज्ञान संस्थान के महानिदेशक उनसे मिलने और उन्हें धन्यवाद देने उनके घर तक गये। ऐसे महान आयुर्वेद चिकित्सक के बारे में पूरी पोस्ट अलग से प्रस्तुत की जायेगी, जिससे गम्भीर बीमारी से जूझ रहे मरीजगण उसका लाभ उठा सकें। (सतीश प्रधान)

Friday, 17 February 2012

क्लीनिकल परीक्षण का फॉलोअप

          दिनांक 5 फरवरी 2012 को ’ऐसे डॉक्टर और केमिस्ट दोनों ठग’ शीषर्क की पोस्ट में आपने पढ़ा कि कैसे हिन्दुस्तान में दवाओं का परीक्षण बिना किसी हिचक व रोक-टोक के यहॉं के चिकित्सालयों, मेडीकल रिसर्च सेन्टर्स, पी0जी0आई0 आदि में किया जा रहा है, जिसमें कितने ही हजार लोगों की जान बगैर यह जाने चली गई कि उनके शरीर के साथ बिना उनकी सहमति के दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। इसी बिना पर तथ्यों पर आधारित एक जनहित याचिका गैर सरकारी संगठन स्वास्थ्य अधिकार मंच ने वकील संजय पारिख के माध्यम से भारत के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर मांग की है, कि आम लोगों पर दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण पर रोक लगाई जाये साथ ही परीक्षण सम्बन्धी नियम कानूनों को चाक चैबन्द करने पर भी जोर दिया जाये।
          संजय पारिख का कहना था कि बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियां ठेके पर रिसर्च कम्पनियों से ये काम कराती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1727 लोगों की ऐसे परीक्षणों से मौत हो चुकी है। ऐसा खेल सिर्फ इन्दौर में ही नहीं अपितू ये पूरे देश में चल रहा है। दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण के लिए भारत के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश राज्य में पिछले साल जून में पूरी हुई राज्य सरकार की जॉंच में यह साबित हो चुका है कि सिर्फ इसी मामले में 3307 लोगों पर ऐसे परीक्षण गैर कानूनी रूप से किये गये। इनमें से 81 मरीजों को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कई मामलों में तो पाया गया कि मुख्य शोधकर्ता ही एथिकल कमेटी के सदस्य भी थे। परीक्षण के लिए भारत में वर्ष 1945 से जो नियम चल रहे थे, उन्हें जनवरी 2005 में बदल कर कम्पनियों के लिए आसान कर दिया गया।
          दरअसल ये बदलाव किया ही गया था इन कम्पनियों के दवाब में। इसके तहत भारत में पहले और दूसरे फेज के परीक्षण काफी आसान कर दिये गये। इसके बाद से सारी दवा कम्पनियों ने परीक्षणों के लिए भारत का रूख कर लिया, क्योंकि यहॉं पर आम आदमी की जान की कीमत बहुत सस्ती और कभी-कभी तो एकदम मुफ्त की होती है। नई दवा मूल रूप से जहॉं खोजी गई होती है, वहॉं या तो उसका क्लीनिकल परीक्षण करने की इजाजत नहीं होती, या फिर यह काम बहुत मंहगा होता है। वैसे तो नियमों में यह प्राविधान होना चाहिए कि केवल भारत में खोजी गई दवाओं के ही क्लीनिकल परीक्षण भारत में होंगे। विदेश में खोजी गई दवा का परीक्षण भारत में किये जाने का क्या औचित्य? लेकिन पता नहीं कि याचिका में इस सम्बन्ध में मांग की गई है अथवा नहीं। याचिका पर सज्ञान लेते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और मेडीकल काउन्सिल ऑफ इण्डिया को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में याचिका का जवाब दाखिल करने को कहा है। देखना शेष है कि अब होता क्या है। (सतीश प्रधान)





Sunday, 12 February 2012

ब्रिटिश लुटेरे

          ब्रिटेन में भारतीय मूल के निवासियों को निशाने पर रखते हुए उनके घरों में सोने की लूट के वास्ते सेंधमारी की जा रही है। दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप के लोग अपनी रूढ़िवादी परम्परा को संजोये हुए, आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए सोना बचाकर रखते हैं। सोने का संग्रहण ही भारतीयों के लिए मुसीबत बन गया है। ब्रिटेन में हथियारबन्द ब्रिटिश लुटेरे मैटल डिटेक्टर के साथ वहॉं बसे भारतीय मूल के निवासियों के घरों में सेंधमारी करके सबकुछ लूटे ले रहे हैं।
          एशियाई मूल के लोगों के घरों में सेंधमारी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए ब्रिटेन की पुलिस ने उन इलाकों में विशेष जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय किया है, जहॉं भारतीय उप महाद्वीप के लोग अधिक संख्या में रहते हैं। भारतीय मूल के लोग बर्मिघम, स्लॉज, ईलिंग, लीसेस्टर, मैनचेस्टर, और ब्रेडफोर्ड में रहते हैं, इसीलिए यह अभियान विशेष तौर पर यहीं चलाया जा रहा है। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही है। ब्रिटेन में मन्दी के बावजूद सोने की कीमतें बढ़ रही हैं, इसी कारण सेंधमार सोने की चोरी को अंजाम दे रहे हैं।
          सोने की रीसेल वैल्यू चूँकि अच्छी है और निशाने पर भारतीय मूल के ही लोग हैं, इसी कारण अपराधियों को भी पता है कि उनके साथ उनकी पुलिस कड़ाई से पेश नहीं आयेगी। वरना क्या कारण है कि विश्वभर में प्रसिद्ध स्कॉटलैण्ड पुलिस के मौजूद रहते केवल भारतीयों के साथ ही इस तरह की घटनायें हो रही हैं। सेन्ट्रल लन्दन स्थित द बैंक ऑफ इंग्लैण्ड के खजाने में 4600 टन स्वर्ण भण्डार सुरक्षित है। सोने की बिस्कुटनुमा 24 कैरेट वाली सिल्लियों के इस भण्डार की कीमत 10035.61 अरब रूपये है। आर्थिक मन्दी से जूझ रहे इंग्लैण्ड -वासियों के लिए इस खजाने का क्या औचित्य है, जब वे मंदी के कारण गलत राह पकड़ रहे हैं। क्या यह ब्रिटेनवासियों के लिए शर्मिंदगी का विषय नहीं है।
          इस खजाने से पूरे विश्व को इंग्लैण्ड यह समझाने की भले ही असफल कोशिश करे कि वह समृद्धशाली है, लेकन सत्यता यह है कि जबतक वह अपने सोने के भण्डार को बेचता नहीं है उसके यहॉं छाई मन्दी के दौर में ऐसी खोखली समृद्धि का क्या फायदा? वर्ष 1991 में भारत पर 163000 करोड़ रूपये का कर्ज था और जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री स्व0 चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार ने 67 टन सोना गिरवी रखकर आई.एम.एफ. से दो अरब डॉलर का कर्ज लिया था।
          भारत की इस नीति का अनुशरण करके ब्रिटेन अपने यहॉ सुरक्षित सोने के भण्डार में से कुछ टन सोना भारत को बेंचकर अपने यहॉं आई मन्दी से सामना करने के साथ ही सेंधमारी करने वाले लोगों में हो रहे इजाफे को कम जरूर कर सकता है। इसी के साथ ब्रिटेन मन्दी की मार से भी राहत पा सकता है। ब्रिटेनवासी कृपया इस पोस्ट पर अपने कमेन्ट प्रेषित कर वस्तुस्थिति से अवगत कराना चाहें। (सतीश प्रधान)


Sunday, 5 February 2012

ऐसे डॉक्टर और केमिस्ट दोनों ठग


          भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय यदि दवा कम्पनियों के दबाब में नहीं आया तो जल्द ही डॉक्टरों और दवा कम्पनियों की मिलीभगत से चलने वाला खेल बन्द हो सकता है। केन्द्रीय योजना आयोग ने मंत्रालय से कहा है कि वह सभी सरकारी और प्राइवेट डॉक्टरों के लिए कम्पनियों के नाम से दवा लिखने पर तुरन्त पाबन्दी लगाये। इसकी जगह उन्हें सिर्फ दवा का जेनेरिक नेम लिखने को कहा जाये। इसी के साथ दवा कम्पनियों के प्रचार और मार्केटिंग के गोरखधन्धे पर भी नज़र रखने को जरूरी बताते हुए योजना आयोग ने कहा है कि इस मद में होने वाले खर्च की पाई-पाई का हिसाब सार्वजनिक किया जाये।
          केन्द्रीय योजना आयोग की स्वास्थ्य संचालन समिति ने अगली पंचवर्षीय योजना के लिए तैयार की गई अपनी रिपोर्ट में दवा क्षेत्र के नियमन को बेहद जरूरी बताया है। डॉक्टर चाहे सरकारी अस्पताल का हो अथवा प्राइवेट अस्पताल का, अथवा अपना क्लीनिक चलाता हो, वह मरीज को केवल जेनेरिक नेम या इंटरनेशनल नान प्रोप्राइटरी नेम(आईएनएन)से ही दवाएं लिखे। साथ ही सरकारी क्षेत्र में दवाओं की खरीद और वितरण के हर स्तर पर भी यही तरीका अपनाया जाये।
          केन्द्रीय योजना आयोग की इस जनहितकारी सिफारिश को अमल में लाते हुए यदि स्वास्थ्य मंत्रालय कुछ माह के अन्दर ऐसा नियम बना देता है तो भारत में दवा कम्पनियों और डॉक्टरों के बीच चल रहा हाई प्रोफाइल गेम बन्द हो सकता है। वर्तमान में दवा कम्पनियां अपनी मार्केटिंग व्यवस्था के तहत डॉक्टरों को तरह-तरह से प्रभावित करती हैं। ए0सी0, टी0वी0, फर्नीचर आदि के साथ इनवर्टर तक दवा कम्पनियॉं डॉक्टरों को मुफ्त में मुहैय्या कराती हैं, जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है, जिन्हें न सिर्फ मंहगी दवाएं ही खरीदनी पड़ती हैं, बल्कि कईबार तो अनावश्यक एण्टी बायोटिक दवाओं का प्रयोग भी करना पड़ता है, जो सीधे-सीधे उसकी किडनी पर प्रभाव डालती हैं। आयोग तो चाहता है कि मंत्रालय सिर्फ ऐसा नियम बनाने तक ही सीमित ना रहे, बल्कि इसकी नियमित जॉच यानी प्रेस्क्रिप्शन आडिट की भी व्यवस्था करे। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय क्या चाहता है यह आपको बाद में बतायेंगे। अभी आपको बताते हैं, उन मेडीकल स्टोर का खेल जो सरकारी अस्पताल के पास अथवा नर्सिंग होम या प्राइवेट अस्पताल के पास अथवा नर्सिंग होम या प्राइवेट अस्पताल में खोले जाते हैं।
          भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के लखनऊ जनपद के तेलीबाग क्षेत्र में रहने वाले रामकुमार श्रीवास्तव के पैर में दर्द था। जब वो इलाज कराने सिविल अस्पताल गये तो डॉक्टर ने पर्चे पर सात दिन की दवाएं लिख दीं। इसमें तीन दवाएं बाहर से खरीदनी थीं। मरीज अस्पताल के सामने स्थित मेडीकल स्टोर पर दवा लेने पहुंचा, तो पता चला कि दवाएं 700 रूपये की हैं। इतने पैसे थे नहीं, लिहाजा मरीज ने केमिस्ट से सात दिन के बजाय दो दिन की दवाएं देने की बात कही, लेकिन केमिस्ट ने इससे इन्कार कर दिया। निराश रामकुमार ने ये दवाएं अपने घर के पास यानी तेलीबाग के आसपास के दवाखानों पर ढ़ूंढ़ने का भरसक प्रयास किया लेकिन निराश हुए। अंततः दो दिन बाद सिविल अस्पताल के सामने आकर सात दिन की दवाएं लीं।
          मरीज का शोषण तीन चरणों पर हुआ। पहला तब जब मरीज को बाहर की दवाएं लिखी गईं। दूसरा तब जब मेडीकल स्टोर पर बैठे केमिस्ट ने उसे दो दिन की दवा नहीं दी, क्योंकि उसे पता है कि मरीज का वापस आना मजबूरी है। ये दवाएं उसे कहीं और मिल ही नहीं सकतीं। मरीज का शोषण तीसरी बार तब हुआ जब अपने घर से सिविल अस्पताल तक उसे महज दवाएं लेने आने-जाने के लिए सौ रूपये किराया खर्च करना पड़ा। यह स्थिति किसी एक मरीज या एक अस्पताल की नहीं है। हर अस्पताल व आसपास स्थित मेडीकल स्टोरों का यही हाल है। यदि मरीज ने छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्व विघालय को दिखाया है तो वहॉं की लिखी दवाएं चिविवि के बाहर मौजूद मेडीकल स्टोर पर ही मिलेंगीं। इसी तरह सिविल अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा लिखी दवाएं उसी अस्पताल के बाहर के मेडीकल स्टोरों पर मिलेंगीं। लोहिया और बलरामपुर अस्पताल भी इससे अछूते नहीं हैं। अस्पताल से मरीज-तीमारदार के निकलते ही मेडीकल स्टोर के लोग उन्हें अपने यहां बुलाने पर आमादा होते हैं।
          मरीजों की जेब पर दवा कम्पनियों और डॉक्टरों की ही नहीं, मेडीकल स्टोर वाले भी नज़र गड़ाए हुए हैं। केमिस्ट महंगी दवाओं की स्ट्रिप काटकर बेचने को तैयार नहीं। डॉक्टर ने दस दिन की दवा लिखी है तो, वे दो-तीन दिन की दवा नहीं देंगे। गरीब मरीजों का हर स्तर पर शोषण हो रहा है। दुखद यह है कि इंडियन मेडीकल एसोसिएशन और केमिस्ट एसोसिएशन इस समस्या से गरीब मरीजों को निजात दिलाने के लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं। (सतीश प्रधान)


Wednesday, 1 February 2012

हिन्दू किशोरियों को नापाक करता पाक

          पाकिस्तान के दक्षिणी हिस्से में बसे प्रमुख शहर करांची में एक हिन्दू किशोरी का पहले तो जबरन धर्म परिवर्तन कराकर इस्लाम कबूल कराया गया और इसके बाद उसकी करांची के ल्यारी क्षेत्र के मुस्लिम अपराधी युवक आबिद से शादी करा दी गई। कहने के लिए वहॉं कि एक स्थानीय अदालत में इस मामले की सुनवाई चल रही है।
          इस लड़की का नाम भारती है, जिससे जबरन इस्लाम कबूल करवाकर उसका नाम आयशा कर दिया गया है। लड़की को जब अदालत में पेश किया गया तो वह काले रंग की मुस्लिम औरतों की पोशाक अबाया पहने हुई थी। उसे इस कदर डराया-धमकाया गया था कि वह अपने माता-पिता तक से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी।
          वैसे भी पाकिस्तान में हिन्दूओं के साथ यह आम बात है। हिन्दू किशोरियों के साथ पहले तो बलात्कार किया जाता है, और यदि ज्यादा शोर-शराबा हुआ तो किसी मुस्लिम के साथ उसकी शादी की रस्म अदायगी कर उसे जायज ठहराने का अम्ली जामा पहनाया जाता है। हिन्दू लड़कियों के साथ ऐसा घिनौना अपराध आम बात है जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है। इसलिए स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि पाकिस्तान में हिन्दू सुरक्षित नहीं हैं।
          मुसलमानों में चूंकि चार शादियां जायज हैं, इसी बिना पर वह हिन्दू लड़कियों के साथ पहले रेप करते हैं, और जब फंसने का नम्बर आता है तो निकाह कर लेते हैं और इसके पश्चात उस लड़की को वेश्या की तरह इस्तेमाल करते हैं। क्या इसके विरूद्ध आवाज उठाने की हिम्मत किसी भारतीय में नहीं है अथवा केवल मंदिर वहीं बनायेंगे और देश को मूर्ख बनायेंगे, इसी नारे से हिन्दुत्व को जिन्दा रखेगी, हिन्दूओं की रहनुमा कहलाई जाने वाली पार्टी क्या पूरे विश्व में फैले हिन्दूओं की रक्षा का दायित्व निभा सकने में असमर्थ है।
          करांची स्थित भारतीय दूतावास क्या कर रहा है, गम्भीर चिंता का विषय है! क्या करांची स्थित दूतावास में माधुरी गुप्ता जैसे ही अधिकारी तैनात हैं जो आईएसआई का पैसा खाकर उनके तलुये चाट रहे हैं? भारत की राजनीति में क्या इस पर किसी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया नहीं आनी चाहिए? कोई ऐसी ठोस व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिससे ऐसी घिनौनी साजिश पर विराम लग सके। (सतीश प्रधान)