Sunday, 4 March 2012

अंर्तराष्ट्रीय मूल्य के बराबर क्यों नहीं भारत में कोयले का मूल्य?


          देश के शीर्ष उघोगपतियों ने भारत की जनता को घुप्प अंधेरे में देखकर और उनके हाल पर द्रवित होते हुए तथाकथित जाने-माने अर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह से व्यक्तिगत रूप से मिलकर भारत के ऊर्जा संकट को दूर करने की गुहार लगाई है। विश्व के कैक्टस, विश्व बैंक ने भी स्वंय तैयार एक अध्ययन के माध्यम से ऊर्जा की उपलब्धता को भारत देश के विकास में एक प्रमुख बाधा बताते हुए उसकी रिर्पोट प्रस्तुत की है। दरअसल ये सारे प्रयास अमीर को और अधिक अमीर बनाने तथा गरीब को और अधिक गरीब बनाने के, चतुराई पूर्वक खेले गये नुस्खे भर हैं। सच्चाई को एक किनारे करते हुए केवल अपने मुनाफे को दिन-प्रतिदिन बढ़ाने की जुगत में लगा रहने वाला प्रत्येक उद्योगपति हर समय अपने फायदे की ही बात सोचता है। वह गरीबों को बिजली मुहैय्या कराने के लिए परेशान नहीं है, बल्कि वह बिजली उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले कोयले के घरेलू उत्पादन और उसके मूल्य को सस्ता रखने के लिए बेहाल है।
          दरअसल उघोगपति बिजली का अधिक से अधिक उत्पादन करने के उत्सुक तो हैं, लेकिन सस्ते भारतीय कोयले से ही बिजली के उत्पादन की शर्त पर। वे चाहते हैं कि उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं, दोनों को लाभ हो, इसलिए उन्होंने फॉर्मूला ढ़ूंढा है कि कोयले का दाम सस्ता रहे तो बिजली का दाम कम होने पर भी उत्पादक लाभ कमा सकेंगे और उपभोक्ता को सस्ती बिजली मिल जायेगी। इसलिए उद्यमियों की मांग है कि कोल इण्डिया द्वारा कोयले के उत्पादन में वृद्धि की जाये और उन्हें सस्ते एवं सबसिडाइज्ड रेट पर कोयला उपलब्ध कराया जाये।
          भारत की 122 करोड़ जनता को पश्चिमी देशों की वर्तमान खपत के बराबर बिजली उपलब्ध कराना भारत की सरकारों के लिए आसान नहीं है, वह भी ऐसे हालात में जबकि इस देश में जिस गॉंव से एक किलोमीटर दूर से भी यदि बिजली का हाईटेंशन केबिल गुजर गया तो वह पूरा गॉंव का गॉंव ही विद्युतीकृत मान लिया जाता है। इसी से आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि इस देश के अधिकतर गॉंवों के हालात कैसे हो सकते हैं। ऐसे ही निरीह लोगों की खातिर, एक अकेले अपने घर का 76 लाख प्रतिमाह का बिजली का बिल देने वाला हमारा उद्योग जगत गम्भीर रूप से चिंतित है और भारत की जनता को सस्ते में बिजली मुहैय्या कराने का बेसब्री से इच्छुक है। जैसे जनहित के नाम पर निरीह किसानों की कृषि भूमि अधिग्रहण के माध्यम से जबरन छीनी जाती है, ठीक उसी प्रकार उनको सस्ते में खाद्यान्न, बिजली, गैस, केरोसिन आयल आदि दिये जाने के नाम पर उन्हें छलने की योजना सलीके से बनाई जाती है।
          सोचनीय प्रश्न यह उठता है कि कोल इण्डिया पर कोयले के घरेलू उत्पादन के लिए इतना जबरदस्त दबाव क्यों? यदि घरेलू उत्पादन कम है तो कोयले का आयात किया जाये, इसमें क्या परेशानी है? उद्यमियों की मांग कुटिलता से भरी, नाजायज और जनता को ठगने वाली ही दिखाई देती है। इन्हें पता है कि धरती पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, फिर भी उनका अंधाधुन्ध दोहन करने के लिए ये उतावले  हैं,  जो भविष्य में निश्चित रूप से भारी संकट पैदा करेगा। इसलिए कोयले, तेल एवं यूरेनियम का दाम बढ़ाकर ऊर्जा की खपत पर अंकुश लगाना ही भारत देश के हित में ही नहीं है, बल्कि जनहित में है। वरना भविश्य की पीढी के लिए हम धरती को खोखला छोड़ने के अलावा और कुछ नहीं दे पायेंगे।
          जबकि दूसरी ओर हमारी संस्कृति यह है कि हम अपने बच्चों क्या पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए इतना छोड़कर मरना चाहते हैं कि उन्हें कुछ करना ही ना पडे़ और वे चैन से बैठे-बैठे खायें। अरबों-खरबों की काली कमाई, सैकड़ों मन चांदी, सैकड़ों किलो सोना, हीरे-जवाहरात, बंगले, कोठी और फार्म हाऊस, और ना जाने क्या-क्या! अपनी आस-औलाद के नाम करने के बाद भी मन नहीं भरता रूकने का। लेकिन किस कीमत पर यह तय नहीं कर पाये हैं, क्योंकि उतना सोचने की इनकी शक्ति ही नहीं है। अमीर केवल गरीब की रोटी छीनकर अपनी तिजोरी भरने में ही लगा हुआ है। वह विश्व का नम्बर एक अमीर होने की ललक में वह सब भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार करने को तैयार है, जिसका परिणाम भले ही उसे सुख-चैन से ना रहने दे।
          आर्थिक विकास का मतलब उत्पादन और खपत में वृद्धि होता है, जिसके लिए ऊर्जा की अधिक जरूरत होती है। पृथ्वी की ऊर्जा पैदा करने की शक्ति सीमित है, इसलिए हमें कम ऊर्जा से अधिक उत्पादन के रास्ते पर चलना होगा। प्रत्येक देश के लिए जरूरी होता है कि वह अपने देश में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप ही उत्पादन करे। जिन देशों में पानी की कमी है, उन देशों में अंगूर और गन्ने की फसल उगाना बेवकूफी है। इसीलिए सऊदी अरब, तेल के निर्यात से विकास कर रहा है। इसी प्रकार भारत को पश्चिमी देशों के ऊर्जा मॉडल को अपनाना निहायत ही बेवकूफी भरा प्रश्न है। ऊर्जा के उत्पादन के लिए हमें अपने संसाधनों पर नज़र डालते हुए उसके विकल्प के उपाय सोचने होंगे, हम जापान की नकल नहीं कर सकते।

          इन्दिरा गॉंधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेन्ट रिसर्च, मुम्बई के एक अध्ययन में पाया गया है कि ऊर्जा की खपत तथा आर्थिक विकास में सम्बन्ध नहीं दिखाई देता। इसी अध्ययन में निष्कर्ष निकला है कि आर्थिक विकास से ऊर्जा की खपत बढ़ती है और यह सम्बन्ध एक दिशा में चलता है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा संरक्षण के कदमों का आर्थिक विकास पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा, यानी ऊर्जा की खपत कम होने पर भी आर्थिक विकास प्रभावित नहीं होगा। आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा का महत्व कम होने का कारण है, सेवा क्षेत्र का विस्तार। भारत की आय में सेवा क्षेत्र का हिस्सा 1971 में 32 फीसदी से बढ़कर 2006 में 54 फीसदी हो गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस 54 फीसदी आय को अर्जित करने में देश की केवल 8 फीसदी ऊर्जा ही लगी। सॉफ्टवेयर, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, सिनेमा इत्यादि में ऊर्जा कम लगती है।
          इसलिए ऊर्जा संकट से निपटने का सीधा हल है कि हम ऊर्जा सघन उद्योगों जैसे स्टील एवंएल्यूमीनियम के उत्पादन को निरूत्साहित करें। सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने तथा देश में भरपूर गन्ने की फसल होने के कारण उसकी खोई से बिजली पैदा करने के संयंत्रों को प्रोत्साहित करें और उस बिजली के वितरण की व्यवस्था सरकार सुनिश्चित कराये। गन्ने की खोई से बनायी जाने वाली विद्युत से उस पूरे शहर की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है जहॉंपर इसका उत्पादन किया जाये। इस पर यदि सरकारें कार्य करें तो मेरा दावा है कि ऊर्जा संकट को ऊर्जा की अधिकता में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी प्रकार मोटे अनाजों की पैदावार को बढ़ाने के उपाय किये जाये जिसमें कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
          देश के उद्योगपतियों की पीड़ा में एक गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। असल विषय ऊर्जा के मूल्य का है। बिजली मंहगी होती है तो बिजली उत्पादित करने वाले उद्यमियों को लाभ, किन्तु खपत करने वाले उद्यमियों को हानि होती है। इसके विपरीत बिजली का दाम कम रखा जाता है तो उत्पादकों को हानि एवं उपभोक्ताओं को लाभ होता है, चूंकि हमारे उद्यमी सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की परिभाषा पर अमल करते हैं इसलिए चाहते हैं कि उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं दोनों को ही लाभ हो। इसका फॉर्मूला उन्होंने पी0एम0 को सुझाया है कि कोयले का दाम सस्ता रहे तो बिजली का दाम कम होने पर भी उत्पादक लाभ कमा सकेंगे और उपभोक्ता को सस्ती बिजली मिल जाएगी, इसीलिए वे कोयले के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे हैं।
          ऊर्जा के संकट से इस तरह भी आसानी निपटा जा सकता है। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों के अनुसार 2004 से 2012 के बीच बिजली की घरेलू खपत में 7.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है जबकि सिंचाई, उद्योग तथा कामर्शियल के लिए बिजली की खपत में मात्र 2.7 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब हुआ कि बिजली की जरूरत फ्रिज और एयर कंडीशनर चलाने के लिए ज्यादा और उत्पादन के लिए कम है। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि देश के आर्थिक विकास के लिए बिजली का उत्पादन बढ़ाना कोई अपरिहार्य चुनौती नहीं है।
          क्रूर सच्चाई यह है कि बिजली की जरूरत मध्यम एवं उच्च वर्ग की विलासितापूर्णं जिन्दगी जीने के लिए अधिक है। शीर्श उद्योगपति मुकेश भाई अम्बानी के घर का मासिक बिजली का बिल ही 76 लाख रूपये से कम का नहीं आता है। दिल्ली की कोठियों में चार व्यक्ति के परिवार का मासिक बिजली का बिल 50,000 होना सामान्य सी बात हो गई है। चार व्यक्तियों के परिवार में आठ-आठ कारें हैं जो प्रतिदिन सैकड़ों लीटर पैट्रोल फूंकती हैं। इस प्रकार की ऊर्जा की बर्बादी के  लिए सस्ता घरेलू कोयला उपलब्ध कराकर पोषित करना कौन सी बुद्धिमानी एवं देशहित में है?
          गरीबों को बिजली उपलब्ध कराने के नाम पर हम बिजली का उत्पादन बढ़ा रहे हैं और उत्पादित बिजली को उच्च वर्ग के ऐशोआराम के लिए सस्ते में उपलब्ध करा रहे हैं। गरीब के गॉंव से एक किलोमीटर दूर से भी यदि बिजली का तार चला गया तो उस पूरे गॉंव को ही विद्युतीकृत मान लेने की परिभाषा सरकार ने आखिरकार क्यों गढ़ी हुई है। उच्च वर्ग के बिजली उपभोग पर अंकुश लगाने की कवायद क्यों नहीं की जा रही है? यदि उत्पादित बिजली का 25 प्रतिशत हिस्सा गॉंव के उपभोग के लिए सुरक्षित कर दिया जाये तो देश के हर घर में बिजली उपलब्ध हो जायेगी, यह मेरा दावा है।
          मेरा सुझाव है कि तुरन्त कोयले का दाम बढ़ाकर अन्र्तराष्ट्रीय मूल्य के बराबर कर देना चाहिए। आर्थिक विकास के लिए हमें सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना होगा। ऊर्जा सघन उद्योगों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसी के साथ उत्पादित बिजली के दाम भी मध्यम (जिनकी प्रतिमाह बिजली की खपत 1000 यूनिट से अधिक है) एवं उच्च वर्ग के लिए बढ़ा दिये जाने चाहिए, जिससे उत्पादक कम्पनियों को लाभ हो तथा खपत पर अंकुश लगे। उत्पादित बिजली का 25 प्रतिशत गॉव की जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सस्ते मूल्य पर दिया जाना चाहिए। गन्ने की खोई से बिजली उत्पादन की यूनिटों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा उनके द्वारा उत्पादित बिजली की वितरण व्यवस्था बिजली निगम को संभालनी चाहिए। इसी के साथ 1000 यूनिट प्रतिमाह से अधिक खर्च करने पर प्रति यूनिट 25 रूपये तथा 1000 यूनिट से 2500 यूनिट प्रतिमाह खर्च करने वाले से 50 रूपये प्रति यूनिट एवं इससे ऊपर उपभोग करने वाले से 100 रूपया प्रति यूनिट चार्ज किया जाना चाहिए। (सतीश प्रधान)