Sunday, 15 April 2012

नज़ारा ऑखों का....रस्सी जल गई, ऐंठन नहीं गई

          लखनऊ 14 अप्रैल। उपरोक्त लोकोक्ति प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं सुश्री मायावती पर एक दम खरी उतरती है,क्योंकि आज भी वे जिस ठसके में चल रही हैं वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले किसी राजनेता की हो ही नही सकती। इसे तो विशुद्ध तानाशाही ही कहा जा सकता है जो लोकतंत्र को पैरों तले रौंद कर खड़ी होती है। चौदह अप्रैल को डा0 भीम राव अम्बेडकर की 121वीं जयन्ती पर गोमती नगर स्थित सामाजिक परिर्वतन स्थल पर अम्बेडकर की मूर्ति को श्रद्धांजली अर्पित करने हेतु बहुजन समाज पार्टी की ओर से मीडिया को एक ईमेल भेजा गया जिसमें प्रातः साढे 10 बजे बसपा की नेत्री सुश्री मायावती द्वारा श्रद्धांजली अर्पित किये जाने की कवरेज किये जाने का अनुरोध था।
          प्रातः 10:15 से ही पत्रकारगण सामाजिक परिर्वतन स्थल पर एकत्र हो गये लेकिन वह 10:15 की जगह 11:40 मिनट पर सामाजिक परिर्वतन स्थल की बजाय अम्बेडकर पार्क में पहुंची तथा वहॉ से सीधे हूटर और सॉयरन बजवाती हुई सामाजिक परिर्वतन स्थल पर बगैर रूके (जहॉ पर दो दर्जन से अधिक कैमरामैन और पत्रकार कवरेज के लिए इंतजार कर रहे थे) सीधे चली गर्इं। ऐसा नही है कि उन्हें अपनी गाडी में से पत्रकारगण दिखाई न दिये हों अथवा उनके साथ में चल रहे अन्य लोगों ने यह नज़ारा न देखा हो, लेकिन अपने दम्भ में लबालब भरी मायावती ऐसे नदारत हो गयीं कि एकत्रित लोगों को यह अन्तर उजागर करने पर मजबूर होना पडा कि देखिये एक वर्तमान का संस्कारवान और शालीन मुख्यमंत्री है जो बगैर किसी सायरन, बगैर किसी हूटर,बगैर चलते ट्रैफिक को रूकवाये बडी शालीनता से कार के अंदर से ही जनता को नमस्कार करते हुए गुजर जाता हैं वहीं दूसरी ओर इस प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती हैं,जिन्हें आम जनता (जिसमें उनके समाज के भी लोग हैं) से नफरत है, मीडिया से महानफरत और हूटर, सायरन, काले रंग के गाडी के शीशे, सिक्योरिटी के ताम-झाम से बेहद लगाव है। उन्हें 15 फिट उंची चाहारदीवारी से बेलाग मोहब्बत है, लेकिन खुले मैदान में आने में शर्म आती है।
          वर्तमान में उत्तर प्रदेश की बागडोर ऐसी शख्सियत के हाथ में है जो अपने को अकबर महान की श्रेणी में लाने की कोशिश कर रहा है। यह बात दीगर है कि उनके पास अभी नौ क्या बीरबल जैसा एक रत्न भी नहीं है। सुना तो है कि उनके पास आईआईएम की एक टीम है जो उन्हें सलाह देती है, लेकिन मेरे विश्लेषण के हिसाब से उनकी पूरी टीम में शायद ही कोई ऐसा व्यक्तित्व हो जो उन्हें बेलाग, बेबाग, उचित और जनता के कल्याणार्थ सलाह दे पा रहा हो।
          मीडिया को सामाजिक परिर्वतन स्थल पर आमंत्रित करके नजरे़ छुपा कर भाग जाने का क्या औचित्य? मीडिया को क्या सुश्री मायावती अपना गुलाम समझती हैं कि पहुंचना हो 12 बजे और मीडिया को बुला लें 10:30 बजे। क्या इससे यह नही समझना चाहिए कि वे अभी भी सत्ता के नशे में हैं, जबकि उन्हें तो मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने जिस भी उॅचाई को प्राप्त किया है, उसके बेस में मीडिया की ही मेहरबानी है। यह बात दीगर है जब वह सत्ता में आर्इं तो मीडिया के उस वर्ग को भूल गर्इं जिसने उनकी जान बचाई थी और उस वर्ग को मलाई चट कराई जो उनके सचिव डा0 विजय शंकर पाण्डे और नवनीत सहगल के लगुए-भगुए थे।
          सामाजिक परिर्वतन स्थल से प्रातः11:47 पर लौटते वक्त कालीदास मार्ग का चक्कर लगाने का निर्णय इस उद्देश्य के साथ लिया गया कि देखा जाय कि मुख्यमंत्री के आवास के सामने वाली सड़क का क्या नज़ारा है। कालीदास मार्ग के मेन हाइटगेट से निकलते समय वहॉ की चेक पोस्ट पर बैठी पुलिस ने न तो रौबीले अंदाज में रोकने की कोशिश की और न ही तलाशी ली। आहिस्ता-आहिस्ता गाड़ी जब 5-कालीदास मार्ग की ओर बढ़ी तो दिखाई दिया,गरीबों की रहन सहन वाला एक दीन-हीन हुजूम जो पैदल ही उस रास्ते से गुज़र रहा था जो उसकी ही बहिन जी की सरकार में उस सड़क को देखने के लिए तरस गया था। उसी भीड़ में यह भी सुनाई दिया कि वाह! क्या मुख्यमंत्री है! कितनी सादगी से रहता है! एक अपनी बहिन जी रहीं, जो हम कभी भी इह सड़क पर आ ही नही पाये। बतावो हमरे लिए भी इह सडक बन्द रही। का मतलब बहिन जी के मुख्यमंत्री रहिन का?
          5-कालीदास मार्ग पर लगा सिक्योरिटी का कोई भी बंदा संगीन ताने,टेरर का माहौल उत्पन्न करते दिखाई नहीं दिया। इससे आगे बढ़ने पर 4-5 साइकिलों पर दूधिये अपने मस्त अंदाज में साइकिल पर दूध की केन लटकाये गुजरते दिखाई दिये। इन्हीं के पीछे पूरा मुंह ढ़के लेकिन केवल ऑखें खुली रखकर 2-3 लड़कियां पैदल ही बिना किसी भय के रास्ता पार करते दिखाई दीं। इस पूरे नजारे ने यह सिद्ध कर दिया कि उत्तर प्रदेश से कर्नल गद्दाफी का शासन खत्म हो गया है और वास्तव में सच्चा लोकतंत्र बहाल हो गया है।
The Security personnel deployed at the time of CM-Mayawati, now has been lifted by the succeeded CM-Akhilesh yadav
          इस सच्चे लोकतंत्र का सबसे बडा उदाहरण है मेरी कलम,जो आज सरपट दौड रही है,जिसकी स्याही सुश्री मायावती के शासन काल में पेन से बाहर आने में डरती थी। दो पत्रकारों को मायावती राज में प्रमुख सचिव रहे डा0 विजय शंकर पाण्डे ने ऐसा प्रताड़ित किया कि वे पूरे बसपा के शासन काल में सचिवालय तक में आने से घबराते रहे, बावजूद इसके कि उनके प्रवेश पर लगी रोक को माननीय हाईकोर्ट ने बदस्तूर चालू कर दिया था। उनका कहना था कि माननीय हाईकोर्ट के आदेश का क्या औचित्य रह जायेगा यदि डा0 विजय शंकर पाण्डे ने सचिवालय ऐनक्सी में हमारे प्रवेश करने पर आईपीसी की किसी दूसरी धारा में हमें जेल में बंद करा दिया! यह भी सत्य है कि इस पूरी घटना से सुश्री मायावती का कोई लेना देना नहीं था। इसके कर्ता-धर्ता थे घोड़ा व्यापारी और काले धन के सौदागर हसन अली के दोस्त डा0 विजय शंकर पांडे।
          एक राजनीतिक दल के अध्यक्ष के ये वाक्य मेरे कान में अब भी गूंज रहे हैं कि जो मीडिया इमरजन्सी में नही डरा,वही मीडिया सुश्री मायावती की अघोषित इमरजेंसी में क्यों थर-थर कांप रहा था? इसका जवाब मैं कलम के माध्यम से अब दे रहा हॅू। दरअसल उस समय मीडिया इसलिए कांप रहा था क्योंकि मीडिया तो नौकर है अपने अधिष्ठान का, और अधिष्ठान है पूंजीपतियों के हाथ में, जिसने मीडिया में प्रवेश किया है, केवल मात्र अपने गोरखधंधे को बचाने के लिए, इससे फायदा कमाने के लिए और मीडिया का इस्तेमाल कर लाइजनिंग करते हुए अपना रसूख बढ़ाने के लिए। उस मालिक के अधीन कार्य करने वाले बहुतेरे पत्रकारों का अपना परिवार है,बाल हैं,बच्चे हैं,जिन पर न तो सरकार मेहरबानी करती है ना ही मालिक। इसलिए उनकी आवाज कैसे निकले। जो सुबह-शाम की दाल रोटी में ही परेशान हैं उसकी कैसी आवाज? और जिसकी सुबह शाम दारू और रंगीनियों में गुजर रही है उसकी आवाज ही कहॉ निकलती है,वो तो केवल बहकता है और गुलामी में ही जिन्दगी जीता है।
          यदि सरकारें मीडिया को चाटूकार ना बनाएं और चाटूकारों को अपने से दूर रखे तथा बिल्डर-माफिया, पूंजीपतियों के अखबारों एवं इलेक्ट्रानिक चैनलों को सरकारी मदद देना बंद कर दें तो उस सरकार को उसके द्वारा किये जा रहे कार्यौ की समीक्षा स्वयं मिल जायेगी और वह आसानी से जान जायेगी कि वह कितने पानी में है। वह झूठी प्रसंशा,झूठे आकडों और झूठे प्रचार से अपने को गढ्ढे में गिरने से निश्चित रूप से बचा ले जायेगी।
अभी-अभी पुनः बसपा के कार्यालय से उसके सचिव राम अवतार मित्तल की ओर से डा0 भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती पर 15 अप्रैल को जिला आगरा में खेरिया एयरपोर्ट के निकट धनौली मैदान पर आयोजित की जाने वाली रैली की कवरेज के लिए मीडिया को आमंत्रित किया गया है,यह बताते हुए कि इस कार्यक्रम में पूरे प्रदेश से पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी व प्रमुख कार्यकर्ता भाग लेंगे। अब इससे मीडिया को क्या लेना देना कि इसमें जिम्मेदार पदाधिकारी भाग लेंगे कि गैर जिम्मेदार? यदि बसपा की ओर से यह बताया जाता कि उसकी पार्टी के ये गैर जिम्मेदार पदाधिकारी हैं जो भाग नही लेंगे तो बात बनती। अब लखनऊ का मीडिया तो किस श्रद्धा से बसपा का कार्यक्रम कवर करेगा बसपा ही जाने,लेकिन आज से मैं तो मुंह पिटाने से रहा।
          अन्त में मेरी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को सलाह है कि वे अपने साथ नौ नही मात्र तीन रत्न ही ढूंढ़ कर रख लें तो निश्चित रूप से वह उत्तर प्रदेश पर अगले 25 वर्षो तक निरंतर राज करते रहेंगे। ये अतिश्योक्ति अथवा चमचागिरी में कहे गये शब्द नही है,अपितु क्रूड एनालिसिस और उनका व्यक्तित्व है जो उन्हें किसी भी उंचाई पर पहुंचने से रोक नहीं सकता, यदि उन्होंने अपनी कार्यशैली में इसी तरह इजाफा किया तो। (सतीश प्रधान)