Sunday, 1 July 2012

पत्रकारों की सम्पत्ति का खुलासा क्यों नहीं?


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने अपनी सरकार की छवि साफ सुथरी रखने के लिए अपने सभी मंत्रियों के वास्ते आचार संहिता तय कर दी है। मुख्यमंत्री ने न सिर्फ मंत्रियों को अपनी व परिवार के सभी सदस्यों की संपत्ति घोषित करने का निर्देश दिया है अपितु पांच हजार से अधिक का उपहार लेना भी प्रतिबंधित कर दिया है। इसके लिए उन्होंने सभी मंत्रियों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के प्राविधानों को भी पत्र में संलग्नक के रूप में भेजा है। मंत्री को अपने उन रिश्तेदारों का भी विवरण देना होगा जो उनपर आश्रित हैं। यह विवरण सिर्फ अचल सम्पत्ति तक ही सीमित नहीं है, अपितु यदि किसी के पास शेयर हैं, नकदी व ज्वैलरी है तो इसका भी विवरण देना होगा। पाँच हजार से अधिक मूल्य के उपहार को उन्होंने सरकारी सम्पत्ति घोषित कर दिया है।
ऐसी स्थिति में जबकि उ0प्र0 के मुख्यमंत्री ने मंत्रियों के लिए सम्पत्ति के खुलासे को अनिवार्य कर दिया है, और जब आई0ए0एस0, आई0पी0एस0 एवं पी0सी0एस0 अधिकारियों पर सम्पत्ति की घोषणा करने के लिए न्यायालय तक दखल दे चुका है तो राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकार इससे अछूते क्यों हैं? यहॉं पर समस्त पत्रकारों की बात नहीं की जा रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश के राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए तो इसे अपरिहार्य बनाया ही जाना चाहिए। चौथा खम्भा कहलाने में हमें बड़ा गर्व महसूस होता है, लेकिन जब बाकी तीनों खम्भों के लिए सम्पत्ति का खुलासा करना अपरिहार्य हो गया है, तो फिर राज्य मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों पर ये प्रतिबन्ध क्यों नहीं? श्री अखिलेश यादव का यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय एवं प्रशंसनीय है।
मुख्यालय पर मान्यताप्राप्त पत्रकारों को निर्देशित किया जाना चाहिए कि वे अपनी सम्पत्ति का खुलासा तीस दिन के अन्दर करें, अन्यथा कि स्थिति में उनकी मुख्यालय पर मान्यता निरस्त कर देनी चाहिए। इसी प्रकार जो पत्रकार मुख्यालय की मान्यता के लिए आवेदन करता है या उसकी सिफारिश/संस्तुति जो संस्थान करता है उसे उसके आवेदन के साथ सम्पत्ति के खुलासे का प्रमाण संलग्न करना चाहिए एवं बगैर इसके उस पत्रकार को राज्य मुख्यालय की मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। सूचना निदेशक, सूचना सचिव, सचिव मुख्यमंत्री एवं प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री को ऐसा प्रारूप तैयार कराना चाहिए जिससे पत्रकार आन-लाइन सम्पत्ति की घोषणा कर सकें। साथ ही प्रतिवर्ष इसको अद्यतित किये जाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
ध्यान रहे इसी लखनऊ में ऐसे-ऐसे पत्रकार हैं जो करोड़पति ही नहीं अपितु अरबपति हैं। पत्रकारिता से वेतन के नाम पर उनको पन्द्रह हजार भी वेतन नहीं मिलता है, लेकिन करोड़ों की अचल सम्पत्ति के वे मालिक हैं, बड़ी-बड़ी स्पोट्‌र्स यूटिलिटी व्हीकिल्स (एस0यू0वी0) से वे अपने तो घूमते ही हैं, कुछ तथाकथित बड़े कहलाने वाले पत्रकारों को भी ऐसे वाहन उपलब्ध कराकर उनकी आत्मा को तृप्त करते हुए ओबलाइज करते हैं। यही तथाकथित बड़े कहलाने वाले पत्रकार उन जैसे संदिग्ध एवं आय से अधिक सम्पत्ति धारण करने वाले पत्रकारों को प्रश्रय एवं संरक्षण दिये हुए हैं।
संदिग्ध एवं गलत धन्धों में लिप्त, बिल्डर और माफिया पत्रकारिता के पेशे में घुसकर अपने जैसे ही लोगों को पत्रकार का ठप्पा लगाकर सचिवालय एनेक्सी के मीडिया सेन्टर में घुसा चुके हैं। गैराज से अखबार निकालने वाले लोग आज की तारीख में कई करोड़ के आसामी ही नहीं हैं अपितु इनका नेक्सस इतना तगड़ा है कि कई एस0पी0, सी0ओ0, दारोगा इनके नेक्सस का हिस्सा हैं। इनकी सच्चाई का जो भी पत्रकार खुलासा करने की हिम्मत करता है, उसे यह जबरन फंसाने के लिए फर्जी एफ0आई0आर0 विभिन्न थानों में लिखवा देते हैं, जिसमें यही दरोगा, सी0ओ0, एस0पी0 और तो और एस0एस0पी0 (आई0जी0रेन्क के अधिकारी तक) इनकी खुले आम चाहे-अनचाहे मदद करते हैं।
क्या इससे कोई इंकार कर सकता है कि आई0बी0 की सूचना पर जो सतर्कता, सचिवालय मुख्य भवन, सचिवालय एनेक्सी, बापू भवन, राज्यपाल भवन के लिए बरतनी पड़ी उसमें किसी ऐसी व्यक्ति का हांथ नहीं है, जो पत्रकारिता के पेशे में घुसा हुआ है। जब महाराष्ट्र की शिक्षामंत्री की संलिप्तता आतंकवादियों से हो सकती है, तो पत्रकारिता के पेशे में ऐसे भेड़ियों की क्यों नहीं, आखिरकार इसकी गारण्टी कौन देगा। इसलिए राज्य मुख्यालय पर मान्यता पाये और मान्यता चाहने वाले पत्रकारों की जॉंच एल0आई0यू0 के स्थान पर आई0बी0 से होनी चाहिए।
सचिवालय एनेक्सी में लगे सी0सी0टी0वी0 कैमरों की रिकार्डिंग में क्या इसकी मॉनीटरिंग होती है कि कौन व्यक्ति कैसे और किस व्यवस्था के तहत पंचम तल तक पहुंच रहा है, और वहॉं कर क्या रहा है। ट्रान्सफर-पोस्टिंग के धन्धे में लगे इन तथाकथित पत्रकारों की जॉंच आखिरकार क्यों नहीं होती? कोई अपने को सचिव मुख्यमंत्री श्रीमती अनीता सिंह का खास बताता है तो कोई अपने को शम्भू सिंह यादव का। इनमें से एक अपने को मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव का खास बताता है, जबकि मुख्यमंत्री के यहॉं उसकी एन्ट्री ही बन्द है। आखिरकार ये कैसे हो रहा है कि जब कोई भी पत्रकार पंचमतल पर बैठे अधिकारियों की मर्जी से बने पास के बगैर वहॉं नहीं पहुंच सकता तो ये कैसे ऊपर पहुंच जाते हैं? ग्रह विभाग में तिलचट्टे की तरह घुसे इन पत्रकारों की निगरानी का समय आ गया है।
अब समय आ गया है जब मुख्यालय पर पत्रकार मान्यता दिये जाने की अधिनियम के तहत नियमावली बने तथा पन्द्रह वर्ष से कम अनुभव रखने वाले किसी भी पत्रकार को राज्य मुख्यालय की मान्यता प्रदान न की जाये, भले ही वह कितने ही बड़े ग्रुप से ताल्लुक क्यों ना रखता हो, उसे लिखना-पढ़ना आता हो, जिस भाषा के समाचार-पत्र से वह मान्यता चाह रहा है उस भाषा का उसे ज्ञान हो, साथ ही ए-4 साइज का एक पन्ना वह लिखने में तो सक्षम हो, क्योंकि राज्य मुख्यालय पर एक से एक वरिष्ठ अधिकारी से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री तक यहॉं बैठते हैं, इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उनसे पत्रकार के रूप में मिलने वाले व्यक्ति को लिखना-पढ़ना आता हो, सलीका आता हो, और कुल मिलाकर वह सभ्य हो।
पत्रकारिता ही एक ऐसा पेशा है जिसके नाम पर कोई भी कहीं भी घुस सकता है। इसलिए अब इसपर निगरानी की आवश्यकता आन पड़ी है। पत्रकार मान्यता नियमावली के प्रख्यापन के साथ ही पत्रकार आवास आवंटन नियमावली-1985 को भी संशोधित किये जाने की आवश्यकता है। कितने ही पत्रकार ऐसे हैं, जिनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उनके घर वाले उस सरकारी आवास पर जबरन कब्जा बनाये हुए हैं और अपने निजी मकान को अस्सी-अस्सी हजार रूपये किराये पर उठाये हुए हैं। सरकारी आवास निरस्त होने के बावजूद उनके खिलाफ पब्लिक प्रिमाइसेज इविक्शन एक्ट के तहत कार्रवाई ना होना ही सबसे बड़ा दुखद पहलू है।
(सतीश प्रधान)