Saturday, 29 October 2016

डीएवीपी का न्यू मीडिया में भी खेल

      सतीश प्रधान    

डीएवीपी के एक निदेशक है, अनिन्दय सेनगुप्ता, जिनके पास वेबसाइट्स को सूचीबद्ध किये जाने का अधिकार के0 गणेशन, महानिदेशक डीएवीपी ने दिया है। 01 जून 2016 को उन्होंने फाइल नं0 Dir(New Media) /EAC/Websites/2014/New Media  दिनांक 01 जून 2016 से वेबसाइट्स के सूचीबद्धीकरण और उनके रेट फिक्स करने के लिए पालिसी गाइडलाइन बनाई और डीएवीपी की साइट पर अपलोड की। यहाॅं भी एक अलग स्कैण्डल तैयार हो रहा है।
उक्त गाइडलाइन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आफिस मेमो नं/45/2011-MUC  दिनांक 25 मई 2016 के तहत जारी की गई है।इनके द्वारा जारी गाइडलाइन के प्रथम पेज को यहाॅं इसलिए स्पष्ट करना चाहता हूं कि ये अधिकारी जानबूझकर नोटिफिकेशन का गलत मतलब निकालकर मीडिया को धोखा दे रहे हैं। पालिसी के प्रथम पेज की फोटो पेस्ट की जा रही है।

इसमें सेनगुप्ता ने लिखा है कि The Policy Guidelines for Emplacement and Rate Fixation for Central Govt. Advertisements on Websites are being notified.
क्या सेनगुप्ता बतायेंगे कि इसके ड्राफट को कैबीनेट से कब पास कराया गया और इसे लोकसभा में कब प्रस्तुत किया गया? अथवा सरकार ने इसका नोटिफिकेशन कब जारी किया। 
इस नीति में इसका भी जिक्र है कि वेबसाइट को सूचीबद्ध कराने वालों के लिए अलग से प्रार्थना-पत्र आमंत्रित किये जायेंगे। वे समय-समय पर वेबसाइट को चेक करते रहें। इसमें सेनगुप्ता ने कम्पीटेन्ट अथारिटी का जिक्र किया है, लेकिन ये नहीं बताया है कि आखिरकार काम्पीटेन्ट अथारिटी है, कौन?
इस तथाकथित नीति में यूनिक यजर्स की बात की गई है। वेबसाइट सूचीबद्धता को तीन भागों में विभक्त किया गया है। ए, बी, एवं सी कैटेगरी। सी कैटेगरी के लिए न्यूनतम ढ़ाई लाख से बीस लाख यूनिक यूजर्स, बी केटेगरी के लिए बीस लाख एक से पचास लाख तक, एवं आ कैटेगरी के लिए पचास लाख प्लस यूनीक यूजर्स की शर्त रखी गई है अब इसे देखिए, ये शर्त व्यावहारिक है अथवा अव्यावहारिक।
डीएवीपी ने अपनी वेबसाइट वर्ष 2012 में बनाई है और आज दिनांक 29 अक्टूबर 2016 के दो बजकर दस मिनट तक उसकी ही वेबसाइट को क्लिक करने वालों की संख्या 1,77,75,232 (दो करोड़ सत्तर लाख पचहत्तर हजार दो सौ बत्तीस) है। जबकि हालात ये हैं कि अपने ही कम्प्यूटर पर एक के बाद, दूसरी, तीसरी,..........दसवीं विण्डो आप खोलें तो 30 सेकण्ड में ही विजिटर की संख्या 100 से भी ऊपर पहुंच जाती है। यानी ये यूनीक यूजर्स नहीं हैं।
यूजर्स तो आप अकेले ही हैं, लेकिन जितनी बार आप डीएवीपी की विण्डो  खोलेंगे उतने ही नम्बर इसके बढ़ जायेंगे। अब देखिये 2012 से इस गति  से चल रही इस वेबसाइट की हालत की इन लगभग 55 महीनों में उसकी साइट पर विजिटर्स की संख्या हुई 3,23,186 (तीन लाख तेईस हजार एक सौ छियासी) ये पेज व्यू हैं, यूनीक यूजर्स नहीं। इसके यूनिक यूज़र्स निकाले जायँ  तो ये बीस हज़ार से अधिक नहीं बैठेंगे। देखिए जब वेबसाइट सूचीबद्ध करने वाले डीएवीपी संस्थान की हालत ये है कि वो स्वंय सी  केटेगरी में नही आ रहा, तो अन्य का आना कैसे सम्भव है, जबकि डीएवीपी की वेबसाइट रोजाना खोलना तो लाखों लोगों की मजबूरी है।
Websites will get the advertisements like this.
इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि डीएवीपी के ये अधिकारी कितने नासमझ, अव्यवहारिक और वास्तविकता से दूर हैं। ये कौन सी वेबसाइट्स को सूचीबद्ध करना चाहते हैं, और डीएवीपी के फण्ड को किस तरीके से साइफन करना चाहते हैं, ये जाँच का विषय है.
सुनने में आया है कि वेबसाइट को सूचीबद्ध करने का रेट आठ लाख रूपये है। कितना विज्ञापन ये वेबसाइट पर देंगे, ये तो लेने वाले ही जानें। जैसे प्रिन्ट में लगे अधिकारी दैनिक समाचार-पत्रों की सूचीबद्धता में दो-दो लाख ले लेते हैं, उसके बाद उनका काम खत्म। अब विज्ञापन चाहिए तो उसके लिए पचास प्रतिशत अलग से लेकर विज्ञापन दिलाने वाले दलाल को पकड़िए, वही हाल इस न्यू मीडिया में सेनगुप्ता भी करने जा रहे हैं।
हालात ये हैं कि ये वेबसाइट का सूचीबद्धीकरण कर रहे हैं अथवा ठेकेदारों का। इन्होंने तो टेण्डर निकाल दिया है। जिसमें दो तरह की बिड पड़नी हैं, एक कामर्शियल और दूसरी फायनेन्सियल। डीएवीपी के ये अधिकारी लूट का धन्धा स्थापित कर रहे हैं, वो भी नरेन्द्र मोदी की सरकार में।
स्थापित की गई इस फर्जी नीति के बिन्दु-4 के द्वितीय पैरा में लिखा है कि सूचीबद्धता के लिए विण्डों को- The Window for applications for the next panel will be opened from 01 Dec. to 31 of the previous year for the panel that will come into the following year. For example, the Window for the panel that will come into effect from April 01, 2018 shall be opened from Dec 01 to 31, 2017. The first panel under these Guidelines shall be valid till March 31, 2017.

इसके बाद भी इस फर्जी नीति के तहत अभी से आवेदन-पत्र कैसे मांग लिए गये। इतनी जल्दी सेनगुप्ता को कयों हुई? किसका दबाव था, समय से पूर्व आवेदन पत्र आमंत्रित करने की? ये गणेशन के आदेश पर हुआ अथवा सूचना सचिव श्री अजय मित्तल का वर्तमान में खोली गई विंण्डो पर फायनेन्सियल बिड़ की अन्तिम तिथि बढ़ाये जाने के बाद 10 नवम्बर 2016 है। अब जिस वेबसाइट वाले को एक वर्ष 10 नवम्बर को पूरा हो रहा है, उसका तो सेनगुप्ता ने हक़ मार ही दिया, वो भी भ्रष्टाचार के इटरेस्ट में। 
वेबसाइट के टेण्डर में भाग लेने वाले सावधान रहें, और आठ लाख रुपया कतई ना दें, क्यों कि कुछ लोग न्यायालय में जा रहे हैं। और मामला स्टे हो गया तो कब खुलेगा, पता नहीं। तबतक डीएवीपी के इन अधिकारियों पर क्या गाज गिरती है, पता नहीं।
कुछ पत्रकारों का कहना है कि इसमें से कुछ अधिकारियों ने अपना कालाधन विदेश में रखा हुआ है। और कुछ ने अभी-अभी 40 प्रतिशत देकर सफेद किया है। इनका काला धन खोजने में सी0बी0आई को भी पसीने आ जायेंगे।
सेनगुप्ता जी  वेबसाइट के लिए आवेदन की तिथि को 31 दिसम्बर 2016 तक बढ़ा दें, अन्यथा आप भी जानबूझकर लोगों को गुमराह करने, सूचना मंत्रालय को धोखे में रखने तथा वेबसाइट वालों को गुमराह करने के दाषी पाये जायेंगे। गणेशन,  नाम रख लेने मात्र से गणेश जी नहीं बचायेंगे। ऐसा ही हाल डीएवीपी के प्रकाशन विंग का भी है, जिसकी  कहानी आपको आगे बताई जाएगी। साथ ही ये भी बताया जायेगा की डीएवीपी का उक्त प्रिंटिंग प्रेस से कैसा एग्रीमेंट है। क्या वैसा ही एग्रीमेंट है, जैसा प्रोफॉर्मा उसने हम प्रकाशकों को जारी किया है. क्या उसका एग्रीमेंट भी वैसा ही नहीं होना चाहिए जैसा उसने प्रकाशकों के लिए जारी किया है।.




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